अंग 43

अंग
43
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਭਲਕੇ ਉਠਿ ਪਪੋਲੀਐ ਵਿਣੁ ਬੁਝੇ ਮੁਗਧ ਅਜਾਣਿ ॥
ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਚਿਤਿ ਨ ਆਇਓ ਛੁਟੈਗੀ ਬੇਬਾਣਿ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਤੀ ਚਿਤੁ ਲਾਇ ਸਦਾ ਸਦਾ ਰੰਗੁ ਮਾਣਿ ॥੧॥
ਪ੍ਰਾਣੀ ਤੂੰ ਆਇਆ ਲਾਹਾ ਲੈਣਿ ॥
ਲਗਾ ਕਿਤੁ ਕੁਫਕੜੇ ਸਭ ਮੁਕਦੀ ਚਲੀ ਰੈਣਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕੁਦਮ ਕਰੇ ਪਸੁ ਪੰਖੀਆ ਦਿਸੈ ਨਾਹੀ ਕਾਲੁ ॥
ਓਤੈ ਸਾਥਿ ਮਨੁਖੁ ਹੈ ਫਾਥਾ ਮਾਇਆ ਜਾਲਿ ॥
ਮੁਕਤੇ ਸੇਈ ਭਾਲੀਅਹਿ ਜਿ ਸਚਾ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਿ ॥੨॥
ਜੋ ਘਰੁ ਛਡਿ ਗਵਾਵਣਾ ਸੋ ਲਗਾ ਮਨ ਮਾਹਿ ॥
ਜਿਥੈ ਜਾਇ ਤੁਧੁ ਵਰਤਣਾ ਤਿਸ ਕੀ ਚਿੰਤਾ ਨਾਹਿ ॥
ਫਾਥੇ ਸੇਈ ਨਿਕਲੇ ਜਿ ਗੁਰ ਕੀ ਪੈਰੀ ਪਾਹਿ ॥੩॥
ਕੋਈ ਰਖਿ ਨ ਸਕਈ ਦੂਜਾ ਕੋ ਨ ਦਿਖਾਇ ॥
ਚਾਰੇ ਕੁੰਡਾ ਭਾਲਿ ਕੈ ਆਇ ਪਇਆ ਸਰਣਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਸਚੈ ਪਾਤਿਸਾਹਿ ਡੁਬਦਾ ਲਇਆ ਕਢਾਇ ॥੪॥੩॥੭੩॥
सिरीरागु महला ५ ॥
भलके उठि पपोलीऐ विणु बुझे मुगध अजाणि ॥
सो प्रभु चिति न आइओ छुटैगी बेबाणि ॥
सतिगुर सेती चितु लाइ सदा सदा रंगु माणि ॥१॥
प्राणी तूं आइआ लाहा लैणि ॥
लगा कितु कुफकड़े सभ मुकदी चली रैणि ॥१॥ रहाउ ॥
कुदम करे पसु पंखीआ दिसै नाही कालु ॥
ओतै साथि मनुखु है फाथा माइआ जालि ॥
मुकते सेई भालीअहि जि सचा नामु समालि ॥२॥
जो घरु छडि गवावणा सो लगा मन माहि ॥
जिथै जाइ तुधु वरतणा तिस की चिंता नाहि ॥
फाथे सेई निकले जि गुर की पैरी पाहि ॥३॥
कोई रखि न सकई दूजा को न दिखाइ ॥
चारे कुंडा भालि कै आइ पइआ सरणाइ ॥
नानक सचै पातिसाहि डुबदा लइआ कढाइ ॥४॥३॥७३॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ५ ॥ हर रोज उद्यम से इस शरीर को पालते पोसते हैं~ (जिंदगी का मनोरथ) समझे बगैर यह मूर्ख ही रह जाता है। इसे कभी उस परमात्मा (जिसने इसे पैदा किया है) याद नहीं आता~ और आखिर में इसे मसाणों में फेक दिया जाएगा। (हे प्राणी! अभी भी वक्त है~ अपने) गुरू के साथ चिक्त जोड़ ले~ और (परमात्मा का नाम सिमर के) सदा कायम रहने वाला आत्मिक आनंद ले।1। हे प्राणी ! तू (जगत में परमात्मा के नाम का) लाभ लेने के लिए आया है। तू किस खुआरी वाले काम में उलझा हुआ है? तेरी जिंदगी की सारी रात खत्म होती जा रही है।1।रहाउ। पशु कलोल करते हैं~ पंक्षी कलोल करते हैं। (पशु और पंक्षी को) मौत नहीं दिखती। (पर) मनुष्य भी उसके साथ ही जा मिला है (पशु पक्षी की तरह इसे भी मौत याद नहीं~ और यह) माया के जाल में फंसा हुआ है। माया के जाल से बचे हुए वही लोग दिखते हैं जो परमात्मा का सदा कायम रहने वाला नाम हृदय में बसाते हैं।2। (हे प्राणी!) जो (ये) घर छोड़ के सदा के लिए चले जाना है~ वह तुझे अपने मन में (प्यारा) लग रहा है। और जहां जा के तेरा वास्ता पड़ना है~ उसका तूझे (रॅक्ती भर भी) फिक्र नहीं। (सभ जीव माया के मोह में फंसे हुए हैं~ इस मोह में) फंसे हुए वही बंदे निकलते हैं जो गुरू के चरणों में पड़ जाते हैं।3। (पर~ माया का मोह है ही बड़ा प्रबल~ इस में से गुरू के बिना) और कोई बचा नहीं सकता। (गुरू के बिना ऐसी स्मर्था वाला) कोई दिखाई नहीं देता। मैं तो सारी सृष्टि ढूंढ के गुरू की शरण आ पड़ा हूँ। हे नानक (कह) सॅचे पातशाह ने~ गुरू ने मुझे (माया के मोह समुंद्र में) डूब रहे को निकाल लिया है।4।3।73।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਘੜੀ ਮੁਹਤ ਕਾ ਪਾਹੁਣਾ ਕਾਜ ਸਵਾਰਣਹਾਰੁ ॥
ਮਾਇਆ ਕਾਮਿ ਵਿਆਪਿਆ ਸਮਝੈ ਨਾਹੀ ਗਾਵਾਰੁ ॥
ਉਠਿ ਚਲਿਆ ਪਛੁਤਾਇਆ ਪਰਿਆ ਵਸਿ ਜੰਦਾਰ ॥੧॥
ਅੰਧੇ ਤੂੰ ਬੈਠਾ ਕੰਧੀ ਪਾਹਿ ॥
ਜੇ ਹੋਵੀ ਪੂਰਬਿ ਲਿਖਿਆ ਤਾ ਗੁਰ ਕਾ ਬਚਨੁ ਕਮਾਹਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਰੀ ਨਾਹੀ ਨਹ ਡਡੁਰੀ ਪਕੀ ਵਢਣਹਾਰ ॥
ਲੈ ਲੈ ਦਾਤ ਪਹੁਤਿਆ ਲਾਵੇ ਕਰਿ ਤਈਆਰੁ ॥
ਜਾ ਹੋਆ ਹੁਕਮੁ ਕਿਰਸਾਣ ਦਾ ਤਾ ਲੁਣਿ ਮਿਣਿਆ ਖੇਤਾਰੁ ॥੨॥
ਪਹਿਲਾ ਪਹਰੁ ਧੰਧੈ ਗਇਆ ਦੂਜੈ ਭਰਿ ਸੋਇਆ ॥
ਤੀਜੈ ਝਾਖ ਝਖਾਇਆ ਚਉਥੈ ਭੋਰੁ ਭਇਆ ॥
ਕਦ ਹੀ ਚਿਤਿ ਨ ਆਇਓ ਜਿਨਿ ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਦੀਆ ॥੩॥
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਕਉ ਵਾਰਿਆ ਜੀਉ ਕੀਆ ਕੁਰਬਾਣੁ ॥
ਜਿਸ ਤੇ ਸੋਝੀ ਮਨਿ ਪਈ ਮਿਲਿਆ ਪੁਰਖੁ ਸੁਜਾਣੁ ॥
ਨਾਨਕ ਡਿਠਾ ਸਦਾ ਨਾਲਿ ਹਰਿ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਜਾਣੁ ॥੪॥੪॥੭੪॥
सिरीरागु महला ५ ॥
घड़ी मुहत का पाहुणा काज सवारणहारु ॥
माइआ कामि विआपिआ समझै नाही गावारु ॥
उठि चलिआ पछुताइआ परिआ वसि जंदार ॥१॥
अंधे तूं बैठा कंधी पाहि ॥
जे होवी पूरबि लिखिआ ता गुर का बचनु कमाहि ॥१॥ रहाउ ॥
हरी नाही नह डडुरी पकी वढणहार ॥
लै लै दात पहुतिआ लावे करि तईआरु ॥
जा होआ हुकमु किरसाण दा ता लुणि मिणिआ खेतारु ॥२॥
पहिला पहरु धंधै गइआ दूजै भरि सोइआ ॥
तीजै झाख झखाइआ चउथै भोरु भइआ ॥
कद ही चिति न आइओ जिनि जीउ पिंडु दीआ ॥३॥
साधसंगति कउ वारिआ जीउ कीआ कुरबाणु ॥
जिस ते सोझी मनि पई मिलिआ पुरखु सुजाणु ॥
नानक डिठा सदा नालि हरि अंतरजामी जाणु ॥४॥४॥७४॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ५ ॥ (किसी के घर घड़ी दो घड़ी के लिये गया हुआ मेहमान उस घर के काम संवारने वाला बन बैठे तो हास्यास्पद ही होता है~ उसी तरह से जीव इस जगत में) घड़ी दो घड़ियों का मेहमान ही है~ पर इस के ही काम-धंधे निपटाने वाला बन जाता है। मूर्ख (जीवन का सही रास्ता) नहीं समझता~ माया के मोह में और कामवासना में फंसा रहता है। जब (यहां से) उठ के चल पड़ता है तो पछताता है (पर~ उस वक्त पछताने से क्या होता है?) यमों के तो बस पड़ जाता है।1। हे (माया के मोह में) अंधे हुए जीव! (जैसे कोई पेड़ नदी के किनारे पर उगा हुआ हो तो किसी भी समय नदी के किनारे के टूटने से वृक्ष नदी में बह सकता है~ ठीक उसी तरह) तू (मौत रूपी नदी के) किनारे पर बैठा हुआ है (पता नहीं किस वक्त मौत आ जाए)। अगर (तेरे माथे पर) पूर्व जन्म में (की हुई कमाई के अच्छे लेख) लिखे हुए हों तो तू गुरू का उपदेश कमा ले (गुरू के उपदेश मुताबक अपना जीवन बनाए~ और आत्मिक मौत से बच जाए)।1।रहाउ। यह जरूरी नहीं कि हरी खेती ना काटी जाए~ डोडियों पर आई अधपकी फसल ना काटी जाए~ और सिर्फ पकी हुई ही काटी जाए। जब खेत के मालिक का हुकम होता है~ वह काटने वाले तैयार करता है जो हसिए ले ले के (खेत में) आ पहुंचते हैं। (वह काटने वाले खेत को) काट के सारा खेत नाप लेते हैं। (इस तरह जगत का मालिक प्रभु जब हुकम करता है जम आ के जीवों को ले जाते हैं~ चाहे बाल उम्र हो~ चाहे जवान हो और चाहे बुजुर्ग हो चुके हों)।2। (माया में ग्रसे मूर्ख मनुष्य की जीवन की रात का) पहिला पहर दुनिया के धंधों में बीत जाता है। दूसरे पहर (मोह की नींद में) जी भर के सोता रहता है~ तीसरे पहर विषय भोगता रहता है। और चौथे पहर (आखिर) दिन चढ़ जाता है (बुढ़ापा आ के मौत आ पुकारती है)। जिस प्रभु ने ये जीवात्मा और शरीर दिया है वह कभी भी इसके चिक्त में नहीं आता (उसे कभी भी याद नहीं करता)।3। हे नानक! (कह) मैं साध-संगति पर सदके जाता हूं~ साध-संगति के ऊपर अपनी जीवात्मा कुर्बान करता हूं। क्योंकि~ साध-संगति से ही मन में (प्रभु के सिमरन की) सूझ पैदा होती है~ (साध-संगति द्वारा ही) सभ के दिल की जानने वाला अकाल-पुरख मिलता है। अंतरयामी सुजान प्रभु को (साध-संगति की कृपा से ही) मैंने सदा अपने अंग-संग देखा है।4।4।74।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸਭੇ ਗਲਾ ਵਿਸਰਨੁ ਇਕੋ ਵਿਸਰਿ ਨ ਜਾਉ ॥
ਧੰਧਾ ਸਭੁ ਜਲਾਇ ਕੈ ਗੁਰਿ ਨਾਮੁ ਦੀਆ ਸਚੁ ਸੁਆਉ ॥
ਆਸਾ ਸਭੇ ਲਾਹਿ ਕੈ ਇਕਾ ਆਸ ਕਮਾਉ ॥
ਜਿਨੀ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿਆ ਤਿਨ ਅਗੈ ਮਿਲਿਆ ਥਾਉ ॥੧॥
ਮਨ ਮੇਰੇ ਕਰਤੇ ਨੋ ਸਾਲਾਹਿ ॥
ਸਭੇ ਛਡਿ ਸਿਆਣਪਾ ਗੁਰ ਕੀ ਪੈਰੀ ਪਾਹਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਦੁਖ ਭੁਖ ਨਹ ਵਿਆਪਈ ਜੇ ਸੁਖਦਾਤਾ ਮਨਿ ਹੋਇ ॥
ਕਿਤ ਹੀ ਕੰਮਿ ਨ ਛਿਜੀਐ ਜਾ ਹਿਰਦੈ ਸਚਾ ਸੋਇ ॥
ਜਿਸੁ ਤੂੰ ਰਖਹਿ ਹਥ ਦੇ ਤਿਸੁ ਮਾਰਿ ਨ ਸਕੈ ਕੋਇ ॥
ਸੁਖਦਾਤਾ ਗੁਰੁ ਸੇਵੀਐ ਸਭਿ ਅਵਗਣ ਕਢੈ ਧੋਇ ॥੨॥
ਸੇਵਾ ਮੰਗੈ ਸੇਵਕੋ ਲਾਈਆਂ ਅਪੁਨੀ ਸੇਵ ॥
सिरीरागु महला ५ ॥
सभे गला विसरनु इको विसरि न जाउ ॥
धंधा सभु जलाइ कै गुरि नामु दीआ सचु सुआउ ॥
आसा सभे लाहि कै इका आस कमाउ ॥
जिनी सतिगुरु सेविआ तिन अगै मिलिआ थाउ ॥१॥
मन मेरे करते नो सालाहि ॥
सभे छडि सिआणपा गुर की पैरी पाहि ॥१॥ रहाउ ॥
दुख भुख नह विआपई जे सुखदाता मनि होइ ॥
कित ही कंमि न छिजीऐ जा हिरदै सचा सोइ ॥
जिसु तूं रखहि हथ दे तिसु मारि न सकै कोइ ॥
सुखदाता गुरु सेवीऐ सभि अवगण कढै धोइ ॥२॥
सेवा मंगै सेवको लाईआं अपुनी सेव ॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ५ ॥ (मेरी तो सदा यही अरदास है कि) और सारी बातें बेशक भूल जाएं~ पर एक परमात्मा का नाम मुझे (कभी) ना भूले। गुरू ने (दुनिया के) धंधों से मेरा सारा मोह जला के मुझे प्रभु का नाम दिया है। यह सदा स्थिर नाम ही अब मेरा (जीवन) मनोरथ है। मैं (दुनिया की) सारी आशाएं मन से दूर करके एक परमात्मा की आस (अपने अंदर) पक्की करता हूं। जिन लोगों ने सतिगुरू का आसरा लिया है उनको परलोक में (प्रभु की दरगाह में) आदर मिलता है।1। हे मेरे मन ! करतार की सिफत सलाह कर। (पर~ यह सिफत सलाह की दात गुरू से ही मिलती है, सो तू) सभी चतुराईयां छोड़ के गुरू के चरणों पर गिर जा।1।रहाउ। अगर~ सुख देने वाला परमात्मा मन में बस जाए~ तो ना दुनिया के दुख जोर डाल सकते हैं~ ना माया की तृष्णा ही कमजोर कर सकती है। जब~ हृदय में वह सदा स्थिर रहने वाला परमात्मा बसता हो~ तो किसी भी काम में लगें आत्मिक जीवन कमजोर नहीं होता। हे प्रभु ! जिस मनुष्य को तू अपना हाथ दे के (विकारों से) बचाता है~ कोई (विकार) उसे (आत्मिक मौत) मार नहीं सकते। (हे भाई!) आत्मिक आनंद देने वाले सतिगुरू की शरण लेनी चाहिए~ सत्गुरू (मन में से) सारे अवगुण निकाल के धो देता है।2। हे प्रकाश स्वरूप प्रभु! मैं सेवक (तेरे से) उन (जीव-सि्त्रयों) की सेवा (का दान) मांगता हूं~ जिनको तूने अपनी सेवा में लगाया हुआ है।

संदर्भ: यह अंग 43 है, राग Siree Raag का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

दिल्ली-NCR की office-canteen की 1 बजे की दोपहर।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 42 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 43” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Siree Raag राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 44 →, पीछे का: ← अंग 42

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।