अंग
56
राग Siree Raag
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਮੁਖਿ ਝੂਠੈ ਝੂਠੁ ਬੋਲਣਾ ਕਿਉ ਕਰਿ ਸੂਚਾ ਹੋਇ ॥
ਬਿਨੁ ਅਭ ਸਬਦ ਨ ਮਾਂਜੀਐ ਸਾਚੇ ਤੇ ਸਚੁ ਹੋਇ ॥੧॥
ਮੁੰਧੇ ਗੁਣਹੀਣੀ ਸੁਖੁ ਕੇਹਿ ॥
ਪਿਰੁ ਰਲੀਆ ਰਸਿ ਮਾਣਸੀ ਸਾਚਿ ਸਬਦਿ ਸੁਖੁ ਨੇਹਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪਿਰੁ ਪਰਦੇਸੀ ਜੇ ਥੀਐ ਧਨ ਵਾਂਢੀ ਝੂਰੇਇ ॥
ਜਿਉ ਜਲਿ ਥੋੜੈ ਮਛੁਲੀ ਕਰਣ ਪਲਾਵ ਕਰੇਇ ॥
ਪਿਰ ਭਾਵੈ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ਜਾ ਆਪੇ ਨਦਰਿ ਕਰੇਇ ॥੨॥
ਪਿਰੁ ਸਾਲਾਹੀ ਆਪਣਾ ਸਖੀ ਸਹੇਲੀ ਨਾਲਿ ॥
ਤਨਿ ਸੋਹੈ ਮਨੁ ਮੋਹਿਆ ਰਤੀ ਰੰਗਿ ਨਿਹਾਲਿ ॥
ਸਬਦਿ ਸਵਾਰੀ ਸੋਹਣੀ ਪਿਰੁ ਰਾਵੇ ਗੁਣ ਨਾਲਿ ॥੩॥
ਕਾਮਣਿ ਕਾਮਿ ਨ ਆਵਈ ਖੋਟੀ ਅਵਗਣਿਆਰਿ ॥
ਨਾ ਸੁਖੁ ਪੇਈਐ ਸਾਹੁਰੈ ਝੂਠਿ ਜਲੀ ਵੇਕਾਰਿ ॥
ਆਵਣੁ ਵੰਞਣੁ ਡਾਖੜੋ ਛੋਡੀ ਕੰਤਿ ਵਿਸਾਰਿ ॥੪॥
ਪਿਰ ਕੀ ਨਾਰਿ ਸੁਹਾਵਣੀ ਮੁਤੀ ਸੋ ਕਿਤੁ ਸਾਦਿ ॥
ਪਿਰ ਕੈ ਕਾਮਿ ਨ ਆਵਈ ਬੋਲੇ ਫਾਦਿਲੁ ਬਾਦਿ ॥
ਦਰਿ ਘਰਿ ਢੋਈ ਨਾ ਲਹੈ ਛੂਟੀ ਦੂਜੈ ਸਾਦਿ ॥੫॥
ਪੰਡਿਤ ਵਾਚਹਿ ਪੋਥੀਆ ਨਾ ਬੂਝਹਿ ਵੀਚਾਰੁ ॥
ਅਨ ਕਉ ਮਤੀ ਦੇ ਚਲਹਿ ਮਾਇਆ ਕਾ ਵਾਪਾਰੁ ॥
ਕਥਨੀ ਝੂਠੀ ਜਗੁ ਭਵੈ ਰਹਣੀ ਸਬਦੁ ਸੁ ਸਾਰੁ ॥੬॥
ਕੇਤੇ ਪੰਡਿਤ ਜੋਤਕੀ ਬੇਦਾ ਕਰਹਿ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਵਾਦਿ ਵਿਰੋਧਿ ਸਲਾਹਣੇ ਵਾਦੇ ਆਵਣੁ ਜਾਣੁ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਕਰਮ ਨ ਛੁਟਸੀ ਕਹਿ ਸੁਣਿ ਆਖਿ ਵਖਾਣੁ ॥੭॥
ਸਭਿ ਗੁਣਵੰਤੀ ਆਖੀਅਹਿ ਮੈ ਗੁਣੁ ਨਾਹੀ ਕੋਇ ॥
ਹਰਿ ਵਰੁ ਨਾਰਿ ਸੁਹਾਵਣੀ ਮੈ ਭਾਵੈ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਵੜਾ ਨਾ ਵੇਛੋੜਾ ਹੋਇ ॥੮॥੫॥
ਬਿਨੁ ਅਭ ਸਬਦ ਨ ਮਾਂਜੀਐ ਸਾਚੇ ਤੇ ਸਚੁ ਹੋਇ ॥੧॥
ਮੁੰਧੇ ਗੁਣਹੀਣੀ ਸੁਖੁ ਕੇਹਿ ॥
ਪਿਰੁ ਰਲੀਆ ਰਸਿ ਮਾਣਸੀ ਸਾਚਿ ਸਬਦਿ ਸੁਖੁ ਨੇਹਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪਿਰੁ ਪਰਦੇਸੀ ਜੇ ਥੀਐ ਧਨ ਵਾਂਢੀ ਝੂਰੇਇ ॥
ਜਿਉ ਜਲਿ ਥੋੜੈ ਮਛੁਲੀ ਕਰਣ ਪਲਾਵ ਕਰੇਇ ॥
ਪਿਰ ਭਾਵੈ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ਜਾ ਆਪੇ ਨਦਰਿ ਕਰੇਇ ॥੨॥
ਪਿਰੁ ਸਾਲਾਹੀ ਆਪਣਾ ਸਖੀ ਸਹੇਲੀ ਨਾਲਿ ॥
ਤਨਿ ਸੋਹੈ ਮਨੁ ਮੋਹਿਆ ਰਤੀ ਰੰਗਿ ਨਿਹਾਲਿ ॥
ਸਬਦਿ ਸਵਾਰੀ ਸੋਹਣੀ ਪਿਰੁ ਰਾਵੇ ਗੁਣ ਨਾਲਿ ॥੩॥
ਕਾਮਣਿ ਕਾਮਿ ਨ ਆਵਈ ਖੋਟੀ ਅਵਗਣਿਆਰਿ ॥
ਨਾ ਸੁਖੁ ਪੇਈਐ ਸਾਹੁਰੈ ਝੂਠਿ ਜਲੀ ਵੇਕਾਰਿ ॥
ਆਵਣੁ ਵੰਞਣੁ ਡਾਖੜੋ ਛੋਡੀ ਕੰਤਿ ਵਿਸਾਰਿ ॥੪॥
ਪਿਰ ਕੀ ਨਾਰਿ ਸੁਹਾਵਣੀ ਮੁਤੀ ਸੋ ਕਿਤੁ ਸਾਦਿ ॥
ਪਿਰ ਕੈ ਕਾਮਿ ਨ ਆਵਈ ਬੋਲੇ ਫਾਦਿਲੁ ਬਾਦਿ ॥
ਦਰਿ ਘਰਿ ਢੋਈ ਨਾ ਲਹੈ ਛੂਟੀ ਦੂਜੈ ਸਾਦਿ ॥੫॥
ਪੰਡਿਤ ਵਾਚਹਿ ਪੋਥੀਆ ਨਾ ਬੂਝਹਿ ਵੀਚਾਰੁ ॥
ਅਨ ਕਉ ਮਤੀ ਦੇ ਚਲਹਿ ਮਾਇਆ ਕਾ ਵਾਪਾਰੁ ॥
ਕਥਨੀ ਝੂਠੀ ਜਗੁ ਭਵੈ ਰਹਣੀ ਸਬਦੁ ਸੁ ਸਾਰੁ ॥੬॥
ਕੇਤੇ ਪੰਡਿਤ ਜੋਤਕੀ ਬੇਦਾ ਕਰਹਿ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਵਾਦਿ ਵਿਰੋਧਿ ਸਲਾਹਣੇ ਵਾਦੇ ਆਵਣੁ ਜਾਣੁ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਕਰਮ ਨ ਛੁਟਸੀ ਕਹਿ ਸੁਣਿ ਆਖਿ ਵਖਾਣੁ ॥੭॥
ਸਭਿ ਗੁਣਵੰਤੀ ਆਖੀਅਹਿ ਮੈ ਗੁਣੁ ਨਾਹੀ ਕੋਇ ॥
ਹਰਿ ਵਰੁ ਨਾਰਿ ਸੁਹਾਵਣੀ ਮੈ ਭਾਵੈ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਵੜਾ ਨਾ ਵੇਛੋੜਾ ਹੋਇ ॥੮॥੫॥
मुखि झूठै झूठु बोलणा किउ करि सूचा होइ ॥
बिनु अभ सबद न मांजीऐ साचे ते सचु होइ ॥१॥
मुंधे गुणहीणी सुखु केहि ॥
पिरु रलीआ रसि माणसी साचि सबदि सुखु नेहि ॥१॥ रहाउ ॥
पिरु परदेसी जे थीऐ धन वांढी झूरेइ ॥
जिउ जलि थोड़ै मछुली करण पलाव करेइ ॥
पिर भावै सुखु पाईऐ जा आपे नदरि करेइ ॥२॥
पिरु सालाही आपणा सखी सहेली नालि ॥
तनि सोहै मनु मोहिआ रती रंगि निहालि ॥
सबदि सवारी सोहणी पिरु रावे गुण नालि ॥३॥
कामणि कामि न आवई खोटी अवगणिआरि ॥
ना सुखु पेईऐ साहुरै झूठि जली वेकारि ॥
आवणु वंञणु डाखड़ो छोडी कंति विसारि ॥४॥
पिर की नारि सुहावणी मुती सो कितु सादि ॥
पिर कै कामि न आवई बोले फादिलु बादि ॥
दरि घरि ढोई ना लहै छूटी दूजै सादि ॥५॥
पंडित वाचहि पोथीआ ना बूझहि वीचारु ॥
अन कउ मती दे चलहि माइआ का वापारु ॥
कथनी झूठी जगु भवै रहणी सबदु सु सारु ॥६॥
केते पंडित जोतकी बेदा करहि बीचारु ॥
वादि विरोधि सलाहणे वादे आवणु जाणु ॥
बिनु गुर करम न छुटसी कहि सुणि आखि वखाणु ॥७॥
सभि गुणवंती आखीअहि मै गुणु नाही कोइ ॥
हरि वरु नारि सुहावणी मै भावै प्रभु सोइ ॥
नानक सबदि मिलावड़ा ना वेछोड़ा होइ ॥८॥५॥
बिनु अभ सबद न मांजीऐ साचे ते सचु होइ ॥१॥
मुंधे गुणहीणी सुखु केहि ॥
पिरु रलीआ रसि माणसी साचि सबदि सुखु नेहि ॥१॥ रहाउ ॥
पिरु परदेसी जे थीऐ धन वांढी झूरेइ ॥
जिउ जलि थोड़ै मछुली करण पलाव करेइ ॥
पिर भावै सुखु पाईऐ जा आपे नदरि करेइ ॥२॥
पिरु सालाही आपणा सखी सहेली नालि ॥
तनि सोहै मनु मोहिआ रती रंगि निहालि ॥
सबदि सवारी सोहणी पिरु रावे गुण नालि ॥३॥
कामणि कामि न आवई खोटी अवगणिआरि ॥
ना सुखु पेईऐ साहुरै झूठि जली वेकारि ॥
आवणु वंञणु डाखड़ो छोडी कंति विसारि ॥४॥
पिर की नारि सुहावणी मुती सो कितु सादि ॥
पिर कै कामि न आवई बोले फादिलु बादि ॥
दरि घरि ढोई ना लहै छूटी दूजै सादि ॥५॥
पंडित वाचहि पोथीआ ना बूझहि वीचारु ॥
अन कउ मती दे चलहि माइआ का वापारु ॥
कथनी झूठी जगु भवै रहणी सबदु सु सारु ॥६॥
केते पंडित जोतकी बेदा करहि बीचारु ॥
वादि विरोधि सलाहणे वादे आवणु जाणु ॥
बिनु गुर करम न छुटसी कहि सुणि आखि वखाणु ॥७॥
सभि गुणवंती आखीअहि मै गुणु नाही कोइ ॥
हरि वरु नारि सुहावणी मै भावै प्रभु सोइ ॥
नानक सबदि मिलावड़ा ना वेछोड़ा होइ ॥८॥५॥
हिन्दी अर्थ: झूठे मुंह से झूठ बोलने का ही स्वभाव बन जाता है। ऐसा जीव (किसी बाहरी स्वच्छता आदि कर्मां से अंदर) की स्वच्छता कभी भी नहीं हो सकता। गुरू के शबद जल के बिनां (मन) मांजा नहीं जा सकता~ (तथा) यह सच (सिमरन) सदा स्थिर प्रभू से ही मिलता है।1। हे भोली जीव स्त्री ! जो (अपने अंदर~ आत्मिक सुख देने वाले) गुणों से वंचित है उसको (बाहर से) किसी और तरीके से आत्मिक सुख नहीं मिल सकता। आत्मिक सुख उसको है जो सदा कायम रहने वाले प्रभू में (लीन रहती है)। जो गुरू के शबद में (जुड़ी हुई) है। जो प्रभू के प्यार में (मस्त) है। पति प्रभू के मिलाप के सुख का (वही जीव स्त्री) आनंद लेती है।1।रहाउ। यदि पति प्रभू (जीव स्त्री के हृदय देश में प्रगट नहीं~ उसके हृदय को छोड़ के) और और हृदय देश का निवासी है~ तो पति से बिछुड़ी हुई वह जीव स्त्री झुरती (सतत् निराशा की ओर अग्रसर होती) रहती है (अंदर ही अंदर से चिंता से खाई जाती है)। जिस प्रकार थोड़े पानी में मछुली तड़फती है~ उसी प्रकार वह भी प्रलाप करती है। आत्मिक सुख तभी मिलता है जब प्रभू पति को (जीव स्त्री) अच्छी लगे। जब वह खुद (उस पर) मेहर की नजर करे।2। (हे जीव स्त्री!) तू सखियों सहेलियों के साथ मिल के (भाव~ साध-संगति में बैठ के) अपने पति प्रभू की सिफत सलाह कर। (जो जीव स्त्री सिफत सलाह करती है~ उस के) हृदय में प्रभू प्रगट हो जाता है। उसका मन (प्रभू के प्रेम में) मोहा जाता है। वह प्रभू के प्रेम रंग में रंगी हुई उसका दर्शन करती है। गुरू के शबद (की बरकति) से उसका जीवन संवर जाता है। गुणों से वह सुंदर बन जाती है~ और पति प्रभू उसको प्यार करता है।3। (गुरू से वंचित होने के कारण) जो जीव स्त्री (अंदर से) खोटी है और अवगुणों से भरी हुई है~ उसका जीवन व्यर्थ चला जाता है। ना इस लोक में ना ही परलोक में~ कहीं भी उसको आत्मिक सुख नहीं मिलता। झूठ में विकारों में वह जल जाती है (उसका आत्मिक जीवन जल जाता है); (उसके वास्ते) जनम मरन का मुश्किल चक्कर बना रहता है। (क्योंकि) कंत प्रभू ने उसको भुला दिया होता है।4। पर वह प्रभू-पति की खूबसूरत नारी थी~ वह किस स्वाद में (फंसने के कारण) छॅुटड़ हो गई? वह क्यों व्यर्थ फजूल बोल बोलती है जो पति प्रभू के साथ मिलाप के लिए काम नहीं दे सकता? वह जीव स्त्री (प्रभू को भुला के) माया के स्वाद में (फंसने के कारण) छुटॅड़ हो गई है~ (तभी उसको) प्रभू के दर पर प्रभू के महल में (टिकने के लिए) आसरा नहीं मिलता (माया का मोह उसे भटकनों में डाले रखता है)।5। पंडित लोग धार्मिक पुस्तकें पढ़ते हैं (पर अंदर से गुणहीन होने के कारण उन पुस्तकों की) विचार नहीं समझते। औरों को ही उपदेश दे के (जगत से) चले जाते हैं (उनका ये सारा उद्यम) माया कमाने के लिए व्यापार ही बना रह जाता है। सारा जगत झूठी कथनी में ही भटकता रहता है (भाव~ आम तौर पे जीवों के अंदर झूठ-फरेब है~ और बाहर ज्ञान की बातें करते हैं)। प्रभु की सिफत सलाह का शब्द (हृदय में टिकाए रखना) ही श्रेष्ठ रहन सहन है।6। अनेकों ही पंडित ज्योतिषी (आदि) वेदों (के मंत्रों) को विचारते हैं~ अपने आप में मतभेद होने के कारण (चर्चा करते हैं और दृढ़ता के कारण) वाह वाह कहलवाते हैं। पर~ सिर्फ इस मतभेद में रह के ही उनका जन्म मरन बना रहता है। कोई भी मनुष्य (निरा अच्छा) व्याख्यान करके या सुन के (आत्मिक आनंद नहीं ले सकता~ और जन्म मरन के चक्कर में से) मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकता। हउमै~ अहंकार छोड़ के गुरू के शरण पड़ने की जरूरत है। गुरू की बख्शिश के बगैर (माया के मोह से) मुक्ति नहीं होती।7। (जो जीव-सि्त्रयां प्रभू-पति को प्यारी लगती हैं वही) सारे गुणों वाली कहलाती हैं। पर~ मेरे अंदर ऐसा कोई गुण नहीं है (जिसकी बरकति से मैं प्रभू प्रेम को अपने दिल में बसा सकूँ)। अगर वह हरि पति प्रभू मुझे प्यारा लगने लग जाए~ तो मैं भी उसकी सुंदर नारी बन जाऊँ। हे नानक ! गुरू के शबद में (जुड़ के जिसने प्रभू चाणों से) खूबसूरत मिलाप हासिल कर लिया है उसका उससे फिर विछोड़ा नहीं होता।8।5।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਜਪੁ ਤਪੁ ਸੰਜਮੁ ਸਾਧੀਐ ਤੀਰਥਿ ਕੀਚੈ ਵਾਸੁ ॥
ਪੁੰਨ ਦਾਨ ਚੰਗਿਆਈਆ ਬਿਨੁ ਸਾਚੇ ਕਿਆ ਤਾਸੁ ॥
ਜੇਹਾ ਰਾਧੇ ਤੇਹਾ ਲੁਣੈ ਬਿਨੁ ਗੁਣ ਜਨਮੁ ਵਿਣਾਸੁ ॥੧॥
ਮੁੰਧੇ ਗੁਣ ਦਾਸੀ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥
ਅਵਗਣ ਤਿਆਗਿ ਸਮਾਈਐ ਗੁਰਮਤਿ ਪੂਰਾ ਸੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਵਿਣੁ ਰਾਸੀ ਵਾਪਾਰੀਆ ਤਕੇ ਕੁੰਡਾ ਚਾਰਿ ॥
ਮੂਲੁ ਨ ਬੁਝੈ ਆਪਣਾ ਵਸਤੁ ਰਹੀ ਘਰ ਬਾਰਿ ॥
ਵਿਣੁ ਵਖਰ ਦੁਖੁ ਅਗਲਾ ਕੂੜਿ ਮੁਠੀ ਕੂੜਿਆਰਿ ॥੨॥
ਲਾਹਾ ਅਹਿਨਿਸਿ ਨਉਤਨਾ ਪਰਖੇ ਰਤਨੁ ਵੀਚਾਰਿ ॥
ਵਸਤੁ ਲਹੈ ਘਰਿ ਆਪਣੈ ਚਲੈ ਕਾਰਜੁ ਸਾਰਿ ॥
ਵਣਜਾਰਿਆ ਸਿਉ ਵਣਜੁ ਕਰਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬ੍ਰਹਮੁ ਬੀਚਾਰਿ ॥੩॥
ਸੰਤਾਂ ਸੰਗਤਿ ਪਾਈਐ ਜੇ ਮੇਲੇ ਮੇਲਣਹਾਰੁ ॥
ਮਿਲਿਆ ਹੋਇ ਨ ਵਿਛੁੜੈ ਜਿਸੁ ਅੰਤਰਿ ਜੋਤਿ ਅਪਾਰ ॥
ਸਚੈ ਆਸਣਿ ਸਚਿ ਰਹੈ ਸਚੈ ਪ੍ਰੇਮ ਪਿਆਰ ॥੪॥
ਜਿਨੀ ਆਪੁ ਪਛਾਣਿਆ ਘਰ ਮਹਿ ਮਹਲੁ ਸੁਥਾਇ ॥
ਸਚੇ ਸੇਤੀ ਰਤਿਆ ਸਚੋ ਪਲੈ ਪਾਇ ॥
ਜਪੁ ਤਪੁ ਸੰਜਮੁ ਸਾਧੀਐ ਤੀਰਥਿ ਕੀਚੈ ਵਾਸੁ ॥
ਪੁੰਨ ਦਾਨ ਚੰਗਿਆਈਆ ਬਿਨੁ ਸਾਚੇ ਕਿਆ ਤਾਸੁ ॥
ਜੇਹਾ ਰਾਧੇ ਤੇਹਾ ਲੁਣੈ ਬਿਨੁ ਗੁਣ ਜਨਮੁ ਵਿਣਾਸੁ ॥੧॥
ਮੁੰਧੇ ਗੁਣ ਦਾਸੀ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥
ਅਵਗਣ ਤਿਆਗਿ ਸਮਾਈਐ ਗੁਰਮਤਿ ਪੂਰਾ ਸੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਵਿਣੁ ਰਾਸੀ ਵਾਪਾਰੀਆ ਤਕੇ ਕੁੰਡਾ ਚਾਰਿ ॥
ਮੂਲੁ ਨ ਬੁਝੈ ਆਪਣਾ ਵਸਤੁ ਰਹੀ ਘਰ ਬਾਰਿ ॥
ਵਿਣੁ ਵਖਰ ਦੁਖੁ ਅਗਲਾ ਕੂੜਿ ਮੁਠੀ ਕੂੜਿਆਰਿ ॥੨॥
ਲਾਹਾ ਅਹਿਨਿਸਿ ਨਉਤਨਾ ਪਰਖੇ ਰਤਨੁ ਵੀਚਾਰਿ ॥
ਵਸਤੁ ਲਹੈ ਘਰਿ ਆਪਣੈ ਚਲੈ ਕਾਰਜੁ ਸਾਰਿ ॥
ਵਣਜਾਰਿਆ ਸਿਉ ਵਣਜੁ ਕਰਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬ੍ਰਹਮੁ ਬੀਚਾਰਿ ॥੩॥
ਸੰਤਾਂ ਸੰਗਤਿ ਪਾਈਐ ਜੇ ਮੇਲੇ ਮੇਲਣਹਾਰੁ ॥
ਮਿਲਿਆ ਹੋਇ ਨ ਵਿਛੁੜੈ ਜਿਸੁ ਅੰਤਰਿ ਜੋਤਿ ਅਪਾਰ ॥
ਸਚੈ ਆਸਣਿ ਸਚਿ ਰਹੈ ਸਚੈ ਪ੍ਰੇਮ ਪਿਆਰ ॥੪॥
ਜਿਨੀ ਆਪੁ ਪਛਾਣਿਆ ਘਰ ਮਹਿ ਮਹਲੁ ਸੁਥਾਇ ॥
ਸਚੇ ਸੇਤੀ ਰਤਿਆ ਸਚੋ ਪਲੈ ਪਾਇ ॥
सिरीरागु महला १ ॥
जपु तपु संजमु साधीऐ तीरथि कीचै वासु ॥
पुंन दान चंगिआईआ बिनु साचे किआ तासु ॥
जेहा राधे तेहा लुणै बिनु गुण जनमु विणासु ॥१॥
मुंधे गुण दासी सुखु होइ ॥
अवगण तिआगि समाईऐ गुरमति पूरा सोइ ॥१॥ रहाउ ॥
विणु रासी वापारीआ तके कुंडा चारि ॥
मूलु न बुझै आपणा वसतु रही घर बारि ॥
विणु वखर दुखु अगला कूड़ि मुठी कूड़िआरि ॥२॥
लाहा अहिनिसि नउतना परखे रतनु वीचारि ॥
वसतु लहै घरि आपणै चलै कारजु सारि ॥
वणजारिआ सिउ वणजु करि गुरमुखि ब्रहमु बीचारि ॥३॥
संतां संगति पाईऐ जे मेले मेलणहारु ॥
मिलिआ होइ न विछुड़ै जिसु अंतरि जोति अपार ॥
सचै आसणि सचि रहै सचै प्रेम पिआर ॥४॥
जिनी आपु पछाणिआ घर महि महलु सुथाइ ॥
सचे सेती रतिआ सचो पलै पाइ ॥
जपु तपु संजमु साधीऐ तीरथि कीचै वासु ॥
पुंन दान चंगिआईआ बिनु साचे किआ तासु ॥
जेहा राधे तेहा लुणै बिनु गुण जनमु विणासु ॥१॥
मुंधे गुण दासी सुखु होइ ॥
अवगण तिआगि समाईऐ गुरमति पूरा सोइ ॥१॥ रहाउ ॥
विणु रासी वापारीआ तके कुंडा चारि ॥
मूलु न बुझै आपणा वसतु रही घर बारि ॥
विणु वखर दुखु अगला कूड़ि मुठी कूड़िआरि ॥२॥
लाहा अहिनिसि नउतना परखे रतनु वीचारि ॥
वसतु लहै घरि आपणै चलै कारजु सारि ॥
वणजारिआ सिउ वणजु करि गुरमुखि ब्रहमु बीचारि ॥३॥
संतां संगति पाईऐ जे मेले मेलणहारु ॥
मिलिआ होइ न विछुड़ै जिसु अंतरि जोति अपार ॥
सचै आसणि सचि रहै सचै प्रेम पिआर ॥४॥
जिनी आपु पछाणिआ घर महि महलु सुथाइ ॥
सचे सेती रतिआ सचो पलै पाइ ॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला १ ॥ अगर (किसी सिद्धि आदि वास्ते मंत्रों का) पाठ किया जाए~ (धूणियां आदि तपा के) शरीर को कष्ट दिया जाए~ इन्द्रियों को वस में करने का कोई साधन किया जाए~ किसी तीर्थ पर निवास किया जाए~ (अगर खलकत के भले के वास्ते) दान-पुंन्न आदि अच्छे काम किए जांए (पर परमात्मा का सिमरन ना किया जाए~ तो) प्रभू सिमरन के बिना उपरोक्त सारे ही उद्यमों का कोई लाभ नहीं। मनुष्य जैसा बीज बीजता है~ वैसा ही फल काटता है (यदि सिमरन नहीं किया तो आत्मिक गुण कहां से आ जाएं~ तथा) आत्मिक गुणों के बिना जिंदगी व्यर्थ है।1। हे भोली जीव स्त्री ! (आत्मिक गुणों के बिनां आत्मिक सुख नहीं हो सकता~ और परमात्मा के नाम के बिना गुण पैदा नहीं हो सकते) गुणों की खातर परमात्मा के गुणों की दासी बन~ तभी आत्मिक सुख सुख होगा। औगुणों को त्याग के ही प्रभू चरणों में लीन हो सकते हैं। गुरू की मति पे चल कर ही वह पूरा प्रभू मिलता है।1।रहाउ। सरमाये के बिना व्यापारी (नफे के लिए व्यर्थ ही) चारों तरफ ताकता है। जो मनुष्य (अपनी जिंदगी के) मूल प्रभू को नहीं समझता~ उसका असल सरमाया उसके हृदय घर के अंदर ही (बे-पहिचान सा) पड़ा रहता है। नाशवंत पदार्थ की व्यापारिन (जीव स्त्री) झूठ में लग के (आत्मिक गुणों से) लूटी जा रही है। नाम धन से वंचित रह के उसे बहुत आत्मिक कलेश व्यापता है।2। जो मनुष्य सोच समझ के नाम रतन को परखता है (नाम की कीमत जानता व समझता है) उसको दिन रात (आत्मिक गुणों का नित्य) नया नफा होता रहता है। वह अपने दिल में ही अपना असल सरमाया ढूंढ लेता है~ और अपनी जिंदगी का मनोरथ सिरे चढ़ा के यहां से जाता है~ जो मनुष्य नाम के व्यापारी सत्संगियों के साथ मिल के नाम का व्यापार करता है~ जो गुरू की शरण पड़ के परमात्मा (के गुणों) को अपने सोच मण्डल में लाता है ।3। (परमात्मा खुद ही आत्मिक गुणों का खजाना ढुंढवा सकता है) अगर उस खजाने के साथ मिलाप करवाने के स्मर्थ प्रभू खुद मिलाप करवा दे तो वह खजाना संतो की संगति में रह के मिल सकता है~ और जिस मनुष्य के अंदर बेअंत प्रभू की ज्योति (एक बार जाग जाए) वह प्रभू चरणों में मिल के फिर नहीं बिछुड़ता। क्योंकि~ वह अडोल (आत्मिक) आसन पर बैठ जाता है। वह सदा स्थिर प्रभू में लिव लगा लेता है। वह अपना प्रेम प्यार सदा स्थिर प्रभू में लगा लेता है।4। (गुरू की मति पर चल के) जिन्होंने अपने आप को पहिचान लिया है~ उनको अपने हृदय-रूप सुंदर स्थान में ही परमात्मा का निवास स्थान मिल जाता है। सदा स्थिर प्रभू के प्यार रंग में रंगे रहने के कारण उन्हे वह सदा कायम रहने वाला प्रभू मिल जाता है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 56 है, राग Siree Raag का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
Lodhi Gardens में सुबह की walk, घूमते-घूमते एक पुरानी पंक्ति।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 42 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 56” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Siree Raag राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 57 →, पीछे का: ← अंग 55।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।