अंग 61

अंग
61
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਾਚਿ ਸਹਜਿ ਸੋਭਾ ਘਣੀ ਹਰਿ ਗੁਣ ਨਾਮ ਅਧਾਰਿ ॥
ਜਿਉ ਭਾਵੈ ਤਿਉ ਰਖੁ ਤੂੰ ਮੈ ਤੁਝ ਬਿਨੁ ਕਵਨੁ ਭਤਾਰੁ ॥੩॥
ਅਖਰ ਪੜਿ ਪੜਿ ਭੁਲੀਐ ਭੇਖੀ ਬਹੁਤੁ ਅਭਿਮਾਨੁ ॥
ਤੀਰਥ ਨਾਤਾ ਕਿਆ ਕਰੇ ਮਨ ਮਹਿ ਮੈਲੁ ਗੁਮਾਨੁ ॥
ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਕਿਨਿ ਸਮਝਾਈਐ ਮਨੁ ਰਾਜਾ ਸੁਲਤਾਨੁ ॥੪॥
ਪ੍ਰੇਮ ਪਦਾਰਥੁ ਪਾਈਐ ਗੁਰਮੁਖਿ ਤਤੁ ਵੀਚਾਰੁ ॥
ਸਾ ਧਨ ਆਪੁ ਗਵਾਇਆ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਸੀਗਾਰੁ ॥
ਘਰ ਹੀ ਸੋ ਪਿਰੁ ਪਾਇਆ ਗੁਰ ਕੈ ਹੇਤਿ ਅਪਾਰੁ ॥੫॥
ਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ਚਾਕਰੀ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥
ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਹਉਮੈ ਵਿਚਹੁ ਖੋਇ ॥
ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਪਾਇਆ ਲਾਭੁ ਸਦਾ ਮਨਿ ਹੋਇ ॥੬॥
ਕਰਮਿ ਮਿਲੈ ਤਾ ਪਾਈਐ ਆਪਿ ਨ ਲਇਆ ਜਾਇ ॥
ਗੁਰ ਕੀ ਚਰਣੀ ਲਗਿ ਰਹੁ ਵਿਚਹੁ ਆਪੁ ਗਵਾਇ ॥
ਸਚੇ ਸੇਤੀ ਰਤਿਆ ਸਚੋ ਪਲੈ ਪਾਇ ॥੭॥
ਭੁਲਣ ਅੰਦਰਿ ਸਭੁ ਕੋ ਅਭੁਲੁ ਗੁਰੂ ਕਰਤਾਰੁ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਮਨੁ ਸਮਝਾਇਆ ਲਾਗਾ ਤਿਸੈ ਪਿਆਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਚੁ ਨ ਵੀਸਰੈ ਮੇਲੇ ਸਬਦੁ ਅਪਾਰੁ ॥੮॥੧੨॥
साचि सहजि सोभा घणी हरि गुण नाम अधारि ॥
जिउ भावै तिउ रखु तूं मै तुझ बिनु कवनु भतारु ॥३॥
अखर पड़ि पड़ि भुलीऐ भेखी बहुतु अभिमानु ॥
तीरथ नाता किआ करे मन महि मैलु गुमानु ॥
गुर बिनु किनि समझाईऐ मनु राजा सुलतानु ॥४॥
प्रेम पदारथु पाईऐ गुरमुखि ततु वीचारु ॥
सा धन आपु गवाइआ गुर कै सबदि सीगारु ॥
घर ही सो पिरु पाइआ गुर कै हेति अपारु ॥५॥
गुर की सेवा चाकरी मनु निरमलु सुखु होइ ॥
गुर का सबदु मनि वसिआ हउमै विचहु खोइ ॥
नामु पदारथु पाइआ लाभु सदा मनि होइ ॥६॥
करमि मिलै ता पाईऐ आपि न लइआ जाइ ॥
गुर की चरणी लगि रहु विचहु आपु गवाइ ॥
सचे सेती रतिआ सचो पलै पाइ ॥७॥
भुलण अंदरि सभु को अभुलु गुरू करतारु ॥
गुरमति मनु समझाइआ लागा तिसै पिआरु ॥
नानक साचु न वीसरै मेले सबदु अपारु ॥८॥१२॥

हिन्दी अर्थ: हरि के गुणों की बरकति से हरि-नाम के आसरे से सदा स्थिर प्रभू में (जुड़ने से) अडोल अवस्था में (टिके रहने से) बहुत शोभा ( भी मिलती है)। (मैं तेरा दास विनती करता हूं- हे प्रभू) जैसे तेरी रजा हो सके~ मुझे अपने चरणों में रख। तेरे बिना मेरा खसम सांई और कोई नहीं।3। विद्या पढ़ पढ़ के (भी विद्या के अहंकार के कारण) कुमार्ग पर ही पड़ता है (गृहस्थ-त्यागियों के) भेषों से भी (मन में) बड़ा गुमान पैदा होता है। तीर्तों पर स्नान करने से भी कुछ नहीं संवार सकता। क्योंकि~ मन में (इस) अहंकार की मैल टिकी रहती है (कि मैं तीर्थ स्नानी हूँ)। (हरेक भटके हुए रास्ते में) मन (इस शरीर नगरी का) राजा बना रहता है~ सुल्तान बना रहता है। गुरू के बिनां इसको किसी और ने मति नहीं दी (कोई इसे समझा नहीं सका)।4। (हे बाबा !) गुरू की शरण पड़ के अपने मूल प्रभू (के गुणों) को विचार। गुरू की शरण पड़ने से ही (प्रभू चरणों से) प्रेम पैदा करने वाला नाम धन मिलता है। जिस जीव स्त्री ने स्वै भाव दूर किया है~ गुरू के शबद में (जुड़ के आत्मिक जीवन को स्वैभाव दूर करने का) श्रृंगार किया है। उसने गुरू के बख्शे प्रेम से अपने हृदय रूपी घर में उस बेअंत प्रभू पति को ढूंढ लिया है।5। गुरू की बताई हुई सेवा करने से चाकरी करने सेमन पवित्र हो जाता है~ आत्मिक आनंद मिलता है। जिस मनुष्य के मन में गुरू का शबद (उपदेश) बस जाता है~ वह अपने अंदर से अहम् दूर कर लेता है। जिस मनुष्य ने (गुरू की शरण पड़ के) नाम-धन हासिल कर लिया है~ उसके मन में सदा लाभ होता है। (उसके मन में आत्मक गुणों की सदैव बढ़होतरी ही होती है)।6। परमात्मा मिलता है तो अपनी मेहर से मिलता है। मनुष्य के अपने उद्यम से नहीं मिल सकता। (इस वास्ते~ हे भाई !) अपने अंदर से स्वैभाव दूर करके गुरू के चरणों में टिका रह। (गुरू की शरण की बरकति से) सदा कायम रहने वाले प्रभू के रंग में रंगे रहें~ तब वह सदा स्थिर प्रभू मिल जाता है।7। (हे बाबा ! माया ऐसी प्रबल है कि इसके चक्कर में फंस के) हरेक जीव गलती खा जाता है। सिर्फ गुरू है करतार है जो (ना माया के असर में आता है~ और) ना गलती खाता है। जिस मनुष्य ने गुरू का मति पर चल कर अपने मन को समझा लिया है~ उसके अंदर (परमात्मा का) प्रेम बन जाता है। हे नानक ! जिस मनुष्य को गुरू का शबद अपार प्रभू मिला देता है उसे सदा स्थिर प्रभू कभी भूलता नहीं।8।12।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਮਾਇਆ ਮੋਹਣੀ ਸੁਤ ਬੰਧਪ ਘਰ ਨਾਰਿ ॥
ਧਨਿ ਜੋਬਨਿ ਜਗੁ ਠਗਿਆ ਲਬਿ ਲੋਭਿ ਅਹੰਕਾਰਿ ॥
ਮੋਹ ਠਗਉਲੀ ਹਉ ਮੁਈ ਸਾ ਵਰਤੈ ਸੰਸਾਰਿ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਪ੍ਰੀਤਮਾ ਮੈ ਤੁਝ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥
ਮੈ ਤੁਝ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਭਾਵਈ ਤੂੰ ਭਾਵਹਿ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਾਮੁ ਸਾਲਾਹੀ ਰੰਗ ਸਿਉ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਸੰਤੋਖੁ ॥
ਜੋ ਦੀਸੈ ਸੋ ਚਲਸੀ ਕੂੜਾ ਮੋਹੁ ਨ ਵੇਖੁ ॥
ਵਾਟ ਵਟਾਊ ਆਇਆ ਨਿਤ ਚਲਦਾ ਸਾਥੁ ਦੇਖੁ ॥੨॥
ਆਖਣਿ ਆਖਹਿ ਕੇਤੜੇ ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਬੂਝ ਨ ਹੋਇ ॥
ਨਾਮੁ ਵਡਾਈ ਜੇ ਮਿਲੈ ਸਚਿ ਰਪੈ ਪਤਿ ਹੋਇ ॥
ਜੋ ਤੁਧੁ ਭਾਵਹਿ ਸੇ ਭਲੇ ਖੋਟਾ ਖਰਾ ਨ ਕੋਇ ॥੩॥
ਗੁਰ ਸਰਣਾਈ ਛੁਟੀਐ ਮਨਮੁਖ ਖੋਟੀ ਰਾਸਿ ॥
ਅਸਟ ਧਾਤੁ ਪਾਤਿਸਾਹ ਕੀ ਘੜੀਐ ਸਬਦਿ ਵਿਗਾਸਿ ॥
ਆਪੇ ਪਰਖੇ ਪਾਰਖੂ ਪਵੈ ਖਜਾਨੈ ਰਾਸਿ ॥੪॥
ਤੇਰੀ ਕੀਮਤਿ ਨਾ ਪਵੈ ਸਭ ਡਿਠੀ ਠੋਕਿ ਵਜਾਇ ॥
ਕਹਣੈ ਹਾਥ ਨ ਲਭਈ ਸਚਿ ਟਿਕੈ ਪਤਿ ਪਾਇ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਤੂੰ ਸਾਲਾਹਣਾ ਹੋਰੁ ਕੀਮਤਿ ਕਹਣੁ ਨ ਜਾਇ ॥੫॥
ਜਿਤੁ ਤਨਿ ਨਾਮੁ ਨ ਭਾਵਈ ਤਿਤੁ ਤਨਿ ਹਉਮੈ ਵਾਦੁ ॥
ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਗਿਆਨੁ ਨ ਪਾਈਐ ਬਿਖਿਆ ਦੂਜਾ ਸਾਦੁ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਣ ਕਾਮਿ ਨ ਆਵਈ ਮਾਇਆ ਫੀਕਾ ਸਾਦੁ ॥੬॥
ਆਸਾ ਅੰਦਰਿ ਜੰਮਿਆ ਆਸਾ ਰਸ ਕਸ ਖਾਇ ॥
ਆਸਾ ਬੰਧਿ ਚਲਾਈਐ ਮੁਹੇ ਮੁਹਿ ਚੋਟਾ ਖਾਇ ॥
ਅਵਗਣਿ ਬਧਾ ਮਾਰੀਐ ਛੂਟੈ ਗੁਰਮਤਿ ਨਾਇ ॥੭॥
सिरीरागु महला १ ॥
त्रिसना माइआ मोहणी सुत बंधप घर नारि ॥
धनि जोबनि जगु ठगिआ लबि लोभि अहंकारि ॥
मोह ठगउली हउ मुई सा वरतै संसारि ॥१॥
मेरे प्रीतमा मै तुझ बिनु अवरु न कोइ ॥
मै तुझ बिनु अवरु न भावई तूं भावहि सुखु होइ ॥१॥ रहाउ ॥
नामु सालाही रंग सिउ गुर कै सबदि संतोखु ॥
जो दीसै सो चलसी कूड़ा मोहु न वेखु ॥
वाट वटाऊ आइआ नित चलदा साथु देखु ॥२॥
आखणि आखहि केतड़े गुर बिनु बूझ न होइ ॥
नामु वडाई जे मिलै सचि रपै पति होइ ॥
जो तुधु भावहि से भले खोटा खरा न कोइ ॥३॥
गुर सरणाई छुटीऐ मनमुख खोटी रासि ॥
असट धातु पातिसाह की घड़ीऐ सबदि विगासि ॥
आपे परखे पारखू पवै खजानै रासि ॥४॥
तेरी कीमति ना पवै सभ डिठी ठोकि वजाइ ॥
कहणै हाथ न लभई सचि टिकै पति पाइ ॥
गुरमति तूं सालाहणा होरु कीमति कहणु न जाइ ॥५॥
जितु तनि नामु न भावई तितु तनि हउमै वादु ॥
गुर बिनु गिआनु न पाईऐ बिखिआ दूजा सादु ॥
बिनु गुण कामि न आवई माइआ फीका सादु ॥६॥
आसा अंदरि जंमिआ आसा रस कस खाइ ॥
आसा बंधि चलाईऐ मुहे मुहि चोटा खाइ ॥
अवगणि बधा मारीऐ छूटै गुरमति नाइ ॥७॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला १ ॥ पुत्र~ रिश्तेदार~ घर~ स्त्री (आदि के मोह) के कारण मोहनी माया की तृष्णा जीवों में व्याप रही है। धन ने~ जवानी ने~ लोभ ने~ अहंकार ने (सारे) जगत को लूट लिया है। मोह की ठग-बूटी ने मुझे भी ठग लिया है यही मोह ठॅग बूटी सारे संसार पर अपना जोर डाल रही है।1। हे मेरे प्रीतम प्रभू ! (इस ठॅग बूटी से बचाने के लिए) मुझे तेरे बिनां और कोई (स्मर्थ) नहीं (दिखता)। मुझे तेरे बिनां कोई और प्यारा नहीं लगता। जब तू मुझे प्यारा लगता है~ तब मुझे आत्मिक सुख मिलता है।1।रहाउ। (हे मन !) गुरू के शबद से संतोख धारण करके (तृष्णा के पंजे में से निकल के) प्रेम से (परमात्मा के) नाम की सिफत सलाह कर। इस नाशवंत मोह को ना देख। ये तो जो कुछ दिखाई दे रहा है सभ नाश हो जाएगा। (यहां जीव) रास्ते का मुसाफिर (बन के) आया है~ यह सारा साथ नित्य चलने वाला समझ।2। बताने को तो बेअंत जीव बता देते हैं (कि माया की तृष्णा से इस प्रकार बच सकते हैं~ पर) गुरू के बगैर सही समझ नहीं पड़ती। (गुरू की शरण पड़ के) अगर परमात्मा का नाम मिल जाए~ परमात्मा की सिफत सलाह मिल जाए अगर (मनुष्य का मन) सदा स्थिर प्रभू (के प्यार) में रंगा जाए~ तो उस लोक (परलोक में) इज्जत मिलती है। (पर~ हे प्रभू ! अपने प्रयास से कोई जीव) ना खरा बन सकता है~ ना ही खोटा रह जाता है। जो तुझे प्यारे लगते हैं वही भले हैं।3। गुरू की शरण पड़ के ही (तृष्णा के पंजे में से) निजात पायी जाती है। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य खोटी पूँजी ही जोड़ता है। परमात्मा की रची हुई ये आठ धातुओं वाली मानस काया अगर गुरू के शबद (की टकसाल) में घढ़ी जाए (सुचज्जी बनाई जाए~ तो ही यह) खिलती है (आत्मिक उल्लास में आती है)। परखने वाला प्रभू खुद ही (इसकी मेहनत मुश्क्कत को) परख लेता है और (इसके आत्मिक गुणों का) सरमाया (उसके) खजाने में (कबूल) पड़ता है।4। (हे प्रभू !) मैंने सारी सृष्टि अच्छी तरह परख कर देख ली है~ मुझे तेरे बराबर कोई नहीं दिखता ( जो मुझे माया के पंजे से बचा सके। तूं बेअंत गुणों का मालिक है) ये बयान करने से तेरे गुण की थाह नहीं पाई जा सकती। जो जीव सदा स्थिर स्वरूप में टिकता है उसको इज्जत मिलती है। गुरू की मति ले के ही तेरी सिफत सलाह की जा सकती है। पर~ तेरे बराबर का ढूंढने के वास्ते कोई बोल नहीं बोला जा सकता।5। जिस शरीर को परमात्मा का नाम प्यारा नहीं लगता~ उस शरीर में अहम् बढ़ता है~ उस शरीर में तृष्णा का बखेड़ा भी बढ़ता है। गुरू के बिनां परमात्मा से जान पहिचान नहीं बन सकती। माया का प्रभाव पड़ के परमात्मा के बिनां और तरफ का स्वाद मन में उपजता है। आत्मिक गुणों से वंचित रह कर यह मानस देह व्यर्थ जाती है और अंत को माया वाला स्वाद भी बे-रस हो जाता है।6। जीव आशा (तृष्णा) में बंधा हुआ जन्म लेता है (जब तक जगत में जीता है) आशा के प्रभाव में ही (मीठे) कसैले (आदिक) रसों (वाले पदार्थ) खाता रहता है। (उम्र खत्म हो जाने पर) आशा (तृष्णा) के (बंधन में) बंधा हुआ यहां से भेजा जाता है। (सारी उम्र आशा तृष्णा में ही फंसे रहने करके) मुड़ मुड़ मुंह पर चोटें खाता है। विकारमयी जीवन के कारण (आशा तृष्णा में) जकड़ा हुआ मार खाता है। यदि गुरू की शिक्षा लेकर प्रभू के नाम में जुड़ें~ तो ही (आसा तृष्णा के जाल में से) खलासी पा सकता है।7।

संदर्भ: यह अंग 61 है, राग Siree Raag का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

Khan Market की किताबों की दुकान में किसी पुरानी कविता-book को उठाते-उठाते।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 41 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 61” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Siree Raag राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 62 →, पीछे का: ← अंग 60

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।