अंग
50
राग Siree Raag
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਤਿਗੁਰੁ ਗਹਿਰ ਗਭੀਰੁ ਹੈ ਸੁਖ ਸਾਗਰੁ ਅਘਖੰਡੁ ॥
ਜਿਨਿ ਗੁਰੁ ਸੇਵਿਆ ਆਪਣਾ ਜਮਦੂਤ ਨ ਲਾਗੈ ਡੰਡੁ ॥
ਗੁਰ ਨਾਲਿ ਤੁਲਿ ਨ ਲਗਈ ਖੋਜਿ ਡਿਠਾ ਬ੍ਰਹਮੰਡੁ ॥
ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਸਤਿਗੁਰਿ ਦੀਆ ਸੁਖੁ ਨਾਨਕ ਮਨ ਮਹਿ ਮੰਡੁ ॥੪॥੨੦॥੯੦॥
ਜਿਨਿ ਗੁਰੁ ਸੇਵਿਆ ਆਪਣਾ ਜਮਦੂਤ ਨ ਲਾਗੈ ਡੰਡੁ ॥
ਗੁਰ ਨਾਲਿ ਤੁਲਿ ਨ ਲਗਈ ਖੋਜਿ ਡਿਠਾ ਬ੍ਰਹਮੰਡੁ ॥
ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਸਤਿਗੁਰਿ ਦੀਆ ਸੁਖੁ ਨਾਨਕ ਮਨ ਮਹਿ ਮੰਡੁ ॥੪॥੨੦॥੯੦॥
सतिगुरु गहिर गभीरु है सुख सागरु अघखंडु ॥
जिनि गुरु सेविआ आपणा जमदूत न लागै डंडु ॥
गुर नालि तुलि न लगई खोजि डिठा ब्रहमंडु ॥
नामु निधानु सतिगुरि दीआ सुखु नानक मन महि मंडु ॥४॥२०॥९०॥
जिनि गुरु सेविआ आपणा जमदूत न लागै डंडु ॥
गुर नालि तुलि न लगई खोजि डिठा ब्रहमंडु ॥
नामु निधानु सतिगुरि दीआ सुखु नानक मन महि मंडु ॥४॥२०॥९०॥
हिन्दी अर्थ: सतगुरु (मानों~ एक) गहरा (समुंद्र) है~ गुरू बड़े जिगरे वाला है~ गुरू सारे सुखों का समुंद्र है। गुरू पापों का नाश करने वाला है। जिस मनुष्य ने अपने गुरू की सेवा की है यमदूतों का डंडा (उस के सिर पे) नहीं बजता। मैंने सारा संसार ढूंढ के देख लिया है~ कोई भी गुरू के बराबर का नहीं। हे नानक ! सतिगुरू ने जिस मनुष्य को परमातमा का नाम खजाना दिया हे~ उसने आत्मिक आनन्द (सदा के लिए) अपने मन में पिरो लिया है ।4।20।90।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮਿਠਾ ਕਰਿ ਕੈ ਖਾਇਆ ਕਉੜਾ ਉਪਜਿਆ ਸਾਦੁ ॥
ਭਾਈ ਮੀਤ ਸੁਰਿਦ ਕੀਏ ਬਿਖਿਆ ਰਚਿਆ ਬਾਦੁ ॥
ਜਾਂਦੇ ਬਿਲਮ ਨ ਹੋਵਈ ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਬਿਸਮਾਦੁ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਮਨ ਸਤਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ਲਾਗੁ ॥
ਜੋ ਦੀਸੈ ਸੋ ਵਿਣਸਣਾ ਮਨ ਕੀ ਮਤਿ ਤਿਆਗੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਿਉ ਕੂਕਰੁ ਹਰਕਾਇਆ ਧਾਵੈ ਦਹ ਦਿਸ ਜਾਇ ॥
ਲੋਭੀ ਜੰਤੁ ਨ ਜਾਣਈ ਭਖੁ ਅਭਖੁ ਸਭ ਖਾਇ ॥
ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧ ਮਦਿ ਬਿਆਪਿਆ ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਜੋਨੀ ਪਾਇ ॥੨॥
ਮਾਇਆ ਜਾਲੁ ਪਸਾਰਿਆ ਭੀਤਰਿ ਚੋਗ ਬਣਾਇ ॥
ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਪੰਖੀ ਫਾਸਿਆ ਨਿਕਸੁ ਨ ਪਾਏ ਮਾਇ ॥
ਜਿਨਿ ਕੀਤਾ ਤਿਸਹਿ ਨ ਜਾਣਈ ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਆਵੈ ਜਾਇ ॥੩॥
ਅਨਿਕ ਪ੍ਰਕਾਰੀ ਮੋਹਿਆ ਬਹੁ ਬਿਧਿ ਇਹੁ ਸੰਸਾਰੁ ॥
ਜਿਸ ਨੋ ਰਖੈ ਸੋ ਰਹੈ ਸੰਮ੍ਰਿਥੁ ਪੁਰਖੁ ਅਪਾਰੁ ॥
ਹਰਿ ਜਨ ਹਰਿ ਲਿਵ ਉਧਰੇ ਨਾਨਕ ਸਦ ਬਲਿਹਾਰੁ ॥੪॥੨੧॥੯੧॥
ਮਿਠਾ ਕਰਿ ਕੈ ਖਾਇਆ ਕਉੜਾ ਉਪਜਿਆ ਸਾਦੁ ॥
ਭਾਈ ਮੀਤ ਸੁਰਿਦ ਕੀਏ ਬਿਖਿਆ ਰਚਿਆ ਬਾਦੁ ॥
ਜਾਂਦੇ ਬਿਲਮ ਨ ਹੋਵਈ ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਬਿਸਮਾਦੁ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਮਨ ਸਤਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ਲਾਗੁ ॥
ਜੋ ਦੀਸੈ ਸੋ ਵਿਣਸਣਾ ਮਨ ਕੀ ਮਤਿ ਤਿਆਗੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਿਉ ਕੂਕਰੁ ਹਰਕਾਇਆ ਧਾਵੈ ਦਹ ਦਿਸ ਜਾਇ ॥
ਲੋਭੀ ਜੰਤੁ ਨ ਜਾਣਈ ਭਖੁ ਅਭਖੁ ਸਭ ਖਾਇ ॥
ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧ ਮਦਿ ਬਿਆਪਿਆ ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਜੋਨੀ ਪਾਇ ॥੨॥
ਮਾਇਆ ਜਾਲੁ ਪਸਾਰਿਆ ਭੀਤਰਿ ਚੋਗ ਬਣਾਇ ॥
ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਪੰਖੀ ਫਾਸਿਆ ਨਿਕਸੁ ਨ ਪਾਏ ਮਾਇ ॥
ਜਿਨਿ ਕੀਤਾ ਤਿਸਹਿ ਨ ਜਾਣਈ ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਆਵੈ ਜਾਇ ॥੩॥
ਅਨਿਕ ਪ੍ਰਕਾਰੀ ਮੋਹਿਆ ਬਹੁ ਬਿਧਿ ਇਹੁ ਸੰਸਾਰੁ ॥
ਜਿਸ ਨੋ ਰਖੈ ਸੋ ਰਹੈ ਸੰਮ੍ਰਿਥੁ ਪੁਰਖੁ ਅਪਾਰੁ ॥
ਹਰਿ ਜਨ ਹਰਿ ਲਿਵ ਉਧਰੇ ਨਾਨਕ ਸਦ ਬਲਿਹਾਰੁ ॥੪॥੨੧॥੯੧॥
सिरीरागु महला ५ ॥
मिठा करि कै खाइआ कउड़ा उपजिआ सादु ॥
भाई मीत सुरिद कीए बिखिआ रचिआ बादु ॥
जांदे बिलम न होवई विणु नावै बिसमादु ॥१॥
मेरे मन सतगुर की सेवा लागु ॥
जो दीसै सो विणसणा मन की मति तिआगु ॥१॥ रहाउ ॥
जिउ कूकरु हरकाइआ धावै दह दिस जाइ ॥
लोभी जंतु न जाणई भखु अभखु सभ खाइ ॥
काम क्रोध मदि बिआपिआ फिरि फिरि जोनी पाइ ॥२॥
माइआ जालु पसारिआ भीतरि चोग बणाइ ॥
त्रिसना पंखी फासिआ निकसु न पाए माइ ॥
जिनि कीता तिसहि न जाणई फिरि फिरि आवै जाइ ॥३॥
अनिक प्रकारी मोहिआ बहु बिधि इहु संसारु ॥
जिस नो रखै सो रहै संम्रिथु पुरखु अपारु ॥
हरि जन हरि लिव उधरे नानक सद बलिहारु ॥४॥२१॥९१॥
मिठा करि कै खाइआ कउड़ा उपजिआ सादु ॥
भाई मीत सुरिद कीए बिखिआ रचिआ बादु ॥
जांदे बिलम न होवई विणु नावै बिसमादु ॥१॥
मेरे मन सतगुर की सेवा लागु ॥
जो दीसै सो विणसणा मन की मति तिआगु ॥१॥ रहाउ ॥
जिउ कूकरु हरकाइआ धावै दह दिस जाइ ॥
लोभी जंतु न जाणई भखु अभखु सभ खाइ ॥
काम क्रोध मदि बिआपिआ फिरि फिरि जोनी पाइ ॥२॥
माइआ जालु पसारिआ भीतरि चोग बणाइ ॥
त्रिसना पंखी फासिआ निकसु न पाए माइ ॥
जिनि कीता तिसहि न जाणई फिरि फिरि आवै जाइ ॥३॥
अनिक प्रकारी मोहिआ बहु बिधि इहु संसारु ॥
जिस नो रखै सो रहै संम्रिथु पुरखु अपारु ॥
हरि जन हरि लिव उधरे नानक सद बलिहारु ॥४॥२१॥९१॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ५ ॥ जीव दुनिया के पदार्थो को स्वाद-दार समझ के इस्तेमाल करता है पर~ इन (भोगों) का स्वाद (अंत में) कड़वा (दुखदाई) साबित होता है (विकार और रोग पैदा हो जाते हैं)। मनुष्य (जगत में) भाई-मित्र-दोस्त आदि बनाता है और (यह) माया का झगड़ा खड़ा किये रखता है। पर आश्चर्य की बात यह है कि परमात्मा के नाम के बिना किसी भी चीज के नाश होने में समय नहीं लगता।1। हे मेरे मन ! गुरू की (बताई हुई) सेवा में व्यस्त रह। (हे भाई!) अपने मन के पीछे चलना छोड़ दे और (दुनिया के पदार्थों का मोह त्याग~ क्योंकि) जो कुछ दिख रहा है सभ नाशवंत है।1।रहाउ। जैसे हलकाया कुक्ता दौड़ता है और हर तरफ को दौड़ता है। (उसी तरह) लोभी जीव को भी कुछ नहीं सूझता~ अच्छी-बुरी हरेक चीज खा लेता है। काम के और क्रोध के नशे में फंसा हुआ मनुष्य मुड़-मुड़ योनियों में पड़ता रहता है।2। माया के विषयों का चोगा जाल में तैयार करके वह जाल बिखेरा हुआ है। माया की तृष्णा ने जीव पक्षी को (उस जाल में) फंसाया हुआ है। हे (मेरी) मां ! (जीव उस जाल में से) छुटकारा प्राप्त नहीं कर सकता~ (क्योंकि) जिस ईश्वर ने (यह सभ कुछ) पैदा किया है उस से सांझ नहीं डालता ~ और बार बार पैदा होता मरता रहता है।3। इस जगत को (माया के) अनेकों किस्म के रूपों रंगों में कई तरीकों से मोह रखा है। इस में से वही बच सकता है~ जिसको सर्व समर्थ बेअंत अकाल-पुरख खुद बचाए। (परमात्मा की मेहर से) परमात्मा के भगत ही परमात्मा (के चरनों) में सुरति जोड़ के बचते हैं। हे नानक ! तू सदा उस परमात्मा से सदके रह।4।25।91।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੫ ਘਰੁ ੨ ॥
ਗੋਇਲਿ ਆਇਆ ਗੋਇਲੀ ਕਿਆ ਤਿਸੁ ਡੰਫੁ ਪਸਾਰੁ ॥
ਮੁਹਲਤਿ ਪੁੰਨੀ ਚਲਣਾ ਤੂੰ ਸੰਮਲੁ ਘਰ ਬਾਰੁ ॥੧॥
ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਉ ਮਨਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਪਿਆਰਿ ॥
ਕਿਆ ਥੋੜੜੀ ਬਾਤ ਗੁਮਾਨੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੈਸੇ ਰੈਣਿ ਪਰਾਹੁਣੇ ਉਠਿ ਚਲਸਹਿ ਪਰਭਾਤਿ ॥
ਕਿਆ ਤੂੰ ਰਤਾ ਗਿਰਸਤ ਸਿਉ ਸਭ ਫੁਲਾ ਕੀ ਬਾਗਾਤਿ ॥੨॥
ਮੇਰੀ ਮੇਰੀ ਕਿਆ ਕਰਹਿ ਜਿਨਿ ਦੀਆ ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਲੋੜਿ ॥
ਸਰਪਰ ਉਠੀ ਚਲਣਾ ਛਡਿ ਜਾਸੀ ਲਖ ਕਰੋੜਿ ॥੩॥
ਲਖ ਚਉਰਾਸੀਹ ਭ੍ਰਮਤਿਆ ਦੁਲਭ ਜਨਮੁ ਪਾਇਓਇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਿ ਤੂੰ ਸੋ ਦਿਨੁ ਨੇੜਾ ਆਇਓਇ ॥੪॥੨੨॥੯੨॥
ਗੋਇਲਿ ਆਇਆ ਗੋਇਲੀ ਕਿਆ ਤਿਸੁ ਡੰਫੁ ਪਸਾਰੁ ॥
ਮੁਹਲਤਿ ਪੁੰਨੀ ਚਲਣਾ ਤੂੰ ਸੰਮਲੁ ਘਰ ਬਾਰੁ ॥੧॥
ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਉ ਮਨਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਪਿਆਰਿ ॥
ਕਿਆ ਥੋੜੜੀ ਬਾਤ ਗੁਮਾਨੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੈਸੇ ਰੈਣਿ ਪਰਾਹੁਣੇ ਉਠਿ ਚਲਸਹਿ ਪਰਭਾਤਿ ॥
ਕਿਆ ਤੂੰ ਰਤਾ ਗਿਰਸਤ ਸਿਉ ਸਭ ਫੁਲਾ ਕੀ ਬਾਗਾਤਿ ॥੨॥
ਮੇਰੀ ਮੇਰੀ ਕਿਆ ਕਰਹਿ ਜਿਨਿ ਦੀਆ ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਲੋੜਿ ॥
ਸਰਪਰ ਉਠੀ ਚਲਣਾ ਛਡਿ ਜਾਸੀ ਲਖ ਕਰੋੜਿ ॥੩॥
ਲਖ ਚਉਰਾਸੀਹ ਭ੍ਰਮਤਿਆ ਦੁਲਭ ਜਨਮੁ ਪਾਇਓਇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਿ ਤੂੰ ਸੋ ਦਿਨੁ ਨੇੜਾ ਆਇਓਇ ॥੪॥੨੨॥੯੨॥
सिरीरागु महला ५ घरु २ ॥
गोइलि आइआ गोइली किआ तिसु डंफु पसारु ॥
मुहलति पुंनी चलणा तूं संमलु घर बारु ॥१॥
हरि गुण गाउ मना सतिगुरु सेवि पिआरि ॥
किआ थोड़ड़ी बात गुमानु ॥१॥ रहाउ ॥
जैसे रैणि पराहुणे उठि चलसहि परभाति ॥
किआ तूं रता गिरसत सिउ सभ फुला की बागाति ॥२॥
मेरी मेरी किआ करहि जिनि दीआ सो प्रभु लोड़ि ॥
सरपर उठी चलणा छडि जासी लख करोड़ि ॥३॥
लख चउरासीह भ्रमतिआ दुलभ जनमु पाइओइ ॥
नानक नामु समालि तूं सो दिनु नेड़ा आइओइ ॥४॥२२॥९२॥
गोइलि आइआ गोइली किआ तिसु डंफु पसारु ॥
मुहलति पुंनी चलणा तूं संमलु घर बारु ॥१॥
हरि गुण गाउ मना सतिगुरु सेवि पिआरि ॥
किआ थोड़ड़ी बात गुमानु ॥१॥ रहाउ ॥
जैसे रैणि पराहुणे उठि चलसहि परभाति ॥
किआ तूं रता गिरसत सिउ सभ फुला की बागाति ॥२॥
मेरी मेरी किआ करहि जिनि दीआ सो प्रभु लोड़ि ॥
सरपर उठी चलणा छडि जासी लख करोड़ि ॥३॥
लख चउरासीह भ्रमतिआ दुलभ जनमु पाइओइ ॥
नानक नामु समालि तूं सो दिनु नेड़ा आइओइ ॥४॥२२॥९२॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ५ घरु २ ॥ (मुसीबत के समय थोड़े समय के लिए) गुजॅर (अपने माल-मवेशी ले के) किसी चरने वाली जगह पे चला जाता है~ वहां उसे अपने किसी बड़ेपन का दिखावा-पसारा शोभा नहीं देता। (वैसे ही~ हे जीव! जब तुम्हारा यहां जगत में रहने के लिए) मिला हुआ समय समाप्त हो जाएगा~ तू (यहां से) चल पड़ेगा। (इसलिए~ अपना असली) घर घाट संभाल (याद रख)।1। हे मेरे मन ! परमात्मा के गुण गाया कर, प्यार से गुरू की (बताई) सेवा करा कर। थोड़ी जितनी बात के पीछे (इस थोड़े से जीवन समय के वास्ते) क्यूँ गुमान करता है?1।रहाउ। जैसे रात के समय (किसी के घर आए हुए) मेहमान दिन चढ़ने पे (वहां से उॅठ के) चल पड़ेंगे। (उसी तरह~ हे जीव ! जिंदगी की रात खत्म होने पर तू भी इस जगत से चल पड़ेगा)। तू इस गृहस्थ से (बाग परिवार से) क्यूँ मस्त हुआ पड़ा है? यह सारी फूलों की बगीची के समान है।2। यह चीज मेरी है~ यह जयदाद मेरी है, क्यूं ऐसा गुमान कर रहा है? जिस परमात्मा ने यह सभ कुछ दिया है~ उसको ढूंढ। यहां से जरूर कूच कर जाना है। (लाखों करोड़ों का मालिक भी) लाखों करोड़ों रूपए छोड़ के चला जाएगा।3। (हे भाई !) चौरासी लाख जूनियों में भटक भटक के अब ये मानस जन्म बड़ी मुश्किल से मिला है। हे नानक! (परमात्मा का) नाम हृदय में बसा~ वह दिन नजदीक आ रहा है (जब यहां से कूच करना है)।4।22।92।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਤਿਚਰੁ ਵਸਹਿ ਸੁਹੇਲੜੀ ਜਿਚਰੁ ਸਾਥੀ ਨਾਲਿ ॥
ਜਾ ਸਾਥੀ ਉਠੀ ਚਲਿਆ ਤਾ ਧਨ ਖਾਕੂ ਰਾਲਿ ॥੧॥
ਮਨਿ ਬੈਰਾਗੁ ਭਇਆ ਦਰਸਨੁ ਦੇਖਣੈ ਕਾ ਚਾਉ ॥
ਧੰਨੁ ਸੁ ਤੇਰਾ ਥਾਨੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਿਚਰੁ ਵਸਿਆ ਕੰਤੁ ਘਰਿ ਜੀਉ ਜੀਉ ਸਭਿ ਕਹਾਤਿ ॥
ਜਾ ਉਠੀ ਚਲਸੀ ਕੰਤੜਾ ਤਾ ਕੋਇ ਨ ਪੁਛੈ ਤੇਰੀ ਬਾਤ ॥੨॥
ਪੇਈਅੜੈ ਸਹੁ ਸੇਵਿ ਤੂੰ ਸਾਹੁਰੜੈ ਸੁਖਿ ਵਸੁ ॥
ਗੁਰ ਮਿਲਿ ਚਜੁ ਅਚਾਰੁ ਸਿਖੁ ਤੁਧੁ ਕਦੇ ਨ ਲਗੈ ਦੁਖੁ ॥੩॥
ਸਭਨਾ ਸਾਹੁਰੈ ਵੰਞਣਾ ਸਭਿ ਮੁਕਲਾਵਣਹਾਰ ॥
ਤਿਚਰੁ ਵਸਹਿ ਸੁਹੇਲੜੀ ਜਿਚਰੁ ਸਾਥੀ ਨਾਲਿ ॥
ਜਾ ਸਾਥੀ ਉਠੀ ਚਲਿਆ ਤਾ ਧਨ ਖਾਕੂ ਰਾਲਿ ॥੧॥
ਮਨਿ ਬੈਰਾਗੁ ਭਇਆ ਦਰਸਨੁ ਦੇਖਣੈ ਕਾ ਚਾਉ ॥
ਧੰਨੁ ਸੁ ਤੇਰਾ ਥਾਨੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਿਚਰੁ ਵਸਿਆ ਕੰਤੁ ਘਰਿ ਜੀਉ ਜੀਉ ਸਭਿ ਕਹਾਤਿ ॥
ਜਾ ਉਠੀ ਚਲਸੀ ਕੰਤੜਾ ਤਾ ਕੋਇ ਨ ਪੁਛੈ ਤੇਰੀ ਬਾਤ ॥੨॥
ਪੇਈਅੜੈ ਸਹੁ ਸੇਵਿ ਤੂੰ ਸਾਹੁਰੜੈ ਸੁਖਿ ਵਸੁ ॥
ਗੁਰ ਮਿਲਿ ਚਜੁ ਅਚਾਰੁ ਸਿਖੁ ਤੁਧੁ ਕਦੇ ਨ ਲਗੈ ਦੁਖੁ ॥੩॥
ਸਭਨਾ ਸਾਹੁਰੈ ਵੰਞਣਾ ਸਭਿ ਮੁਕਲਾਵਣਹਾਰ ॥
सिरीरागु महला ५ ॥
तिचरु वसहि सुहेलड़ी जिचरु साथी नालि ॥
जा साथी उठी चलिआ ता धन खाकू रालि ॥१॥
मनि बैरागु भइआ दरसनु देखणै का चाउ ॥
धंनु सु तेरा थानु ॥१॥ रहाउ ॥
जिचरु वसिआ कंतु घरि जीउ जीउ सभि कहाति ॥
जा उठी चलसी कंतड़ा ता कोइ न पुछै तेरी बात ॥२॥
पेईअड़ै सहु सेवि तूं साहुरड़ै सुखि वसु ॥
गुर मिलि चजु अचारु सिखु तुधु कदे न लगै दुखु ॥३॥
सभना साहुरै वंञणा सभि मुकलावणहार ॥
तिचरु वसहि सुहेलड़ी जिचरु साथी नालि ॥
जा साथी उठी चलिआ ता धन खाकू रालि ॥१॥
मनि बैरागु भइआ दरसनु देखणै का चाउ ॥
धंनु सु तेरा थानु ॥१॥ रहाउ ॥
जिचरु वसिआ कंतु घरि जीउ जीउ सभि कहाति ॥
जा उठी चलसी कंतड़ा ता कोइ न पुछै तेरी बात ॥२॥
पेईअड़ै सहु सेवि तूं साहुरड़ै सुखि वसु ॥
गुर मिलि चजु अचारु सिखु तुधु कदे न लगै दुखु ॥३॥
सभना साहुरै वंञणा सभि मुकलावणहार ॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ५ ॥ हे काया ! तू उतना समय ही सुखी बसेगी~ जितना समय (जीवात्मा तेरा) साथी (तेरे) साथ है। जब (तेरा) साथी (जीवात्मा) उॅठ के चल पड़ेगा~ तब~ हे काया ! तू मिट्टी में मिल जाएगी।1। (वह मनुष्य भाग्यवान है जिसके) मन में तेरा प्यार पैदा हो गया है। जिसके मन में तेरे दर्शन की तड़प पैदा हुई है (हे हरी !) वह शरीर भाग्यशाली है जिसमें तेरा निवास है (जहां तुझे याद किया जा रहा है)। ।1।रहाउ। हे काया ! जितने समय तेरा पति (जीवात्मा तेरे) घर में बसता है~ सभी लोग तुम्हें ‘जी’ ‘जी’ करते हैं (सारे तेरा आदर करते हैं)। पर जब निमाणी कंत (जीवात्मा) उठ के चल पड़ेगा~ तब कोई भी तेरी बात नहीं पूछता।2। (हे जीवात्मा ! जब तक तू~) पेके घर में (संसार में है~ तब तक) पति प्रभू को सिमरती रह। ससुराल में (परलोक में जाकर) तू सुखी बसेगी। (हे जीवात्मा !) गुरू को मिल के जीवन जाच सीख~ अच्छा आचरण बनाना सीख~ तुझे कभी कोई दुख नहीं व्यापेगा।3। (हे मन !) उद्यम कर के परमात्मा का नाम सिमर। बड़े भाग्यों से परमात्मा का नाम धन इकट्ठा कर।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 50 है, राग Siree Raag का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
दिल्ली के सुबह 5 बजे के gurdwara में जब रागी पहली पंक्ति गाता है, हवा में एक specific quietness आती है।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 40 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 50” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Siree Raag राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 51 →, पीछे का: ← अंग 49।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।