अंग
51
राग Siree Raag
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਨਾਨਕ ਧੰਨੁ ਸੋਹਾਗਣੀ ਜਿਨ ਸਹ ਨਾਲਿ ਪਿਆਰੁ ॥੪॥੨੩॥੯੩॥
नानक धंनु सोहागणी जिन सह नालि पिआरु ॥४॥२३॥९३॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक! वह वह जीवस्त्री सुहाग-भाग वाली है जिनका पति प्रभू से प्यार (बन गया) है।4।23।93।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੫ ਘਰੁ ੬ ॥
ਕਰਣ ਕਾਰਣ ਏਕੁ ਓਹੀ ਜਿਨਿ ਕੀਆ ਆਕਾਰੁ ॥
ਤਿਸਹਿ ਧਿਆਵਹੁ ਮਨ ਮੇਰੇ ਸਰਬ ਕੋ ਆਧਾਰੁ ॥੧॥
ਗੁਰ ਕੇ ਚਰਨ ਮਨ ਮਹਿ ਧਿਆਇ ॥
ਛੋਡਿ ਸਗਲ ਸਿਆਣਪਾ ਸਾਚਿ ਸਬਦਿ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਦੁਖੁ ਕਲੇਸੁ ਨ ਭਉ ਬਿਆਪੈ ਗੁਰ ਮੰਤ੍ਰੁ ਹਿਰਦੈ ਹੋਇ ॥
ਕੋਟਿ ਜਤਨਾ ਕਰਿ ਰਹੇ ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਤਰਿਓ ਨ ਕੋਇ ॥੨॥
ਦੇਖਿ ਦਰਸਨੁ ਮਨੁ ਸਾਧਾਰੈ ਪਾਪ ਸਗਲੇ ਜਾਹਿ ॥
ਹਉ ਤਿਨ ਕੈ ਬਲਿਹਾਰਣੈ ਜਿ ਗੁਰ ਕੀ ਪੈਰੀ ਪਾਹਿ ॥੩॥
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਮਨਿ ਵਸੈ ਸਾਚੁ ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਉ ॥
ਸੇ ਵਡਭਾਗੀ ਨਾਨਕਾ ਜਿਨਾ ਮਨਿ ਇਹੁ ਭਾਉ ॥੪॥੨੪॥੯੪॥
ਕਰਣ ਕਾਰਣ ਏਕੁ ਓਹੀ ਜਿਨਿ ਕੀਆ ਆਕਾਰੁ ॥
ਤਿਸਹਿ ਧਿਆਵਹੁ ਮਨ ਮੇਰੇ ਸਰਬ ਕੋ ਆਧਾਰੁ ॥੧॥
ਗੁਰ ਕੇ ਚਰਨ ਮਨ ਮਹਿ ਧਿਆਇ ॥
ਛੋਡਿ ਸਗਲ ਸਿਆਣਪਾ ਸਾਚਿ ਸਬਦਿ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਦੁਖੁ ਕਲੇਸੁ ਨ ਭਉ ਬਿਆਪੈ ਗੁਰ ਮੰਤ੍ਰੁ ਹਿਰਦੈ ਹੋਇ ॥
ਕੋਟਿ ਜਤਨਾ ਕਰਿ ਰਹੇ ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਤਰਿਓ ਨ ਕੋਇ ॥੨॥
ਦੇਖਿ ਦਰਸਨੁ ਮਨੁ ਸਾਧਾਰੈ ਪਾਪ ਸਗਲੇ ਜਾਹਿ ॥
ਹਉ ਤਿਨ ਕੈ ਬਲਿਹਾਰਣੈ ਜਿ ਗੁਰ ਕੀ ਪੈਰੀ ਪਾਹਿ ॥੩॥
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਮਨਿ ਵਸੈ ਸਾਚੁ ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਉ ॥
ਸੇ ਵਡਭਾਗੀ ਨਾਨਕਾ ਜਿਨਾ ਮਨਿ ਇਹੁ ਭਾਉ ॥੪॥੨੪॥੯੪॥
सिरीरागु महला ५ घरु ६ ॥
करण कारण एकु ओही जिनि कीआ आकारु ॥
तिसहि धिआवहु मन मेरे सरब को आधारु ॥१॥
गुर के चरन मन महि धिआइ ॥
छोडि सगल सिआणपा साचि सबदि लिव लाइ ॥१॥ रहाउ ॥
दुखु कलेसु न भउ बिआपै गुर मंत्रु हिरदै होइ ॥
कोटि जतना करि रहे गुर बिनु तरिओ न कोइ ॥२॥
देखि दरसनु मनु साधारै पाप सगले जाहि ॥
हउ तिन कै बलिहारणै जि गुर की पैरी पाहि ॥३॥
साधसंगति मनि वसै साचु हरि का नाउ ॥
से वडभागी नानका जिना मनि इहु भाउ ॥४॥२४॥९४॥
करण कारण एकु ओही जिनि कीआ आकारु ॥
तिसहि धिआवहु मन मेरे सरब को आधारु ॥१॥
गुर के चरन मन महि धिआइ ॥
छोडि सगल सिआणपा साचि सबदि लिव लाइ ॥१॥ रहाउ ॥
दुखु कलेसु न भउ बिआपै गुर मंत्रु हिरदै होइ ॥
कोटि जतना करि रहे गुर बिनु तरिओ न कोइ ॥२॥
देखि दरसनु मनु साधारै पाप सगले जाहि ॥
हउ तिन कै बलिहारणै जि गुर की पैरी पाहि ॥३॥
साधसंगति मनि वसै साचु हरि का नाउ ॥
से वडभागी नानका जिना मनि इहु भाउ ॥४॥२४॥९४॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ५ घरु ६ ॥ हे मेरे मन ! जिस परमात्मा ने यह दिखाई देता जगत बनाया है~ सिर्फ वही सृष्टि का रचनहार है~ और जीवों का रचनहार है~ तथा जीवों का आसरा है, उसी को सदा सिमरते रहो।1। (हे भाई !) गुरू के चरण अपने मन में टिका के रख (भाव~ अहम् को छोड़ के गुरू में श्रद्धा बना)। (अपनी) सारी चतुराईयां छोड़ दे। गुरू के शबद द्वारा सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा में सुरति जोड़।1।रहाउ। जिस मनुष्य के हृदय में गुरू का उपदेश (सदा) बसता है। उसको कोई दुख कोई कलेश कोई डर सता नहीं सकता। लोग करोडों (और और) यत्न करके थक जाते हैं~ पर गुरू की शरण के बिनां (उन दुख कलेशों से) कोई मनुष्य पार नहीं लांघ सकता।2। गुरू का दर्शन करके जिस मनुष्य का मन (गुरू का) आसरा पकड़ लेता है~ उसके सारे (पहले किए) पाप नाश हो जाते हैं। मैं उन ( भाग्यशाली) लोगों से कुर्बान जाता हूँ जो गुरू के चरणों में गिर पड़ते हैं।3। साध-संगति में रहने से सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा का नाम मन में बस जाता है। हे नानक! वह लोग भाग्यशाली हैं~ जिनके मन में (साध-संगति में टिकने का) यह प्रेम है।4।24।94।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸੰਚਿ ਹਰਿ ਧਨੁ ਪੂਜਿ ਸਤਿਗੁਰੁ ਛੋਡਿ ਸਗਲ ਵਿਕਾਰ ॥
ਜਿਨਿ ਤੂੰ ਸਾਜਿ ਸਵਾਰਿਆ ਹਰਿ ਸਿਮਰਿ ਹੋਇ ਉਧਾਰੁ ॥੧॥
ਜਪਿ ਮਨ ਨਾਮੁ ਏਕੁ ਅਪਾਰੁ ॥
ਪ੍ਰਾਨ ਮਨੁ ਤਨੁ ਜਿਨਹਿ ਦੀਆ ਰਿਦੇ ਕਾ ਆਧਾਰੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਾਮਿ ਕ੍ਰੋਧਿ ਅਹੰਕਾਰਿ ਮਾਤੇ ਵਿਆਪਿਆ ਸੰਸਾਰੁ ॥
ਪਉ ਸੰਤ ਸਰਣੀ ਲਾਗੁ ਚਰਣੀ ਮਿਟੈ ਦੂਖੁ ਅੰਧਾਰੁ ॥੨॥
ਸਤੁ ਸੰਤੋਖੁ ਦਇਆ ਕਮਾਵੈ ਏਹ ਕਰਣੀ ਸਾਰ ॥
ਆਪੁ ਛੋਡਿ ਸਭ ਹੋਇ ਰੇਣਾ ਜਿਸੁ ਦੇਇ ਪ੍ਰਭੁ ਨਿਰੰਕਾਰੁ ॥੩॥
ਜੋ ਦੀਸੈ ਸੋ ਸਗਲ ਤੂੰਹੈ ਪਸਰਿਆ ਪਾਸਾਰੁ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਗੁਰਿ ਭਰਮੁ ਕਾਟਿਆ ਸਗਲ ਬ੍ਰਹਮ ਬੀਚਾਰੁ ॥੪॥੨੫॥੯੫॥
ਸੰਚਿ ਹਰਿ ਧਨੁ ਪੂਜਿ ਸਤਿਗੁਰੁ ਛੋਡਿ ਸਗਲ ਵਿਕਾਰ ॥
ਜਿਨਿ ਤੂੰ ਸਾਜਿ ਸਵਾਰਿਆ ਹਰਿ ਸਿਮਰਿ ਹੋਇ ਉਧਾਰੁ ॥੧॥
ਜਪਿ ਮਨ ਨਾਮੁ ਏਕੁ ਅਪਾਰੁ ॥
ਪ੍ਰਾਨ ਮਨੁ ਤਨੁ ਜਿਨਹਿ ਦੀਆ ਰਿਦੇ ਕਾ ਆਧਾਰੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਾਮਿ ਕ੍ਰੋਧਿ ਅਹੰਕਾਰਿ ਮਾਤੇ ਵਿਆਪਿਆ ਸੰਸਾਰੁ ॥
ਪਉ ਸੰਤ ਸਰਣੀ ਲਾਗੁ ਚਰਣੀ ਮਿਟੈ ਦੂਖੁ ਅੰਧਾਰੁ ॥੨॥
ਸਤੁ ਸੰਤੋਖੁ ਦਇਆ ਕਮਾਵੈ ਏਹ ਕਰਣੀ ਸਾਰ ॥
ਆਪੁ ਛੋਡਿ ਸਭ ਹੋਇ ਰੇਣਾ ਜਿਸੁ ਦੇਇ ਪ੍ਰਭੁ ਨਿਰੰਕਾਰੁ ॥੩॥
ਜੋ ਦੀਸੈ ਸੋ ਸਗਲ ਤੂੰਹੈ ਪਸਰਿਆ ਪਾਸਾਰੁ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਗੁਰਿ ਭਰਮੁ ਕਾਟਿਆ ਸਗਲ ਬ੍ਰਹਮ ਬੀਚਾਰੁ ॥੪॥੨੫॥੯੫॥
सिरीरागु महला ५ ॥
संचि हरि धनु पूजि सतिगुरु छोडि सगल विकार ॥
जिनि तूं साजि सवारिआ हरि सिमरि होइ उधारु ॥१॥
जपि मन नामु एकु अपारु ॥
प्रान मनु तनु जिनहि दीआ रिदे का आधारु ॥१॥ रहाउ ॥
कामि क्रोधि अहंकारि माते विआपिआ संसारु ॥
पउ संत सरणी लागु चरणी मिटै दूखु अंधारु ॥२॥
सतु संतोखु दइआ कमावै एह करणी सार ॥
आपु छोडि सभ होइ रेणा जिसु देइ प्रभु निरंकारु ॥३॥
जो दीसै सो सगल तूंहै पसरिआ पासारु ॥
कहु नानक गुरि भरमु काटिआ सगल ब्रहम बीचारु ॥४॥२५॥९५॥
संचि हरि धनु पूजि सतिगुरु छोडि सगल विकार ॥
जिनि तूं साजि सवारिआ हरि सिमरि होइ उधारु ॥१॥
जपि मन नामु एकु अपारु ॥
प्रान मनु तनु जिनहि दीआ रिदे का आधारु ॥१॥ रहाउ ॥
कामि क्रोधि अहंकारि माते विआपिआ संसारु ॥
पउ संत सरणी लागु चरणी मिटै दूखु अंधारु ॥२॥
सतु संतोखु दइआ कमावै एह करणी सार ॥
आपु छोडि सभ होइ रेणा जिसु देइ प्रभु निरंकारु ॥३॥
जो दीसै सो सगल तूंहै पसरिआ पासारु ॥
कहु नानक गुरि भरमु काटिआ सगल ब्रहम बीचारु ॥४॥२५॥९५॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ५ ॥ (हे भाई!) परमात्मा का नाम धन इकट्ठा कर। अपने गुरू का आदर सत्कार हृदय में बसा (और इस तरह) सारे विकार छोड़। जिस परमात्मा ने तुझे पैदा करके सुंदर बनाया है~ उसका सिमरन कर~ (विकारों से तेरा) बचाव हो जाएगा।1। हे मन! उस परमात्मा का नाम जप। जो एक खुद ही खुद है और जो बेअंत है। जिसने ये जीवात्मा दी है मन दिया है और शरीर दिया है~ जो सभ जीवों के हृदय का आसरा है।1।रहाउ। जिन लोगों पे जगत का मोह दबाव डाले रखता है~ वह काम में~ क्रोध में~ अहंकार में मस्त रहते हैं। (इन विकारों से बचने के लिए~ हे भाई!) गुरू की शरण पड़~ गुरू की चरणी लग (गुरू का आसरा लेने से अज्ञानता का) घोर अंधकार रूप दुख मिट जाता है।2। वह सेवा~ संतोख व दया (की कमाई) कमाता है~ और यही है श्रेष्ठ करणी है। जिस (भाग्यशाली मनुष्य) को निरंकार प्रभू (अपने नाम की दात) देता है~ वह स्वै भाव छोड़के सभ की चरण धूड़ बनता है। ।3। हे प्रभू ! जो ये जगत दिखाई देता है सारा तेरा ही रूप दिखता है। तेरा ही पसारा हुआ ये पसारा दिखता है। हे नानक ! कह, गुरू ने जिस मनुष्य के मन की भटकन दूर कर दी है~ उस को~ यही सोच बनी रहती है कि हर जगह तू ही तू है।4।25।95।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਦੁਕ੍ਰਿਤ ਸੁਕ੍ਰਿਤ ਮੰਧੇ ਸੰਸਾਰੁ ਸਗਲਾਣਾ ॥
ਦੁਹਹੂੰ ਤੇ ਰਹਤ ਭਗਤੁ ਹੈ ਕੋਈ ਵਿਰਲਾ ਜਾਣਾ ॥੧॥
ਠਾਕੁਰੁ ਸਰਬੇ ਸਮਾਣਾ ॥
ਕਿਆ ਕਹਉ ਸੁਣਉ ਸੁਆਮੀ ਤੂੰ ਵਡ ਪੁਰਖੁ ਸੁਜਾਣਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਾਨ ਅਭਿਮਾਨ ਮੰਧੇ ਸੋ ਸੇਵਕੁ ਨਾਹੀ ॥
ਤਤ ਸਮਦਰਸੀ ਸੰਤਹੁ ਕੋਈ ਕੋਟਿ ਮੰਧਾਹੀ ॥੨॥
ਕਹਨ ਕਹਾਵਨ ਇਹੁ ਕੀਰਤਿ ਕਰਲਾ ॥
ਕਥਨ ਕਹਨ ਤੇ ਮੁਕਤਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਕੋਈ ਵਿਰਲਾ ॥੩॥
ਗਤਿ ਅਵਿਗਤਿ ਕਛੁ ਨਦਰਿ ਨ ਆਇਆ ॥
ਸੰਤਨ ਕੀ ਰੇਣੁ ਨਾਨਕ ਦਾਨੁ ਪਾਇਆ ॥੪॥੨੬॥੯੬॥
ਦੁਕ੍ਰਿਤ ਸੁਕ੍ਰਿਤ ਮੰਧੇ ਸੰਸਾਰੁ ਸਗਲਾਣਾ ॥
ਦੁਹਹੂੰ ਤੇ ਰਹਤ ਭਗਤੁ ਹੈ ਕੋਈ ਵਿਰਲਾ ਜਾਣਾ ॥੧॥
ਠਾਕੁਰੁ ਸਰਬੇ ਸਮਾਣਾ ॥
ਕਿਆ ਕਹਉ ਸੁਣਉ ਸੁਆਮੀ ਤੂੰ ਵਡ ਪੁਰਖੁ ਸੁਜਾਣਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਾਨ ਅਭਿਮਾਨ ਮੰਧੇ ਸੋ ਸੇਵਕੁ ਨਾਹੀ ॥
ਤਤ ਸਮਦਰਸੀ ਸੰਤਹੁ ਕੋਈ ਕੋਟਿ ਮੰਧਾਹੀ ॥੨॥
ਕਹਨ ਕਹਾਵਨ ਇਹੁ ਕੀਰਤਿ ਕਰਲਾ ॥
ਕਥਨ ਕਹਨ ਤੇ ਮੁਕਤਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਕੋਈ ਵਿਰਲਾ ॥੩॥
ਗਤਿ ਅਵਿਗਤਿ ਕਛੁ ਨਦਰਿ ਨ ਆਇਆ ॥
ਸੰਤਨ ਕੀ ਰੇਣੁ ਨਾਨਕ ਦਾਨੁ ਪਾਇਆ ॥੪॥੨੬॥੯੬॥
सिरीरागु महला ५ ॥
दुक्रित सुक्रित मंधे संसारु सगलाणा ॥
दुहहूं ते रहत भगतु है कोई विरला जाणा ॥१॥
ठाकुरु सरबे समाणा ॥
किआ कहउ सुणउ सुआमी तूं वड पुरखु सुजाणा ॥१॥ रहाउ ॥
मान अभिमान मंधे सो सेवकु नाही ॥
तत समदरसी संतहु कोई कोटि मंधाही ॥२॥
कहन कहावन इहु कीरति करला ॥
कथन कहन ते मुकता गुरमुखि कोई विरला ॥३॥
गति अविगति कछु नदरि न आइआ ॥
संतन की रेणु नानक दानु पाइआ ॥४॥२६॥९६॥
दुक्रित सुक्रित मंधे संसारु सगलाणा ॥
दुहहूं ते रहत भगतु है कोई विरला जाणा ॥१॥
ठाकुरु सरबे समाणा ॥
किआ कहउ सुणउ सुआमी तूं वड पुरखु सुजाणा ॥१॥ रहाउ ॥
मान अभिमान मंधे सो सेवकु नाही ॥
तत समदरसी संतहु कोई कोटि मंधाही ॥२॥
कहन कहावन इहु कीरति करला ॥
कथन कहन ते मुकता गुरमुखि कोई विरला ॥३॥
गति अविगति कछु नदरि न आइआ ॥
संतन की रेणु नानक दानु पाइआ ॥४॥२६॥९६॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ५ ॥ (हे भाई!) सारा जगत (शास्त्रों के अनुसार नीयत) बुरे कर्मों और अच्छे कर्मों (की विचार) में ही डूबा हुआ है। परमात्मा की भगती करने वाला मनुष्य इन दोनों विचारों से ही मुक्त रहता है (कि शास्त्रों अनुसार ‘दुक्रित’ कौन से हैं और ‘सुक्रित’ कौन से हैं)~ पर ऐसा कोई विरला ही मिलता है।1। हे स्वामी ! तू सब जीवों में समाया हुआ है और सबको पालने वाला है। तू सबसे बड़ा है~ सभ में व्यापक है। सबके दिल की जानने वाला है। (हे स्वामी! इससे ज्यादा तेरे बाबत) मैं (क्या) कहूँ और क्या सुनूँ? ।1।रहाउ। जो मनुष्य (जगत में मिलते) आदर या निरादरी (के अहसास) में फंसा रहता है~ वह परमात्मा का असल सेवक नहीं (कहला सकता)। हे संत जनों ! हर जगह जगत के मूल-प्रभू को देखने वाला और सभी को एक-सी प्रेम निगाह से देखने वाला करोड़ों में कोई एक होता है।2। (ज्ञान आदि की बातें निरी) कहनी या कहलानी- ये रास्ता है दुनिया से शोभा कमाने का। गुरू की शरण पड़ा हुआ कोई विरला ही मनुष्य होता है जो (ज्ञान की यह जबानी जबानी बातें) कहने से आजाद रहता है।3। उसे इस बात की ओर ध्यान ही नहीं होता कि मुक्ति क्या है और ना-मुक्ति क्या है (उसे प्रभू ही हर जगह दिखता है~ प्रभू की याद ही उस का निशाना है) हे नानक! जिस मनुष्य ने संत जनों के चरणों की धूल (का) दान प्राप्त कर लिया है ।4।26।96।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੫ ਘਰੁ ੭ ॥
ਤੇਰੈ ਭਰੋਸੈ ਪਿਆਰੇ ਮੈ ਲਾਡ ਲਡਾਇਆ ॥
ਭੂਲਹਿ ਚੂਕਹਿ ਬਾਰਿਕ ਤੂੰ ਹਰਿ ਪਿਤਾ ਮਾਇਆ ॥੧॥
ਸੁਹੇਲਾ ਕਹਨੁ ਕਹਾਵਨੁ ॥
ਤੇਰਾ ਬਿਖਮੁ ਭਾਵਨੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਉ ਮਾਣੁ ਤਾਣੁ ਕਰਉ ਤੇਰਾ ਹਉ ਜਾਨਉ ਆਪਾ ॥
ਸਭ ਹੀ ਮਧਿ ਸਭਹਿ ਤੇ ਬਾਹਰਿ ਬੇਮੁਹਤਾਜ ਬਾਪਾ ॥੨॥
ਪਿਤਾ ਹਉ ਜਾਨਉ ਨਾਹੀ ਤੇਰੀ ਕਵਨ ਜੁਗਤਾ ॥
ਤੇਰੈ ਭਰੋਸੈ ਪਿਆਰੇ ਮੈ ਲਾਡ ਲਡਾਇਆ ॥
ਭੂਲਹਿ ਚੂਕਹਿ ਬਾਰਿਕ ਤੂੰ ਹਰਿ ਪਿਤਾ ਮਾਇਆ ॥੧॥
ਸੁਹੇਲਾ ਕਹਨੁ ਕਹਾਵਨੁ ॥
ਤੇਰਾ ਬਿਖਮੁ ਭਾਵਨੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਉ ਮਾਣੁ ਤਾਣੁ ਕਰਉ ਤੇਰਾ ਹਉ ਜਾਨਉ ਆਪਾ ॥
ਸਭ ਹੀ ਮਧਿ ਸਭਹਿ ਤੇ ਬਾਹਰਿ ਬੇਮੁਹਤਾਜ ਬਾਪਾ ॥੨॥
ਪਿਤਾ ਹਉ ਜਾਨਉ ਨਾਹੀ ਤੇਰੀ ਕਵਨ ਜੁਗਤਾ ॥
सिरीरागु महला ५ घरु ७ ॥
तेरै भरोसै पिआरे मै लाड लडाइआ ॥
भूलहि चूकहि बारिक तूं हरि पिता माइआ ॥१॥
सुहेला कहनु कहावनु ॥
तेरा बिखमु भावनु ॥१॥ रहाउ ॥
हउ माणु ताणु करउ तेरा हउ जानउ आपा ॥
सभ ही मधि सभहि ते बाहरि बेमुहताज बापा ॥२॥
पिता हउ जानउ नाही तेरी कवन जुगता ॥
तेरै भरोसै पिआरे मै लाड लडाइआ ॥
भूलहि चूकहि बारिक तूं हरि पिता माइआ ॥१॥
सुहेला कहनु कहावनु ॥
तेरा बिखमु भावनु ॥१॥ रहाउ ॥
हउ माणु ताणु करउ तेरा हउ जानउ आपा ॥
सभ ही मधि सभहि ते बाहरि बेमुहताज बापा ॥२॥
पिता हउ जानउ नाही तेरी कवन जुगता ॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ५ घरु ७ ॥ हे प्यारे (प्रभू-पिता) ! तेरे प्यार के भरोसे पे मैंने लाडों में ही दिन गुजार दिए हैं। (मुझे यकीन है कि) तू हमारा माता-पिता है~ और बच्चे भूल-चूक करते ही रहते हैं।1। (यह) कहना और कहलाना आसान है (कि हम तेरा भाणा मानते हैं)। पर हे प्रभू ! तेरा भाणा मानना (तेरी रजा में रहना~ तेरी मर्जी में चलना) कठिन है। 1।रहाउ। हे मेरे बे-मुथाज पिता (प्रभू) ! मैं तेरा (ही) मान (गर्व) करता हूं (मुझे ये फखर है कि तू मेरे सिर पर है)~ मैं तेरा ही आसरा रखता हूं। मैं जानता हूं कि तू मेरा अपना है। तू सभ जीवों के अंदर बसता है~ और सभी से बाहर भी है (निरलेप भी है)।2। हे पिता प्रभू ! मुझे पता नहीं कि तुझे प्रसंन्न करने का तरीका क्या है?
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 51 है, राग Siree Raag का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Connaught Place के Bangla Sahib में दोपहर 12 बजे का langar-समय, और बीच में यह पंक्ति।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 42 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 51” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Siree Raag राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 52 →, पीछे का: ← अंग 50।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।