अंग 62

अंग
62
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਰਬੇ ਥਾਈ ਏਕੁ ਤੂੰ ਜਿਉ ਭਾਵੈ ਤਿਉ ਰਾਖੁ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਸਾਚਾ ਮਨਿ ਵਸੈ ਨਾਮੁ ਭਲੋ ਪਤਿ ਸਾਖੁ ॥
ਹਉਮੈ ਰੋਗੁ ਗਵਾਈਐ ਸਬਦਿ ਸਚੈ ਸਚੁ ਭਾਖੁ ॥੮॥
ਆਕਾਸੀ ਪਾਤਾਲਿ ਤੂੰ ਤ੍ਰਿਭਵਣਿ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥
ਆਪੇ ਭਗਤੀ ਭਾਉ ਤੂੰ ਆਪੇ ਮਿਲਹਿ ਮਿਲਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਨ ਵੀਸਰੈ ਜਿਉ ਭਾਵੈ ਤਿਵੈ ਰਜਾਇ ॥੯॥੧੩॥
सरबे थाई एकु तूं जिउ भावै तिउ राखु ॥
गुरमति साचा मनि वसै नामु भलो पति साखु ॥
हउमै रोगु गवाईऐ सबदि सचै सचु भाखु ॥८॥
आकासी पातालि तूं त्रिभवणि रहिआ समाइ ॥
आपे भगती भाउ तूं आपे मिलहि मिलाइ ॥
नानक नामु न वीसरै जिउ भावै तिवै रजाइ ॥९॥१३॥

हिन्दी अर्थ: (जीवों के भी क्या वश? हे प्रभू !) सब जीवों में तो तू स्वयं ही बसता है। जैसी तेरी मर्जी हो~ हे प्रभू ! तू स्वयं ही (जीवों को आसा तृष्णा के जाल से) बचा। हे प्रभू ! तेरा सदा स्थिर नाम ही (जीव का) भला साथी है~ तेरा नाम ही जीव की इज्जत है~ तेरा नाम~ गुरू की मति ले के ही~ जीव के मन में बस सकता है। (हे भाई !) गुरू के सच्चे शबद के द्वारा सदा स्थिर नाम सिमर। नाम सिमरने से ही अहंकार का रोग दूर होता है।8। हे प्रभू ! आकाश में पाताल में तीनों ही भवनों में तू स्वयं ही व्यापक है। तू खुद ही (जीवों को अपनी) भक्ति बख्शता है~ अपना प्रेम बख्शता है। तू खुद ही जीवों को अपने साथ मिला के मिलाता है। हे नानक ! (प्रभू के दर पे अरदास कर) और कह, (हे प्रभू !) जैसे तुझे ठीक लगे~ वैसे तेरी रजा वर्तती है। (पर मेहर कर) मुझे तेरा नाम कभी ना भूले।9।13।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮਿ ਮਨੁ ਬੇਧਿਆ ਅਵਰੁ ਕਿ ਕਰੀ ਵੀਚਾਰੁ ॥
ਸਬਦ ਸੁਰਤਿ ਸੁਖੁ ਊਪਜੈ ਪ੍ਰਭ ਰਾਤਉ ਸੁਖ ਸਾਰੁ ॥
ਜਿਉ ਭਾਵੈ ਤਿਉ ਰਾਖੁ ਤੂੰ ਮੈ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਅਧਾਰੁ ॥੧॥
ਮਨ ਰੇ ਸਾਚੀ ਖਸਮ ਰਜਾਇ ॥
ਜਿਨਿ ਤਨੁ ਮਨੁ ਸਾਜਿ ਸੀਗਾਰਿਆ ਤਿਸੁ ਸੇਤੀ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤਨੁ ਬੈਸੰਤਰਿ ਹੋਮੀਐ ਇਕ ਰਤੀ ਤੋਲਿ ਕਟਾਇ ॥
ਤਨੁ ਮਨੁ ਸਮਧਾ ਜੇ ਕਰੀ ਅਨਦਿਨੁ ਅਗਨਿ ਜਲਾਇ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੈ ਤੁਲਿ ਨ ਪੁਜਈ ਜੇ ਲਖ ਕੋਟੀ ਕਰਮ ਕਮਾਇ ॥੨॥
ਅਰਧ ਸਰੀਰੁ ਕਟਾਈਐ ਸਿਰਿ ਕਰਵਤੁ ਧਰਾਇ ॥
ਤਨੁ ਹੈਮੰਚਲਿ ਗਾਲੀਐ ਭੀ ਮਨ ਤੇ ਰੋਗੁ ਨ ਜਾਇ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੈ ਤੁਲਿ ਨ ਪੁਜਈ ਸਭ ਡਿਠੀ ਠੋਕਿ ਵਜਾਇ ॥੩॥
ਕੰਚਨ ਕੇ ਕੋਟ ਦਤੁ ਕਰੀ ਬਹੁ ਹੈਵਰ ਗੈਵਰ ਦਾਨੁ ॥
ਭੂਮਿ ਦਾਨੁ ਗਊਆ ਘਣੀ ਭੀ ਅੰਤਰਿ ਗਰਬੁ ਗੁਮਾਨੁ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮਿ ਮਨੁ ਬੇਧਿਆ ਗੁਰਿ ਦੀਆ ਸਚੁ ਦਾਨੁ ॥੪॥
ਮਨਹਠ ਬੁਧੀ ਕੇਤੀਆ ਕੇਤੇ ਬੇਦ ਬੀਚਾਰ ॥
ਕੇਤੇ ਬੰਧਨ ਜੀਅ ਕੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਮੋਖ ਦੁਆਰ ॥
ਸਚਹੁ ਓਰੈ ਸਭੁ ਕੋ ਉਪਰਿ ਸਚੁ ਆਚਾਰੁ ॥੫॥
ਸਭੁ ਕੋ ਊਚਾ ਆਖੀਐ ਨੀਚੁ ਨ ਦੀਸੈ ਕੋਇ ॥
ਇਕਨੈ ਭਾਂਡੇ ਸਾਜਿਐ ਇਕੁ ਚਾਨਣੁ ਤਿਹੁ ਲੋਇ ॥
ਕਰਮਿ ਮਿਲੈ ਸਚੁ ਪਾਈਐ ਧੁਰਿ ਬਖਸ ਨ ਮੇਟੈ ਕੋਇ ॥੬॥
ਸਾਧੁ ਮਿਲੈ ਸਾਧੂ ਜਨੈ ਸੰਤੋਖੁ ਵਸੈ ਗੁਰ ਭਾਇ ॥
ਅਕਥ ਕਥਾ ਵੀਚਾਰੀਐ ਜੇ ਸਤਿਗੁਰ ਮਾਹਿ ਸਮਾਇ ॥
ਪੀ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਸੰਤੋਖਿਆ ਦਰਗਹਿ ਪੈਧਾ ਜਾਇ ॥੭॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਵਾਜੈ ਕਿੰਗੁਰੀ ਅਨਦਿਨੁ ਸਬਦਿ ਸੁਭਾਇ ॥
ਵਿਰਲੇ ਕਉ ਸੋਝੀ ਪਈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਨੁ ਸਮਝਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਨ ਵੀਸਰੈ ਛੂਟੈ ਸਬਦੁ ਕਮਾਇ ॥੮॥੧੪॥
सिरीरागु महला १ ॥
राम नामि मनु बेधिआ अवरु कि करी वीचारु ॥
सबद सुरति सुखु ऊपजै प्रभ रातउ सुख सारु ॥
जिउ भावै तिउ राखु तूं मै हरि नामु अधारु ॥१॥
मन रे साची खसम रजाइ ॥
जिनि तनु मनु साजि सीगारिआ तिसु सेती लिव लाइ ॥१॥ रहाउ ॥
तनु बैसंतरि होमीऐ इक रती तोलि कटाइ ॥
तनु मनु समधा जे करी अनदिनु अगनि जलाइ ॥
हरि नामै तुलि न पुजई जे लख कोटी करम कमाइ ॥२॥
अरध सरीरु कटाईऐ सिरि करवतु धराइ ॥
तनु हैमंचलि गालीऐ भी मन ते रोगु न जाइ ॥
हरि नामै तुलि न पुजई सभ डिठी ठोकि वजाइ ॥३॥
कंचन के कोट दतु करी बहु हैवर गैवर दानु ॥
भूमि दानु गऊआ घणी भी अंतरि गरबु गुमानु ॥
राम नामि मनु बेधिआ गुरि दीआ सचु दानु ॥४॥
मनहठ बुधी केतीआ केते बेद बीचार ॥
केते बंधन जीअ के गुरमुखि मोख दुआर ॥
सचहु ओरै सभु को उपरि सचु आचारु ॥५॥
सभु को ऊचा आखीऐ नीचु न दीसै कोइ ॥
इकनै भांडे साजिऐ इकु चानणु तिहु लोइ ॥
करमि मिलै सचु पाईऐ धुरि बखस न मेटै कोइ ॥६॥
साधु मिलै साधू जनै संतोखु वसै गुर भाइ ॥
अकथ कथा वीचारीऐ जे सतिगुर माहि समाइ ॥
पी अंम्रितु संतोखिआ दरगहि पैधा जाइ ॥७॥
घटि घटि वाजै किंगुरी अनदिनु सबदि सुभाइ ॥
विरले कउ सोझी पई गुरमुखि मनु समझाइ ॥
नानक नामु न वीसरै छूटै सबदु कमाइ ॥८॥१४॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला १ ॥ जिस मनुष्य का मन परमात्मा के नाम में परोया जाए~ (उसके संबंध में) मैं और क्या विचार करूँ (मैं और क्या बताऊँ? इस में कोई शक नहीं कि) जो मनुष्य प्रभू के (नाम में) रंगा जाता है~ उसको श्रेष्ठ (आत्मिक) सुख मिलता है। जिसकी सुरति शबद के (विचार में) जुड़ी हुई है~ उसके अंदर आनंद पैदा होता है। (हे प्रभू !) जैसी भी तेरी रजा हो~ मुझे भी तू (अपने चरणों में) रख। तेरा नाम (मेरे जीवन का) आसरा बन जाए।1। हे मेरे मन ! खसम प्रभू की रजा में चलना सही कार है। (हे मन !) तू उस प्रभू (के चरणों) से लिव जोड़~ जिसने ये शरीर और मन पैदा करके इन्हें सुंदर बनाया है।1।रहाउ। अगर अपने शरीर को काट काट के एक एक रक्ती भर तोल तोल के आग में हवन कर दिया जाय। अगर मैं अपने शरीर व मन को हवन सामग्री बनां दूं और हर रोज इन्हें आग में जलाऊँ। यदि इस प्रकार के अन्य लाखों करोड़ों कर्म किए जाएं~ तो भी कोई कर्म परमात्मा के नाम की बराबरी तक नहीं पहुँच सकता।2। यदि सिर के ऊपर आरा रखा के शरीर को दो फाड़ चिरवा लिया जाय~ यदि शरीर को हिमालय पर्वत (की बरफ) में गला दिया जाए~ तो भी मन में से (अहम् आदिक) रोग दूर नहीं होते। (कर्मकाण्डों की) सारी (ही मर्यादा) मैंने अच्छी तरह परख के देख ली है। कोई करम प्रभु सिमरन की बराबरी तक नहीं पहुँचता।3। यदि मैं सोने के किले दान करूँ~ बहुत सारे बढ़िया घोड़े व हाथी दान करूँ~ जमीन दान करूँ~ बहुत सारी गाऐं दान करूँ~ फिर भी (बल्कि इस दान का ही) मन में अहंकार गुमान बन जाता है। जिस मनुष्य को सतिगुरू ने सदा स्थिर प्रभू (का नाम जपने की) बख्शिश की है~ उसका मन परमात्मा के नाम में परोया रहता है (और यही है सही करनी)।4। अनेकों ही लोगों की अक्ल (तप आदि कर्मों की ओर प्रेरती है जो) मन के हठ से (किये जाते हैं)~ अनेकों ही लोग वेद आदि धर्म-पुस्तकों के अर्थ-विचार करते हैं (और इस वाद-विवाद को ही जीवन का सही राह समझते हैं)~ ऐसे और भी अनेकों ही कर्म हैं जो जीवात्मा के वास्ते फांसी का रूप बन जाते हैं~ (पर अहंकार आदि बंधनों से) निजात का दरवाजा गुरू के सन्मुख होने से ही मिलता है (क्योंकि~ गुरू प्रभू का सिमरन की हिदायत करता है) हरेक कर्म सदा स्थिर प्रभू के नाम सिमरन से नीचे है~ घटिआ है। सिमरन रूपी कर्म सब कर्मों धर्मों से श्रेष्ठ है। ।5। (पर कर्म काण्ड के जाल में फंसे उच्च जाति के लोगों को भी निंदना ठीक नहीं है)~ हरेक जीव को ठीक ही कहना चाहिए। (जगत में) कोई नीच नहीं दिखाई नहीं देता~ क्योंकि~ एक करतार ने ही सारे जीव रचे हैं और तीनों लोकों (के जीवों) में उसे (करतार की ज्योति) का ही प्रकाश है। सिमरन (का खैर) प्रभू की गुरू की मेहर से ही मिलता है और धुर से ही प्रभू की हुकम अनुसार जिस मनुष्य को सिमरन की दात मिलती है~ कोई पक्ष उस (दात) के राह में रोक नहीं डाल सकता।6। जो गुरमुख मनुष्य गुरमुखों की संगति में मिल बैठता है~ गुरू आशै के अनुसार चलने से (उसके मन में) संतोष आ बसता है। (क्योंकि~) यदि मनुष्य सतिगुरू के उपदेश में लीन रहे तो बेअंत गुणों वाले करतार की सिफत-सालाह की जा सकती है। और~ सिफत सलाह रूपी अंमृत पीने से मन संतोष ग्रहण कर लेता है और (जगत में से) आदर सत्कार कमा के प्रभू की हजूरी में पहुँचता है।7। गुरू के शबद के द्वारा प्रभू के स्वभाव में हरवक्त एक-मेक होने से यह यकीन बन जाता है कि (रॅबी रौंअ की) वीणा हरेक शरीर में बज रही है। पर ये समझ किसी विरले को ही पड़ती है, जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर अपने मन को ऐसे समझा लेता है हे नानक ! उसको परमात्मा का नाम कभी नहीं भूलता। वह गुरू के उपदेश को कमा के (गुरू के शबद मुताबिक जीवन बना के~ अहम् आदि रोगों से) बचा रहता है।8।14।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਚਿਤੇ ਦਿਸਹਿ ਧਉਲਹਰ ਬਗੇ ਬੰਕ ਦੁਆਰ ॥
ਕਰਿ ਮਨ ਖੁਸੀ ਉਸਾਰਿਆ ਦੂਜੈ ਹੇਤਿ ਪਿਆਰਿ ॥
ਅੰਦਰੁ ਖਾਲੀ ਪ੍ਰੇਮ ਬਿਨੁ ਢਹਿ ਢੇਰੀ ਤਨੁ ਛਾਰੁ ॥੧॥
ਭਾਈ ਰੇ ਤਨੁ ਧਨੁ ਸਾਥਿ ਨ ਹੋਇ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਧਨੁ ਨਿਰਮਲੋ ਗੁਰੁ ਦਾਤਿ ਕਰੇ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਧਨੁ ਨਿਰਮਲੋ ਜੇ ਦੇਵੈ ਦੇਵਣਹਾਰੁ ॥
ਆਗੈ ਪੂਛ ਨ ਹੋਵਈ ਜਿਸੁ ਬੇਲੀ ਗੁਰੁ ਕਰਤਾਰੁ ॥
ਆਪਿ ਛਡਾਏ ਛੁਟੀਐ ਆਪੇ ਬਖਸਣਹਾਰੁ ॥੨॥
सिरीरागु महला १ ॥
चिते दिसहि धउलहर बगे बंक दुआर ॥
करि मन खुसी उसारिआ दूजै हेति पिआरि ॥
अंदरु खाली प्रेम बिनु ढहि ढेरी तनु छारु ॥१॥
भाई रे तनु धनु साथि न होइ ॥
राम नामु धनु निरमलो गुरु दाति करे प्रभु सोइ ॥१॥ रहाउ ॥
राम नामु धनु निरमलो जे देवै देवणहारु ॥
आगै पूछ न होवई जिसु बेली गुरु करतारु ॥
आपि छडाए छुटीऐ आपे बखसणहारु ॥२॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला १ ॥ जैसे बड़े चाव से बनाए हुए चित्रित किए हुए महल-माढियां (सुंदर) दिखाई देते हैं~ उनके सफेद बांके दरवाजे होते हैं। (पर यदि वे अंदर से खाली रहें तो गिर के ढेरी हो जाते हैं~ वैसे ही माया के मोह में प्यार में (ये शरीर) पालते हैं~ पर यदि हृदय नाम से वंचित है~ प्रेम के बगैर है~ तो ये शरीर भी गिर के ढेरी हो जाता है (व्यर्थ जाता है।)।1। हे भाई ! यह शरीर यह धन (जगत से चलने के वक्त) साथ नहीं निभता। परमात्मा का नाम ऐसा पवित्र धन है (जो सदा साथ निभता है~ पर ये मिलता उसको ही है) जिसे गुरू देता है जिसको वह परमात्मा दात करता है।1।रहाउ। परमात्मा का नाम पवित्र धन है (तब ही मिलता है) अगर देने के स्मर्थ हरि खुद दे। (नाम धन हासिल करने में) जिस मनुष्य का सहयोगी गुरू खुद बने~ करतार खुद बने~ परलोक में उस पर कोई एतराज नहीं होता। पर माया के मोह से प्रभू स्वयं ही बचाए तो बच सकते हैं। प्रभू खुद ही बख्शिश करने वाला है।2।

संदर्भ: यह अंग 62 है, राग Siree Raag का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

Sarojini Nagar की hagling के बीच कोई unexpected calm।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 42 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 62” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Siree Raag राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 63 →, पीछे का: ← अंग 61

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।