अंग
42
राग Siree Raag
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਓਨੀ ਚਲਣੁ ਸਦਾ ਨਿਹਾਲਿਆ ਹਰਿ ਖਰਚੁ ਲੀਆ ਪਤਿ ਪਾਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਦਰਗਹ ਮੰਨੀਅਹਿ ਹਰਿ ਆਪਿ ਲਏ ਗਲਿ ਲਾਇ ॥੨॥
ਗੁਰਮੁਖਾ ਨੋ ਪੰਥੁ ਪਰਗਟਾ ਦਰਿ ਠਾਕ ਨ ਕੋਈ ਪਾਇ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸਲਾਹਨਿ ਨਾਮੁ ਮਨਿ ਨਾਮਿ ਰਹਨਿ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਅਨਹਦ ਧੁਨੀ ਦਰਿ ਵਜਦੇ ਦਰਿ ਸਚੈ ਸੋਭਾ ਪਾਇ ॥੩॥
ਜਿਨੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਸਲਾਹਿਆ ਤਿਨਾ ਸਭ ਕੋ ਕਹੈ ਸਾਬਾਸਿ ॥
ਤਿਨ ਕੀ ਸੰਗਤਿ ਦੇਹਿ ਪ੍ਰਭ ਮੈ ਜਾਚਿਕ ਕੀ ਅਰਦਾਸਿ ॥
ਨਾਨਕ ਭਾਗ ਵਡੇ ਤਿਨਾ ਗੁਰਮੁਖਾ ਜਿਨ ਅੰਤਰਿ ਨਾਮੁ ਪਰਗਾਸਿ ॥੪॥੩੩॥੩੧॥੬॥੭੦॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਦਰਗਹ ਮੰਨੀਅਹਿ ਹਰਿ ਆਪਿ ਲਏ ਗਲਿ ਲਾਇ ॥੨॥
ਗੁਰਮੁਖਾ ਨੋ ਪੰਥੁ ਪਰਗਟਾ ਦਰਿ ਠਾਕ ਨ ਕੋਈ ਪਾਇ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸਲਾਹਨਿ ਨਾਮੁ ਮਨਿ ਨਾਮਿ ਰਹਨਿ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਅਨਹਦ ਧੁਨੀ ਦਰਿ ਵਜਦੇ ਦਰਿ ਸਚੈ ਸੋਭਾ ਪਾਇ ॥੩॥
ਜਿਨੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਸਲਾਹਿਆ ਤਿਨਾ ਸਭ ਕੋ ਕਹੈ ਸਾਬਾਸਿ ॥
ਤਿਨ ਕੀ ਸੰਗਤਿ ਦੇਹਿ ਪ੍ਰਭ ਮੈ ਜਾਚਿਕ ਕੀ ਅਰਦਾਸਿ ॥
ਨਾਨਕ ਭਾਗ ਵਡੇ ਤਿਨਾ ਗੁਰਮੁਖਾ ਜਿਨ ਅੰਤਰਿ ਨਾਮੁ ਪਰਗਾਸਿ ॥੪॥੩੩॥੩੧॥੬॥੭੦॥
ओनी चलणु सदा निहालिआ हरि खरचु लीआ पति पाइ ॥
गुरमुखि दरगह मंनीअहि हरि आपि लए गलि लाइ ॥२॥
गुरमुखा नो पंथु परगटा दरि ठाक न कोई पाइ ॥
हरि नामु सलाहनि नामु मनि नामि रहनि लिव लाइ ॥
अनहद धुनी दरि वजदे दरि सचै सोभा पाइ ॥३॥
जिनी गुरमुखि नामु सलाहिआ तिना सभ को कहै साबासि ॥
तिन की संगति देहि प्रभ मै जाचिक की अरदासि ॥
नानक भाग वडे तिना गुरमुखा जिन अंतरि नामु परगासि ॥४॥३३॥३१॥६॥७०॥
गुरमुखि दरगह मंनीअहि हरि आपि लए गलि लाइ ॥२॥
गुरमुखा नो पंथु परगटा दरि ठाक न कोई पाइ ॥
हरि नामु सलाहनि नामु मनि नामि रहनि लिव लाइ ॥
अनहद धुनी दरि वजदे दरि सचै सोभा पाइ ॥३॥
जिनी गुरमुखि नामु सलाहिआ तिना सभ को कहै साबासि ॥
तिन की संगति देहि प्रभ मै जाचिक की अरदासि ॥
नानक भाग वडे तिना गुरमुखा जिन अंतरि नामु परगासि ॥४॥३३॥३१॥६॥७०॥
हिन्दी अर्थ: उन मनुष्यों ने (जगत से आखिर) चले जाने को सदा (सामने) देखा है~ उन्होंने परमात्मा का नाम (जीवन के सफर वास्ते) खर्च एकत्र किया है और (लोक परलोक में) इज्जत पाई है। गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य प्रभु की हजूरी में सत्कारे जाते हैं~ परमात्मा स्वयं उन्हें अपने गले से लगा लेता है।2। गुरू के सन्मुख रहने वाले लोगों को (जीवन का) रास्ता साफ साफ दिखाई देता है। परमात्मा के दर पे उनके पहुँचने के राह में कोई रुकावट नहीं पड़ती। वह परमात्मा की सिफत सलाह करते रहते हैं। परमात्मा का नाम उनके मन में बसा रहता है~ वह सदा प्रभु नाम में सुरति जोड़ के रखते हैं। उनके अंदर एक रस सुर से प्रभु की सिफति के (मानो~ बाजे) बजते रहते हैं। सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के दर पे उनको शोभा मिलती है।3। जिन मनुष्यों ने गुरू के सन्मुख हो के परमात्मा के नाम की सिफत सलाह की है~ हर कोई उनकी वाह वाह करता है। हे प्रभु! मैं मंगते की तेरे आगे अरजोई है कि मुझे उन की संगति बख्श। हे नानक! गुरू के सन्मुख रहने वाले उन मनुष्यों के अहो भाग्य जाग पड़ते है~ जिनके हृदय में परमात्मा का नाम (आत्मिक) प्रकाश पैदा कर देता है।4।33।31।6।70।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੫ ਘਰੁ ੧ ॥
ਕਿਆ ਤੂ ਰਤਾ ਦੇਖਿ ਕੈ ਪੁਤ੍ਰ ਕਲਤ੍ਰ ਸੀਗਾਰ ॥
ਰਸ ਭੋਗਹਿ ਖੁਸੀਆ ਕਰਹਿ ਮਾਣਹਿ ਰੰਗ ਅਪਾਰ ॥
ਬਹੁਤੁ ਕਰਹਿ ਫੁਰਮਾਇਸੀ ਵਰਤਹਿ ਹੋਇ ਅਫਾਰ ॥
ਕਰਤਾ ਚਿਤਿ ਨ ਆਵਈ ਮਨਮੁਖ ਅੰਧ ਗਵਾਰ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਮਨ ਸੁਖਦਾਤਾ ਹਰਿ ਸੋਇ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਪਾਈਐ ਕਰਮਿ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਪੜਿ ਭੋਗਿ ਲਪਟਾਇਆ ਸੁਇਨਾ ਰੁਪਾ ਖਾਕੁ ॥
ਹੈਵਰ ਗੈਵਰ ਬਹੁ ਰੰਗੇ ਕੀਏ ਰਥ ਅਥਾਕ ॥
ਕਿਸ ਹੀ ਚਿਤਿ ਨ ਪਾਵਹੀ ਬਿਸਰਿਆ ਸਭ ਸਾਕ ॥
ਸਿਰਜਣਹਾਰਿ ਭੁਲਾਇਆ ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਨਾਪਾਕ ॥੨॥
ਲੈਦਾ ਬਦ ਦੁਆਇ ਤੂੰ ਮਾਇਆ ਕਰਹਿ ਇਕਤ ॥
ਜਿਸ ਨੋ ਤੂੰ ਪਤੀਆਇਦਾ ਸੋ ਸਣੁ ਤੁਝੈ ਅਨਿਤ ॥
ਅਹੰਕਾਰੁ ਕਰਹਿ ਅਹੰਕਾਰੀਆ ਵਿਆਪਿਆ ਮਨ ਕੀ ਮਤਿ ॥
ਤਿਨਿ ਪ੍ਰਭਿ ਆਪਿ ਭੁਲਾਇਆ ਨਾ ਤਿਸੁ ਜਾਤਿ ਨ ਪਤਿ ॥੩॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਪੁਰਖਿ ਮਿਲਾਇਆ ਇਕੋ ਸਜਣੁ ਸੋਇ ॥
ਹਰਿ ਜਨ ਕਾ ਰਾਖਾ ਏਕੁ ਹੈ ਕਿਆ ਮਾਣਸ ਹਉਮੈ ਰੋਇ ॥
ਜੋ ਹਰਿ ਜਨ ਭਾਵੈ ਸੋ ਕਰੇ ਦਰਿ ਫੇਰੁ ਨ ਪਾਵੈ ਕੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਰਤਾ ਰੰਗਿ ਹਰਿ ਸਭ ਜਗ ਮਹਿ ਚਾਨਣੁ ਹੋਇ ॥੪॥੧॥੭੧॥
ਕਿਆ ਤੂ ਰਤਾ ਦੇਖਿ ਕੈ ਪੁਤ੍ਰ ਕਲਤ੍ਰ ਸੀਗਾਰ ॥
ਰਸ ਭੋਗਹਿ ਖੁਸੀਆ ਕਰਹਿ ਮਾਣਹਿ ਰੰਗ ਅਪਾਰ ॥
ਬਹੁਤੁ ਕਰਹਿ ਫੁਰਮਾਇਸੀ ਵਰਤਹਿ ਹੋਇ ਅਫਾਰ ॥
ਕਰਤਾ ਚਿਤਿ ਨ ਆਵਈ ਮਨਮੁਖ ਅੰਧ ਗਵਾਰ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਮਨ ਸੁਖਦਾਤਾ ਹਰਿ ਸੋਇ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਪਾਈਐ ਕਰਮਿ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਪੜਿ ਭੋਗਿ ਲਪਟਾਇਆ ਸੁਇਨਾ ਰੁਪਾ ਖਾਕੁ ॥
ਹੈਵਰ ਗੈਵਰ ਬਹੁ ਰੰਗੇ ਕੀਏ ਰਥ ਅਥਾਕ ॥
ਕਿਸ ਹੀ ਚਿਤਿ ਨ ਪਾਵਹੀ ਬਿਸਰਿਆ ਸਭ ਸਾਕ ॥
ਸਿਰਜਣਹਾਰਿ ਭੁਲਾਇਆ ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਨਾਪਾਕ ॥੨॥
ਲੈਦਾ ਬਦ ਦੁਆਇ ਤੂੰ ਮਾਇਆ ਕਰਹਿ ਇਕਤ ॥
ਜਿਸ ਨੋ ਤੂੰ ਪਤੀਆਇਦਾ ਸੋ ਸਣੁ ਤੁਝੈ ਅਨਿਤ ॥
ਅਹੰਕਾਰੁ ਕਰਹਿ ਅਹੰਕਾਰੀਆ ਵਿਆਪਿਆ ਮਨ ਕੀ ਮਤਿ ॥
ਤਿਨਿ ਪ੍ਰਭਿ ਆਪਿ ਭੁਲਾਇਆ ਨਾ ਤਿਸੁ ਜਾਤਿ ਨ ਪਤਿ ॥੩॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਪੁਰਖਿ ਮਿਲਾਇਆ ਇਕੋ ਸਜਣੁ ਸੋਇ ॥
ਹਰਿ ਜਨ ਕਾ ਰਾਖਾ ਏਕੁ ਹੈ ਕਿਆ ਮਾਣਸ ਹਉਮੈ ਰੋਇ ॥
ਜੋ ਹਰਿ ਜਨ ਭਾਵੈ ਸੋ ਕਰੇ ਦਰਿ ਫੇਰੁ ਨ ਪਾਵੈ ਕੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਰਤਾ ਰੰਗਿ ਹਰਿ ਸਭ ਜਗ ਮਹਿ ਚਾਨਣੁ ਹੋਇ ॥੪॥੧॥੭੧॥
सिरीरागु महला ५ घरु १ ॥
किआ तू रता देखि कै पुत्र कलत्र सीगार ॥
रस भोगहि खुसीआ करहि माणहि रंग अपार ॥
बहुतु करहि फुरमाइसी वरतहि होइ अफार ॥
करता चिति न आवई मनमुख अंध गवार ॥१॥
मेरे मन सुखदाता हरि सोइ ॥
गुर परसादी पाईऐ करमि परापति होइ ॥१॥ रहाउ ॥
कपड़ि भोगि लपटाइआ सुइना रुपा खाकु ॥
हैवर गैवर बहु रंगे कीए रथ अथाक ॥
किस ही चिति न पावही बिसरिआ सभ साक ॥
सिरजणहारि भुलाइआ विणु नावै नापाक ॥२॥
लैदा बद दुआइ तूं माइआ करहि इकत ॥
जिस नो तूं पतीआइदा सो सणु तुझै अनित ॥
अहंकारु करहि अहंकारीआ विआपिआ मन की मति ॥
तिनि प्रभि आपि भुलाइआ ना तिसु जाति न पति ॥३॥
सतिगुरि पुरखि मिलाइआ इको सजणु सोइ ॥
हरि जन का राखा एकु है किआ माणस हउमै रोइ ॥
जो हरि जन भावै सो करे दरि फेरु न पावै कोइ ॥
नानक रता रंगि हरि सभ जग महि चानणु होइ ॥४॥१॥७१॥
किआ तू रता देखि कै पुत्र कलत्र सीगार ॥
रस भोगहि खुसीआ करहि माणहि रंग अपार ॥
बहुतु करहि फुरमाइसी वरतहि होइ अफार ॥
करता चिति न आवई मनमुख अंध गवार ॥१॥
मेरे मन सुखदाता हरि सोइ ॥
गुर परसादी पाईऐ करमि परापति होइ ॥१॥ रहाउ ॥
कपड़ि भोगि लपटाइआ सुइना रुपा खाकु ॥
हैवर गैवर बहु रंगे कीए रथ अथाक ॥
किस ही चिति न पावही बिसरिआ सभ साक ॥
सिरजणहारि भुलाइआ विणु नावै नापाक ॥२॥
लैदा बद दुआइ तूं माइआ करहि इकत ॥
जिस नो तूं पतीआइदा सो सणु तुझै अनित ॥
अहंकारु करहि अहंकारीआ विआपिआ मन की मति ॥
तिनि प्रभि आपि भुलाइआ ना तिसु जाति न पति ॥३॥
सतिगुरि पुरखि मिलाइआ इको सजणु सोइ ॥
हरि जन का राखा एकु है किआ माणस हउमै रोइ ॥
जो हरि जन भावै सो करे दरि फेरु न पावै कोइ ॥
नानक रता रंगि हरि सभ जग महि चानणु होइ ॥४॥१॥७१॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ५ घरु १ ॥ हे अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य ! हे (माया के मोह में) अंधे हुए मनुष्य! हे मूर्ख! तू (अपने) पुत्रों को देख के~ (अपनी) स्त्री के हाव-भाव को देख के क्यूँ मस्त हो रहा है? तू (दुनिया के कई) रस भोगता है~ तू (कई तरह की) खुशियों का आनन्द लेता है~ तू अनेकों (किस्म की) मौजें करता है। तू बड़े हुकम (भी) देता है~ तू अहंकारी हो के (लोगों के साथ अहंकारी) बरताव करता है। तुझे करतार याद ही नहीं रहा।1। हे मेरे मन ! वह परमात्मा स्वयं ही सुख देने वाला है। (वह परमात्मा) गुरू की कृपा से मिलता है (अपनी ही) मेहर से मिलता है।1।रहाउ। (हे मूर्ख!) तू खाने में~ पहनने में मस्त हो रहा है~ तू सोना~ चांदी धरती एकत्र कर रहा है। तूने कई किस्मों के बढ़ीया घोड़े~ बढ़ीया हाथी और कभी ना थकने वाले रॅथ इकट्ठे कर लिए हैं। (माया की मस्ती में) तू अपने साक संबंधियों को भी भुला बैठा है~ किसी को तू अपने चिक्त में नहीं लाता। परमात्मा के नाम के बिना तू (आत्मिक जीवन में) गंदा है। सृजनहार प्रभु ने तुझे अपने मन से उतार दिया है।2। (हे मूर्ख!) तू (धक्केशाही करके) संपक्ति एकत्र करता है (जिस करके लोगों की) बद्-दुआएं लेता है। (पर) जिस (परिवार) को तू (इस सम्पदा से) खुश करता है वह तेरे समेत ही नाशवंत है। हे अहंकारी ! तू अपने मन की मति के दबाव में आया हुआ है और (धन-सम्पक्ति) का गुमान करता है। जिस (दुर्भाग्य वाले जीव) को उस प्रभु ने स्वयं ही गुमराह किया हो (प्रभु की हजूरी में) ना उसकी (ऊँची) जाति (किसी काम की) ना (दुनिया वाली कोई) इज्जत।3। अकाल-पुरख के रूप सतिगुरू ने जिस मनुष्य को वह प्रभु सज्जन ही मिला दिया है~ प्रभु के उस सेवक का रखवाला (हर जगह) प्रभु खुद ही बनता ळै। दुनिया के लोग उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकते। (पर अपनी) अहम् में (फंसा मनुष्य) दुखी (ही) रहता है। परमात्मा के सेवक को जो अच्छा लगता है~ परमात्मा वही करता है। परमात्मा के दर पे उसकी बात कोई काट नहीं सकता। हे नानक ! जो मनुष्य परमात्मा के प्यार रंग में रंगा रहता है~ वह सारे जगत में प्रकाश (मीनार) बन जाता है।4।1।71।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮਨਿ ਬਿਲਾਸੁ ਬਹੁ ਰੰਗੁ ਘਣਾ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਭੂਲਿ ਖੁਸੀਆ ॥
ਛਤ੍ਰਧਾਰ ਬਾਦਿਸਾਹੀਆ ਵਿਚਿ ਸਹਸੇ ਪਰੀਆ ॥੧॥
ਭਾਈ ਰੇ ਸੁਖੁ ਸਾਧਸੰਗਿ ਪਾਇਆ ॥
ਲਿਖਿਆ ਲੇਖੁ ਤਿਨਿ ਪੁਰਖਿ ਬਿਧਾਤੈ ਦੁਖੁ ਸਹਸਾ ਮਿਟਿ ਗਇਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੇਤੇ ਥਾਨ ਥਨੰਤਰਾ ਤੇਤੇ ਭਵਿ ਆਇਆ ॥
ਧਨ ਪਾਤੀ ਵਡ ਭੂਮੀਆ ਮੇਰੀ ਮੇਰੀ ਕਰਿ ਪਰਿਆ ॥੨॥
ਹੁਕਮੁ ਚਲਾਏ ਨਿਸੰਗ ਹੋਇ ਵਰਤੈ ਅਫਰਿਆ ॥
ਸਭੁ ਕੋ ਵਸਗਤਿ ਕਰਿ ਲਇਓਨੁ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਖਾਕੁ ਰਲਿਆ ॥੩॥
ਕੋਟਿ ਤੇਤੀਸ ਸੇਵਕਾ ਸਿਧ ਸਾਧਿਕ ਦਰਿ ਖਰਿਆ ॥
ਗਿਰੰਬਾਰੀ ਵਡ ਸਾਹਬੀ ਸਭੁ ਨਾਨਕ ਸੁਪਨੁ ਥੀਆ ॥੪॥੨॥੭੨॥
ਮਨਿ ਬਿਲਾਸੁ ਬਹੁ ਰੰਗੁ ਘਣਾ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਭੂਲਿ ਖੁਸੀਆ ॥
ਛਤ੍ਰਧਾਰ ਬਾਦਿਸਾਹੀਆ ਵਿਚਿ ਸਹਸੇ ਪਰੀਆ ॥੧॥
ਭਾਈ ਰੇ ਸੁਖੁ ਸਾਧਸੰਗਿ ਪਾਇਆ ॥
ਲਿਖਿਆ ਲੇਖੁ ਤਿਨਿ ਪੁਰਖਿ ਬਿਧਾਤੈ ਦੁਖੁ ਸਹਸਾ ਮਿਟਿ ਗਇਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੇਤੇ ਥਾਨ ਥਨੰਤਰਾ ਤੇਤੇ ਭਵਿ ਆਇਆ ॥
ਧਨ ਪਾਤੀ ਵਡ ਭੂਮੀਆ ਮੇਰੀ ਮੇਰੀ ਕਰਿ ਪਰਿਆ ॥੨॥
ਹੁਕਮੁ ਚਲਾਏ ਨਿਸੰਗ ਹੋਇ ਵਰਤੈ ਅਫਰਿਆ ॥
ਸਭੁ ਕੋ ਵਸਗਤਿ ਕਰਿ ਲਇਓਨੁ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਖਾਕੁ ਰਲਿਆ ॥੩॥
ਕੋਟਿ ਤੇਤੀਸ ਸੇਵਕਾ ਸਿਧ ਸਾਧਿਕ ਦਰਿ ਖਰਿਆ ॥
ਗਿਰੰਬਾਰੀ ਵਡ ਸਾਹਬੀ ਸਭੁ ਨਾਨਕ ਸੁਪਨੁ ਥੀਆ ॥੪॥੨॥੭੨॥
सिरीरागु महला ५ ॥
मनि बिलासु बहु रंगु घणा द्रिसटि भूलि खुसीआ ॥
छत्रधार बादिसाहीआ विचि सहसे परीआ ॥१॥
भाई रे सुखु साधसंगि पाइआ ॥
लिखिआ लेखु तिनि पुरखि बिधातै दुखु सहसा मिटि गइआ ॥१॥ रहाउ ॥
जेते थान थनंतरा तेते भवि आइआ ॥
धन पाती वड भूमीआ मेरी मेरी करि परिआ ॥२॥
हुकमु चलाए निसंग होइ वरतै अफरिआ ॥
सभु को वसगति करि लइओनु बिनु नावै खाकु रलिआ ॥३॥
कोटि तेतीस सेवका सिध साधिक दरि खरिआ ॥
गिरंबारी वड साहबी सभु नानक सुपनु थीआ ॥४॥२॥७२॥
मनि बिलासु बहु रंगु घणा द्रिसटि भूलि खुसीआ ॥
छत्रधार बादिसाहीआ विचि सहसे परीआ ॥१॥
भाई रे सुखु साधसंगि पाइआ ॥
लिखिआ लेखु तिनि पुरखि बिधातै दुखु सहसा मिटि गइआ ॥१॥ रहाउ ॥
जेते थान थनंतरा तेते भवि आइआ ॥
धन पाती वड भूमीआ मेरी मेरी करि परिआ ॥२॥
हुकमु चलाए निसंग होइ वरतै अफरिआ ॥
सभु को वसगति करि लइओनु बिनु नावै खाकु रलिआ ॥३॥
कोटि तेतीस सेवका सिध साधिक दरि खरिआ ॥
गिरंबारी वड साहबी सभु नानक सुपनु थीआ ॥४॥२॥७२॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ५ ॥ अगर किसी मनुष्य के मन में कई किस्म की बहुत सी चाव-उमंगें हों~ अगर उसकी निगाह (दुनियां की) खुशियों में ही भूली रहें~ अगर ऐसी बादशाहियां मिलती हों कि सिर पर छत्र टिके रहें~ तो भी (साध-संगति के बिना ये सभ मौजें) सहम में डाल के रखती हैं।1। हे भाई ! साध-संगति में ही सुख मिलता है। उस अकाल-पुरख सृजनहार ने (जिसके माथे पर अच्छे भाग्यों का) लेख लिख दिया (उस को सत्संग मिलता है तथा उसका) दुख सहम दूर हो जाता है।1।रहाउ। धरती पे जितनी भी सुंदर सुंदर जगहें हैं (अगर कोई मनुष्य) वह सारे ही स्थल घूम घूम के देख आया हो~ अगर कोई बहुत धनवान हो~ बहुत सारी धरती का मालिक हो~ तो भी (साध-संगति के बिना) “मेरा पैसा” “मेरी जमीन” कह कह के दुखी रहता है।2। अगर कोई मनुष्य डर-खतरा-झिझक उतार के (लोगों पे) अपना हुकम चलाए~ लोगों से बड़ी अकड़ वाला सलूक करे~ अगर उसने हरेक को अपने वस में कर लिया हो तो भी (साध-संगति से वंचित रह के परमात्मा के) नाम के बगैर (सुख नहीं मिलता~ और आखिर) मिट्टी में मिल जाता है।3। अगर कोई इतनी बड़ी हकूमत का मालिक बन जाए~ कि भारी जिंमेवारी भी मिल जाए~ और तेतीस करोड़ देवते उसके सेवक बन जाएं~ सिद्ध और साधक उसके दर पर खड़े रहें~ तो भी~ हे नानक! (साध-संगति के बिना सुख नहीं मिलता~ और) ये सभ कुछ आखिर सपना बन के रह जाता है।4।2।72।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 42 है, राग Siree Raag का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
startup की 14-घंटे की रात, founder अकेले laptop पर।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 38 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 42” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Siree Raag राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 43 →, पीछे का: ← अंग 41।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।