अंग
44
राग Siree Raag
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਾਧੂ ਸੰਗੁ ਮਸਕਤੇ ਤੂਠੈ ਪਾਵਾ ਦੇਵ ॥
ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਵਸਗਤਿ ਸਾਹਿਬੈ ਆਪੇ ਕਰਣ ਕਰੇਵ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਕੈ ਬਲਿਹਾਰਣੈ ਮਨਸਾ ਸਭ ਪੂਰੇਵ ॥੩॥
ਇਕੋ ਦਿਸੈ ਸਜਣੋ ਇਕੋ ਭਾਈ ਮੀਤੁ ॥
ਇਕਸੈ ਦੀ ਸਾਮਗਰੀ ਇਕਸੈ ਦੀ ਹੈ ਰੀਤਿ ॥
ਇਕਸ ਸਿਉ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ਤਾ ਹੋਆ ਨਿਹਚਲੁ ਚੀਤੁ ॥
ਸਚੁ ਖਾਣਾ ਸਚੁ ਪੈਨਣਾ ਟੇਕ ਨਾਨਕ ਸਚੁ ਕੀਤੁ ॥੪॥੫॥੭੫॥
ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਵਸਗਤਿ ਸਾਹਿਬੈ ਆਪੇ ਕਰਣ ਕਰੇਵ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਕੈ ਬਲਿਹਾਰਣੈ ਮਨਸਾ ਸਭ ਪੂਰੇਵ ॥੩॥
ਇਕੋ ਦਿਸੈ ਸਜਣੋ ਇਕੋ ਭਾਈ ਮੀਤੁ ॥
ਇਕਸੈ ਦੀ ਸਾਮਗਰੀ ਇਕਸੈ ਦੀ ਹੈ ਰੀਤਿ ॥
ਇਕਸ ਸਿਉ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ਤਾ ਹੋਆ ਨਿਹਚਲੁ ਚੀਤੁ ॥
ਸਚੁ ਖਾਣਾ ਸਚੁ ਪੈਨਣਾ ਟੇਕ ਨਾਨਕ ਸਚੁ ਕੀਤੁ ॥੪॥੫॥੭੫॥
साधू संगु मसकते तूठै पावा देव ॥
सभु किछु वसगति साहिबै आपे करण करेव ॥
सतिगुर कै बलिहारणै मनसा सभ पूरेव ॥३॥
इको दिसै सजणो इको भाई मीतु ॥
इकसै दी सामगरी इकसै दी है रीति ॥
इकस सिउ मनु मानिआ ता होआ निहचलु चीतु ॥
सचु खाणा सचु पैनणा टेक नानक सचु कीतु ॥४॥५॥७५॥
सभु किछु वसगति साहिबै आपे करण करेव ॥
सतिगुर कै बलिहारणै मनसा सभ पूरेव ॥३॥
इको दिसै सजणो इको भाई मीतु ॥
इकसै दी सामगरी इकसै दी है रीति ॥
इकस सिउ मनु मानिआ ता होआ निहचलु चीतु ॥
सचु खाणा सचु पैनणा टेक नानक सचु कीतु ॥४॥५॥७५॥
हिन्दी अर्थ: हे प्रभु ! अगर~ तू ही मेहर करे~ तो मुझे साध-संगति की प्राप्ति हो और सेवा की दात मिले। हे भाई! हरेक (दात) मालिक के अपने इख्तियार में है। वह खुद ही सब कुछ करन कारण योग्य है। मैं अपने सतिगुरू से सदके जाता हूं। सतिगुरू मेरी सारी जरूरतें पूरी करने वाला है।3। (हे भाई ! जगत में) एक परमात्मा ही असल सज्जन दिखाई देता हैं वही एक (असली) भाई है और मित्र है। दुनिया का सारा धन पदार्थ उस एक परमात्मा का ही दिया हुआ है। उस ही की मर्यादा जगत में चल रही है। हे नानक ! जब मनुष्य का मन एक परमात्मा (की याद) में रॅच जाता है~ जब उसका चिक्त (माया की ओर) डोलने से हट जाता है। वह परमात्मा के सदा स्थिर नाम को अपनी आत्मा की खुराक बना लेता है। नाम को ही अपनी (आत्मिक) पोशाक बनाता है और सदा स्थिर नाम को ही अपना आसरा बनाता है।4।5।75।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸਭੇ ਥੋਕ ਪਰਾਪਤੇ ਜੇ ਆਵੈ ਇਕੁ ਹਥਿ ॥
ਜਨਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਸਫਲੁ ਹੈ ਜੇ ਸਚਾ ਸਬਦੁ ਕਥਿ ॥
ਗੁਰ ਤੇ ਮਹਲੁ ਪਰਾਪਤੇ ਜਿਸੁ ਲਿਖਿਆ ਹੋਵੈ ਮਥਿ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਮਨ ਏਕਸ ਸਿਉ ਚਿਤੁ ਲਾਇ ॥
ਏਕਸ ਬਿਨੁ ਸਭ ਧੰਧੁ ਹੈ ਸਭ ਮਿਥਿਆ ਮੋਹੁ ਮਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਲਖ ਖੁਸੀਆ ਪਾਤਿਸਾਹੀਆ ਜੇ ਸਤਿਗੁਰੁ ਨਦਰਿ ਕਰੇਇ ॥
ਨਿਮਖ ਏਕ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਦੇਇ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਤਨੁ ਸੀਤਲੁ ਹੋਇ ॥
ਜਿਸ ਕਉ ਪੂਰਬਿ ਲਿਖਿਆ ਤਿਨਿ ਸਤਿਗੁਰ ਚਰਨ ਗਹੇ ॥੨॥
ਸਫਲ ਮੂਰਤੁ ਸਫਲਾ ਘੜੀ ਜਿਤੁ ਸਚੇ ਨਾਲਿ ਪਿਆਰੁ ॥
ਦੂਖੁ ਸੰਤਾਪੁ ਨ ਲਗਈ ਜਿਸੁ ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਅਧਾਰੁ ॥
ਬਾਹ ਪਕੜਿ ਗੁਰਿ ਕਾਢਿਆ ਸੋਈ ਉਤਰਿਆ ਪਾਰਿ ॥੩॥
ਥਾਨੁ ਸੁਹਾਵਾ ਪਵਿਤੁ ਹੈ ਜਿਥੈ ਸੰਤ ਸਭਾ ॥
ਢੋਈ ਤਿਸ ਹੀ ਨੋ ਮਿਲੈ ਜਿਨਿ ਪੂਰਾ ਗੁਰੂ ਲਭਾ ॥
ਨਾਨਕ ਬਧਾ ਘਰੁ ਤਹਾਂ ਜਿਥੈ ਮਿਰਤੁ ਨ ਜਨਮੁ ਜਰਾ ॥੪॥੬॥੭੬॥
ਸਭੇ ਥੋਕ ਪਰਾਪਤੇ ਜੇ ਆਵੈ ਇਕੁ ਹਥਿ ॥
ਜਨਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਸਫਲੁ ਹੈ ਜੇ ਸਚਾ ਸਬਦੁ ਕਥਿ ॥
ਗੁਰ ਤੇ ਮਹਲੁ ਪਰਾਪਤੇ ਜਿਸੁ ਲਿਖਿਆ ਹੋਵੈ ਮਥਿ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਮਨ ਏਕਸ ਸਿਉ ਚਿਤੁ ਲਾਇ ॥
ਏਕਸ ਬਿਨੁ ਸਭ ਧੰਧੁ ਹੈ ਸਭ ਮਿਥਿਆ ਮੋਹੁ ਮਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਲਖ ਖੁਸੀਆ ਪਾਤਿਸਾਹੀਆ ਜੇ ਸਤਿਗੁਰੁ ਨਦਰਿ ਕਰੇਇ ॥
ਨਿਮਖ ਏਕ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਦੇਇ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਤਨੁ ਸੀਤਲੁ ਹੋਇ ॥
ਜਿਸ ਕਉ ਪੂਰਬਿ ਲਿਖਿਆ ਤਿਨਿ ਸਤਿਗੁਰ ਚਰਨ ਗਹੇ ॥੨॥
ਸਫਲ ਮੂਰਤੁ ਸਫਲਾ ਘੜੀ ਜਿਤੁ ਸਚੇ ਨਾਲਿ ਪਿਆਰੁ ॥
ਦੂਖੁ ਸੰਤਾਪੁ ਨ ਲਗਈ ਜਿਸੁ ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਅਧਾਰੁ ॥
ਬਾਹ ਪਕੜਿ ਗੁਰਿ ਕਾਢਿਆ ਸੋਈ ਉਤਰਿਆ ਪਾਰਿ ॥੩॥
ਥਾਨੁ ਸੁਹਾਵਾ ਪਵਿਤੁ ਹੈ ਜਿਥੈ ਸੰਤ ਸਭਾ ॥
ਢੋਈ ਤਿਸ ਹੀ ਨੋ ਮਿਲੈ ਜਿਨਿ ਪੂਰਾ ਗੁਰੂ ਲਭਾ ॥
ਨਾਨਕ ਬਧਾ ਘਰੁ ਤਹਾਂ ਜਿਥੈ ਮਿਰਤੁ ਨ ਜਨਮੁ ਜਰਾ ॥੪॥੬॥੭੬॥
सिरीरागु महला ५ ॥
सभे थोक परापते जे आवै इकु हथि ॥
जनमु पदारथु सफलु है जे सचा सबदु कथि ॥
गुर ते महलु परापते जिसु लिखिआ होवै मथि ॥१॥
मेरे मन एकस सिउ चितु लाइ ॥
एकस बिनु सभ धंधु है सभ मिथिआ मोहु माइ ॥१॥ रहाउ ॥
लख खुसीआ पातिसाहीआ जे सतिगुरु नदरि करेइ ॥
निमख एक हरि नामु देइ मेरा मनु तनु सीतलु होइ ॥
जिस कउ पूरबि लिखिआ तिनि सतिगुर चरन गहे ॥२॥
सफल मूरतु सफला घड़ी जितु सचे नालि पिआरु ॥
दूखु संतापु न लगई जिसु हरि का नामु अधारु ॥
बाह पकड़ि गुरि काढिआ सोई उतरिआ पारि ॥३॥
थानु सुहावा पवितु है जिथै संत सभा ॥
ढोई तिस ही नो मिलै जिनि पूरा गुरू लभा ॥
नानक बधा घरु तहां जिथै मिरतु न जनमु जरा ॥४॥६॥७६॥
सभे थोक परापते जे आवै इकु हथि ॥
जनमु पदारथु सफलु है जे सचा सबदु कथि ॥
गुर ते महलु परापते जिसु लिखिआ होवै मथि ॥१॥
मेरे मन एकस सिउ चितु लाइ ॥
एकस बिनु सभ धंधु है सभ मिथिआ मोहु माइ ॥१॥ रहाउ ॥
लख खुसीआ पातिसाहीआ जे सतिगुरु नदरि करेइ ॥
निमख एक हरि नामु देइ मेरा मनु तनु सीतलु होइ ॥
जिस कउ पूरबि लिखिआ तिनि सतिगुर चरन गहे ॥२॥
सफल मूरतु सफला घड़ी जितु सचे नालि पिआरु ॥
दूखु संतापु न लगई जिसु हरि का नामु अधारु ॥
बाह पकड़ि गुरि काढिआ सोई उतरिआ पारि ॥३॥
थानु सुहावा पवितु है जिथै संत सभा ॥
ढोई तिस ही नो मिलै जिनि पूरा गुरू लभा ॥
नानक बधा घरु तहां जिथै मिरतु न जनमु जरा ॥४॥६॥७६॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ५ ॥ अगर~ एक परमात्मा मिल जाए~ तो (दुनियां के और) सारे पदार्थ मिल जाते हैं (देने वाला जो खुद ही हुआ)। अगर मैं सदा स्थिर रहने वाले प्रभु की सिफत सलाह करता रहूं~ तो ये कीमती मानस जनम सफल हो जाए। (पर~ उसी मनुष्य को) गुरू की ओर से (परमात्मा के चरणों का) निवास प्राप्त होता है जिसके माथे पर (अच्छे भाग्य) लिखे हुए हों।1। हे मेरे मन ! सिर्फ एक परमात्मा के साथ सुरति जोड़। एक परमात्मा (के प्यार) के बिनां (दुनियां की) सारी (दौड़ भाग) जंजाल बन जाती है। और माया का मोह है भी सारा व्यर्थ।1।रहाउ। अगर~ (मेरा) सतिगुरू (मेरे पे) मेहर की (एक) निगाह करे~ तो (मैं समझता हूं कि मुझे) लाखों बादशाहत की खुशियां मिल गई हैं। (क्योंकि~ जब गुरू मुझे) आँख के झपकने के जितने समय वास्ते भी परमात्मा का नाम बख्शता है~ तो मेरा मन शांत हो जाता है। मेरा शरीर शांत हो जाता है। (मेरी सारी ज्ञानेन्द्रियां विकारों की भड़काहट से हट जाती हैं)। पर उसी मनुष्य ने सतिगुरू के चरण पकड़े हैं (वही मनुष्य सतिगुरू का आसरा लेता है)~ जिस को पूर्व जन्म का लिखा हुआ (अच्छा लेख) मिलता है (जिसके सौभाग्य जागते हैं)।2। वह समय कामयाब समझो~ वह घड़ी सौभाग्यपूर्ण जानो~ जिसमें सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के साथ प्यार बने। जिस मनुष्य को परमात्मा के नाम का (जिंदगी का) आसरा मिल जाता है~ उस को कोई दुख~ कोई कलेश छू नहीं सकता। जिस मनुष्य की गुरू ने बाँह पकड़ के (विकारों में से बाहर) निकाल लिया~ वह (संसार समुंद्र में से सही सलामत) पार लांघ गए।3। (ये सारी बरकत है गुरू की~ साध-संगति की) जहां साध-संगति जुड़ती है वह जगह सुंदर है पवित्र है। (साध-संगति में आ के) जिसने पूरा गुरू ढूंढ लिया है~ उसी को ही (परमात्मा की हजूरी में) आसरा मिलता है। हे नानक ! उस मनुष्य ने अपना पक्का ठिकाना उस जगह पे बना लिया~ जहां आत्मिक मौत नहीं~ जहां जन्म मरण का चक्कर नहीं~ जहां आत्मिक जीवन कभी कमजोर नहीं होता।4।6।76।
ਸ੍ਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸੋਈ ਧਿਆਈਐ ਜੀਅੜੇ ਸਿਰਿ ਸਾਹਾਂ ਪਾਤਿਸਾਹੁ ॥
ਤਿਸ ਹੀ ਕੀ ਕਰਿ ਆਸ ਮਨ ਜਿਸ ਕਾ ਸਭਸੁ ਵੇਸਾਹੁ ॥
ਸਭਿ ਸਿਆਣਪਾ ਛਡਿ ਕੈ ਗੁਰ ਕੀ ਚਰਣੀ ਪਾਹੁ ॥੧॥
ਮਨ ਮੇਰੇ ਸੁਖ ਸਹਜ ਸੇਤੀ ਜਪਿ ਨਾਉ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਪ੍ਰਭੁ ਧਿਆਇ ਤੂੰ ਗੁਣ ਗੋਇੰਦ ਨਿਤ ਗਾਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤਿਸ ਕੀ ਸਰਨੀ ਪਰੁ ਮਨਾ ਜਿਸੁ ਜੇਵਡੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥
ਜਿਸੁ ਸਿਮਰਤ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ਘਣਾ ਦੁਖੁ ਦਰਦੁ ਨ ਮੂਲੇ ਹੋਇ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਕਰਿ ਚਾਕਰੀ ਪ੍ਰਭੁ ਸਾਹਿਬੁ ਸਚਾ ਸੋਇ ॥੨॥
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਹੋਇ ਨਿਰਮਲਾ ਕਟੀਐ ਜਮ ਕੀ ਫਾਸ ॥
ਸੁਖਦਾਤਾ ਭੈ ਭੰਜਨੋ ਤਿਸੁ ਆਗੈ ਕਰਿ ਅਰਦਾਸਿ ॥
ਮਿਹਰ ਕਰੇ ਜਿਸੁ ਮਿਹਰਵਾਨੁ ਤਾਂ ਕਾਰਜੁ ਆਵੈ ਰਾਸਿ ॥੩॥
ਬਹੁਤੋ ਬਹੁਤੁ ਵਖਾਣੀਐ ਊਚੋ ਊਚਾ ਥਾਉ ॥
ਵਰਨਾ ਚਿਹਨਾ ਬਾਹਰਾ ਕੀਮਤਿ ਕਹਿ ਨ ਸਕਾਉ ॥
ਨਾਨਕ ਕਉ ਪ੍ਰਭ ਮਇਆ ਕਰਿ ਸਚੁ ਦੇਵਹੁ ਅਪੁਣਾ ਨਾਉ ॥੪॥੭॥੭੭॥
ਸੋਈ ਧਿਆਈਐ ਜੀਅੜੇ ਸਿਰਿ ਸਾਹਾਂ ਪਾਤਿਸਾਹੁ ॥
ਤਿਸ ਹੀ ਕੀ ਕਰਿ ਆਸ ਮਨ ਜਿਸ ਕਾ ਸਭਸੁ ਵੇਸਾਹੁ ॥
ਸਭਿ ਸਿਆਣਪਾ ਛਡਿ ਕੈ ਗੁਰ ਕੀ ਚਰਣੀ ਪਾਹੁ ॥੧॥
ਮਨ ਮੇਰੇ ਸੁਖ ਸਹਜ ਸੇਤੀ ਜਪਿ ਨਾਉ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਪ੍ਰਭੁ ਧਿਆਇ ਤੂੰ ਗੁਣ ਗੋਇੰਦ ਨਿਤ ਗਾਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤਿਸ ਕੀ ਸਰਨੀ ਪਰੁ ਮਨਾ ਜਿਸੁ ਜੇਵਡੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥
ਜਿਸੁ ਸਿਮਰਤ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ਘਣਾ ਦੁਖੁ ਦਰਦੁ ਨ ਮੂਲੇ ਹੋਇ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਕਰਿ ਚਾਕਰੀ ਪ੍ਰਭੁ ਸਾਹਿਬੁ ਸਚਾ ਸੋਇ ॥੨॥
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਹੋਇ ਨਿਰਮਲਾ ਕਟੀਐ ਜਮ ਕੀ ਫਾਸ ॥
ਸੁਖਦਾਤਾ ਭੈ ਭੰਜਨੋ ਤਿਸੁ ਆਗੈ ਕਰਿ ਅਰਦਾਸਿ ॥
ਮਿਹਰ ਕਰੇ ਜਿਸੁ ਮਿਹਰਵਾਨੁ ਤਾਂ ਕਾਰਜੁ ਆਵੈ ਰਾਸਿ ॥੩॥
ਬਹੁਤੋ ਬਹੁਤੁ ਵਖਾਣੀਐ ਊਚੋ ਊਚਾ ਥਾਉ ॥
ਵਰਨਾ ਚਿਹਨਾ ਬਾਹਰਾ ਕੀਮਤਿ ਕਹਿ ਨ ਸਕਾਉ ॥
ਨਾਨਕ ਕਉ ਪ੍ਰਭ ਮਇਆ ਕਰਿ ਸਚੁ ਦੇਵਹੁ ਅਪੁਣਾ ਨਾਉ ॥੪॥੭॥੭੭॥
स्रीरागु महला ५ ॥
सोई धिआईऐ जीअड़े सिरि साहां पातिसाहु ॥
तिस ही की करि आस मन जिस का सभसु वेसाहु ॥
सभि सिआणपा छडि कै गुर की चरणी पाहु ॥१॥
मन मेरे सुख सहज सेती जपि नाउ ॥
आठ पहर प्रभु धिआइ तूं गुण गोइंद नित गाउ ॥१॥ रहाउ ॥
तिस की सरनी परु मना जिसु जेवडु अवरु न कोइ ॥
जिसु सिमरत सुखु होइ घणा दुखु दरदु न मूले होइ ॥
सदा सदा करि चाकरी प्रभु साहिबु सचा सोइ ॥२॥
साधसंगति होइ निरमला कटीऐ जम की फास ॥
सुखदाता भै भंजनो तिसु आगै करि अरदासि ॥
मिहर करे जिसु मिहरवानु तां कारजु आवै रासि ॥३॥
बहुतो बहुतु वखाणीऐ ऊचो ऊचा थाउ ॥
वरना चिहना बाहरा कीमति कहि न सकाउ ॥
नानक कउ प्रभ मइआ करि सचु देवहु अपुणा नाउ ॥४॥७॥७७॥
सोई धिआईऐ जीअड़े सिरि साहां पातिसाहु ॥
तिस ही की करि आस मन जिस का सभसु वेसाहु ॥
सभि सिआणपा छडि कै गुर की चरणी पाहु ॥१॥
मन मेरे सुख सहज सेती जपि नाउ ॥
आठ पहर प्रभु धिआइ तूं गुण गोइंद नित गाउ ॥१॥ रहाउ ॥
तिस की सरनी परु मना जिसु जेवडु अवरु न कोइ ॥
जिसु सिमरत सुखु होइ घणा दुखु दरदु न मूले होइ ॥
सदा सदा करि चाकरी प्रभु साहिबु सचा सोइ ॥२॥
साधसंगति होइ निरमला कटीऐ जम की फास ॥
सुखदाता भै भंजनो तिसु आगै करि अरदासि ॥
मिहर करे जिसु मिहरवानु तां कारजु आवै रासि ॥३॥
बहुतो बहुतु वखाणीऐ ऊचो ऊचा थाउ ॥
वरना चिहना बाहरा कीमति कहि न सकाउ ॥
नानक कउ प्रभ मइआ करि सचु देवहु अपुणा नाउ ॥४॥७॥७७॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ५ ॥ हे मेरी जीवात्मा! उसी प्रभु (के चरणों) का ध्यान धरना चाहिए जो सभ शाहों के ऊपर पातशाह है। हे (मेरे) मन ! सिर्फ उस परमात्मा की (सहायता की) आस बना~ जिस का सभ जीवों को भरोसा है। (हे मन !) सारी चतुराईयां छोड़ के गुरू के चरण पड़ (गुरू की शरण पड़ने से ही परमात्मा का मिलाप होता है)।1। हे मेरे मन! आनंद से और आत्मिक अडोलता से परमात्मा का नाम सिमर। आठों पहर प्रभु को सिमरता रह~ सदा गोविंद के गुण गाता रह।1।रहाउ। हे (मेरे) मन! उस परमात्मा की शरण पड़ जिसके बराबर और कोई नहीं। जिसका नाम सिमरने से बहुत आत्मिक आनंद मिलता है~ और कोई भी दुख कलेश बिल्कुल पास नहीं फटकता। (हे मन!) परमात्मा ही सदा कायम रहने वाला मालिक है~ सदा उसकी ही सेवा भक्ति करता रह।2। साध-संगति में रहने से (आचरन) पवित्र हो जाता है~ और जमों की फासी कटी जाती है। (हे मन! साध-संगति का आसारा ले के) उस परमात्मा के आगे अरदास करता रह~ जो सारे सुख देने वाला हैऔर सारे डर सहम का नाश करने वाला है। मेहर करने वाला परमात्मा जिस मनुष्य पे जब मेहर की निगाह करता है~ जब उसकी मनुष्य जीवन की भारी जिमेंदारी (पूरी हो) जाती है।3। हर कोई कहता है कि परमात्मा बहुत ऊंचा है~ बहुत ऊँचा है~ उसका ठिकाना बहुत ऊँचा है। उस प्रभु का कोई खास रंग नहीं है कोई खास रूप-रेखा नहीं। मैं उसकी कोई कीमत नहीं बता सकता। ( भाव~ दुनिया के किसी भी पदार्थ के बदले उसकी प्राप्ति नहीं हो सकती)। हे प्रभु ! मेहर कर और मुझे नानक को अपना सदा कायम रहने वाला नाम बख्श (क्यूँकि~ जिस को तेरा नाम मिल जाता है उस को तेरा मेल हो जाता है)।4।7।77।
ਸ੍ਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਨਾਮੁ ਧਿਆਏ ਸੋ ਸੁਖੀ ਤਿਸੁ ਮੁਖੁ ਊਜਲੁ ਹੋਇ ॥
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਤੇ ਪਾਈਐ ਪਰਗਟੁ ਸਭਨੀ ਲੋਇ ॥
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਕੈ ਘਰਿ ਵਸੈ ਏਕੋ ਸਚਾ ਸੋਇ ॥੧॥
ਨਾਮੁ ਧਿਆਏ ਸੋ ਸੁਖੀ ਤਿਸੁ ਮੁਖੁ ਊਜਲੁ ਹੋਇ ॥
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਤੇ ਪਾਈਐ ਪਰਗਟੁ ਸਭਨੀ ਲੋਇ ॥
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਕੈ ਘਰਿ ਵਸੈ ਏਕੋ ਸਚਾ ਸੋਇ ॥੧॥
स्रीरागु महला ५ ॥
नामु धिआए सो सुखी तिसु मुखु ऊजलु होइ ॥
पूरे गुर ते पाईऐ परगटु सभनी लोइ ॥
साधसंगति कै घरि वसै एको सचा सोइ ॥१॥
नामु धिआए सो सुखी तिसु मुखु ऊजलु होइ ॥
पूरे गुर ते पाईऐ परगटु सभनी लोइ ॥
साधसंगति कै घरि वसै एको सचा सोइ ॥१॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ५ ॥ जो मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरता है वही सुखी रहता है। उसका मुख (परलोक में) उजला रहता है। (यह नाम) पूरे गुरू से ही मिलता है। (यद्यपि नाम का मालिक प्रभु) सारे ही भवनों में प्रत्यक्ष बसता है। वह सदा कायम रहने वाला प्रभु साध-संगति के घर में बसता है।1।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 44 है, राग Siree Raag का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
WhatsApp-family-group पर सुबह की good-morning messages का flood।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 41 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 44” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Siree Raag राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 45 →, पीछे का: ← अंग 43।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।