योग सूत्र · पाद 4 · कैवल्य पाद

पतञ्जलि योग सूत्र · Yoga Sutras of Patanjali

पाद 4 · कैवल्य पाद · Kaivalya Pada

34 सूत्र। सबसे छोटा पाद, और सबसे गहरा। यहाँ पतञ्जलि एक हैरान करने वाली बात कहते हैं: मन खुद नहीं चमकता। बाक़ी सब उसी एक खोज की कहानी है।

34 सूत्र · पढ़ने का समय ~ 55 मिनट · पहले पढ़ें: पाद 3 (विभूति पाद) · साथ में अच्छा लगेगा: पाद 1, अष्टावक्र गीता

🟢 पूरा — सभी 34 सूत्र, भाष्य सहित। इसके साथ चारों पाद पूरे।

पहले एक बात

तीन पाद हो चुके — समाधि (नक्शा), साधन (रास्ता), विभूति (रास्ते की क्षमताएँ और उनकी चेतावनी)। पाद 4 अब बची हुई दार्शनिक गुत्थियाँ बाँधता है और एक साफ़ तस्वीर देता है: कैवल्य आख़िर है क्या।

यह पाद तीन काम करता है। एक, मन का असली रूप खोलता है — और यहाँ एक झटका है: मन अपनी रोशनी से नहीं चमकता, वह तो खुद देखी जाने वाली एक चीज़ है। दो, कर्म और वासना की मशीनरी खोलता है। तीन, धर्ममेघ समाधि और कैवल्य की आख़िरी परिभाषा देता है।

यह पाद सबसे abstract है, पर सबसे फलदार भी। यहाँ पतञ्जलि एक दार्शनिक की तरह बोलते हैं — और उनकी सटीकता देखने लायक है।

इसे कैसे पढ़ें

धीरे पढ़िए। यह पाद सूची नहीं, एक तर्क है, और हर सूत्र पिछले पर खड़ा होता है। असली खंभे: 4.1, 4.3, 4.7, 4.10, 4.18, 4.19, 4.22, 4.25, 4.29, 4.34। और 4.34 चारों पाद का आख़िरी सूत्र है — पूरे ग्रंथ का समापन। उस तक पहुँचते-पहुँचते रुक कर साँस लीजिए।

4.1 जन्मौषधिमन्त्रतपःसमाधिजाः सिद्धयः

janma-auṣadhi-mantra-tapaḥ-samādhi-jāḥ siddhayaḥ

शब्दार्थ: जन्म · जन्म · औषधि · जड़ी-बूटियाँ · मन्त्र · मंत्र · तपः · तप · समाधि · गहरी डूब · जाः · से जन्मी · सिद्धयः · क्षमताएँ।

अर्थ: सिद्धियाँ पाँच स्रोतों से आती हैं — जन्म, औषधि, मंत्र, तप, और समाधि।

भावार्थ: पतञ्जलि पाद 4 की शुरुआत पाद 3 के सूत्र को एक नया कोण देकर करते हैं। पाद 3 ने सिद्धियाँ संयम से बताई थीं। पतञ्जलि अब ईमानदारी से बताते हैं — सिद्धियाँ सिर्फ़ संयम से नहीं आतीं।

पाँच स्रोत: कुछ लोग जन्म से ही ऐसी क्षमताएँ रखते हैं (पाद 1 का 1.19 याद कीजिए)। औषधि — कुछ पदार्थ कुछ देर के लिए मन की हालत बदल देते हैं। मंत्र — आवाज़ पर टिका अभ्यास। तप — ठान कर की मेहनत। समाधि — सबसे गहरा, सबसे टिकाऊ स्रोत।

एक बात गौर कीजिए — यह सूची एक दर्जाबंदी भी है। औषधि वाली हालत अस्थायी और भरोसे लायक नहीं। समाधि वाली सबसे टिकाऊ। पतञ्जलि एक तरह से बता रहे हैं — असली रास्ता समाधि है, बाक़ी स्रोत कमतर हैं।

4.2 जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूरात्

jāty-antara-pariṇāmaḥ prakṛti-āpūrāt

शब्दार्थ: जाति-अन्तर · एक तरह से दूसरी तरह में, एक अवस्था से दूसरी · परिणामः · बदलाव · प्रकृति-आपूरात् · प्रकृति के “भर देने” से।

अर्थ: एक अवस्था से दूसरी में बदलाव प्रकृति के “भर देने” से होता है।

भावार्थ: पतञ्जलि बदलाव की मशीनरी समझा रहे हैं। जब कोई being एक स्तर से दूसरे पर जाता है, तो वह कोई ज़बरदस्ती की छलाँग नहीं है। प्रकृति अपने आप उस नए रूप को “भर देती है” — जैसे पानी अपने स्तर तक पहुँचने के लिए हर खाली जगह में खुद चला जाता है।

यह सूत्र एक तरह का विकास-सिद्धांत है — बदलाव किसी बाहरी धक्के की माँग नहीं करता, यह प्रकृति का अपना बहाव है, जब हालात इजाज़त दें।

4.3 निमित्तमप्रयोजकं प्रकृतीनां वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत्

nimittam-aprayojakaṁ prakṛtīnāṁ varaṇa-bhedas-tu tataḥ kṣetrikavat

शब्दार्थ: निमित्तम् · निमित्त-कारण · अप्रयोजकं · धक्का नहीं देता · प्रकृतीनां · प्रकृति की शक्तियों को · वरण-भेदः · एक रुकावट का हटना · तु · पर · ततः · उससे · क्षेत्रिकवत् · एक किसान की तरह।

अर्थ: निमित्त-कारण प्रकृति को धक्का नहीं देता; वह बस एक रुकावट हटाता है — एक किसान की तरह।

भावार्थ: पतञ्जलि की सबसे प्यारी तस्वीर। एक किसान को अपने खेत में पानी पहुँचाना है। वह पानी को “धकेलता” नहीं। वह बस एक छोटी मेड़ हटा देता है, और पानी ढलान से अपने आप बह जाता है।

बदलाव की असली मशीनरी यही है। आप बदलाव को ज़बरदस्ती नहीं लाते। आप बस रुकावट हटाते हैं, और प्रकृति का सहज बहाव बाक़ी काम कर देता है।

इसमें एक गहरी बात है: सबसे ताक़तवर हस्तक्षेप जोड़ने वाले नहीं, घटाने वाले होते हैं। नई ऊर्जा डालने की कोशिश मत कीजिए; जो रुकावट ऊर्जा को रोक रही है उसे ढूँढ कर हटाइए। साधना भी यही है — कुछ हासिल करना नहीं, बाधा हटाना।

4.4 निर्माणचित्तान्यस्मितामात्रात्

nirmāṇa-cittāny-asmitā-mātrāt

शब्दार्थ: निर्माण-चित्तानि · बनाए गए मन · अस्मिता-मात्रात् · सिर्फ़ “मैं”-एहसास से।

अर्थ: (योगी के) बनाए हुए मन सिर्फ़ अस्मिता से बनते हैं।

भावार्थ: पतञ्जलि एक आगे की योगिक बात बता रहे हैं — एक सधा हुआ योगी एक से ज़्यादा “मन” बना सकता है, और वे सिर्फ़ शुद्ध अस्मिता (“मैं”-एहसास) से बनते हैं।

अक्षरशः मानें या नहीं, इसका काम का सार यह है: मन कोई पक्की, इकलौती चीज़ नहीं है। यह अस्मिता की एक रचना है। और जो रचा गया है, वह तोड़ा भी जा सकता है, और दोबारा अलग ढंग से जोड़ा भी।

4.5 प्रवृत्तिभेदे प्रयोजकं चित्तमेकमनेकेषाम्

pravṛtti-bhede prayojakaṁ cittam-ekam-anekeṣām

शब्दार्थ: प्रवृत्ति-भेदे · कामों की विविधता में · प्रयोजकं · चलाने वाला · चित्तम् एकम् · एक मन · अनेकेषाम् · अनेकों का।

अर्थ: उन अनेक (बनाए हुए) मनों के विविध कामों को चलाने वाला एक ही (मूल) मन होता है।

भावार्थ: 4.4 की आगे की बात। भले कई मन बनाए जाएँ, उन सबको चलाने वाला एक मूल मन है।

एक काम की पढ़ाई — हमारे भीतर भी कई “उप-मन” चलते रहते हैं (काम वाला रूप, घर वाला रूप)। पर अगर साधना ठहरी हुई हो तो एक केंद्रीय, सधी हुई जागरूकता उन सबको एक सुर में बाँध देती है। इस एक सुर के बिना वे उप-मन आपस में टकराते रहते हैं।

4.6 तत्र ध्यानजमनाशयम्

tatra dhyāna-jam-anāśayam

शब्दार्थ: तत्र · उनमें (उन मनों में) · ध्यान-जम् · ध्यान से जन्मा · अनाशयम् · बिना कर्म-गोदाम के।

अर्थ: उनमें से, ध्यान से जन्मा मन बिना कर्म-गोदाम के होता है।

भावार्थ: एक ज़रूरी फ़र्क। 4.1 ने सिद्धियों के पाँच स्रोत बताए थे। 4.6 कहता है — इनमें से सिर्फ़ ध्यान से जन्मा मन “अनाशय” है, यानी नया कर्म-गोदाम जमा नहीं करता।

बाक़ी स्रोतों (औषधि, अकेला मंत्र वग़ैरह) से जो क्षमताएँ आती हैं, वे नई कर्म-राख छोड़ती हैं। सिर्फ़ ध्यान से जन्मा मन साफ़ है। यही वजह है कि पतञ्जलि बार-बार ध्यान/समाधि को बाक़ी सबसे ऊपर रखते हैं।

4.7 कर्माशुक्लाकृष्णं योगिनस्त्रिविधमितरेषाम्

karma-aśukla-akṛṣṇaṁ yoginas-tri-vidham-itareṣām

शब्दार्थ: कर्म · काम · अशुक्ल-अकृष्णं · न सफ़ेद, न काला · योगिनः · योगी का · त्रि-विधम् · तीन तरह का · इतरेषाम् · बाक़ी सबका।

अर्थ: योगी का कर्म न सफ़ेद है, न काला। बाक़ी सबका कर्म तीन तरह का होता है।

भावार्थ: कर्म का एक सटीक वर्गीकरण। आम लोगों का कर्म तीन रंगों में आता है — शुक्ल (सफ़ेद, नेक), कृष्ण (काला, हानिकारक), और शुक्ल-कृष्ण (मिला-जुला, सबसे आम)।

योगी का कर्म एक चौथे ख़ाने में है — अशुक्ल-अकृष्ण, “न सफ़ेद, न काला।” यानी रंगहीन।

रंगहीन क्यों — क्योंकि रंग चिपक से आता है। योगी कर्म करता है पर फल से बिना बँधे (गीता 2.47 की सीधी गूँज)। इसलिए उसके कर्म कोई कर्म-रंग नहीं छोड़ते। काम तो होता है, पर राख नहीं।

यह “अच्छे काम करो” से एक स्तर ऊपर है। अच्छे काम भी (शुक्ल कर्म) एक कर्म-रंग छोड़ते हैं। योगी की क्षमता है — काम करना बिना किसी रंग के, क्योंकि “मैं कर रहा हूँ” वाली चिपक नहीं है।

4.8 ततस्तद्विपाकानुगुणानामेवाभिव्यक्तिर्वासनानाम्

tatas-tad-vipāka-anuguṇānām-eva-abhivyaktir-vāsanānām

शब्दार्थ: ततः · उससे (कर्म से) · तद्-विपाक-अनुगुणानाम् · जो उसके पकने वाले हालात से मेल खाएँ · एव · सिर्फ़ · अभिव्यक्तिः · प्रकट होना · वासनानाम् · गहरी आदतों का।

अर्थ: उस कर्म से, सिर्फ़ वही वासनाएँ प्रकट होती हैं जो उसके पकने वाले हालात से मेल खाती हैं।

भावार्थ: वासना का चुनिंदा जागना। हमारे भीतर अनगिनत वासनाएँ (गहरी आदतें) जमा हैं। पर एक समय में सब जागती नहीं।

सिर्फ़ वही वासनाएँ जागती हैं जिनके लिए मौजूदा हालात सही हैं। बाक़ी सोई रहती हैं, अपने सही मौक़े का इंतज़ार करते हुए।

एक काम की पढ़ाई: एक ख़ास माहौल आपकी एक ख़ास आदतों की कतार जगा देता है। माहौल बदलिए, और एक बिल्कुल अलग कतार सामने आती है। आप कई “रूपों” का एक मेल हैं; हालात तय करते हैं कौनसा सामने आए।

4.9 जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानन्तर्यं स्मृतिसंस्कारयोरेकरूपत्वात्

jāti-deśa-kāla-vyavahitānām-apy-ānantaryaṁ smṛti-saṁskārayor-eka-rūpatvāt

शब्दार्थ: जाति-देश-काल · जन्म, जगह, समय · व्यवहितानाम् · से अलग होने पर · अपि · भी · आनन्तर्यं · बिना टूटे जुड़ाव · स्मृति-संस्कारयोः · याद और छाप का · एक-रूपत्वात् · एक ही रूप होने से।

अर्थ: जन्म, जगह, और समय से अलग होने पर भी (वासनाओं में) बिना टूटे जुड़ाव रहता है, क्योंकि याद और छाप का रूप एक ही है।

भावार्थ: वासनाएँ समय के अंतराल से टूटती नहीं। बीच में चाहे सालों का फ़ासला हो, चाहे जगह बदल जाए, एक आदत वहीं से लौटती है जहाँ छूटी थी।

क्यों — क्योंकि याद और छाप ढाँचे में एक ही हैं। एक छाप एक “जमी हुई याद” है। जब सही हालात आते हैं, वह याद फिर जाग जाती है, बीच के फ़ासले से बेअसर।

एक काम की बात: एक पुरानी आदत जो आपने सालों पहले छोड़ी थी — वह सही धक्के पर तुरंत लौट सकती है, बिल्कुल वहीं से। फ़ासला उसे मिटाता नहीं।

4.10 तासामनादित्वं चाशिषो नित्यत्वात्

tāsām-anāditvaṁ ca-āśiṣo nityatvāt

शब्दार्थ: तासाम् · उनका (वासनाओं का) · अनादित्वं · शुरुआत का न होना · आशिषः · जीने की मूल इच्छा का · नित्यत्वात् · हमेशा रहने से।

अर्थ: वासनाएँ अनादि हैं, क्योंकि जीने की मूल इच्छा (आशिष्) हमेशा से है।

भावार्थ: एक गहरी बात। पतञ्जलि पूछ रहे हैं — वासनाएँ कब शुरू हुईं? जवाब: कभी नहीं, उनकी कोई शुरुआत नहीं।

क्यों — क्योंकि उनकी जड़ है “आशिष्” — एक मूल जीने की इच्छा। यही वह अभिनिवेश है (पाद 2 का 2.9, पाँचवाँ क्लेश)। और यह मूल इच्छा हमेशा से रही है।

यह सुन कर पहले निराशा लग सकती है — अगर वासनाओं की कोई शुरुआत ही नहीं, तो उनका अंत कैसे? पर पतञ्जलि की बात उल्टी है। वासनाओं का “पहला कारण” ढूँढने में समय मत गँवाइए। उनका अंत उनकी शुरुआत समझने से नहीं, उनके आज के ढाँचे को खोलने से होगा (अगला सूत्र)।

4.11 हेतुफलाश्रयालम्बनैः सङ्गृहीतत्वादेषामभावे तदभावः

hetu-phala-āśraya-ālambanaiḥ saṅgṛhītatvād-eṣām-abhāve tad-abhāvaḥ

शब्दार्थ: हेतु · कारण · फल · नतीजा · आश्रय · आधार · आलम्बन · चीज़/सहारा · सङ्गृहीतत्वात् · इनसे बँधे होने से · एषाम् अभावे · इनके न रहने पर · तद्-अभावः · उन (वासनाओं) का न रहना।

अर्थ: वासनाएँ चार चीज़ों से बँधी रहती हैं — कारण, नतीजा, आधार, और चीज़। इन चारों के न रहने पर, वासनाएँ भी नहीं रहतीं।

भावार्थ: यह 4.10 का जवाब है। वासनाएँ अनादि हैं, पर बेशर्त नहीं। वे चार सहारों पर खड़ी हैं — हेतु (जो उन्हें चालू करता है), फल (जो वे पैदा करती हैं), आश्रय (मन, जहाँ वे रहती हैं), और आलम्बन (वह चीज़ जिसकी ओर वे खींचती हैं)।

इन चार में से कोई भी हटाओ, वासना का ढाँचा कमज़ोर। सब हटाओ, वासना ग़ायब।

एक काम की बात: एक आदत ख़त्म करने के लिए उसके इतिहास से लड़ने की ज़रूरत नहीं। उसके चार आज वाले सहारे पहचानिए — चालू करने वाला धक्का, उसका इनाम, जहाँ वह रहती है, जिस चीज़ को वह तरसती है — और उन्हें एक-एक करके हटाइए। यह आधुनिक आदत-विज्ञान से हू-ब-हू मिलता है।

4.12 अतीतानागतं स्वरूपतोऽस्त्यध्वभेदाद्धर्माणाम्

atīta-anāgataṁ svarūpato-‘sty-adhva-bhedād-dharmāṇām

शब्दार्थ: अतीत-अनागतं · बीता और आने वाला · स्वरूपतः · अपने रूप में · अस्ति · मौजूद है · अध्व-भेदात् · समय-दौर के फ़र्क से · धर्माणाम् · गुणों का।

अर्थ: बीता और आने वाला अपने रूप में मौजूद हैं; फ़र्क सिर्फ़ गुणों के समय-दौर का है।

भावार्थ: पतञ्जलि का समय-दर्शन, और यह सोचने पर मजबूर कर देता है। बीता हुआ ख़त्म नहीं हुआ, आने वाला अभी “कुछ नहीं” नहीं है। तीनों — बीता, अभी का, आने वाला — किसी न किसी रूप में मौजूद हैं।

फ़र्क “अध्व” का है — कौनसे समय-दौर में कोई गुण है। अभी वाला गुण प्रकट है; बीता गुण दबा हुआ; आने वाला गुण छिपा हुआ। पर तीनों असली हैं।

यह एक तरह का “सब-समय-एक-साथ” वाला नज़रिया है — और मज़े की बात, आधुनिक भौतिकी के block-universe मॉडल से इसकी एक दिलचस्प गूँज मिलती है। दोनों में बीता और आने वाला “अभी” किसी रूप में मौजूद हैं।

4.13 ते व्यक्तसूक्ष्मा गुणात्मानः

te vyakta-sūkṣmā guṇa-ātmānaḥ

शब्दार्थ: ते · वे (गुण) · व्यक्त-सूक्ष्माः · प्रकट या सूक्ष्म · गुण-आत्मानः · तीनों गुणों के स्वभाव वाले।

अर्थ: वे गुण या तो प्रकट हैं या सूक्ष्म, और सब तीनों गुणों के स्वभाव वाले हैं।

भावार्थ: 4.12 की आगे की बात। हर गुण दो में से एक हालत में है — व्यक्त (प्रकट, यानी अभी का) या सूक्ष्म (छिपा, यानी बीता या आने वाला)। और हर गुण — चाहे किसी भी हालत में हो — तीन गुणों (सत्व, रजस्, तमस्) से बना है। यही पूरी प्रकृति का बुनियादी ताना-बाना है।

4.14 परिणामैकत्वाद्वस्तुतत्त्वम्

pariṇāma-ekatvād-vastu-tattvam

शब्दार्थ: परिणाम-एकत्वात् · बदलाव की एकता / एक-दिशा से · वस्तु-तत्त्वम् · किसी चीज़ का असली होना।

अर्थ: बदलाव की एकता से किसी चीज़ का “एक चीज़ होना” बनता है।

भावार्थ: एक बारीक बात। कोई चीज़ “एक चीज़” क्यों दिखती है, जबकि उसमें अनगिनत गुण-कण लगातार बदल रहे हैं?

जवाब: क्योंकि उन सब बदलावों में एक तालमेल, एक एकता है। वे सब एक सधे हुए तरीक़े से बदल रहे हैं। यही सधी हुई हलचल ही “एक चीज़” का एहसास देती है।

एक तस्वीर: कोई भी ठहरी हुई चीज़ असल में जमी हुई चीज़ नहीं है — यह सधे हुए बदलाव का एक पैटर्न है। नदी “एक नदी” है क्योंकि उसका बहना एक सुर में है, पानी टिका हुआ नहीं।

4.15 वस्तुसाम्ये चित्तभेदात्तयोर्विभक्तः पन्थाः

vastu-sāmye citta-bhedāt-tayor-vibhaktaḥ panthāḥ

शब्दार्थ: वस्तु-साम्ये · चीज़ एक ही होने पर · चित्त-भेदात् · मनों के फ़र्क से · तयोः · दोनों का (चीज़ और मन) · विभक्तः पन्थाः · अलग-अलग रास्ते।

अर्थ: एक ही चीज़ को अलग-अलग मन अलग देखते हैं — इससे साबित होता है कि चीज़ और मन दो अलग चीज़ें हैं।

भावार्थ: पतञ्जलि एक दार्शनिक तर्क दे रहे हैं। अगर चीज़ और मन एक ही होते (शुद्ध idealism), तो एक चीज़ हर मन को एक जैसी दिखती।

पर ऐसा होता नहीं। एक ही चीज़ — एक पेड़, एक हालात — दो लोगों को बिल्कुल अलग दिखती है। इससे साबित — चीज़ का अपना स्वतंत्र अस्तित्व है, मन का अपना। दोनों अलग “रास्ते” हैं।

यह सूत्र पतञ्जलि को “सब कुछ बस मन है” वाले नज़रिए से अलग कर देता है। प्रकृति असली है, मन से स्वतंत्र।

4.16 न चैकचित्ततन्त्रं वस्तु तदप्रमाणकं तदा किं स्यात्

na ca-eka-citta-tantraṁ vastu tad-apramāṇakaṁ tadā kiṁ syāt

शब्दार्थ: न · नहीं · एक-चित्त-तन्त्रं · एक मन पर निर्भर · वस्तु · चीज़ · तद्-अप्रमाणकं · जब उससे न देखी जा रही हो · तदा किं स्यात् · तब वह क्या होती।

अर्थ: चीज़ किसी एक मन पर निर्भर नहीं है। (अगर होती, तो) जब वह मन उसे देख नहीं रहा हो, तब वह चीज़ क्या होती?

भावार्थ: 4.15 का तर्क आगे। पतञ्जलि एक मज़ेदार चाल चल रहे हैं।

मान लो चीज़ किसी एक मन पर निर्भर है। फिर जब आप कमरे से बाहर जाते हैं और कोई उस चीज़ को नहीं देख रहा — तो वह क्या होती? ग़ायब हो जाती? बेतुका। इसलिए चीज़ का होना किसी ख़ास मन पर निर्भर नहीं करता।

यह “जंगल में गिरते पेड़” वाले मशहूर दार्शनिक सवाल का पतञ्जलि का जवाब है — हाँ, पेड़ तब भी होता है जब कोई नहीं देख रहा।

4.17 तदुपरागापेक्षित्वाच्चित्तस्य वस्तु ज्ञाताज्ञातम्

tad-uparāga-apekṣitvāc-cittasya vastu jñāta-ajñātam

शब्दार्थ: तद्-उपराग · उस (चीज़) से रंग जाना · अपेक्षित्वात् · की ज़रूरत होने से · चित्तस्य · मन का · वस्तु · चीज़ · ज्ञात-अज्ञातम् · जानी हुई या अनजानी।

अर्थ: चीज़ जानी हुई है या अनजानी — यह इस पर निर्भर है कि उसने मन को “रंगा” है या नहीं।

भावार्थ: देखने की मशीनरी। एक चीज़ तभी “जानी हुई” बनती है जब वह मन को “रंग” देती है — यानी मन उसका रूप ले लेता है (पाद 1 का 1.41 — स्फटिक वाला सूत्र)।

जो चीज़ें मन को रंग नहीं देतीं, वे “अनजानी” रहती हैं। यानी जानना एक मेल-मिलाप है — चीज़ और मन के बीच। चीज़ खुद हमेशा वहाँ है, पर वह “ज्ञात” तभी होती है जब मन उससे रंगा हो।

4.18 सदा ज्ञाताश्चित्तवृत्तयस्तत्प्रभोः पुरुषस्यापरिणामित्वात्

sadā jñātāś-citta-vṛttayas-tat-prabhoḥ puruṣasya-apariṇāmitvāt

शब्दार्थ: सदा · हमेशा · ज्ञाताः · जानी हुई · चित्त-वृत्तयः · मन की हलचलें · तत्-प्रभोः · उनके मालिक · पुरुषस्य · पुरुष की · अपरिणामित्वात् · न बदलने वाली प्रकृति से।

अर्थ: मन की हलचलें हमेशा (पुरुष को) जानी हुई रहती हैं, क्योंकि उनका मालिक पुरुष न बदलने वाला है।

भावार्थ: एक ज़रूरी सूत्र। मन के contents कभी जाने जाते हैं, कभी नहीं (4.17)। पर पुरुष के लिए मन के सारे contents हमेशा जाने हुए हैं।

क्यों — क्योंकि पुरुष अपरिणामी है, न बदलने वाला। मन बदलता रहता है, इसलिए वह अपने सारे contents एक साथ नहीं देख सकता। पुरुष कभी बदलता नहीं, इसलिए वह मन की हर हलचल का लगातार, बिना टूटे गवाह है।

यह वही “द्रष्टा” है जिसकी बात पाद 1 (1.3) से चल रही है। मन एक बदलती चीज़ है; पुरुष उसका न बदलने वाला गवाह।

4.19 न तत्स्वाभासं दृश्यत्वात्

na tat-sva-ābhāsaṁ dṛśyatvāt

शब्दार्थ: न · नहीं · तत् · वह (मन) · स्व-आभासं · अपनी रोशनी से चमकने वाला · दृश्यत्वात् · क्योंकि वह खुद देखी जाने वाली चीज़ है।

अर्थ: मन अपनी रोशनी से नहीं चमकता, क्योंकि वह खुद एक देखी जाने वाली चीज़ है।

भावार्थ: शायद पाद 4 का सबसे ज़रूरी सूत्र। पतञ्जलि एक तीखी दार्शनिक बात कह रहे हैं — मन अपनी रोशनी से नहीं चमकता।

तर्क सीधा है: मन एक देखी जाने वाली चीज़ है (हम उसे देख सकते हैं — “आज मन बेचैन है”)। जो देखा जा सकता है, वह अपनी रोशनी से नहीं चमक सकता; उसे किसी और से रोशन होना पड़ता है।

वह “कोई और” पुरुष है। मन की सारी “रोशनी” असल में उधार की है — पुरुष की जागरूकता से। चाँद की तरह — खुद नहीं चमकता, सूरज की रोशनी लौटाता है।

इसमें एक छोटी सी बात बहुत बड़ी है: आप अपने विचार नहीं हैं। विचार देखे जा रहे हैं; देखने वाले आप हैं। यह एक नन्हा सा सूत्र है पर पूरी आत्म-खोज की नींव।

4.20 एकसमये चोभयानवधारणम्

eka-samaye ca-ubhaya-anavadhāraṇam

शब्दार्थ: एक-समये · एक ही समय में · च · और · उभय · दोनों · अनवधारणम् · पक्के तौर पर नहीं जान सकता।

अर्थ: मन एक ही समय में दोनों (खुद को और किसी चीज़ को) पक्के तौर पर नहीं जान सकता।

भावार्थ: 4.19 की पुष्टि। अगर कोई कहे कि मन खुद को भी जान सकता है और चीज़ को भी — पतञ्जलि कहते हैं नहीं, एक साथ दोनों नहीं।

मन या तो किसी चीज़ पर टिका है, या खुद पर। एक पल में एक। इसलिए मन “सब कुछ एक साथ जानने वाली” चीज़ नहीं हो सकता — वह क्षमता सिर्फ़ पुरुष में है (4.18)।

4.21 चित्तान्तरदृश्ये बुद्धिबुद्धेरतिप्रसङ्गः स्मृतिसङ्करश्च

citta-antara-dṛśye buddhi-buddher-atiprasaṅgaḥ smṛti-saṅkaraś-ca

शब्दार्थ: चित्त-अन्तर-दृश्ये · अगर एक मन को दूसरा मन देखे · बुद्धि-बुद्धेः · बोध के बोध का · अतिप्रसङ्गः · न ख़त्म होने वाला सिलसिला · स्मृति-सङ्करः · याद का घालमेल · च · और।

अर्थ: अगर एक मन को दूसरा मन देखता, तो “बोध के बोध” का न ख़त्म होने वाला सिलसिला बन जाता, और याद में घालमेल।

भावार्थ: पतञ्जलि एक और संभव आपत्ति बंद कर रहे हैं। कोई कह सकता है — “मन को एक और मन देख लेता है।” पतञ्जलि का जवाब: तब उस दूसरे मन को कौन देखेगा? एक तीसरा? और उसको? सिलसिला कभी ख़त्म ही नहीं होगा।

साथ ही, अगर अनेक मन एक-दूसरे को देखें, तो यादें आपस में मिल जाएँगी — कौनसी याद किसकी, पता ही नहीं चलेगा।

नतीजा: एक ही आख़िरी गवाह होना चाहिए जो खुद देखा न जाए — पुरुष। इस सिलसिले का यही इकलौता साफ़ हल है।

4.22 चितेरप्रतिसंक्रमायास्तदाकारापत्तौ स्वबुद्धिसंवेदनम्

citer-apratisaṁkramāyās-tad-ākāra-āpattau sva-buddhi-saṁvedanam

शब्दार्थ: चितेः · शुद्ध चेतना की · अप्रतिसंक्रमायाः · जो हिलती नहीं, कहीं जाती नहीं · तद्-आकार-आपत्तौ · जब (मन) उसका रूप ले लेता है · स्व-बुद्धि-संवेदनम् · अपनी ही बुद्धि का बोध।

अर्थ: शुद्ध चेतना खुद कहीं नहीं जाती (अचल है)। जब मन उसका रूप ले लेता है, तब “अपनी ही बुद्धि का बोध” होता है।

भावार्थ: एक गहरा सूत्र। पुरुष (चिति, शुद्ध चेतना) कभी हिलती नहीं — वह मन में “उतरती” नहीं।

फिर हमें चेतना का अनुभव कैसे होता है? जब मन इतना शुद्ध और शांत हो जाता है कि वह पुरुष का रूप लौटाने लगता है। तब मन को अपनी ही समझ का बोध होता है — और वह बोध असल में पुरुष की लौटी हुई रोशनी है।

एक तस्वीर: सूरज नदी में “उतरता” नहीं। पर शांत पानी सूरज को इतनी अच्छी तरह लौटाता है कि पानी में सूरज दिखता है। पुरुष सूरज है, शुद्ध मन शांत पानी।

4.23 द्रष्टृदृश्योपरक्तं चित्तं सर्वार्थम्

draṣṭṛ-dṛśya-uparaktaṁ cittaṁ sarva-artham

शब्दार्थ: द्रष्टृ · देखने वाला (पुरुष) · दृश्य · देखी जाने वाली चीज़ें · उपरक्तं · दोनों से रंगा · चित्तं · मन · सर्व-अर्थम् · सब कुछ समझने में सक्षम।

अर्थ: मन, जो देखने वाले और देखी जाने वाली चीज़ — दोनों से रंगा होता है, सब कुछ समझने में सक्षम है।

भावार्थ: मन की अनोखी जगह। मन एक पुल है — एक तरफ़ पुरुष (देखने वाला), दूसरी तरफ़ चीज़ें (देखी जाने वाली)। मन दोनों का रंग ले सकता है।

यही मन की ताक़त है — और यही उसकी सीमा। ताक़त: वह सब कुछ जोड़ सकता है। सीमा: वह दोनों से रंगता रहता है, इसलिए वह खुद कभी आख़िरी हक़ीक़त नहीं।

4.24 तदसङ्ख्येयवासनाभिश्चित्रमपि परार्थं संहत्यकारित्वात्

tad-asaṅkhyeya-vāsanābhiś-citram-api para-arthaṁ saṁhatya-kāritvāt

शब्दार्थ: तद् · वह (मन) · असङ्ख्येय-वासनाभिः · अनगिनत आदतों से · चित्रम् अपि · रंग-बिरंगा होने पर भी · पर-अर्थं · किसी और के लिए · संहत्य-कारित्वात् · क्योंकि वह मेल में काम करता है।

अर्थ: मन, अनगिनत वासनाओं से रंग-बिरंगा होने पर भी, किसी और के लिए ही काम करता है — क्योंकि वह मेल में काम करता है।

भावार्थ: एक ज़रूरी तर्क। मन बहुत पेचीदा है (अनगिनत वासनाएँ)। पर इतना पेचीदा होने पर भी, वह अपने लिए नहीं — किसी और के लिए काम करता है।

तर्क: जो भी चीज़ “मेल में” काम करती है (अलग-अलग हिस्से मिल कर), वह किसी बड़े मक़सद की सेवा करती है। एक घड़ी के पुर्ज़े घड़ी के लिए काम करते हैं, अपने लिए नहीं। मन के सारे पुर्ज़े मिल कर पुरुष की सेवा करते हैं।

यह पाद 2 के सूत्र 2.21 (“दृश्य का होना ही द्रष्टा के लिए है”) की दोबारा कही गई बात है, अब ख़ास तौर पर मन के बारे में।

4.25 विशेषदर्शिन आत्मभावभावनाविनिवृत्तिः

viśeṣa-darśina ātma-bhāva-bhāvanā-vinivṛttiḥ

शब्दार्थ: विशेष-दर्शिनः · जो (मन और पुरुष का) भेद देख लेता है · आत्म-भाव-भावना · “मन ही मैं हूँ” वाली आदत · विनिवृत्तिः · ख़त्म हो जाना।

अर्थ: जो (मन और पुरुष का) भेद देख लेता है, उसमें “मन ही मैं हूँ” वाली आदत अपने आप ख़त्म हो जाती है।

भावार्थ: एक मोड़ का बिंदु। एक बार किसी ने साफ़-साफ़ देख लिया कि मन और पुरुष अलग हैं — तो “मैं यह मन हूँ” वाली पुरानी आदत खुद ही रुक जाती है।

शब्द देखिए — “विनिवृत्ति।” यह कोशिश से नहीं रुकती। यह अपने आप रुक जाती है, उस देख लेने के नतीजे में। आप एक झूठी पहचान से लड़ते नहीं; आप बस सच देख लेते हैं, और झूठ अपनी पकड़ छोड़ देता है।

एक काम की बात: किसी भी गहरी झूठी मान्यता को इच्छाशक्ति से नहीं हटाया जाता। उसे साफ़-साफ़ देख लेने भर से वह गिर जाती है। देख लेना ही असली हस्तक्षेप है।

4.26 तदा विवेकनिम्नं कैवल्यप्राग्भारं चित्तम्

tadā viveka-nimnaṁ kaivalya-prāg-bhāraṁ cittam

शब्दार्थ: तदा · तब · विवेक-निम्नं · विवेक की ओर ढलता हुआ · कैवल्य-प्राग्भारं · कैवल्य की ओर खिंचता हुआ · चित्तम् · मन।

अर्थ: तब मन विवेक की ओर ढलने लगता है, कैवल्य की ओर खिंचता है।

भावार्थ: एक सुंदर तस्वीर। “निम्न” और “प्राग्भार” — दोनों का अर्थ है ढलान, गुरुत्व का खिंचाव।

एक बार झूठी पहचान रुक गई (4.25), तो मन का सहज झुकाव बदल जाता है। पहले वह चीज़ों की ओर ढलता था; अब वह विवेक की ओर, कैवल्य की ओर ढलता है — जैसे पानी ढलान की ओर बहता है।

यह सबसे हिम्मत बँधाने वाले सूत्रों में से है। एक दहलीज़ के बाद, साधना चढ़ाई वाली जद्दोजहद नहीं रहती — यह उतराई वाला बहाव बन जाती है। मन खुद आज़ादी की ओर बहने लगता है।

4.27 तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः

tac-chidreṣu pratyaya-antarāṇi saṁskārebhyaḥ

शब्दार्थ: तत्-छिद्रेषु · उस (बहाव) की दरारों में · प्रत्यय-अन्तराणि · दूसरे बोध · संस्कारेभ्यः · पुरानी छापों से।

अर्थ: उस (कैवल्य की ओर बहाव) की दरारों में, पुरानी छापों से दूसरे बोध उठ आते हैं।

भावार्थ: एक ईमानदार चेतावनी। 4.26 की प्रगति सीधी-सपाट नहीं है। बीच-बीच में दरारें आती हैं, और उन दरारों में पुरानी छापें फिर से बोध भेजती हैं।

एक काम की बात: यह वापस फिसलना सामान्य है। बहुत आगे का साधक भी पुराने पैटर्नों की अचानक वापसी से गुज़रता है। यह नाकामी नहीं — यह बस पुरानी छापों का अभी पूरी तरह न मिटना है। पतञ्जलि इसे पहले से बता देते हैं, ताकि कोई हिम्मत न हारे।

4.28 हानमेषां क्लेशवदुक्तम्

hānam-eṣāṁ kleśavad-uktam

शब्दार्थ: हानम् · हटाना · एषां · इन (दूसरे बोधों) का · क्लेशवत् · क्लेशों की तरह · उक्तम् · बताया गया।

अर्थ: इन (पुराने बोधों) का हटाना वैसे ही होता है जैसे क्लेशों का — जैसा पहले बताया गया।

भावार्थ: पतञ्जलि पीछे की ओर इशारा कर रहे हैं। ये बीच में उठने वाले बोध कैसे हटाएँ? उसी तरह जैसे क्लेश हटाते हैं — पाद 2 के 2.10 और 2.11 के तरीक़े से (सूक्ष्म वालों को उल्टी यात्रा से, जागे हुए वालों को ध्यान से)। नई technique की ज़रूरत नहीं। पुराने औज़ार यहाँ भी काम करते हैं।

4.29 प्रसंख्यानेऽप्यकुसीदस्य सर्वथा विवेकख्यातेर्धर्ममेघः समाधिः

prasaṁkhyāne-‘py-akusīdasya sarvathā viveka-khyāter-dharma-meghaḥ samādhiḥ

शब्दार्थ: प्रसंख्याने · सबसे ऊँचे ध्यान / उसके इनामों में · अपि · भी · अकुसीदस्य · जिसकी कोई दिलचस्पी नहीं (ब्याज वाले अर्थ में — कोई जोड़ नहीं चाहता) · सर्वथा · हर तरह से · विवेक-ख्यातेः · लगातार विवेक से · धर्म-मेघः समाधिः · “धर्म का बादल” समाधि।

अर्थ: जिसको सबसे ऊँचे ध्यान के इनामों में भी कोई दिलचस्पी नहीं, जो हर तरह से लगातार विवेक में टिका है — उसे धर्ममेघ समाधि मिलती है।

भावार्थ: पाद 4 का शिखर। और सबसे सुंदर शब्द — धर्ममेघ, “धर्म का बादल।”

शब्द “अकुसीद” बेहद ख़ूबसूरत है। कुसीद का अर्थ है ब्याज। अकुसीद यानी जो किसी भी चीज़ से “ब्याज कमाना” नहीं चाहता — सबसे ऊँचे ध्यान के इनामों तक से नहीं। यह पाद 3 के 3.50 की गूँज है — सर्वज्ञता तक से वैराग्य।

जब यह पूरी पकड़-रहितता लगातार विवेक के साथ हो, तब धर्ममेघ समाधि आती है। नाम “बादल” क्यों — एक बादल की तरह यह समाधि एक शुद्ध “बारिश” करती है: सद्गुण, समझ, और आख़िर में मुक्ति की। यह कुछ माँगती नहीं, यह बस बरसती है।

सबसे ऊँची उपलब्धि के सामने भी “और चाहिए” का न होना — यही वह आख़िरी चाल है। जब तक एक भी चीज़ चाहिए, चाहे वह सबसे ऊँची आध्यात्मिक उपलब्धि ही क्यों न हो, आज़ादी अधूरी है।

4.30 ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः

tataḥ kleśa-karma-nivṛttiḥ

शब्दार्थ: ततः · उससे (धर्ममेघ समाधि से) · क्लेश-कर्म · क्लेश और कर्म · निवृत्तिः · ख़त्म हो जाना।

अर्थ: उससे क्लेशों और कर्मों का अंत हो जाता है।

भावार्थ: धर्ममेघ समाधि का पहला फल। पाँचों क्लेश (पाद 2 का 2.3 — अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश) और कर्म का बाँधने वाला चक्कर — दोनों रुक जाते हैं।

एक बात गौर कीजिए — कर्म रुकता नहीं, कर्म का बाँधना रुकता है। मुक्त इंसान काम करता रहता है (4.7 का अशुक्ल-अकृष्ण कर्म), पर वह कर्म अब कोई राख नहीं बनाता। चक्कर टूट गया।

4.31 तदा सर्वावरणमलापेतस्य ज्ञानस्यानन्त्याज्ज्ञेयमल्पम्

tadā sarva-āvaraṇa-mala-apetasya jñānasya-ānantyāj-jñeyam-alpam

शब्दार्थ: तदा · तब · सर्व-आवरण-मल · सारे परदे और मैल · अपेतस्य · हट जाने पर · ज्ञानस्य · ज्ञान का · आनन्त्यात् · असीम होने से · ज्ञेयम् अल्पम् · जानने को थोड़ा सा बचता है।

अर्थ: तब, सारे परदे और मैल हट जाने पर, ज्ञान असीम हो जाता है, और जानने को बहुत थोड़ा सा बचता है।

भावार्थ: एक चौंकाने वाली तस्वीर। हम सोचते हैं ज्ञान जमा करने की चीज़ है — जितना पढ़ो उतना ज़्यादा। पतञ्जलि उल्टा कह रहे हैं।

जब सारे परदे हट जाते हैं, ज्ञान असीम हो जाता है — कोई सीमा नहीं, इसलिए गिना नहीं जा सकता। और उस असीम के सामने, जो भी अभी “जानने को बाक़ी” है, वह छोटा सा रह जाता है।

यह ज्ञान का एक उलट-फेर है। साधारण ज्ञान — जोड़ने से बढ़ता है। यह ज्ञान — परदों के घटने से प्रकट होता है। यह पाद 4 के 4.3 (किसान वाला सूत्र) से जुड़ा है — सब कुछ रुकावट हटाने का खेल है।

4.32 ततः कृतार्थानां परिणामक्रमसमाप्तिर्गुणानाम्

tataḥ kṛta-arthānāṁ pariṇāma-krama-samāptir-guṇānām

शब्दार्थ: ततः · उससे · कृत-अर्थानां · जिनका मक़सद पूरा हो गया · परिणाम-क्रम · बदलावों का सिलसिला · समाप्तिः · अंत · गुणानाम् · गुणों का।

अर्थ: उससे, गुण अपना मक़सद पूरा करके, अपने बदलावों के सिलसिले को ख़त्म कर देते हैं।

भावार्थ: तीनों गुण (सत्व, रजस्, तमस्) पूरी प्रकृति बनाते हैं, और वे लगातार बदलते रहते हैं (पाद 3 के परिणाम-सूत्र)। उनका मक़सद क्या था? पुरुष को अनुभव और आख़िर में मुक्ति देना (पाद 2 का 2.18)।

जब वह मक़सद पूरा हो जाता है — यानी पुरुष मुक्त हो गया — तो गुणों के बदलावों का सिलसिला, उस ख़ास पुरुष के लिए, रुक जाता है। उनका काम ख़त्म। एक तरह का retirement — गुण उस पुरुष के लिए अब कोई और रूप नहीं बनाते।

4.33 क्षणप्रतियोगी परिणामापरान्तनिर्ग्राह्यः क्रमः

kṣaṇa-pratiyogī pariṇāma-apara-anta-nirgrāhyaḥ kramaḥ

शब्दार्थ: क्षण-प्रतियोगी · पल से जुड़ा हुआ · परिणाम-अपरान्त · बदलाव के आख़िरी छोर पर · निर्ग्राह्यः · पकड़ में आने वाला · क्रमः · सिलसिला।

अर्थ: क्रम (सिलसिला) पल से जुड़ा हुआ है, और यह बदलाव के आख़िरी छोर पर ही पूरी तरह पकड़ में आता है।

भावार्थ: पतञ्जलि क्रम (समय) के स्वभाव पर लौट रहे हैं। क्रम पलों की एक कतार है — हर पल अगले से जुड़ा हुआ।

पर क्रम पूरी तरह तभी “पकड़ में” आता है जब बदलाव ख़त्म हो जाए। बीच में होते हुए, सिलसिले का पूरा पैटर्न दिखता नहीं। आख़िर में ही, पीछे मुड़ कर, पूरा क्रम समझ में आता है।

एक काम की बात: किसी भी लंबी प्रक्रिया का असली पैटर्न प्रक्रिया के दौरान दिखता नहीं — वह बाद में, अंत पर ही साफ़ होता है। बिंदु पीछे मुड़ कर ही जुड़ते हैं।

4.34 पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति

puruṣa-artha-śūnyānāṁ guṇānāṁ pratiprasavaḥ kaivalyaṁ sva-rūpa-pratiṣṭhā vā citi-śaktir-iti

शब्दार्थ: पुरुष-अर्थ-शून्यानां · पुरुष के लिए अब कोई मक़सद न रखने वाले · गुणानां · गुणों का · प्रतिप्रसवः · वापस अपने स्रोत में लौट जाना · कैवल्यं · मुक्ति, अकेलापन · स्व-रूप-प्रतिष्ठा · अपने ही रूप में टिक जाना · वा · या (दूसरे शब्दों में) · चिति-शक्तिः · शुद्ध चेतना की शक्ति · इति · इति (यहाँ ग्रंथ ख़त्म)।

अर्थ: जब गुणों के पास पुरुष के लिए कोई मक़सद नहीं बचता, तो वे अपने स्रोत में वापस लौट जाते हैं — यही कैवल्य है। या, दूसरे शब्दों में: चिति-शक्ति का अपने रूप में टिक जाना। इति।

भावार्थ: पूरे योग सूत्र का आख़िरी सूत्र। 196 सूत्रों की पूरी यात्रा यहाँ ख़त्म होती है। ज़रा रुक कर साँस लीजिए। पतञ्जलि कैवल्य की दो परिभाषाएँ देते हैं, एक ही चीज़ के दो कोण।

पहला कोण (प्रकृति की तरफ़ से): गुणों का काम पूरा हो गया। उनके पास इस पुरुष के लिए और कुछ करने को नहीं। तो वे “प्रतिप्रसव” — अपने स्रोत में वापस घुल जाते हैं। प्रकृति का नाटक, इस पुरुष के लिए, समाप्त।

दूसरा कोण (पुरुष की तरफ़ से): “चिति-शक्ति का अपने रूप में टिक जाना” — शुद्ध चेतना की शक्ति अपने ही असली रूप में आ बैठती है। कहीं जाना नहीं, कुछ पाना नहीं — बस वह जो हमेशा से था, अब बिना किसी परदे के, अपने आप में।

यह पाद 1 के दूसरे सूत्र (1.3 — “तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्”) का पूरा होना है। 196 सूत्र पहले पतञ्जलि ने कहा था: लहरें थमें तो द्रष्टा अपने रूप में आ ठहरता है। आख़िरी सूत्र वही बात है, अब पूरी यात्रा के बाद, अपने आख़िरी रूप में।

शब्द “इति” गौर करने लायक है। संस्कृत ग्रंथ “इति” से ख़त्म होते हैं — “बस, यहीं पाठ पूरा।” पतञ्जलि कोई बड़ा-सा भाषण नहीं देते, कोई भावुक समापन नहीं। बस — कैवल्य की परिभाषा, और इति। काम पूरा हुआ।

संगति: एक अच्छी तरह लिखा हुआ नक्शा अपने पहले वाले दावे पर बंद होता है, अब सिद्ध। पतञ्जलि ने 1.2 में बात रखी थी (योग = लहरों का थमना), और 4.34 में उसकी आख़िरी हालत दे दी। पूरा ग्रंथ एक बंद घेरा है — और यही उसकी असली ख़ूबसूरती है।

पढ़ कर आगे क्या

चारों पाद अब पूरे। 196 सूत्र की यह पूरी यात्रा एक बार फिर, धीरे, पढ़ने लायक है — दूसरी बार पढ़ने पर आख़िरी सूत्र की रोशनी में पहले सूत्र अलग दिखते हैं। यही असली मज़ा है।

इसी site पर: अष्टावक्र गीता ठीक यही कैवल्य एक बिल्कुल अलग रास्ते से कहती है — पतञ्जलि का रास्ता कदम-दर-कदम है, अष्टावक्र का एक ही छलाँग। दोनों को साथ पढ़ना दोनों को रोशन कर देता है।

बाहर का एक सुझाव: पूरे ग्रंथ के लिए, स्वामी हरिहरानंद आरण्य की “Yoga Philosophy of Patanjali” — क्रिया योग परम्परा से जुड़ा सबसे आधिकारिक आधुनिक भाष्य।

और एक सवाल जेब में रखिए: 1.2 (लहरों का थमना) और 4.34 (चिति-शक्ति का अपने रूप में टिकना) — क्या ये एक ही बात हैं, या यात्रा ने कुछ बदला? इस एक सवाल में पूरा ग्रंथ है। जल्दी मत कीजिए।

मूल पाठ: पतञ्जलि योग सूत्र, मानक देवनागरी संस्करण (व्यास-भाष्य परम्परा)।

जिन भाष्यों से मदद ली: व्यास-भाष्य, स्वामी हरिहरानंद आरण्य, Edwin Bryant, स्वामी वेद भारती (हिमालयन इंस्टीट्यूट), Georg Feuerstein।

स्थायी URL: /yoga-sutras/pada-4/

आख़िरी बार देखा गया: 2026-05-21