Lulla Family

योग सूत्र · पाद 4 · कैवल्य पाद

पतञ्जलि योग सूत्र · Yoga Sutras of Patanjali

पाद 4 · कैवल्य पाद · Kaivalya Pada

34 सूत्र। सबसे छोटा पाद, और सबसे गहरा। यहाँ पतञ्जलि एक हैरान करने वाली बात कहते हैं: मन खुद नहीं चमकता। बाक़ी सब उसी एक खोज की कहानी है।

34 सूत्र · पढ़ने का समय ~ 55 मिनट · पहले पढ़ें: पाद 3 (विभूति पाद) · साथ में अच्छा लगेगा: पाद 1अष्टावक्र गीता

आप यात्रा में कहाँ हैं

चौथा पाद: कैवल्य। जहाँ सब रुकता है। 34 सूत्र। पतञ्जलि अंत में कहते हैं, “पुरुषार्थ-शून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यम्।” यानी, गुणों की वापसी, पुरुष का अकेले बच रहना।

पहले एक बात

तीन पाद हो चुके, समाधि (नक्शा), साधन (रास्ता), विभूति (रास्ते की क्षमताएँ और उनकी चेतावनी)। पाद 4 अब बची हुई दार्शनिक गुत्थियाँ बाँधता है और एक साफ़ तस्वीर देता है: कैवल्य आख़िर है क्या।

यह पाद तीन काम करता है। एक, मन का असली रूप खोलता है, और यहाँ एक झटका है: मन अपनी रोशनी से नहीं चमकता, वह तो खुद देखी जाने वाली एक चीज़ है। दो, कर्म और वासना की मशीनरी खोलता है। तीन, धर्ममेघ समाधि और कैवल्य की आख़िरी परिभाषा देता है।

यह पाद सबसे सूक्ष्म है, पर सबसे फलदार भी। यहाँ पतञ्जलि एक दार्शनिक की तरह बोलते हैं, और उनकी सटीकता देखने लायक है।

इसे कैसे पढ़ें

धीरे पढ़िए। एक तर्क है, और हर सूत्र पिछले पर खड़ा होता है। असली खंभे: 4.1, 4.3, 4.7, 4.10, 4.18, 4.19, 4.22, 4.25, 4.29, 4.34। और 4.34 चारों पाद का आख़िरी सूत्र है, पूरे ग्रंथ का समापन। उस तक पहुँचते-पहुँचते रुक कर साँस लीजिए।

पतञ्जलि पाद 4 की शुरुआत पाद 3 के सूत्र को एक नया कोण देकर करते हैं। पाद 3 ने सिद्धियाँ संयम से बताई थीं, अब वे ईमानदारी से जोड़ते हैं कि क्षमताएँ सिर्फ़ संयम से नहीं आतीं। पाँच स्रोत हैं, कुछ लोग जन्म से ही ऐसी शक्ति लिए आते हैं, कुछ औषधि से थोड़ी देर के लिए मन की हालत बदल लेते हैं, मंत्र आवाज़ पर टिका अभ्यास है, तप ठान कर की गई मेहनत, और समाधि सबसे गहरा और सबसे टिकाऊ स्रोत। यह सूची एक दर्जाबंदी भी है, औषधि वाली हालत अस्थायी और भरोसे लायक नहीं, समाधि वाली सबसे पक्की। फिर पतञ्जलि बदलाव की मशीनरी समझाते हैं। जब कोई एक स्तर से दूसरे पर जाता है, तो यह कोई ज़बरदस्ती की छलाँग नहीं, प्रकृति अपने आप उस नए रूप को भर देती है, जैसे पानी अपने स्तर तक पहुँचने के लिए हर खाली जगह में ख़ुद चला जाता है। बदलाव किसी बाहरी धक्के की माँग नहीं करता, यह प्रकृति का अपना बहाव है, जब हालात इजाज़त दें।

अगली तस्वीर पतञ्जलि की सबसे प्यारी तस्वीरों में से है, और इसे ध्यान से देखिए। एक किसान को अपने खेत में पानी पहुँचाना है। वह पानी को धकेलता नहीं, बस एक छोटी मेड़ हटा देता है, और पानी ढलान से अपने आप बह जाता है। निमित्त-कारण प्रकृति को धक्का नहीं देता, वह सिर्फ़ एक रुकावट हटाता है। बदलाव की असली मशीनरी यही है। आप नई ऊर्जा डालने की कोशिश मत कीजिए, जो रुकावट ऊर्जा को रोक रही है उसे ढूँढ कर हटाइए। साधना भी यही है, कुछ हासिल करना नहीं, बाधा हटाना। और एक आगे की योगिक बात, एक सधा हुआ योगी एक से ज़्यादा मन बना सकता है, और वे सिर्फ़ शुद्ध अस्मिता, उस “मैं”-एहसास से बनते हैं। इसका सार यह है कि मन अस्मिता की एक रचना है, कोई पक्की इकलौती चीज़ नहीं, और जो रचा गया है वह तोड़ा भी जा सकता है और दोबारा अलग ढंग से जोड़ा भी।

भले कई मन बनाए जाएँ, उन सबको चलाने वाला एक ही मूल मन रहता है। हमारे भीतर भी कई उप-मन चलते हैं, काम वाला रूप, घर वाला रूप, पर अगर साधना ठहरी हुई हो तो एक केंद्रीय जागरूकता उन सबको एक सुर में बाँध देती है, वरना वे आपस में टकराते रहते हैं। फिर एक ज़रूरी फ़र्क आता है। 4.1 ने सिद्धियों के पाँच स्रोत बताए थे, अब पतञ्जलि कहते हैं कि इनमें सिर्फ़ ध्यान से जन्मा मन अनाशय है, यानी नया कर्म-गोदाम जमा नहीं करता। बाक़ी स्रोतों से जो क्षमताएँ आती हैं, वे नई कर्म-राख छोड़ती हैं, सिर्फ़ ध्यान से जन्मा मन साफ़ है। यही वजह है कि पतञ्जलि बार-बार ध्यान और समाधि को बाक़ी सबसे ऊपर रखते हैं।

अब कर्म का एक सटीक वर्गीकरण। आम लोगों का कर्म तीन रंगों में आता है, शुक्ल यानी सफ़ेद और नेक, कृष्ण यानी काला और हानिकारक, और शुक्ल-कृष्ण यानी मिला-जुला, जो सबसे आम है। योगी का कर्म एक चौथे ख़ाने में है, अशुक्ल-अकृष्ण, न सफ़ेद न काला, यानी रंगहीन। रंगहीन क्यों, क्योंकि रंग चिपक से आता है। योगी काम तो करता है पर फल से बिना बँधे, और इसलिए उसके कर्म कोई कर्म-रंग नहीं छोड़ते। काम होता है, पर राख नहीं। यह “अच्छे काम करो” से एक स्तर ऊपर है, क्योंकि अच्छे काम भी एक रंग छोड़ते हैं। फिर वासना की बारी। हमारे भीतर अनगिनत गहरी आदतें जमा हैं, पर एक समय में सब नहीं जागतीं। सिर्फ़ वही वासनाएँ जागती हैं जिनके लिए मौजूदा हालात सही हैं, बाक़ी अपने मौक़े का इंतज़ार करती सोई रहती हैं। माहौल बदलिए, और एक बिल्कुल अलग कतार सामने आ जाती है, हालात तय करते हैं कौनसा रूप सामने आए।

वासनाएँ समय के अंतराल से टूटती नहीं। बीच में चाहे सालों का फ़ासला हो, चाहे जगह बदल जाए, एक आदत वहीं से लौटती है जहाँ छूटी थी, क्योंकि याद और छाप ढाँचे में एक ही हैं। एक छाप एक जमी हुई याद है, सही धक्के पर वह फिर जाग जाती है, फ़ासले से बेअसर। फिर पतञ्जलि एक गहरा सवाल उठाते हैं, वासनाएँ कब शुरू हुईं? जवाब, कभी नहीं, उनकी कोई शुरुआत नहीं। उनकी जड़ है आशिष्, एक मूल जीने की इच्छा, वही अभिनिवेश जो पाद 2 का पाँचवाँ क्लेश था, और यह इच्छा हमेशा से रही है। पहले यह सुन कर निराशा लग सकती है, पर पतञ्जलि की बात उल्टी है। वासनाओं का पहला कारण ढूँढने में समय मत गँवाइए, उनका अंत उनकी शुरुआत समझने से नहीं, उनके आज के ढाँचे को खोलने से होगा।

और वही ढाँचा अब खुलता है। वासनाएँ अनादि ज़रूर हैं, पर बेशर्त नहीं। वे चार सहारों पर खड़ी हैं, हेतु जो उन्हें चालू करता है, फल जो वे पैदा करती हैं, आश्रय यानी मन जहाँ वे रहती हैं, और आलम्बन यानी वह चीज़ जिसकी ओर वे खींचती हैं। इन चार में से कोई भी हटाओ, ढाँचा कमज़ोर, सब हटाओ, वासना ग़ायब। एक आदत ख़त्म करने के लिए उसके इतिहास से लड़ने की ज़रूरत नहीं, उसके चार आज वाले सहारे पहचानिए और एक-एक करके हटाइए। फिर पतञ्जलि का समय-दर्शन, जो सोचने पर मजबूर कर देता है। बीता हुआ ख़त्म नहीं हुआ, आने वाला अभी “कुछ नहीं” नहीं, तीनों किसी न किसी रूप में मौजूद हैं। फ़र्क सिर्फ़ अध्व का है, कौनसे समय-दौर में कोई गुण है। अभी वाला गुण प्रकट है, बीता गुण दबा हुआ, आने वाला गुण छिपा हुआ, पर तीनों असली हैं। आधुनिक भौतिकी के block-universe मॉडल से इसकी एक दिलचस्प गूँज मिलती है।

हर गुण दो में से एक हालत में है, व्यक्त यानी प्रकट और अभी का, या सूक्ष्म यानी छिपा और बीता या आने वाला। और हर गुण, चाहे किसी भी हालत में हो, तीनों गुणों, सत्व रजस् तमस्, से बना है। यही पूरी प्रकृति का बुनियादी ताना-बाना है। फिर एक बारीक बात, कोई चीज़ “एक चीज़” क्यों दिखती है, जबकि उसमें अनगिनत गुण-कण लगातार बदल रहे हैं? क्योंकि उन सब बदलावों में एक तालमेल है, एक एकता, वे सब एक सधे हुए तरीक़े से बदल रहे हैं, और यही सधी हुई हलचल “एक चीज़” का एहसास देती है। कोई भी ठहरी हुई दिखने वाली चीज़ असल में सधे हुए बदलाव का एक पैटर्न है, जमी हुई कोई वस्तु नहीं। नदी “एक नदी” है क्योंकि उसका बहना एक सुर में है, पानी टिका हुआ नहीं।

अब पतञ्जलि एक दार्शनिक तर्क देते हैं। अगर चीज़ और मन एक ही होते, तो एक चीज़ हर मन को एक जैसी दिखती। पर ऐसा होता नहीं, एक ही पेड़, एक ही हालात, दो लोगों को बिल्कुल अलग दिखता है। इससे साबित होता है कि चीज़ का अपना स्वतंत्र अस्तित्व है और मन का अपना, दोनों अलग रास्ते हैं। यह सूत्र पतञ्जलि को “सब कुछ बस मन है” वाले नज़रिए से अलग कर देता है, प्रकृति असली है, मन से स्वतंत्र। और तर्क आगे बढ़ता है। मान लीजिए चीज़ किसी एक मन पर निर्भर है, फिर जब आप कमरे से बाहर जाते हैं और कोई उसे नहीं देख रहा, तो वह क्या होती? ग़ायब हो जाती? बेतुका। इसलिए चीज़ का होना किसी ख़ास मन पर निर्भर नहीं करता। यह “जंगल में गिरते पेड़” वाले मशहूर सवाल का पतञ्जलि का जवाब है, हाँ, पेड़ तब भी होता है जब कोई नहीं देख रहा।

अब देखने की मशीनरी। एक चीज़ तभी “जानी हुई” बनती है जब वह मन को रंग देती है, यानी मन उसका रूप ले लेता है। जो चीज़ें मन को रंग नहीं देतीं, वे अनजानी रहती हैं। यानी जानना एक मेल-मिलाप है, चीज़ और मन के बीच, चीज़ ख़ुद हमेशा वहाँ है पर “ज्ञात” तभी होती है जब मन उससे रंगा हो। फिर एक ज़रूरी मोड़। मन के contents कभी जाने जाते हैं कभी नहीं, पर पुरुष के लिए मन के सारे contents हमेशा जाने हुए हैं। क्यों, क्योंकि पुरुष अपरिणामी है, न बदलने वाला। मन बदलता रहता है इसलिए वह अपने सारे contents एक साथ नहीं देख सकता, पर पुरुष मन की हर हलचल का लगातार, बिना टूटे गवाह है। यह वही द्रष्टा है जिसकी बात पाद 1 से चल रही है, मन एक बदलती चीज़, पुरुष उसका न बदलने वाला गवाह।

यह शायद पूरे पाद का सबसे ज़रूरी सूत्र है। पतञ्जलि एक तीखी बात कहते हैं, मन अपनी रोशनी से नहीं चमकता। तर्क सीधा है, मन एक देखी जाने वाली चीज़ है, हम उसे देख सकते हैं, “आज मन बेचैन है”। और जो देखा जा सकता है वह अपनी रोशनी से नहीं चमक सकता, उसे किसी और से रोशन होना पड़ता है। वह “कोई और” पुरुष है। मन की सारी रोशनी असल में उधार की है, पुरुष की जागरूकता से, चाँद की तरह जो ख़ुद नहीं चमकता, सूरज की रोशनी लौटाता है। इसमें एक नन्ही सी बात बहुत बड़ी है, आप अपने विचार नहीं हैं, विचार देखे जा रहे हैं और देखने वाले आप हैं। फिर इसकी पुष्टि, मन एक ही समय में दोनों को, ख़ुद को और किसी चीज़ को, पक्के तौर पर नहीं जान सकता। वह या तो किसी चीज़ पर टिका है या ख़ुद पर, एक पल में एक। इसलिए मन “सब कुछ एक साथ जानने वाली” चीज़ नहीं हो सकता, वह क्षमता सिर्फ़ पुरुष में है।

पतञ्जलि एक और संभव आपत्ति बंद करते हैं। कोई कह सकता है कि मन को एक और मन देख लेता है। जवाब, तब उस दूसरे मन को कौन देखेगा? एक तीसरा? और उसको? सिलसिला कभी ख़त्म ही नहीं होगा। साथ ही, अगर अनेक मन एक-दूसरे को देखें तो यादें आपस में मिल जाएँगी, कौनसी याद किसकी, पता ही नहीं चलेगा। नतीजा, एक ही आख़िरी गवाह होना चाहिए जो ख़ुद देखा न जाए, और वह पुरुष है। फिर एक गहरा सूत्र, पुरुष यानी चिति, शुद्ध चेतना, कभी हिलती नहीं, वह मन में उतरती नहीं। तो हमें चेतना का अनुभव कैसे होता है? जब मन इतना शुद्ध और शांत हो जाता है कि वह पुरुष का रूप लौटाने लगता है, तब मन को अपनी ही समझ का बोध होता है, और वह बोध असल में पुरुष की लौटी हुई रोशनी है। सूरज नदी में उतरता नहीं, पर शांत पानी सूरज को इतनी अच्छी तरह लौटाता है कि पानी में सूरज दिखता है। पुरुष सूरज है, शुद्ध मन शांत पानी।

मन की अनोखी जगह अब साफ़ होती है। मन एक पुल है, एक तरफ़ पुरुष यानी देखने वाला, दूसरी तरफ़ चीज़ें यानी देखी जाने वाली, और मन दोनों का रंग ले सकता है। यही उसकी ताक़त है और यही उसकी सीमा। ताक़त यह कि वह सब कुछ जोड़ सकता है, सीमा यह कि वह दोनों से रंगता रहता है इसलिए ख़ुद कभी आख़िरी हक़ीक़त नहीं। मन भले अनगिनत वासनाओं से रंग-बिरंगा हो, फिर भी किसी और के लिए ही काम करता है, क्योंकि जो भी चीज़ मेल में काम करती है, अलग-अलग हिस्से मिल कर, वह किसी बड़े मक़सद की सेवा करती है। एक घड़ी के पुर्ज़े घड़ी के लिए काम करते हैं, अपने लिए नहीं, मन के सारे पुर्ज़े मिल कर पुरुष की सेवा करते हैं। यह पाद 2 की उसी बात की दोबारा कही गई गूँज है, दृश्य का होना ही द्रष्टा के लिए है, अब ख़ास तौर पर मन के बारे में।

अब एक मोड़ का बिंदु। एक बार किसी ने साफ़-साफ़ देख लिया कि मन और पुरुष अलग हैं, तो “मैं यह मन हूँ” वाली पुरानी आदत ख़ुद ही रुक जाती है। शब्द देखिए, विनिवृत्ति, यह कोशिश से नहीं रुकती, अपने आप रुकती है, उस देख लेने के नतीजे में। आप एक झूठी पहचान से लड़ते नहीं, बस सच देख लेते हैं और झूठ अपनी पकड़ छोड़ देता है, देख लेना ही असली हस्तक्षेप है। फिर एक सुंदर तस्वीर। निम्न और प्राग्भार, दोनों का अर्थ है ढलान, गुरुत्व का खिंचाव। एक बार झूठी पहचान रुकी, तो मन का सहज झुकाव बदल जाता है, पहले वह चीज़ों की ओर ढलता था, अब विवेक की ओर, कैवल्य की ओर ढलता है, जैसे पानी ढलान की ओर बहता है। यह सबसे हिम्मत बँधाने वाले सूत्रों में से है, एक दहलीज़ के बाद साधना चढ़ाई वाली जद्दोजहद नहीं रहती, उतराई वाला बहाव बन जाती है। मन ख़ुद आज़ादी की ओर बहने लगता है।

पर यह बहाव सीधा-सपाट नहीं, और पतञ्जलि एक ईमानदार चेतावनी देते हैं। बीच-बीच में दरारें आती हैं, और उन दरारों में पुरानी छापें फिर से बोध भेजती हैं। यह वापस फिसलना सामान्य है, बहुत आगे का साधक भी पुराने पैटर्नों की अचानक वापसी से गुज़रता है। इसे नाकामी समझना आसान है, पर असल में यह पुरानी छापों का अभी पूरी तरह न मिटना है, और पतञ्जलि इसे पहले से बता देते हैं ताकि कोई हिम्मत न हारे। इन बीच में उठने वाले बोधों को हटाएँ कैसे? उसी तरह जैसे क्लेश हटाते हैं, पाद 2 के तरीक़े से, सूक्ष्म वालों को उल्टी यात्रा से और जागे हुए वालों को ध्यान से। नई technique की ज़रूरत नहीं, पुराने औज़ार यहाँ भी काम करते हैं।

और अब पाद 4 का शिखर, सबसे सुंदर शब्द के साथ, धर्ममेघ, धर्म का बादल। एक और शब्द बेहद ख़ूबसूरत है, अकुसीद। कुसीद का अर्थ है ब्याज, अकुसीद यानी जो किसी भी चीज़ से ब्याज कमाना नहीं चाहता, सबसे ऊँचे ध्यान के इनामों तक से नहीं। यह पाद 3 की उसी गूँज है, सर्वज्ञता तक से वैराग्य। जब यह पूरी पकड़-रहितता लगातार विवेक के साथ हो, तब धर्ममेघ समाधि आती है। नाम बादल क्यों, क्योंकि एक बादल की तरह यह समाधि एक शुद्ध बारिश करती है, सद्गुण की, समझ की, और आख़िर में मुक्ति की, बिना कुछ माँगे, चुपचाप अपने आप बरसती जाती है। सबसे ऊँची उपलब्धि के सामने भी “और चाहिए” का न होना, यही वह आख़िरी चाल है। जब तक एक भी चीज़ चाहिए, चाहे वह सबसे ऊँची आध्यात्मिक उपलब्धि ही क्यों न हो, आज़ादी अधूरी है।

धर्ममेघ समाधि का पहला फल यह कि पाँचों क्लेश, अविद्या अस्मिता राग द्वेष अभिनिवेश, और कर्म का बाँधने वाला चक्कर, दोनों रुक जाते हैं। ग़ौर कीजिए, कर्म का बाँधना रुकता है, कर्म नहीं। मुक्त इंसान काम करता रहता है, वही अशुक्ल-अकृष्ण कर्म, पर वह अब कोई राख नहीं बनाता, चक्कर टूट गया। फिर एक चौंकाने वाली तस्वीर। हम सोचते हैं ज्ञान जमा करने की चीज़ है, जितना पढ़ो उतना ज़्यादा, पर पतञ्जलि उल्टा कहते हैं। जब सारे परदे और मैल हट जाते हैं, ज्ञान असीम हो जाता है, कोई सीमा नहीं, इसलिए गिना नहीं जा सकता, और उस असीम के सामने जो भी “जानने को बाक़ी” है वह छोटा सा रह जाता है। यह ज्ञान का एक उलट-फेर है, साधारण ज्ञान जोड़ने से बढ़ता है, यह ज्ञान परदों के घटने से प्रकट होता है। वही किसान वाला सूत्र फिर याद आता है, सब कुछ रुकावट हटाने का खेल है।

अब तीनों गुण अपना काम समेटने लगते हैं। सत्व रजस् तमस् पूरी प्रकृति बनाते हैं और लगातार बदलते रहते हैं, पर उनका मक़सद क्या था? पुरुष को अनुभव और आख़िर में मुक्ति देना। जब वह मक़सद पूरा हो जाता है, यानी पुरुष मुक्त हो गया, तो गुणों के बदलावों का सिलसिला, उस ख़ास पुरुष के लिए, रुक जाता है। एक तरह का retirement नहीं, बल्कि काम का पूरा हो जाना, गुण उस पुरुष के लिए अब कोई और रूप नहीं बनाते। फिर पतञ्जलि क्रम यानी समय के स्वभाव पर लौटते हैं। क्रम पलों की एक कतार है, हर पल अगले से जुड़ा, पर वह पूरी तरह तभी पकड़ में आता है जब बदलाव ख़त्म हो जाए। बीच में होते हुए सिलसिले का पूरा पैटर्न दिखता नहीं, आख़िर में ही, पीछे मुड़ कर, पूरा क्रम समझ में आता है। किसी भी लंबी प्रक्रिया का असली पैटर्न उसके दौरान साफ़ नहीं दिखता, बिंदु पीछे मुड़ कर ही जुड़ते हैं।

और अब पूरे योग सूत्र का आख़िरी सूत्र। 196 सूत्रों की पूरी यात्रा यहाँ ख़त्म होती है, ज़रा रुक कर साँस लीजिए। पतञ्जलि कैवल्य की दो परिभाषाएँ देते हैं, एक ही चीज़ के दो कोण। पहला कोण प्रकृति की तरफ़ से, गुणों का काम पूरा हो गया, उनके पास इस पुरुष के लिए और कुछ करने को नहीं, तो वे प्रतिप्रसव यानी अपने स्रोत में वापस घुल जाते हैं, प्रकृति का नाटक इस पुरुष के लिए समाप्त। दूसरा कोण पुरुष की तरफ़ से, चिति-शक्ति का अपने रूप में टिक जाना, शुद्ध चेतना की शक्ति अपने ही असली रूप में आ बैठती है, कहीं जाने या कुछ पाने वाली बात नहीं, बस वह जो हमेशा से था, अब बिना किसी परदे के। यह पाद 1 के “तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्” का पूरा होना है, 196 सूत्र पहले पतञ्जलि ने कहा था कि लहरें थमें तो द्रष्टा अपने रूप में आ ठहरता है, और आख़िरी सूत्र वही बात है, अब पूरी यात्रा के बाद। और शब्द इति गौर करने लायक है, संस्कृत ग्रंथ इति से ख़त्म होते हैं, बस यहीं पाठ पूरा। पतञ्जलि किसी बड़े भाषण या भावुक समापन में नहीं उतरते, बस कैवल्य की परिभाषा, और इति। पूरा ग्रंथ एक बंद घेरा है, उसने 1.2 में बात रखी थी और 4.34 में उसकी आख़िरी हालत दे दी, और यही उसकी असली ख़ूबसूरती है।

पढ़ कर आगे क्या

चारों पाद अब पूरे। 196 सूत्र की यह पूरी यात्रा एक बार फिर, धीरे, पढ़ने लायक है, दूसरी बार पढ़ने पर आख़िरी सूत्र की रोशनी में पहले सूत्र अलग दिखते हैं। यही असली मज़ा है।

इसी site पर: अष्टावक्र गीता ठीक यही कैवल्य एक बिल्कुल अलग रास्ते से कहती है, पतञ्जलि का रास्ता कदम-दर-कदम है, अष्टावक्र का एक ही छलाँग। दोनों को साथ पढ़ना दोनों को रोशन कर देता है।

बाहर का एक सुझाव: पूरे ग्रंथ के लिए, स्वामी हरिहरानंद आरण्य की “Yoga Philosophy of Patanjali”, क्रिया योग परम्परा से जुड़ा सबसे आधिकारिक आधुनिक भाष्य।

और एक सवाल जेब में रखिए: 1.2 (लहरों का थमना) और 4.34 (चिति-शक्ति का अपने रूप में टिकना), क्या ये एक ही बात हैं, या यात्रा ने कुछ बदला? इस एक सवाल में पूरा ग्रंथ है। जल्दी मत कीजिए।

मूल पाठ: पतञ्जलि योग सूत्र, मानक देवनागरी संस्करण (व्यास-भाष्य परम्परा)।

जिन भाष्यों से मदद ली: व्यास-भाष्य, स्वामी हरिहरानंद आरण्य, Edwin Bryant, स्वामी वेद भारती (हिमालयन इंस्टीट्यूट), Georg Feuerstein।

स्थायी URL: /yoga-sutras/pada-4/

आख़िरी बार देखा गया: 2026-05-21