विभीषण गीता · खण्ड 4: कवच और हथियार

विभीषण गीता · खण्ड 4

कवच और हथियार

Armor and Weapons · चौपाइयाँ 8-10

रथ पर अब हथियार और कवच। हर एक एक inner शक्ति।

चौपाई 8
दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा।
बर बिग्यान कठिन कोदंडा॥
dāna parasu budhi sakti pracaṁḍā
bara bigyāna kaṭhina kodaṁḍā

अर्थ“दान, परशु। बुद्धि, प्रचण्ड शक्ति। उत्तम विज्ञान, कठोर धनुष।”

सन्दर्भतीन हथियार: दान (परशु, axe), बुद्धि (शक्ति, spear), विज्ञान (कोदण्ड, धनुष)। तीनों offense। outer fight के लिए।

पाठक के लिए“दान परशु”। दान को परशु (axe) कहा। क्यों? क्योंकि greed को काटता है। और greed बड़ा शत्रु है।

चौपाई 9
अमल अचल मन त्रोन समाना।
सम जम नियम सिलीमुख नाना॥
amala acala mana trona samānā
sama jama niyama silīmukha nānā

अर्थ“निर्मल, अचल मन, यह तरकश के समान। सम, यम, नियम, अनेक तीर।”

सन्दर्भतरकश (quiver) कहाँ से तीर निकलते। राम कहते हैं, “अचल, निर्मल mind” तरकश। और हर तीर एक virtue: सम (equanimity), यम (5 restraints), नियम (5 observances)।
चौपाई 10
कवच अभेद बिप्र गुर पूजा।
एहि सम बिजय उपाय न दूजा॥
kavaca abheda bipra gura pūjā
ehi sama bijaya upāya na dūjā

अर्थ“विप्र और गुरु की पूजा, अभेद्य कवच। इसके समान विजय का दूसरा उपाय नहीं।”

सन्दर्भ“विप्र-गुरु-पूजा”। ब्राह्मण और गुरु का सम्मान। यह “कवच”, सबसे ज़रूरी। और राम बोलते हैं, “एहि सम बिजय उपाय न दूजा”। “इसके बराबर विजय का दूसरा कोई उपाय नहीं”। यह strong statement।

पाठक के लिए“गुरु-सम्मान” को कवच कहा। क्योंकि अहंकार के तीर सबसे ख़तरनाक। और गुरु-सम्मान ही अहंकार को टालता है।

॥ कवच और हथियार ॥