अंग
53
राग Siree Raag
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਭਾਈ ਰੇ ਸਾਚੀ ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਤੁਠੈ ਪਾਈਐ ਪੂਰਨ ਅਲਖ ਅਭੇਵ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਵਿਟਹੁ ਵਾਰਿਆ ਜਿਨਿ ਦਿਤਾ ਸਚੁ ਨਾਉ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਸਚੁ ਸਲਾਹਣਾ ਸਚੇ ਕੇ ਗੁਣ ਗਾਉ ॥
ਸਚੁ ਖਾਣਾ ਸਚੁ ਪੈਨਣਾ ਸਚੇ ਸਚਾ ਨਾਉ ॥੨॥
ਸਾਸਿ ਗਿਰਾਸਿ ਨ ਵਿਸਰੈ ਸਫਲੁ ਮੂਰਤਿ ਗੁਰੁ ਆਪਿ ॥
ਗੁਰ ਜੇਵਡੁ ਅਵਰੁ ਨ ਦਿਸਈ ਆਠ ਪਹਰ ਤਿਸੁ ਜਾਪਿ ॥
ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਤਾ ਪਾਈਐ ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਗੁਣਤਾਸਿ ॥੩॥
ਗੁਰੁ ਪਰਮੇਸਰੁ ਏਕੁ ਹੈ ਸਭ ਮਹਿ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥
ਜਿਨ ਕਉ ਪੂਰਬਿ ਲਿਖਿਆ ਸੇਈ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਸਰਣਾਗਤੀ ਮਰੈ ਨ ਆਵੈ ਜਾਇ ॥੪॥੩੦॥੧੦੦॥
ਸਤਿਗੁਰ ਤੁਠੈ ਪਾਈਐ ਪੂਰਨ ਅਲਖ ਅਭੇਵ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਵਿਟਹੁ ਵਾਰਿਆ ਜਿਨਿ ਦਿਤਾ ਸਚੁ ਨਾਉ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਸਚੁ ਸਲਾਹਣਾ ਸਚੇ ਕੇ ਗੁਣ ਗਾਉ ॥
ਸਚੁ ਖਾਣਾ ਸਚੁ ਪੈਨਣਾ ਸਚੇ ਸਚਾ ਨਾਉ ॥੨॥
ਸਾਸਿ ਗਿਰਾਸਿ ਨ ਵਿਸਰੈ ਸਫਲੁ ਮੂਰਤਿ ਗੁਰੁ ਆਪਿ ॥
ਗੁਰ ਜੇਵਡੁ ਅਵਰੁ ਨ ਦਿਸਈ ਆਠ ਪਹਰ ਤਿਸੁ ਜਾਪਿ ॥
ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਤਾ ਪਾਈਐ ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਗੁਣਤਾਸਿ ॥੩॥
ਗੁਰੁ ਪਰਮੇਸਰੁ ਏਕੁ ਹੈ ਸਭ ਮਹਿ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥
ਜਿਨ ਕਉ ਪੂਰਬਿ ਲਿਖਿਆ ਸੇਈ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਸਰਣਾਗਤੀ ਮਰੈ ਨ ਆਵੈ ਜਾਇ ॥੪॥੩੦॥੧੦੦॥
भाई रे साची सतिगुर सेव ॥
सतिगुर तुठै पाईऐ पूरन अलख अभेव ॥१॥ रहाउ ॥
सतिगुर विटहु वारिआ जिनि दिता सचु नाउ ॥
अनदिनु सचु सलाहणा सचे के गुण गाउ ॥
सचु खाणा सचु पैनणा सचे सचा नाउ ॥२॥
सासि गिरासि न विसरै सफलु मूरति गुरु आपि ॥
गुर जेवडु अवरु न दिसई आठ पहर तिसु जापि ॥
नदरि करे ता पाईऐ सचु नामु गुणतासि ॥३॥
गुरु परमेसरु एकु है सभ महि रहिआ समाइ ॥
जिन कउ पूरबि लिखिआ सेई नामु धिआइ ॥
नानक गुर सरणागती मरै न आवै जाइ ॥४॥३०॥१००॥
सतिगुर तुठै पाईऐ पूरन अलख अभेव ॥१॥ रहाउ ॥
सतिगुर विटहु वारिआ जिनि दिता सचु नाउ ॥
अनदिनु सचु सलाहणा सचे के गुण गाउ ॥
सचु खाणा सचु पैनणा सचे सचा नाउ ॥२॥
सासि गिरासि न विसरै सफलु मूरति गुरु आपि ॥
गुर जेवडु अवरु न दिसई आठ पहर तिसु जापि ॥
नदरि करे ता पाईऐ सचु नामु गुणतासि ॥३॥
गुरु परमेसरु एकु है सभ महि रहिआ समाइ ॥
जिन कउ पूरबि लिखिआ सेई नामु धिआइ ॥
नानक गुर सरणागती मरै न आवै जाइ ॥४॥३०॥१००॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! गुरू की सेवा जरूर फल देती है। (क्योंकि) गुरू प्रसन्न हो जाए तो वह परमात्मा मिल जाता है जो सब में व्यापक है जो अदृष्ट है और जिस का भेद नहीं पाया जा सकता।1।रहाउ। हे भाई ! मैं उस गुरू के सदके जाता हूँ~ जिस ने (मुझे) सदा कायम रहने वाला हरि नाम दिया है। (जिस गुरू की कृपा से) मैं हर वक्त सदा स्थिर प्रभू को सलाहता रहता हूँ और सदा स्थिर प्रभू के गुण गाता रहता हूँ। (हे भाई! गुरू की मेहर से अब) सदा स्थिर हरि नाम (मेरी आत्मिक) खुराक बन गया है। सदा स्थिर हरि नाम (मेरी) पोशाक हो चुका है (आदर-सत्कार का कारण बन चुका है)। (अब मैं) सदा कायम रहने वाले प्रभू का सदा स्थिर नाम (हर वक्त जपता हूँ)।2। हे भाई ! गुरू वह व्यक्तित्व है (सख्शियत है) जो सारे फल देने के स्मर्थ है (गुरू की शरण पड़ने से हरेक) श्वास के साथ (हरेक) ग्रास के साथ (कभी भी परमात्मा) नहीं भूलता। हे भाई ! गुरू के बराबर और कोई (दाता) नहीं दिखता~ आठों पहर उस (गुरू को) याद रख। जब गुरू मेहर की निगाह करता है~ तो सारे गुणों के खजाने परमात्मा का सदा स्थिर रहने वाला नाम प्राप्त हो जाता है।3। हे भाई ! जो परमात्मा सारी सृष्टि में व्यापक है~ वह और गुरू एक रूप हैं। जिन मनुष्यों की पूर्व जन्म की नेक कमाई के संसकारों का लेखा अंकुरित होता है वही मनुष्य (गुरू की शरण पड़ के) परमात्मा का नाम सिमर के (ये श्रद्धा बनाते हैं कि परमात्मा सभ में व्यापक है)। हे नानक! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है~ वह मनुष्य आत्मिक मौत नहीं मरता। वह जनम मरण के चक्कर में नहीं पड़ता।4।30।100।
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੧ ਘਰੁ ੧ ਅਸਟਪਦੀਆ ॥
ਆਖਿ ਆਖਿ ਮਨੁ ਵਾਵਣਾ ਜਿਉ ਜਿਉ ਜਾਪੈ ਵਾਇ ॥
ਜਿਸ ਨੋ ਵਾਇ ਸੁਣਾਈਐ ਸੋ ਕੇਵਡੁ ਕਿਤੁ ਥਾਇ ॥
ਆਖਣ ਵਾਲੇ ਜੇਤੜੇ ਸਭਿ ਆਖਿ ਰਹੇ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥੧॥
ਬਾਬਾ ਅਲਹੁ ਅਗਮ ਅਪਾਰੁ ॥
ਪਾਕੀ ਨਾਈ ਪਾਕ ਥਾਇ ਸਚਾ ਪਰਵਦਿਗਾਰੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੇਰਾ ਹੁਕਮੁ ਨ ਜਾਪੀ ਕੇਤੜਾ ਲਿਖਿ ਨ ਜਾਣੈ ਕੋਇ ॥
ਜੇ ਸਉ ਸਾਇਰ ਮੇਲੀਅਹਿ ਤਿਲੁ ਨ ਪੁਜਾਵਹਿ ਰੋਇ ॥
ਕੀਮਤਿ ਕਿਨੈ ਨ ਪਾਈਆ ਸਭਿ ਸੁਣਿ ਸੁਣਿ ਆਖਹਿ ਸੋਇ ॥੨॥
ਪੀਰ ਪੈਕਾਮਰ ਸਾਲਕ ਸਾਦਕ ਸੁਹਦੇ ਅਉਰੁ ਸਹੀਦ ॥
ਸੇਖ ਮਸਾਇਕ ਕਾਜੀ ਮੁਲਾ ਦਰਿ ਦਰਵੇਸ ਰਸੀਦ ॥
ਬਰਕਤਿ ਤਿਨ ਕਉ ਅਗਲੀ ਪੜਦੇ ਰਹਨਿ ਦਰੂਦ ॥੩॥
ਪੁਛਿ ਨ ਸਾਜੇ ਪੁਛਿ ਨ ਢਾਹੇ ਪੁਛਿ ਨ ਦੇਵੈ ਲੇਇ ॥
ਆਪਣੀ ਕੁਦਰਤਿ ਆਪੇ ਜਾਣੈ ਆਪੇ ਕਰਣੁ ਕਰੇਇ ॥
ਸਭਨਾ ਵੇਖੈ ਨਦਰਿ ਕਰਿ ਜੈ ਭਾਵੈ ਤੈ ਦੇਇ ॥੪॥
ਥਾਵਾ ਨਾਵ ਨ ਜਾਣੀਅਹਿ ਨਾਵਾ ਕੇਵਡੁ ਨਾਉ ॥
ਜਿਥੈ ਵਸੈ ਮੇਰਾ ਪਾਤਿਸਾਹੁ ਸੋ ਕੇਵਡੁ ਹੈ ਥਾਉ ॥
ਅੰਬੜਿ ਕੋਇ ਨ ਸਕਈ ਹਉ ਕਿਸ ਨੋ ਪੁਛਣਿ ਜਾਉ ॥੫॥
ਵਰਨਾ ਵਰਨ ਨ ਭਾਵਨੀ ਜੇ ਕਿਸੈ ਵਡਾ ਕਰੇਇ ॥
ਵਡੇ ਹਥਿ ਵਡਿਆਈਆ ਜੈ ਭਾਵੈ ਤੈ ਦੇਇ ॥
ਹੁਕਮਿ ਸਵਾਰੇ ਆਪਣੈ ਚਸਾ ਨ ਢਿਲ ਕਰੇਇ ॥੬॥
ਸਭੁ ਕੋ ਆਖੈ ਬਹੁਤੁ ਬਹੁਤੁ ਲੈਣੈ ਕੈ ਵੀਚਾਰਿ ॥
ਕੇਵਡੁ ਦਾਤਾ ਆਖੀਐ ਦੇ ਕੈ ਰਹਿਆ ਸੁਮਾਰਿ ॥
ਨਾਨਕ ਤੋਟਿ ਨ ਆਵਈ ਤੇਰੇ ਜੁਗਹ ਜੁਗਹ ਭੰਡਾਰ ॥੭॥੧॥
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੧ ਘਰੁ ੧ ਅਸਟਪਦੀਆ ॥
ਆਖਿ ਆਖਿ ਮਨੁ ਵਾਵਣਾ ਜਿਉ ਜਿਉ ਜਾਪੈ ਵਾਇ ॥
ਜਿਸ ਨੋ ਵਾਇ ਸੁਣਾਈਐ ਸੋ ਕੇਵਡੁ ਕਿਤੁ ਥਾਇ ॥
ਆਖਣ ਵਾਲੇ ਜੇਤੜੇ ਸਭਿ ਆਖਿ ਰਹੇ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥੧॥
ਬਾਬਾ ਅਲਹੁ ਅਗਮ ਅਪਾਰੁ ॥
ਪਾਕੀ ਨਾਈ ਪਾਕ ਥਾਇ ਸਚਾ ਪਰਵਦਿਗਾਰੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੇਰਾ ਹੁਕਮੁ ਨ ਜਾਪੀ ਕੇਤੜਾ ਲਿਖਿ ਨ ਜਾਣੈ ਕੋਇ ॥
ਜੇ ਸਉ ਸਾਇਰ ਮੇਲੀਅਹਿ ਤਿਲੁ ਨ ਪੁਜਾਵਹਿ ਰੋਇ ॥
ਕੀਮਤਿ ਕਿਨੈ ਨ ਪਾਈਆ ਸਭਿ ਸੁਣਿ ਸੁਣਿ ਆਖਹਿ ਸੋਇ ॥੨॥
ਪੀਰ ਪੈਕਾਮਰ ਸਾਲਕ ਸਾਦਕ ਸੁਹਦੇ ਅਉਰੁ ਸਹੀਦ ॥
ਸੇਖ ਮਸਾਇਕ ਕਾਜੀ ਮੁਲਾ ਦਰਿ ਦਰਵੇਸ ਰਸੀਦ ॥
ਬਰਕਤਿ ਤਿਨ ਕਉ ਅਗਲੀ ਪੜਦੇ ਰਹਨਿ ਦਰੂਦ ॥੩॥
ਪੁਛਿ ਨ ਸਾਜੇ ਪੁਛਿ ਨ ਢਾਹੇ ਪੁਛਿ ਨ ਦੇਵੈ ਲੇਇ ॥
ਆਪਣੀ ਕੁਦਰਤਿ ਆਪੇ ਜਾਣੈ ਆਪੇ ਕਰਣੁ ਕਰੇਇ ॥
ਸਭਨਾ ਵੇਖੈ ਨਦਰਿ ਕਰਿ ਜੈ ਭਾਵੈ ਤੈ ਦੇਇ ॥੪॥
ਥਾਵਾ ਨਾਵ ਨ ਜਾਣੀਅਹਿ ਨਾਵਾ ਕੇਵਡੁ ਨਾਉ ॥
ਜਿਥੈ ਵਸੈ ਮੇਰਾ ਪਾਤਿਸਾਹੁ ਸੋ ਕੇਵਡੁ ਹੈ ਥਾਉ ॥
ਅੰਬੜਿ ਕੋਇ ਨ ਸਕਈ ਹਉ ਕਿਸ ਨੋ ਪੁਛਣਿ ਜਾਉ ॥੫॥
ਵਰਨਾ ਵਰਨ ਨ ਭਾਵਨੀ ਜੇ ਕਿਸੈ ਵਡਾ ਕਰੇਇ ॥
ਵਡੇ ਹਥਿ ਵਡਿਆਈਆ ਜੈ ਭਾਵੈ ਤੈ ਦੇਇ ॥
ਹੁਕਮਿ ਸਵਾਰੇ ਆਪਣੈ ਚਸਾ ਨ ਢਿਲ ਕਰੇਇ ॥੬॥
ਸਭੁ ਕੋ ਆਖੈ ਬਹੁਤੁ ਬਹੁਤੁ ਲੈਣੈ ਕੈ ਵੀਚਾਰਿ ॥
ਕੇਵਡੁ ਦਾਤਾ ਆਖੀਐ ਦੇ ਕੈ ਰਹਿਆ ਸੁਮਾਰਿ ॥
ਨਾਨਕ ਤੋਟਿ ਨ ਆਵਈ ਤੇਰੇ ਜੁਗਹ ਜੁਗਹ ਭੰਡਾਰ ॥੭॥੧॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सिरीरागु महला १ घरु १ असटपदीआ ॥
आखि आखि मनु वावणा जिउ जिउ जापै वाइ ॥
जिस नो वाइ सुणाईऐ सो केवडु कितु थाइ ॥
आखण वाले जेतड़े सभि आखि रहे लिव लाइ ॥१॥
बाबा अलहु अगम अपारु ॥
पाकी नाई पाक थाइ सचा परवदिगारु ॥१॥ रहाउ ॥
तेरा हुकमु न जापी केतड़ा लिखि न जाणै कोइ ॥
जे सउ साइर मेलीअहि तिलु न पुजावहि रोइ ॥
कीमति किनै न पाईआ सभि सुणि सुणि आखहि सोइ ॥२॥
पीर पैकामर सालक सादक सुहदे अउरु सहीद ॥
सेख मसाइक काजी मुला दरि दरवेस रसीद ॥
बरकति तिन कउ अगली पड़दे रहनि दरूद ॥३॥
पुछि न साजे पुछि न ढाहे पुछि न देवै लेइ ॥
आपणी कुदरति आपे जाणै आपे करणु करेइ ॥
सभना वेखै नदरि करि जै भावै तै देइ ॥४॥
थावा नाव न जाणीअहि नावा केवडु नाउ ॥
जिथै वसै मेरा पातिसाहु सो केवडु है थाउ ॥
अंबड़ि कोइ न सकई हउ किस नो पुछणि जाउ ॥५॥
वरना वरन न भावनी जे किसै वडा करेइ ॥
वडे हथि वडिआईआ जै भावै तै देइ ॥
हुकमि सवारे आपणै चसा न ढिल करेइ ॥६॥
सभु को आखै बहुतु बहुतु लैणै कै वीचारि ॥
केवडु दाता आखीऐ दे कै रहिआ सुमारि ॥
नानक तोटि न आवई तेरे जुगह जुगह भंडार ॥७॥१॥
सिरीरागु महला १ घरु १ असटपदीआ ॥
आखि आखि मनु वावणा जिउ जिउ जापै वाइ ॥
जिस नो वाइ सुणाईऐ सो केवडु कितु थाइ ॥
आखण वाले जेतड़े सभि आखि रहे लिव लाइ ॥१॥
बाबा अलहु अगम अपारु ॥
पाकी नाई पाक थाइ सचा परवदिगारु ॥१॥ रहाउ ॥
तेरा हुकमु न जापी केतड़ा लिखि न जाणै कोइ ॥
जे सउ साइर मेलीअहि तिलु न पुजावहि रोइ ॥
कीमति किनै न पाईआ सभि सुणि सुणि आखहि सोइ ॥२॥
पीर पैकामर सालक सादक सुहदे अउरु सहीद ॥
सेख मसाइक काजी मुला दरि दरवेस रसीद ॥
बरकति तिन कउ अगली पड़दे रहनि दरूद ॥३॥
पुछि न साजे पुछि न ढाहे पुछि न देवै लेइ ॥
आपणी कुदरति आपे जाणै आपे करणु करेइ ॥
सभना वेखै नदरि करि जै भावै तै देइ ॥४॥
थावा नाव न जाणीअहि नावा केवडु नाउ ॥
जिथै वसै मेरा पातिसाहु सो केवडु है थाउ ॥
अंबड़ि कोइ न सकई हउ किस नो पुछणि जाउ ॥५॥
वरना वरन न भावनी जे किसै वडा करेइ ॥
वडे हथि वडिआईआ जै भावै तै देइ ॥
हुकमि सवारे आपणै चसा न ढिल करेइ ॥६॥
सभु को आखै बहुतु बहुतु लैणै कै वीचारि ॥
केवडु दाता आखीऐ दे कै रहिआ सुमारि ॥
नानक तोटि न आवई तेरे जुगह जुगह भंडार ॥७॥१॥
हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। श्री राग महला १ घरु १ असटपदीआ ॥ ज्यों ज्यों किसी जीव को (प्रभू के गुणों) को बोलने की समझ पड़ती है (त्यों त्यों ये समझ भी आती जाती है कि उसके गुण) बयान कर कर के मन को खपाना ही है। जिस प्रभू को बोल के सुनाते हैं (जिस प्रभु के गुणों के बारे में बोल के औरों को बताते हैं~ उसकी बाबत ये तो पता ही नहीं लगता कि) वह कितना बड़ा है और किस जगह पे (निवास रखता) है। वह सारे बयान करते थक जाते हैं~ (गुणों में) सुरति जोड़ते रह जाते हैं।1। हे भाई! परमात्मा के गुणों तक पहुँच नहीं हो सकती~ उसके गुणों का परला छोर नहीं ढूंढा जा सकता। उसकी उपमा पवित्र है~ वह पवित्र स्थान पर (शोभायमान) है। वह सदा कायम रहने वाला प्रभू (सब जीवों को) पालने वाला है।1।रहाउ ॥ हे प्रभू ! किसी को भी ये समझ नहीं पड़ी कि तेरा हुकम कितना अटॅल है। कोई भी तेरे हुकम को बयान नहीं कर सकता। अगर सौ कवि भी एकत्र कर लिए जाएंतो भी वह बयान करने का व्यर्थ प्रयत्न करके तेरे गुणों तक एक तिल मात्र नहीं पहुँच सकते। किसी भी जीव ने तेरा मुल्य नहीं पाया~ सारे जीव तेरी बाबत (दूसरों से) सुन सुन के ही कह देते हैं।2। (दनिया में) अनेकों पीर पैग़ंबर~ औरों को जीवन राह बताने वाले~ अनेकों शेख~ काजी~ मुल्ला और तेरे दरवाजे तक पहुंचे हुए दरवेश आए (किसी को~ हे प्रभू! तेरे गुणों का अंत नहीं मिला~ हाँ सिर्फ) उनको बहुत बरकति मिली, (उनके ही भाग्य जागे) जो (तेरे दर पे) दुआ (अरजोई) करते रहते हैं।3। प्रभू ये जगत ना किसी से सलाह ले के बनाता है ना ही पूछ के नाश करता है। ना ही किसी की सलाह से शरीर में जीवात्मा डालता है~ ना निकालता है। परमात्मा अपनी कुदरति स्वयं ही जानता है~ स्वयं ही यह जगत रचना करता है। मेहर की निगाह करके सब जीवों की संभाल स्वयं ही करता है। जो उसे भाता है~ उसको (अपने गुणों की कद्र) बख्शता है।4। (बेअंत पुरियां~ धरतियां आदि हैं। इतनी बेअंत रचना है कि) सब जगहों के (पदार्थों के) नाम जाने नहीं जा सकते। बेअंत नामों में से वह कौन सा नाम हो सकता है जो इतना बड़ा हो कि परमात्मा के असल बडेपन को बयान कर सके? यह बात कोई नहीं बता सकता कि जहां सुष्टि का पातशाह प्रभु बसता है~ वह जगह कितनी बड़ी है। किसी से भी ये पूछा नहीं जा सकता~ क्योंकि~ कोई जीव उस अवस्था तक पहुँच ही नहीं सकता (जहां वह परमात्मा की बुजुर्गी सही सही बता सके)।5। (ये भी नहीं कहा जा सकता कि) परमात्मा को कोई खास ऊँची या नीची जाति भाती है या नहीं भाती और इस तरह वह किसी एक जाति को ऊंचा कर देता है। सब वडिआईआं बड़े प्रभू के अपने हाथ में हैं। जो जीव उसे अच्छा लगता है उसे वडिआई बख्श देता है। अपनी रजा में ही वह जीव के जीवन को संवार देता है~ रॅती भर भी ढील नहीं करता।6। परमात्मा से दातें लेने के ख्याल से हरेक जीव बहुत बहुत मांगे मांगता है। यह बताया नहीं जा सकता कि परमात्मा कितना बड़ा दाता है। वह दातें दे रहा है~ पर दातें गिनती से परे हैं। हे नानक! (कह~ हे प्रभू!) तेरे खजाने सदा ही भरे रहते हैं~ इनमें कभी भी कमी नहीं आ सकती।7।1।
ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਸਭੇ ਕੰਤ ਮਹੇਲੀਆ ਸਗਲੀਆ ਕਰਹਿ ਸੀਗਾਰੁ ॥
ਸਭੇ ਕੰਤ ਮਹੇਲੀਆ ਸਗਲੀਆ ਕਰਹਿ ਸੀਗਾਰੁ ॥
महला १ ॥
सभे कंत महेलीआ सगलीआ करहि सीगारु ॥
सभे कंत महेलीआ सगलीआ करहि सीगारु ॥
हिन्दी अर्थ: महला १ ॥ सारी जीव-सि्त्रयां प्रभु पति की ही हैं~ सारी ही (उस प्रभू पति को प्रसन्न करने के लिए) श्रृंगार करती हैं।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 53 है, राग Siree Raag का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
दिल्ली मेट्रो की सुबह 7 बजे की rush hour, हर चेहरा अपनी जल्दी में, और मन के अंदर यह विचार।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 38 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 53” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Siree Raag राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 54 →, पीछे का: ← अंग 52।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।