अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: देवगंधारी महला 5 ॥ हे बहन ! मैंने इस अनेकों रंगों वाले जगत को (ध्यान से) देखा है।मुझे इसमें परमात्मा के बिना और कोई नहीं दिखता। हे बहन ! धरती के सारे खण्डों में।देशों में सभी में परमात्मा ही मौजूद है।सब भवनों में परमात्मा ही व्यापक है। 1।रहाउ। हे बहन ! परमात्मा अपहुँच है।हम जीवों की बुद्धि उस तक नहीं पहुँच सकती।उसकी महिमा कोई भी बयान नहीं कर सकता।हे बहन ! उसकी शोभा सुन-सुन के मेरे मन को आत्मिक जीवन मिल रहा है। चारों आश्रमों।चारों वर्णों के जीव उसकी सेवा-भक्ति कर के (माया के बंधनों से) आजाद हो जाते हैं। 1। हे नानक ! कह, जिस मनुष्य के हृदय में गुरू ने अपना शबद पक्का करके टिका दिया उसने सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा हासिल कर लिया।उसके अंदर से मेर-तेर दूर हो गई।उसको आत्मिक आनंद मिल गया। उसने संसार-समुंद्र पार कर लिया।उसको परमात्मा का नाम-खजाना मिल गया।उसको आत्मिक अडोलता हासिल हो गई। 2। 2। 33।
रागु देवगंधारी महला 5 घरु 6 ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ एकै रे हरि एकै जान ॥ एकै रे गुरमुखि जान ॥1॥ रहाउ ॥ काहे भ्रमत हउ तुम भ्रमहु न भाई रविआ रे रविआ स्रब थान ॥1॥ जिउ बैसंतरु कासट मझारि बिनु संजम नही कारज सारि ॥ बिनु गुर न पावैगो हरि जी को दुआर ॥ मिलि संगति तजि अभिमान कहु नानक पाए है परम निधान ॥2॥1॥34॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: रागु देवगंधारी महला 5 घरु 6 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! हर जगह एक परमात्मा को ही बसता समझ। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर एक परमात्मा को ही (हर जगह बसता) समझ। 1।रहाउ। हे भाई ! आप क्यों भटकते हैं।भटकना त्याग दो।हे भाई ! परमात्मा सब जगह में व्याप रहा है। 1। हे भाई ! जैसे (हरेक) लकड़ी में आग (बसती है।पर) जुगति के बिना (वह आग हासिल नहीं की जा सकती।और।आग से किए जाने वाले) काम सिरे नहीं चढ़ सकते। (इसी तरह।चाहे परमात्मा हर जगह बस रहा है।पर) गुरू को मिले बिना कोई मनुष्य परमात्मा का दर नहीं पा सकेगा। हे नानक ! कह, साध-संगति में मिल के अपना अहंकार त्याग के सबसे श्रेष्ठ (नाम-) खजाना मिल जाता है। 2। 1। 34।
देवगंधारी 5 ॥ जानी न जाई ता की गाति ॥1॥ रहाउ ॥ कह पेखारउ हउ करि चतुराई बिसमन बिसमे कहन कहाति ॥1॥ गण गंधरब सिध अरु साधिक ॥ सुरि नर देव ब्रहम ब्रहमादिक ॥ चतुर बेद उचरत दिनु राति ॥ अगम अगम ठाकुरु आगाधि ॥ गुन बेअंत बेअंत भनु नानक कहनु न जाई परै पराति ॥2॥2॥35॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: देवगंधारी 5 ॥ हे भाई ! उस परमात्मा की आत्मक अवस्था समझी नहीं जा सकती (कि परमात्मा कैसा है,ये बात जानी नहीं जा सकती)। 1।रहाउ। हे भाई ! अपनी अकल का जोर लगा के मैं वह परमात्मा कहाँ से दिखाऊँ।(नहीं दिखा सकता)।जो मनुष्य उसे बयान करने का प्रयत्न करते हैं वे भी हैरान ही रह जाते हैं (उसका स्वरूप कहा नहीं जा सकता)। 1। हे भाई ! शिव जी के गुण।देवताओं के रागी।करामाती योगी।योग-साधना करने वाले। दैवी गुणों वाले मनुष्य।देवते।ब्रह्मज्ञानी।ब्रह्मा आदि बड़े देवतागण। चारों वेद (उस परमात्मा के गुणों को) दिन-रात उच्चारण करते हैं। फिर भी उस परमात्मा तक (अपनी अकल के जोर से) पहुँच नहीं सकते।वह अपहुँच है वह अथाह है। हे नानक ! कह, परमात्मा के गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता।वह बेअंत है।उसका स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता।वह परे से परे है। 2। 2। 35।
देवगंधारी महला 5 ॥ धिआए गाए करनैहार ॥ भउ नाही सुख सहज अनंदा अनिक ओही रे एक समार ॥1॥ रहाउ ॥ सफल मूरति गुरु मेरै माथै ॥ जत कत पेखउ तत तत साथै ॥ चरन कमल मेरे प्रान अधार ॥1॥ समरथ अथाह बडा प्रभु मेरा ॥ घट घट अंतरि साहिबु नेरा ॥ ताकी सरनि आसर प्रभ नानक जा का अंतु न पारावार ॥2॥3॥36॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: देवगंधारी महला 5 ॥ हे भाई ! जो मनुष्य सृजनहार परमात्मा का ध्यान धरता है करतार के गुण गाता है। उसे कोई डर छू नहीं सकता।उसे आत्मिक अडोलता के सुख-आनंद मिले रहते हैं।हे भाई ! आप उस करतार को अपने हृदय में संभाल के रख।वही एक है और वही अनेकों रूपों वाला है। 1।रहाउ। हे भाई ! जिस गुरू के दर्शन जीवन के फल देने वाले हैं वह मेरे माथे पर (अपना हाथ रखे हुए है।उसकी बरकति से) मैं जिधर देखता हूँ उधर ही परमात्मा मुझे अपने साथ बसता प्रतीत होता है। उस परमात्मा के सुंदर चरण मेरे प्राणों का आसरा बन गए हैं। 1। जिस (के स्वरूप) का इस पार उस पार की थाह नहीं लगाई जा सकती। प्रत्येक शारीर के अन्दर (पास) वह मालिक प्रभु है हे नानक ! (कह, हे भाई !) मैंने उस परमात्मा की शरण देखी है उस प्रभू का आसरा चाहा है जिस (के गुणों) का अंत नहीं पाया जा सकता। 2। 3। 36।
देवगंधारी महला 5 ॥ उलटी रे मन उलटी रे ॥ साकत सिउ करि उलटी रे ॥ झूठै की रे झूठु परीति छुटकी रे मन छुटकी रे साकत संगि न छुटकी रे ॥1॥ रहाउ ॥ जिउ काजर भरि मंदरु राखिओ जो पैसै कालूखी रे ॥ दूरहु ही ते भागि गइओ है जिसु गुर मिलि छुटकी त्रिकुटी रे ॥1॥ मागउ दानु क्रिपाल क्रिपा निधि मेरा मुखु साकत संगि न जुटसी रे ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: देवगंधारी महला 5 ॥ हे मेरे मन !उनसे अपने आप को सदा परे रख।दूर रख। जो मनुष्य परमात्मा के साथ सदा टूटे रहते हैं। हे मन ! साकत झूठे मनुष्य की प्रीति को भी झूठ ही समझ।ये कभी तोड़ नहीं निभती।ये जरूर टूट जाती है।फिर।साकत की संगति में रहने से विकारों से कभी भी निजात नहीं मिल सकती। 1।रहाउ। हे मन ! जैसे कोई घर काजल से भर लिया जाए।उसमें जो भी मनुष्य प्रवेश करेगा वह कालिख से भर जाएगा (वैसे ही परमात्मा से टूटे हुए मनुष्य से मुंह जोड़ने से विकारों की कालिख ही मिलेगी)। गुरू को मिल के जिस मनुष्य के माथे की त्रिकुटी मिट जाती है (जिसके अंदर से विकारों की कशिश दूर हो जाती है) वह दूर से ही साकत मनुष्य से परे परे रहता है। 1। हे कृपा के घर प्रभू ! हे कृपा के खजाने प्रभू ! मैं आपके पास एक दान माँगता हूँ (मेहर कर) मुझे किसी साकत का साथ ना मिले।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “देवगंधारी महला 5 ॥ हे बहन ! मैंने इस अनेकों रंगों वाले जगत को (ध्यान से) देखा है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।