अंग
60
राग Siree Raag
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਮਨ ਰੇ ਕਿਉ ਛੂਟਹਿ ਬਿਨੁ ਪਿਆਰ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਅੰਤਰਿ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਬਖਸੇ ਭਗਤਿ ਭੰਡਾਰ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਰੇ ਮਨ ਐਸੀ ਹਰਿ ਸਿਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਕਰਿ ਜੈਸੀ ਮਛੁਲੀ ਨੀਰ ॥
ਜਿਉ ਅਧਿਕਉ ਤਿਉ ਸੁਖੁ ਘਣੋ ਮਨਿ ਤਨਿ ਸਾਂਤਿ ਸਰੀਰ ॥
ਬਿਨੁ ਜਲ ਘੜੀ ਨ ਜੀਵਈ ਪ੍ਰਭੁ ਜਾਣੈ ਅਭ ਪੀਰ ॥੨॥
ਰੇ ਮਨ ਐਸੀ ਹਰਿ ਸਿਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਕਰਿ ਜੈਸੀ ਚਾਤ੍ਰਿਕ ਮੇਹ ॥
ਸਰ ਭਰਿ ਥਲ ਹਰੀਆਵਲੇ ਇਕ ਬੂੰਦ ਨ ਪਵਈ ਕੇਹ ॥
ਕਰਮਿ ਮਿਲੈ ਸੋ ਪਾਈਐ ਕਿਰਤੁ ਪਇਆ ਸਿਰਿ ਦੇਹ ॥੩॥
ਰੇ ਮਨ ਐਸੀ ਹਰਿ ਸਿਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਕਰਿ ਜੈਸੀ ਜਲ ਦੁਧ ਹੋਇ ॥
ਆਵਟਣੁ ਆਪੇ ਖਵੈ ਦੁਧ ਕਉ ਖਪਣਿ ਨ ਦੇਇ ॥
ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਵਿਛੁੰਨਿਆ ਸਚਿ ਵਡਿਆਈ ਦੇਇ ॥੪॥
ਰੇ ਮਨ ਐਸੀ ਹਰਿ ਸਿਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਕਰਿ ਜੈਸੀ ਚਕਵੀ ਸੂਰ ॥
ਖਿਨੁ ਪਲੁ ਨੀਦ ਨ ਸੋਵਈ ਜਾਣੈ ਦੂਰਿ ਹਜੂਰਿ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਸੋਝੀ ਨਾ ਪਵੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਦਾ ਹਜੂਰਿ ॥੫॥
ਮਨਮੁਖਿ ਗਣਤ ਗਣਾਵਣੀ ਕਰਤਾ ਕਰੇ ਸੁ ਹੋਇ ॥
ਤਾ ਕੀ ਕੀਮਤਿ ਨਾ ਪਵੈ ਜੇ ਲੋਚੈ ਸਭੁ ਕੋਇ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਹੋਇ ਤ ਪਾਈਐ ਸਚਿ ਮਿਲੈ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥੬॥
ਸਚਾ ਨੇਹੁ ਨ ਤੁਟਈ ਜੇ ਸਤਿਗੁਰੁ ਭੇਟੈ ਸੋਇ ॥
ਗਿਆਨ ਪਦਾਰਥੁ ਪਾਈਐ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਸੋਝੀ ਹੋਇ ॥
ਨਿਰਮਲੁ ਨਾਮੁ ਨ ਵੀਸਰੈ ਜੇ ਗੁਣ ਕਾ ਗਾਹਕੁ ਹੋਇ ॥੭॥
ਖੇਲਿ ਗਏ ਸੇ ਪੰਖਣੂੰ ਜੋ ਚੁਗਦੇ ਸਰ ਤਲਿ ॥
ਘੜੀ ਕਿ ਮੁਹਤਿ ਕਿ ਚਲਣਾ ਖੇਲਣੁ ਅਜੁ ਕਿ ਕਲਿ ॥
ਜਿਸੁ ਤੂੰ ਮੇਲਹਿ ਸੋ ਮਿਲੈ ਜਾਇ ਸਚਾ ਪਿੜੁ ਮਲਿ ॥੮॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਪ੍ਰੀਤਿ ਨ ਊਪਜੈ ਹਉਮੈ ਮੈਲੁ ਨ ਜਾਇ ॥
ਸੋਹੰ ਆਪੁ ਪਛਾਣੀਐ ਸਬਦਿ ਭੇਦਿ ਪਤੀਆਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਆਪੁ ਪਛਾਣੀਐ ਅਵਰ ਕਿ ਕਰੇ ਕਰਾਇ ॥੯॥
ਮਿਲਿਆ ਕਾ ਕਿਆ ਮੇਲੀਐ ਸਬਦਿ ਮਿਲੇ ਪਤੀਆਇ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਸੋਝੀ ਨਾ ਪਵੈ ਵੀਛੁੜਿ ਚੋਟਾ ਖਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਦਰੁ ਘਰੁ ਏਕੁ ਹੈ ਅਵਰੁ ਨ ਦੂਜੀ ਜਾਇ ॥੧੦॥੧੧॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਅੰਤਰਿ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਬਖਸੇ ਭਗਤਿ ਭੰਡਾਰ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਰੇ ਮਨ ਐਸੀ ਹਰਿ ਸਿਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਕਰਿ ਜੈਸੀ ਮਛੁਲੀ ਨੀਰ ॥
ਜਿਉ ਅਧਿਕਉ ਤਿਉ ਸੁਖੁ ਘਣੋ ਮਨਿ ਤਨਿ ਸਾਂਤਿ ਸਰੀਰ ॥
ਬਿਨੁ ਜਲ ਘੜੀ ਨ ਜੀਵਈ ਪ੍ਰਭੁ ਜਾਣੈ ਅਭ ਪੀਰ ॥੨॥
ਰੇ ਮਨ ਐਸੀ ਹਰਿ ਸਿਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਕਰਿ ਜੈਸੀ ਚਾਤ੍ਰਿਕ ਮੇਹ ॥
ਸਰ ਭਰਿ ਥਲ ਹਰੀਆਵਲੇ ਇਕ ਬੂੰਦ ਨ ਪਵਈ ਕੇਹ ॥
ਕਰਮਿ ਮਿਲੈ ਸੋ ਪਾਈਐ ਕਿਰਤੁ ਪਇਆ ਸਿਰਿ ਦੇਹ ॥੩॥
ਰੇ ਮਨ ਐਸੀ ਹਰਿ ਸਿਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਕਰਿ ਜੈਸੀ ਜਲ ਦੁਧ ਹੋਇ ॥
ਆਵਟਣੁ ਆਪੇ ਖਵੈ ਦੁਧ ਕਉ ਖਪਣਿ ਨ ਦੇਇ ॥
ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਵਿਛੁੰਨਿਆ ਸਚਿ ਵਡਿਆਈ ਦੇਇ ॥੪॥
ਰੇ ਮਨ ਐਸੀ ਹਰਿ ਸਿਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਕਰਿ ਜੈਸੀ ਚਕਵੀ ਸੂਰ ॥
ਖਿਨੁ ਪਲੁ ਨੀਦ ਨ ਸੋਵਈ ਜਾਣੈ ਦੂਰਿ ਹਜੂਰਿ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਸੋਝੀ ਨਾ ਪਵੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਦਾ ਹਜੂਰਿ ॥੫॥
ਮਨਮੁਖਿ ਗਣਤ ਗਣਾਵਣੀ ਕਰਤਾ ਕਰੇ ਸੁ ਹੋਇ ॥
ਤਾ ਕੀ ਕੀਮਤਿ ਨਾ ਪਵੈ ਜੇ ਲੋਚੈ ਸਭੁ ਕੋਇ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਹੋਇ ਤ ਪਾਈਐ ਸਚਿ ਮਿਲੈ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥੬॥
ਸਚਾ ਨੇਹੁ ਨ ਤੁਟਈ ਜੇ ਸਤਿਗੁਰੁ ਭੇਟੈ ਸੋਇ ॥
ਗਿਆਨ ਪਦਾਰਥੁ ਪਾਈਐ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਸੋਝੀ ਹੋਇ ॥
ਨਿਰਮਲੁ ਨਾਮੁ ਨ ਵੀਸਰੈ ਜੇ ਗੁਣ ਕਾ ਗਾਹਕੁ ਹੋਇ ॥੭॥
ਖੇਲਿ ਗਏ ਸੇ ਪੰਖਣੂੰ ਜੋ ਚੁਗਦੇ ਸਰ ਤਲਿ ॥
ਘੜੀ ਕਿ ਮੁਹਤਿ ਕਿ ਚਲਣਾ ਖੇਲਣੁ ਅਜੁ ਕਿ ਕਲਿ ॥
ਜਿਸੁ ਤੂੰ ਮੇਲਹਿ ਸੋ ਮਿਲੈ ਜਾਇ ਸਚਾ ਪਿੜੁ ਮਲਿ ॥੮॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਪ੍ਰੀਤਿ ਨ ਊਪਜੈ ਹਉਮੈ ਮੈਲੁ ਨ ਜਾਇ ॥
ਸੋਹੰ ਆਪੁ ਪਛਾਣੀਐ ਸਬਦਿ ਭੇਦਿ ਪਤੀਆਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਆਪੁ ਪਛਾਣੀਐ ਅਵਰ ਕਿ ਕਰੇ ਕਰਾਇ ॥੯॥
ਮਿਲਿਆ ਕਾ ਕਿਆ ਮੇਲੀਐ ਸਬਦਿ ਮਿਲੇ ਪਤੀਆਇ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਸੋਝੀ ਨਾ ਪਵੈ ਵੀਛੁੜਿ ਚੋਟਾ ਖਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਦਰੁ ਘਰੁ ਏਕੁ ਹੈ ਅਵਰੁ ਨ ਦੂਜੀ ਜਾਇ ॥੧੦॥੧੧॥
मन रे किउ छूटहि बिनु पिआर ॥
गुरमुखि अंतरि रवि रहिआ बखसे भगति भंडार ॥१॥ रहाउ ॥
रे मन ऐसी हरि सिउ प्रीति करि जैसी मछुली नीर ॥
जिउ अधिकउ तिउ सुखु घणो मनि तनि सांति सरीर ॥
बिनु जल घड़ी न जीवई प्रभु जाणै अभ पीर ॥२॥
रे मन ऐसी हरि सिउ प्रीति करि जैसी चात्रिक मेह ॥
सर भरि थल हरीआवले इक बूंद न पवई केह ॥
करमि मिलै सो पाईऐ किरतु पइआ सिरि देह ॥३॥
रे मन ऐसी हरि सिउ प्रीति करि जैसी जल दुध होइ ॥
आवटणु आपे खवै दुध कउ खपणि न देइ ॥
आपे मेलि विछुंनिआ सचि वडिआई देइ ॥४॥
रे मन ऐसी हरि सिउ प्रीति करि जैसी चकवी सूर ॥
खिनु पलु नीद न सोवई जाणै दूरि हजूरि ॥
मनमुखि सोझी ना पवै गुरमुखि सदा हजूरि ॥५॥
मनमुखि गणत गणावणी करता करे सु होइ ॥
ता की कीमति ना पवै जे लोचै सभु कोइ ॥
गुरमति होइ त पाईऐ सचि मिलै सुखु होइ ॥६॥
सचा नेहु न तुटई जे सतिगुरु भेटै सोइ ॥
गिआन पदारथु पाईऐ त्रिभवण सोझी होइ ॥
निरमलु नामु न वीसरै जे गुण का गाहकु होइ ॥७॥
खेलि गए से पंखणूं जो चुगदे सर तलि ॥
घड़ी कि मुहति कि चलणा खेलणु अजु कि कलि ॥
जिसु तूं मेलहि सो मिलै जाइ सचा पिड़ु मलि ॥८॥
बिनु गुर प्रीति न ऊपजै हउमै मैलु न जाइ ॥
सोहं आपु पछाणीऐ सबदि भेदि पतीआइ ॥
गुरमुखि आपु पछाणीऐ अवर कि करे कराइ ॥९॥
मिलिआ का किआ मेलीऐ सबदि मिले पतीआइ ॥
मनमुखि सोझी ना पवै वीछुड़ि चोटा खाइ ॥
नानक दरु घरु एकु है अवरु न दूजी जाइ ॥१०॥११॥
गुरमुखि अंतरि रवि रहिआ बखसे भगति भंडार ॥१॥ रहाउ ॥
रे मन ऐसी हरि सिउ प्रीति करि जैसी मछुली नीर ॥
जिउ अधिकउ तिउ सुखु घणो मनि तनि सांति सरीर ॥
बिनु जल घड़ी न जीवई प्रभु जाणै अभ पीर ॥२॥
रे मन ऐसी हरि सिउ प्रीति करि जैसी चात्रिक मेह ॥
सर भरि थल हरीआवले इक बूंद न पवई केह ॥
करमि मिलै सो पाईऐ किरतु पइआ सिरि देह ॥३॥
रे मन ऐसी हरि सिउ प्रीति करि जैसी जल दुध होइ ॥
आवटणु आपे खवै दुध कउ खपणि न देइ ॥
आपे मेलि विछुंनिआ सचि वडिआई देइ ॥४॥
रे मन ऐसी हरि सिउ प्रीति करि जैसी चकवी सूर ॥
खिनु पलु नीद न सोवई जाणै दूरि हजूरि ॥
मनमुखि सोझी ना पवै गुरमुखि सदा हजूरि ॥५॥
मनमुखि गणत गणावणी करता करे सु होइ ॥
ता की कीमति ना पवै जे लोचै सभु कोइ ॥
गुरमति होइ त पाईऐ सचि मिलै सुखु होइ ॥६॥
सचा नेहु न तुटई जे सतिगुरु भेटै सोइ ॥
गिआन पदारथु पाईऐ त्रिभवण सोझी होइ ॥
निरमलु नामु न वीसरै जे गुण का गाहकु होइ ॥७॥
खेलि गए से पंखणूं जो चुगदे सर तलि ॥
घड़ी कि मुहति कि चलणा खेलणु अजु कि कलि ॥
जिसु तूं मेलहि सो मिलै जाइ सचा पिड़ु मलि ॥८॥
बिनु गुर प्रीति न ऊपजै हउमै मैलु न जाइ ॥
सोहं आपु पछाणीऐ सबदि भेदि पतीआइ ॥
गुरमुखि आपु पछाणीऐ अवर कि करे कराइ ॥९॥
मिलिआ का किआ मेलीऐ सबदि मिले पतीआइ ॥
मनमुखि सोझी ना पवै वीछुड़ि चोटा खाइ ॥
नानक दरु घरु एकु है अवरु न दूजी जाइ ॥१०॥११॥
हिन्दी अर्थ: हे मन ! (प्रभू के साथ) प्यार पाने के बगैर तू (माया के हमलों से) बच नहीं सकता। (पर~ ये प्यार गुरू की शरण पड़े बगैर नहीं मिलता) गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्यों के अंदर (गुरू की कृपा से ऐसी प्यार-सांझ बनती है कि) परमात्मा हर वक्त मौजूद रहता है~ गुरू उन्हें प्रभू भक्ति के खजाने ही बख्श देता है।1।रहाउ। हे मन ! परमात्मा के साथ ऐसा प्रेम कर~ जैसा मछली का पानी के साथ है। पानी जितना ही बढ़ता है~ मछली को उतना ही सुख आनंद मिलता है। उसके मन में तन में शरीर में ठंड पड़ती है। पानी के बगैर एक घड़ी भी जी नहीं सकती। मछली के दिल की यह वेदना परमात्मा (स्वयं) जानता है।1। हे मन ! परमात्मा के साथ ऐसा प्रेम कर~ जैसा पपीहे का बरसात के साथ है। (पानी से) सरोवर भरे हुए होते हैं~ धरती (पानी की बरकत से) हरी भरी हो जाती है। पर यदि (स्वाति नक्षत्र में पड़ी वर्षा की) एक बूँद (पपीहे के मुंह में) ना पड़े~ तो उसको इस सारे पानी से कोई सरोकार नहीं। (पर~ हे मन ! तेरे भी क्या बस ! परमात्मा) अपनी मेहर से ही मिले तो मिलता है~ (नहीं तो) पूर्बला कमाया हुआ सिर पर शरीर पर झेलना ही पड़ता है।3। हे मन ! हरि के साथ ऐसा प्यार बना~ जैसा पानी और दूध का है। (पानी दूध में आ मिलता है~ दूध की शरण पड़ता है~ (दूध उसकों अपना रूप बना लेता है। जब उस पानी मिले दूध को आग पर रखते हैं तो) उबाला (पानी) स्वयं ही बर्दाश्त करता है~ दूध को जलने नहीं देता। (इसी तरह यदि जीव अपने आप को कुर्बान करे~ तो प्रभू) विछुड़े जीवों कोअपने सदा स्थिर नाम में मिला के (लोक परलोक में) आदर सत्कार देता है।4। हे मन ! परमात्मा के साथ ऐसा प्यार कर~ जैसा कि चकवी का (प्यार) सूरज से है। (जब सूरज डूब जाता है~ चकवी की नजरों से परे हो जाता है~ तो वह चकवी) एक छिन भर एक पल भर नींद (के बस में आ के) नहीं सोती~ दूर (छुपे सूर्य) को अपने अंग-संग समझती है। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है~ उसको परमात्मा अपने अंग संग दिखाई देता है~ पर अपने मन के पीछे चलने वाले को ये बात समझ नहीं आती।5। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य अपनी ही प्रशंसा करता रहता है (पर जीव के भी क्या वश?) वही कुछ होता है जो करतार (स्वयं) करता (कराता) है। (करतार की मेहर के बिनां) यदि कोई जीव (अपनी उस्ततें छोड़ने का प्रयत्न भी करे~ और परमात्मा के गुणों की कद्र पहचानने का उद्यम करे~ तो भी) उस प्रभू के गुणों की कद्र नहीं पड़ सकती। (परमात्मा के गुणों की कद्र) तभी पड़ती है~ जब गुरू की शिक्षा प्राप्त हो। (गुरू की मति मिलने से ही मनुष्य प्रभू के सदा स्थिर नाम में जुड़ता है और आत्मिक आनंद का सुख पाता है।6। (प्रभू चरणों में जोड़ने वाला) यदि वह गुरू मिल जाए~ तो (उसकी मेहर के सदका प्रभू के साथ ऐसा) पक्का प्यार (पड़ता है जो कभी भी) टूटता नहीं। (गुरू की कृपा से) परमात्मा के साथ गहरी सांझ डालने वाला नाम पदार्थ मिलता है। ये समझ भी पड़ती है कि प्रभू तीनों भवनों में मौजूद है। यदि मनुष्य (गुरू की मेहर सदका) परमात्मा के गुणों (के सौदे) को खरीदने वाला बन जाए~ तो इस को प्रभू का पवित्र नाम (फिर कभी) नहीं भूलता।7। (हे मन ! देख) जो जीव पंछी इस (संसार) सरोवर पर (चोगा) चुगते हैं वह (आपो अपनी जीवन) खेल खेलकर चले जाते हैं। हरेक जीव पंछी ने घड़ी पल की खेल खेलके यहाँ से चले जाना है। यह~खेल एक-दो दिनों में ही (जल्दी ही) खत्म हो जाती है। (हे मन ! प्रभू के दर पे सदा अरदास कर और कह, हे प्रभू !) जिसको तू खुद मिलाता है~ वही तेरे चरणों में जुड़ता है। वह यहां से सच्ची जीवन बाजी जीत के जाता है।8। गुरू (की शरण पड़े) बिनां (प्रभू चरणों में) प्रीत पैदा नहीं होती (क्योंकि मनुष्य के अपने प्रयास से ही मन में से) अहंकार की मैल दूर हो सकती है। जब मनुष्य का मन गुरू के शबद में भेदा जाता है~ गुरू के शबद में पतीज जाता है~ तब ये पता चलता है कि मेरा और प्रभू का स्वभाव मेल खाता है या नहीं। गुरू की शरण पड़ के ही मनुष्य अपने आप को (अपनी असलियत को) पहचानता है। (गुरू की शरण के बिनां) जीव अन्य कोई प्रयासा कर करा नहीं सकता।9। जो जीव गुरू के शबद में पतीज के प्रभू चरणों में मिलते हैं~ उनके अंदर कोई ऐसा विछोड़ा नहीं रह जाता जिसको दूर करके उन्हें पुनः प्रभू से जोड़ा जाए। पर अपने मन के पीछे चलने वाले बंदे कोये समझ नहीं पड़ती~ वह प्रभू चरणों से विछुड़ के (माया के मोह की) चोटें खाता है। हे नानक ! जो मनुष्य प्रभू चरणों में मिल गया है उसका प्रभू ही एक आसरा दृढ़ (दिखता) है। प्रभू के बिना उसे और कोई सहारा नहीं (दिखाई देता) अन्य कोई जगह नहीं दिखती।10।11।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਭੁਲੈ ਭੁਲਾਈਐ ਭੂਲੀ ਠਉਰ ਨ ਕਾਇ ॥
ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਕੋ ਨ ਦਿਖਾਵਈ ਅੰਧੀ ਆਵੈ ਜਾਇ ॥
ਗਿਆਨ ਪਦਾਰਥੁ ਖੋਇਆ ਠਗਿਆ ਮੁਠਾ ਜਾਇ ॥੧॥
ਬਾਬਾ ਮਾਇਆ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਇ ॥
ਭਰਮਿ ਭੁਲੀ ਡੋਹਾਗਣੀ ਨਾ ਪਿਰ ਅੰਕਿ ਸਮਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਭੂਲੀ ਫਿਰੈ ਦਿਸੰਤਰੀ ਭੂਲੀ ਗ੍ਰਿਹੁ ਤਜਿ ਜਾਇ ॥
ਭੂਲੀ ਡੂੰਗਰਿ ਥਲਿ ਚੜੈ ਭਰਮੈ ਮਨੁ ਡੋਲਾਇ ॥
ਧੁਰਹੁ ਵਿਛੁੰਨੀ ਕਿਉ ਮਿਲੈ ਗਰਬਿ ਮੁਠੀ ਬਿਲਲਾਇ ॥੨॥
ਵਿਛੁੜਿਆ ਗੁਰੁ ਮੇਲਸੀ ਹਰਿ ਰਸਿ ਨਾਮ ਪਿਆਰਿ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਭੁਲੈ ਭੁਲਾਈਐ ਭੂਲੀ ਠਉਰ ਨ ਕਾਇ ॥
ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਕੋ ਨ ਦਿਖਾਵਈ ਅੰਧੀ ਆਵੈ ਜਾਇ ॥
ਗਿਆਨ ਪਦਾਰਥੁ ਖੋਇਆ ਠਗਿਆ ਮੁਠਾ ਜਾਇ ॥੧॥
ਬਾਬਾ ਮਾਇਆ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਇ ॥
ਭਰਮਿ ਭੁਲੀ ਡੋਹਾਗਣੀ ਨਾ ਪਿਰ ਅੰਕਿ ਸਮਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਭੂਲੀ ਫਿਰੈ ਦਿਸੰਤਰੀ ਭੂਲੀ ਗ੍ਰਿਹੁ ਤਜਿ ਜਾਇ ॥
ਭੂਲੀ ਡੂੰਗਰਿ ਥਲਿ ਚੜੈ ਭਰਮੈ ਮਨੁ ਡੋਲਾਇ ॥
ਧੁਰਹੁ ਵਿਛੁੰਨੀ ਕਿਉ ਮਿਲੈ ਗਰਬਿ ਮੁਠੀ ਬਿਲਲਾਇ ॥੨॥
ਵਿਛੁੜਿਆ ਗੁਰੁ ਮੇਲਸੀ ਹਰਿ ਰਸਿ ਨਾਮ ਪਿਆਰਿ ॥
सिरीरागु महला १ ॥
मनमुखि भुलै भुलाईऐ भूली ठउर न काइ ॥
गुर बिनु को न दिखावई अंधी आवै जाइ ॥
गिआन पदारथु खोइआ ठगिआ मुठा जाइ ॥१॥
बाबा माइआ भरमि भुलाइ ॥
भरमि भुली डोहागणी ना पिर अंकि समाइ ॥१॥ रहाउ ॥
भूली फिरै दिसंतरी भूली ग्रिहु तजि जाइ ॥
भूली डूंगरि थलि चड़ै भरमै मनु डोलाइ ॥
धुरहु विछुंनी किउ मिलै गरबि मुठी बिललाइ ॥२॥
विछुड़िआ गुरु मेलसी हरि रसि नाम पिआरि ॥
मनमुखि भुलै भुलाईऐ भूली ठउर न काइ ॥
गुर बिनु को न दिखावई अंधी आवै जाइ ॥
गिआन पदारथु खोइआ ठगिआ मुठा जाइ ॥१॥
बाबा माइआ भरमि भुलाइ ॥
भरमि भुली डोहागणी ना पिर अंकि समाइ ॥१॥ रहाउ ॥
भूली फिरै दिसंतरी भूली ग्रिहु तजि जाइ ॥
भूली डूंगरि थलि चड़ै भरमै मनु डोलाइ ॥
धुरहु विछुंनी किउ मिलै गरबि मुठी बिललाइ ॥२॥
विछुड़िआ गुरु मेलसी हरि रसि नाम पिआरि ॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला १ ॥ अपने मन के पीछे चलने वाली स्त्री (जीवन के) सही रास्ते से भटक जाती है~ माया उसे गलत रास्ते पे डाल देती है। राह से भटकी हुई (गुरू के बिना) कोइ (ऐसा) स्थान नहीं मिलता (जो उसको रास्ता दिखा दे)। गुरू के बिना और कोई भी (सही रास्ता) दिख नहीं सकता। (माया में) अंधी हुई जीव स्त्री भटकती फिरती है। जिस भी जीव ने (माया के प्रलोभन में फस के) परमात्मा के साथ गहरी सांझ पैदा करने वाले नाम-धन को गवा लिया है~ वह ठगा जाता है~ वह (आत्मिक जीवन की ओर से) लूटा जाता है।1। हे भाई ! माया (जीवों को) छलावे में डाल के गलत रास्ते पे डाल देती है। जो भाग्यहीन जीव स्त्री भुलावे में पड़कर गलत रास्ते पड़ जाती है~ वह (कभी भी) प्रभू पति के चरणों में लीन नहीं हो सकती।1।रहाउ। जीवन के राह से भटकी हुई जीव स्त्री गृहस्थ त्याग के देस-देसांतरों में घूमती फिरती है। भटकी हुई कभी किसी पहाड़ (की गुफा) में बैठती है कभी किसी टीले पे चढ़ बैठती है। भटकती फिरती है~ उसका मन (माया के असर में) डोलता है। (अपने किए कर्मों के कारण) धर से ही प्रभू के हुकम अनुसार विछुड़ी हुई (प्रभू चरणों में) जुड़ नहीं सकती। वह तो (त्याग आदि के) अहंकार आदि में लूटी जा रही है~ और (विछोड़े में) तड़पती है।2। प्रभू से विछुड़ों को गुरू हरि नाम के आनंद में जोड़ के~ नाम के प्यार में जोड़ के (पुनः प्रभू के साथ) मिलाता है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 60 है, राग Siree Raag का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
IGI Airport की 3 बजे की flight का इंतज़ार, सब लोग phones पर, मन कहीं और।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 39 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 60” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Siree Raag राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 61 →, पीछे का: ← अंग 59।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।