विभीषण का समर्पण
Vibhishan’s Surrender · चौपाई 13 + दोहा + पाठक के लिए
राम की बात ख़त्म। विभीषण की reaction। और पाठक के लिए लगने वाली बात।
निज भुज बल चित प्रबल बरषे॥
nija bhuja bala cita prabala baraṣe
अर्थ“प्रभु के वचन सुन कर विभीषण हर्षित हुए। अपनी भुजाओं के बल पर, चित्त में प्रबल वर्षा (उत्साह) हुई।”
सुनहु सखा गुनधाम सब बुधि बल बिजय निधान॥
sunahu sakhā gunadhāma saba budhi bala bijaya nidhāna
अर्थ“इस प्रकार चार तरीक़ों से दिये जाने वाले विमल ज्ञान से विजय। सुनो मित्र, गुणधाम, बुद्धि-बल विजय का निधान है।”
सारांशविभीषण गीता का हर अङ्ग याद रखने योग्य है। 13 अङ्गों में से ज़्यादातर “inner” गुण। यानी असली जीत के लिए outer equipment नहीं, inner virtues चाहिए। और सबसे important: ये सब अलग नहीं। हर एक दूसरे पर depend। एक भी कमज़ोर हो, रथ अधूरा।
ध्वज-पताका: सत्य, शील।
घोड़े: बल, विवेक, दम, परहित।
रस्सी: क्षमा, कृपा, समता।
सारथी: ईश-भजन।
ढाल: विरक्ति।
तलवार: सन्तोष।
परशु: दान।
शक्ति: बुद्धि।
कोदण्ड: विज्ञान।
तरकश: निर्मल मन।
तीर: सम, यम, नियम।
कवच: विप्र-गुरु-पूजा।
रोज़मर्रा के लिएहर सुबह 5 मिनट: एक angle चुनो। आज “क्षमा” को rein बनाओ। कल “सन्तोष” को तलवार। एक-एक करके। 13 दिन में पूरा circuit। ज़िंदगी का “रथ” चलाने का यही तरीक़ा।