विभीषण गीता · खण्ड 5: रथ की पूर्णता

विभीषण गीता · खण्ड 5

रथ की पूर्णता

The Chariot Complete · चौपाइयाँ 11-12

रथ अब complete। राम की declaration: यह रथ हर शत्रु जीतता है।

चौपाई 11
सखा धर्ममय अस रथ जाकें।
जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें॥
sakhā dharmamaya asa ratha jākeṁ
jītana kahaṁ na katahuṁ ripu tākeṁ

अर्थ“मित्र, जिसके पास ऐसा धर्ममय रथ है, उसका कोई शत्रु कहीं नहीं जीतता।”

सन्दर्भराम का thesis। यह powerful है। न तीर, न तलवार, न कवच, न रथ की importance नहीं। मगर सबसे ऊपर “धर्ममय रथ”।
दोहा 12
महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर।
जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर॥
mahā ajaya saṁsāra ripu jīti sakai so bīra
jākeṁ asa ratha hoi dṛḍha sunahu sakhā matidhīra

अर्थ“महान्, अजय, संसार रूपी शत्रु, जिस वीर का ऐसा रथ दृढ़ है, वो उसे भी जीत सकता है। सुनो, मित्र, बुद्धिमान्।”

सन्दर्भ“संसार” को “महा-अजय रिपु” कहा। यानी सबसे बड़ा शत्रु। और इस धर्म-रथ से वो भी जीता जा सकता है।

पाठक के लिए“मतिधीर”। राम विभीषण को “मतिधीर” कह कर सम्बोधित कर रहे हैं। अब विभीषण doubt-वाला नहीं, “मति-धीर” (steady-mind वाला)।

॥ रथ की पूर्णता ॥