अंग
49
राग Siree Raag
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸੰਤਾ ਸੰਗਤਿ ਮਨਿ ਵਸੈ ਪ੍ਰਭੁ ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਬਖਸਿੰਦੁ ॥
ਜਿਨਿ ਸੇਵਿਆ ਪ੍ਰਭੁ ਆਪਣਾ ਸੋਈ ਰਾਜ ਨਰਿੰਦੁ ॥੨॥
ਅਉਸਰਿ ਹਰਿ ਜਸੁ ਗੁਣ ਰਮਣ ਜਿਤੁ ਕੋਟਿ ਮਜਨ ਇਸਨਾਨੁ ॥
ਰਸਨਾ ਉਚਰੈ ਗੁਣਵਤੀ ਕੋਇ ਨ ਪੁਜੈ ਦਾਨੁ ॥
ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਧਾਰਿ ਮਨਿ ਤਨਿ ਵਸੈ ਦਇਆਲ ਪੁਰਖੁ ਮਿਹਰਵਾਨੁ ॥
ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਧਨੁ ਤਿਸ ਦਾ ਹਉ ਸਦਾ ਸਦਾ ਕੁਰਬਾਨੁ ॥੩॥
ਮਿਲਿਆ ਕਦੇ ਨ ਵਿਛੁੜੈ ਜੋ ਮੇਲਿਆ ਕਰਤਾਰਿ ॥
ਦਾਸਾ ਕੇ ਬੰਧਨ ਕਟਿਆ ਸਾਚੈ ਸਿਰਜਣਹਾਰਿ ॥
ਭੂਲਾ ਮਾਰਗਿ ਪਾਇਓਨੁ ਗੁਣ ਅਵਗੁਣ ਨ ਬੀਚਾਰਿ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਸੁ ਸਰਣਾਗਤੀ ਜਿ ਸਗਲ ਘਟਾ ਆਧਾਰੁ ॥੪॥੧੮॥੮੮॥
ਜਿਨਿ ਸੇਵਿਆ ਪ੍ਰਭੁ ਆਪਣਾ ਸੋਈ ਰਾਜ ਨਰਿੰਦੁ ॥੨॥
ਅਉਸਰਿ ਹਰਿ ਜਸੁ ਗੁਣ ਰਮਣ ਜਿਤੁ ਕੋਟਿ ਮਜਨ ਇਸਨਾਨੁ ॥
ਰਸਨਾ ਉਚਰੈ ਗੁਣਵਤੀ ਕੋਇ ਨ ਪੁਜੈ ਦਾਨੁ ॥
ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਧਾਰਿ ਮਨਿ ਤਨਿ ਵਸੈ ਦਇਆਲ ਪੁਰਖੁ ਮਿਹਰਵਾਨੁ ॥
ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਧਨੁ ਤਿਸ ਦਾ ਹਉ ਸਦਾ ਸਦਾ ਕੁਰਬਾਨੁ ॥੩॥
ਮਿਲਿਆ ਕਦੇ ਨ ਵਿਛੁੜੈ ਜੋ ਮੇਲਿਆ ਕਰਤਾਰਿ ॥
ਦਾਸਾ ਕੇ ਬੰਧਨ ਕਟਿਆ ਸਾਚੈ ਸਿਰਜਣਹਾਰਿ ॥
ਭੂਲਾ ਮਾਰਗਿ ਪਾਇਓਨੁ ਗੁਣ ਅਵਗੁਣ ਨ ਬੀਚਾਰਿ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਸੁ ਸਰਣਾਗਤੀ ਜਿ ਸਗਲ ਘਟਾ ਆਧਾਰੁ ॥੪॥੧੮॥੮੮॥
संता संगति मनि वसै प्रभु प्रीतमु बखसिंदु ॥
जिनि सेविआ प्रभु आपणा सोई राज नरिंदु ॥२॥
अउसरि हरि जसु गुण रमण जितु कोटि मजन इसनानु ॥
रसना उचरै गुणवती कोइ न पुजै दानु ॥
द्रिसटि धारि मनि तनि वसै दइआल पुरखु मिहरवानु ॥
जीउ पिंडु धनु तिस दा हउ सदा सदा कुरबानु ॥३॥
मिलिआ कदे न विछुड़ै जो मेलिआ करतारि ॥
दासा के बंधन कटिआ साचै सिरजणहारि ॥
भूला मारगि पाइओनु गुण अवगुण न बीचारि ॥
नानक तिसु सरणागती जि सगल घटा आधारु ॥४॥१८॥८८॥
जिनि सेविआ प्रभु आपणा सोई राज नरिंदु ॥२॥
अउसरि हरि जसु गुण रमण जितु कोटि मजन इसनानु ॥
रसना उचरै गुणवती कोइ न पुजै दानु ॥
द्रिसटि धारि मनि तनि वसै दइआल पुरखु मिहरवानु ॥
जीउ पिंडु धनु तिस दा हउ सदा सदा कुरबानु ॥३॥
मिलिआ कदे न विछुड़ै जो मेलिआ करतारि ॥
दासा के बंधन कटिआ साचै सिरजणहारि ॥
भूला मारगि पाइओनु गुण अवगुण न बीचारि ॥
नानक तिसु सरणागती जि सगल घटा आधारु ॥४॥१८॥८८॥
हिन्दी अर्थ: प्रीतम बख्शणहार प्रभू साध-संगति में टिकने से ही मन में बसता है। जिस मनुष्य ने प्यारे प्रभू का सिमरन किया है~ वह राजाओं का राजा बन गया है।2। जिस समय में परमात्मा की सिफति सलाह की जाए~ परमात्मा के गुण याद किये जाएं (उस समय मानों) करोड़ों तीर्थो के स्नान हो जाते हैं। अगर कोई भाग्यशाली (जीभ) परमात्मा के गुण उचारती है~ तो और कोई दान (इस काम की) बराबरी नहीं कर सकता। (जो मनुष्य सिमरन करता है उस के) मन में~ शरीर में मेहरवान~दयाल अकाल-पुरख मेहर की निगाह करके आ बसता है। यह जीवात्मा~ यह शरीर~ यह धन सब कुछ उस परमात्मा का ही दिया हुआ है~ मैं सदा ही उस के सदके जाता हूँ।3। जिस मनुष्य को करतार ने (अपने चरणों में) जोड़ लिया है~ प्रभु चरणों में जुड़ा वह मनुष्य (कभी माया के बंधनों में नहीं फंसता~ और) कभी (प्रभू से) नहीं विछुड़ता। सदा स्थिर रहने वाले सृजनहार ने अपने दासों के (माया के) बंधन (सदा के वास्ते) काट दिये हुए हैं। (अगर उसका दास पहिले) गलत रास्ते पर भी पड़ गया (था और फिर उसकी शरण आया है तो) उस प्रभू ने उस के (पहले) गुण-अवगुण ना विचार के उसे सही राह पे डाल दिया है। हे नानक! उस प्रभू की शरण पड़~ जो सारे शरीरों का (जीवों का) आसरा है।4।18।88।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਰਸਨਾ ਸਚਾ ਸਿਮਰੀਐ ਮਨੁ ਤਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਇ ॥
ਮਾਤ ਪਿਤਾ ਸਾਕ ਅਗਲੇ ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥
ਮਿਹਰ ਕਰੇ ਜੇ ਆਪਣੀ ਚਸਾ ਨ ਵਿਸਰੈ ਸੋਇ ॥੧॥
ਮਨ ਮੇਰੇ ਸਾਚਾ ਸੇਵਿ ਜਿਚਰੁ ਸਾਸੁ ॥
ਬਿਨੁ ਸਚੇ ਸਭ ਕੂੜੁ ਹੈ ਅੰਤੇ ਹੋਇ ਬਿਨਾਸੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਾਹਿਬੁ ਮੇਰਾ ਨਿਰਮਲਾ ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਰਹਣੁ ਨ ਜਾਇ ॥
ਮੇਰੈ ਮਨਿ ਤਨਿ ਭੁਖ ਅਤਿ ਅਗਲੀ ਕੋਈ ਆਣਿ ਮਿਲਾਵੈ ਮਾਇ ॥
ਚਾਰੇ ਕੁੰਡਾ ਭਾਲੀਆ ਸਹ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਜਾਇ ॥੨॥
ਤਿਸੁ ਆਗੈ ਅਰਦਾਸਿ ਕਰਿ ਜੋ ਮੇਲੇ ਕਰਤਾਰੁ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਦਾਤਾ ਨਾਮ ਕਾ ਪੂਰਾ ਜਿਸੁ ਭੰਡਾਰੁ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਸਾਲਾਹੀਐ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਰਾਵਾਰੁ ॥੩॥
ਪਰਵਦਗਾਰੁ ਸਾਲਾਹੀਐ ਜਿਸ ਦੇ ਚਲਤ ਅਨੇਕ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਆਰਾਧੀਐ ਏਹਾ ਮਤਿ ਵਿਸੇਖ ॥
ਮਨਿ ਤਨਿ ਮਿਠਾ ਤਿਸੁ ਲਗੈ ਜਿਸੁ ਮਸਤਕਿ ਨਾਨਕ ਲੇਖ ॥੪॥੧੯॥੮੯॥
ਰਸਨਾ ਸਚਾ ਸਿਮਰੀਐ ਮਨੁ ਤਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਇ ॥
ਮਾਤ ਪਿਤਾ ਸਾਕ ਅਗਲੇ ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥
ਮਿਹਰ ਕਰੇ ਜੇ ਆਪਣੀ ਚਸਾ ਨ ਵਿਸਰੈ ਸੋਇ ॥੧॥
ਮਨ ਮੇਰੇ ਸਾਚਾ ਸੇਵਿ ਜਿਚਰੁ ਸਾਸੁ ॥
ਬਿਨੁ ਸਚੇ ਸਭ ਕੂੜੁ ਹੈ ਅੰਤੇ ਹੋਇ ਬਿਨਾਸੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਾਹਿਬੁ ਮੇਰਾ ਨਿਰਮਲਾ ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਰਹਣੁ ਨ ਜਾਇ ॥
ਮੇਰੈ ਮਨਿ ਤਨਿ ਭੁਖ ਅਤਿ ਅਗਲੀ ਕੋਈ ਆਣਿ ਮਿਲਾਵੈ ਮਾਇ ॥
ਚਾਰੇ ਕੁੰਡਾ ਭਾਲੀਆ ਸਹ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਜਾਇ ॥੨॥
ਤਿਸੁ ਆਗੈ ਅਰਦਾਸਿ ਕਰਿ ਜੋ ਮੇਲੇ ਕਰਤਾਰੁ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਦਾਤਾ ਨਾਮ ਕਾ ਪੂਰਾ ਜਿਸੁ ਭੰਡਾਰੁ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਸਾਲਾਹੀਐ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਰਾਵਾਰੁ ॥੩॥
ਪਰਵਦਗਾਰੁ ਸਾਲਾਹੀਐ ਜਿਸ ਦੇ ਚਲਤ ਅਨੇਕ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਆਰਾਧੀਐ ਏਹਾ ਮਤਿ ਵਿਸੇਖ ॥
ਮਨਿ ਤਨਿ ਮਿਠਾ ਤਿਸੁ ਲਗੈ ਜਿਸੁ ਮਸਤਕਿ ਨਾਨਕ ਲੇਖ ॥੪॥੧੯॥੮੯॥
सिरीरागु महला ५ ॥
रसना सचा सिमरीऐ मनु तनु निरमलु होइ ॥
मात पिता साक अगले तिसु बिनु अवरु न कोइ ॥
मिहर करे जे आपणी चसा न विसरै सोइ ॥१॥
मन मेरे साचा सेवि जिचरु सासु ॥
बिनु सचे सभ कूड़ु है अंते होइ बिनासु ॥१॥ रहाउ ॥
साहिबु मेरा निरमला तिसु बिनु रहणु न जाइ ॥
मेरै मनि तनि भुख अति अगली कोई आणि मिलावै माइ ॥
चारे कुंडा भालीआ सह बिनु अवरु न जाइ ॥२॥
तिसु आगै अरदासि करि जो मेले करतारु ॥
सतिगुरु दाता नाम का पूरा जिसु भंडारु ॥
सदा सदा सालाहीऐ अंतु न पारावारु ॥३॥
परवदगारु सालाहीऐ जिस दे चलत अनेक ॥
सदा सदा आराधीऐ एहा मति विसेख ॥
मनि तनि मिठा तिसु लगै जिसु मसतकि नानक लेख ॥४॥१९॥८९॥
रसना सचा सिमरीऐ मनु तनु निरमलु होइ ॥
मात पिता साक अगले तिसु बिनु अवरु न कोइ ॥
मिहर करे जे आपणी चसा न विसरै सोइ ॥१॥
मन मेरे साचा सेवि जिचरु सासु ॥
बिनु सचे सभ कूड़ु है अंते होइ बिनासु ॥१॥ रहाउ ॥
साहिबु मेरा निरमला तिसु बिनु रहणु न जाइ ॥
मेरै मनि तनि भुख अति अगली कोई आणि मिलावै माइ ॥
चारे कुंडा भालीआ सह बिनु अवरु न जाइ ॥२॥
तिसु आगै अरदासि करि जो मेले करतारु ॥
सतिगुरु दाता नाम का पूरा जिसु भंडारु ॥
सदा सदा सालाहीऐ अंतु न पारावारु ॥३॥
परवदगारु सालाहीऐ जिस दे चलत अनेक ॥
सदा सदा आराधीऐ एहा मति विसेख ॥
मनि तनि मिठा तिसु लगै जिसु मसतकि नानक लेख ॥४॥१९॥८९॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ५ ॥ (हे भाई!) जीभ से सदा कायम रहने वाले परमात्मा का सिमरन करना चाहिए। (सिमरन की बरकति से) मन पवित्र हो जाता है~ शरीर पवित्र हो जाता है। (जगत में) माता-पिता (आदि) साक-संबंधी होते हैं। पर उस परमात्मा के बिना और कोई (सदा साथ निभने वाला संबन्धी) नहीं होता। (सिमरन भी उसकी मेहर से ही हो सकता है)~ अगर वह प्रभू अपनी मेहर करे~ तो वह (जीव को) रॅती भर समय के लिए भी नहीं भूलता।1। हे मेरे मन ! जितने समय तक (तेरे शरीर में) सांस (आता) है (उतने समय तक) सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा का सिमरन कर। सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के अलावा और सारा झूठा परपंच है~ ये आखिर को नाश हो जाने वाला है।1।रहाउ। हे (मेरी) मां ! मेरा मालिक प्रभू पवित्र स्वरूप है। उसके सिमरन के बिना मुझसे रहा नहीं जा सकता। (उसके दीदार के वास्ते) मेरे मन में~ मेरे तन में बहुत ही ज्यादा तड़प है। (हे मां ! मेरे अंदर तड़प है कि) कोई (गुरमुख) उसे ला के मुझसे मिला दे। मैंने चारों दिशाऐ ढूंढ के देख ली हैं~ खसम-पति के बिना मेरा कोई आसरा नहीं (सूझता)।2। (हे मेरे मन !) तू उस गुरू के दर पे अरदास कर~ जो करतार (को) मिला सकता है। गुरू नाम (की दात) देने वाला है~ उस (गुरू) का (नाम का) खजाना कभी ना खत्म होने वाला है। (गुरू की शरण पड़ के ही) सदा उस परमात्मा की सिफत सलाह करनी चाहिए जिसके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। जिसके गुणों का इस पार उस पार का किनारा नहीं ढूंढा जा सकता।3। (हे भाई! गुरू की शरण पड़ के ही) उस पालनहार परमात्मा की सिफत सलाह करनी चाहिए जिसके अनेकों चमत्कार (दिखाई दे रहे हैं)। उसका नाम सदा ही सिमरना चाहिए~ यही सबसे उक्तम अक्ल है। (पर~ जीव के भी क्या बस?) हे नानक! जिस मनुष्य के माथे पर (सौभाग्य का) लेख (अंकुरित हो आए)~ उस को (परमात्मा) मन में~ हृदय में प्यारा लगता है।4।19।89।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸੰਤ ਜਨਹੁ ਮਿਲਿ ਭਾਈਹੋ ਸਚਾ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਿ ॥
ਤੋਸਾ ਬੰਧਹੁ ਜੀਅ ਕਾ ਐਥੈ ਓਥੈ ਨਾਲਿ ॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਤੇ ਪਾਈਐ ਅਪਣੀ ਨਦਰਿ ਨਿਹਾਲਿ ॥
ਕਰਮਿ ਪਰਾਪਤਿ ਤਿਸੁ ਹੋਵੈ ਜਿਸ ਨੋ ਹੋਇ ਦਇਆਲੁ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਮਨ ਗੁਰ ਜੇਵਡੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥
ਦੂਜਾ ਥਾਉ ਨ ਕੋ ਸੁਝੈ ਗੁਰ ਮੇਲੇ ਸਚੁ ਸੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਗਲ ਪਦਾਰਥ ਤਿਸੁ ਮਿਲੇ ਜਿਨਿ ਗੁਰੁ ਡਿਠਾ ਜਾਇ ॥
ਗੁਰ ਚਰਣੀ ਜਿਨ ਮਨੁ ਲਗਾ ਸੇ ਵਡਭਾਗੀ ਮਾਇ ॥
ਗੁਰੁ ਦਾਤਾ ਸਮਰਥੁ ਗੁਰੁ ਗੁਰੁ ਸਭ ਮਹਿ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥
ਗੁਰੁ ਪਰਮੇਸਰੁ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਗੁਰੁ ਡੁਬਦਾ ਲਏ ਤਰਾਇ ॥੨॥
ਕਿਤੁ ਮੁਖਿ ਗੁਰੁ ਸਾਲਾਹੀਐ ਕਰਣ ਕਾਰਣ ਸਮਰਥੁ ॥
ਸੇ ਮਥੇ ਨਿਹਚਲ ਰਹੇ ਜਿਨ ਗੁਰਿ ਧਾਰਿਆ ਹਥੁ ॥
ਗੁਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਪੀਆਲਿਆ ਜਨਮ ਮਰਨ ਕਾ ਪਥੁ ॥
ਗੁਰੁ ਪਰਮੇਸਰੁ ਸੇਵਿਆ ਭੈ ਭੰਜਨੁ ਦੁਖ ਲਥੁ ॥੩॥
ਸੰਤ ਜਨਹੁ ਮਿਲਿ ਭਾਈਹੋ ਸਚਾ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਿ ॥
ਤੋਸਾ ਬੰਧਹੁ ਜੀਅ ਕਾ ਐਥੈ ਓਥੈ ਨਾਲਿ ॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਤੇ ਪਾਈਐ ਅਪਣੀ ਨਦਰਿ ਨਿਹਾਲਿ ॥
ਕਰਮਿ ਪਰਾਪਤਿ ਤਿਸੁ ਹੋਵੈ ਜਿਸ ਨੋ ਹੋਇ ਦਇਆਲੁ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਮਨ ਗੁਰ ਜੇਵਡੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥
ਦੂਜਾ ਥਾਉ ਨ ਕੋ ਸੁਝੈ ਗੁਰ ਮੇਲੇ ਸਚੁ ਸੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਗਲ ਪਦਾਰਥ ਤਿਸੁ ਮਿਲੇ ਜਿਨਿ ਗੁਰੁ ਡਿਠਾ ਜਾਇ ॥
ਗੁਰ ਚਰਣੀ ਜਿਨ ਮਨੁ ਲਗਾ ਸੇ ਵਡਭਾਗੀ ਮਾਇ ॥
ਗੁਰੁ ਦਾਤਾ ਸਮਰਥੁ ਗੁਰੁ ਗੁਰੁ ਸਭ ਮਹਿ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥
ਗੁਰੁ ਪਰਮੇਸਰੁ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਗੁਰੁ ਡੁਬਦਾ ਲਏ ਤਰਾਇ ॥੨॥
ਕਿਤੁ ਮੁਖਿ ਗੁਰੁ ਸਾਲਾਹੀਐ ਕਰਣ ਕਾਰਣ ਸਮਰਥੁ ॥
ਸੇ ਮਥੇ ਨਿਹਚਲ ਰਹੇ ਜਿਨ ਗੁਰਿ ਧਾਰਿਆ ਹਥੁ ॥
ਗੁਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਪੀਆਲਿਆ ਜਨਮ ਮਰਨ ਕਾ ਪਥੁ ॥
ਗੁਰੁ ਪਰਮੇਸਰੁ ਸੇਵਿਆ ਭੈ ਭੰਜਨੁ ਦੁਖ ਲਥੁ ॥੩॥
सिरीरागु महला ५ ॥
संत जनहु मिलि भाईहो सचा नामु समालि ॥
तोसा बंधहु जीअ का ऐथै ओथै नालि ॥
गुर पूरे ते पाईऐ अपणी नदरि निहालि ॥
करमि परापति तिसु होवै जिस नो होइ दइआलु ॥१॥
मेरे मन गुर जेवडु अवरु न कोइ ॥
दूजा थाउ न को सुझै गुर मेले सचु सोइ ॥१॥ रहाउ ॥
सगल पदारथ तिसु मिले जिनि गुरु डिठा जाइ ॥
गुर चरणी जिन मनु लगा से वडभागी माइ ॥
गुरु दाता समरथु गुरु गुरु सभ महि रहिआ समाइ ॥
गुरु परमेसरु पारब्रहमु गुरु डुबदा लए तराइ ॥२॥
कितु मुखि गुरु सालाहीऐ करण कारण समरथु ॥
से मथे निहचल रहे जिन गुरि धारिआ हथु ॥
गुरि अंम्रित नामु पीआलिआ जनम मरन का पथु ॥
गुरु परमेसरु सेविआ भै भंजनु दुख लथु ॥३॥
संत जनहु मिलि भाईहो सचा नामु समालि ॥
तोसा बंधहु जीअ का ऐथै ओथै नालि ॥
गुर पूरे ते पाईऐ अपणी नदरि निहालि ॥
करमि परापति तिसु होवै जिस नो होइ दइआलु ॥१॥
मेरे मन गुर जेवडु अवरु न कोइ ॥
दूजा थाउ न को सुझै गुर मेले सचु सोइ ॥१॥ रहाउ ॥
सगल पदारथ तिसु मिले जिनि गुरु डिठा जाइ ॥
गुर चरणी जिन मनु लगा से वडभागी माइ ॥
गुरु दाता समरथु गुरु गुरु सभ महि रहिआ समाइ ॥
गुरु परमेसरु पारब्रहमु गुरु डुबदा लए तराइ ॥२॥
कितु मुखि गुरु सालाहीऐ करण कारण समरथु ॥
से मथे निहचल रहे जिन गुरि धारिआ हथु ॥
गुरि अंम्रित नामु पीआलिआ जनम मरन का पथु ॥
गुरु परमेसरु सेविआ भै भंजनु दुख लथु ॥३॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ५ ॥ हे संत जनों ! (साध-संगति में) मिल के सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा का नाम हृदय में बसा के अपनी जीवात्मा के वास्ते (जीवन सफर का) खजाना एकत्र करो। यह नाम रूप सफर खर्च इस लोक में और परलोक में (जीवात्मा के साथ) निभता है। (जब प्रभु) अपनी मेहर की निगाह से देखता है (तब ये नाम खजाना) पूरे गुरू से मिलता है। प्रभू की मेहर से यह उस मनुष्य को प्राप्त होता है जिस पे प्रभु दयाल होता है।1। (हे मन !) उद्यम कर के परमात्मा का नाम सिमर। बड़े भाग्यों से परमात्मा का नाम धन इकट्ठा कर। (गुरू के बिना मुझे) और कोई दूसरा आसरा नहीं दिखाई देता। (पर) वह सदा स्थिर रहने वाला परमात्मा खुद ही गुरू से मिलाता है।1।रहाउ। जिस मनुष्य ने जा के गुरू का दर्शन किया है~ उसे सारे (कीमती) पदार्थ मिल गए (समझो)। हे माँ ! जिन मनुष्यों का मन गुरू के चरणों में जुडता है~ वह बड़े भागयशाली हैं। गुरू (जो उस परमात्मा का रूप है) सभ दातें (दान) देने वाला है जो सभ ताकतों का मालिक है जो सभ जीवों में व्यापक है। गुरू परमेश्वर (का रूप) है। गुरू पारब्रह्म (का रूप) है। गुरू (संसार समुंद्र में) डूबते जीव को पार कर देता है।2। किस मुंह से गुरू की उस्तति की जाए? गुरू (उस प्रभू का रूप है जो) जगत को पैदा करने की ताकत रखता है। वह माथे (गुरू चरणों में) सदा टिके रहते हैं~ जिन पे गुरू ने (अपनी मेहर का) हाथ रखा है। (परमात्मा का नाम) जनम-मरण के चक्कर रूप् रोग का परहेज है। आत्मिक जीवन देने वाला यह नाम जल जिन (भाग्यशालियों) को गुरू ने पिलाया है वह परमेश्वर के रूप गुरू को~ हमारे डर दूर करने वाले गुरू को~ सारे दुख नाश करने वाले गुरू को अपने हृदय में बसाते है।3।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 49 है, राग Siree Raag का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Vasant-Panchami की सुबह, सरस्वती-pooja, बच्चों का पीला कुर्ता।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 40 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 49” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Siree Raag राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 50 →, पीछे का: ← अंग 48।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।