अंग 41

अंग
41
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੪ ॥
ਹਉ ਪੰਥੁ ਦਸਾਈ ਨਿਤ ਖੜੀ ਕੋਈ ਪ੍ਰਭੁ ਦਸੇ ਤਿਨਿ ਜਾਉ ॥
ਜਿਨੀ ਮੇਰਾ ਪਿਆਰਾ ਰਾਵਿਆ ਤਿਨ ਪੀਛੈ ਲਾਗਿ ਫਿਰਾਉ ॥
ਕਰਿ ਮਿੰਨਤਿ ਕਰਿ ਜੋਦੜੀ ਮੈ ਪ੍ਰਭੁ ਮਿਲਣੈ ਕਾ ਚਾਉ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਭਾਈ ਜਨਾ ਕੋਈ ਮੋ ਕਉ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਇ ॥
ਹਉ ਸਤਿਗੁਰ ਵਿਟਹੁ ਵਾਰਿਆ ਜਿਨਿ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਦੀਆ ਦਿਖਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹੋਇ ਨਿਮਾਣੀ ਢਹਿ ਪਵਾ ਪੂਰੇ ਸਤਿਗੁਰ ਪਾਸਿ ॥
ਨਿਮਾਣਿਆ ਗੁਰੁ ਮਾਣੁ ਹੈ ਗੁਰੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਕਰੇ ਸਾਬਾਸਿ ॥
ਹਉ ਗੁਰੁ ਸਾਲਾਹਿ ਨ ਰਜਊ ਮੈ ਮੇਲੇ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਪਾਸਿ ॥੨॥
ਸਤਿਗੁਰ ਨੋ ਸਭ ਕੋ ਲੋਚਦਾ ਜੇਤਾ ਜਗਤੁ ਸਭੁ ਕੋਇ ॥
ਬਿਨੁ ਭਾਗਾ ਦਰਸਨੁ ਨਾ ਥੀਐ ਭਾਗਹੀਣ ਬਹਿ ਰੋਇ ॥
ਜੋ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭ ਭਾਣਾ ਸੋ ਥੀਆ ਧੁਰਿ ਲਿਖਿਆ ਨ ਮੇਟੈ ਕੋਇ ॥੩॥
ਆਪੇ ਸਤਿਗੁਰੁ ਆਪਿ ਹਰਿ ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਇ ॥
ਆਪਿ ਦਇਆ ਕਰਿ ਮੇਲਸੀ ਗੁਰ ਸਤਿਗੁਰ ਪੀਛੈ ਪਾਇ ॥
ਸਭੁ ਜਗਜੀਵਨੁ ਜਗਿ ਆਪਿ ਹੈ ਨਾਨਕ ਜਲੁ ਜਲਹਿ ਸਮਾਇ ॥੪॥੪॥੬੮॥
सिरीरागु महला ४ ॥
हउ पंथु दसाई नित खड़ी कोई प्रभु दसे तिनि जाउ ॥
जिनी मेरा पिआरा राविआ तिन पीछै लागि फिराउ ॥
करि मिंनति करि जोदड़ी मै प्रभु मिलणै का चाउ ॥१॥
मेरे भाई जना कोई मो कउ हरि प्रभु मेलि मिलाइ ॥
हउ सतिगुर विटहु वारिआ जिनि हरि प्रभु दीआ दिखाइ ॥१॥ रहाउ ॥
होइ निमाणी ढहि पवा पूरे सतिगुर पासि ॥
निमाणिआ गुरु माणु है गुरु सतिगुरु करे साबासि ॥
हउ गुरु सालाहि न रजऊ मै मेले हरि प्रभु पासि ॥२॥
सतिगुर नो सभ को लोचदा जेता जगतु सभु कोइ ॥
बिनु भागा दरसनु ना थीऐ भागहीण बहि रोइ ॥
जो हरि प्रभ भाणा सो थीआ धुरि लिखिआ न मेटै कोइ ॥३॥
आपे सतिगुरु आपि हरि आपे मेलि मिलाइ ॥
आपि दइआ करि मेलसी गुर सतिगुर पीछै पाइ ॥
सभु जगजीवनु जगि आपि है नानक जलु जलहि समाइ ॥४॥४॥६८॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ੪ ॥ मै सदा (चाह में) खड़ी हुई (परमात्मा के देश का) राह पूछती हूँ (मैं सदा लोचती रहती हूँ कि) कोई मुझे प्रभु के बारे में बताए~ और उस के द्वारा (उसकी सहायता से प्रभु के चरणों में) पहुँचू। जिन (सत्संगी सहेलियों) ने प्यारे प्रभु का मिलाप हासिल किया है मैं उनके आगे तरला विनती करूँ~ उनकी सेवा करके उनके पीछे लगी फिरूँ। क्योंकि~ मेरे अंदर प्रभु मिलन की चाह है।1। हे मेरे भाईओ! कोई मुझे परमात्मा से मिला दे। (पर गुरू के बिना और कौन मिला सकता है?) मैं सतिगुरू से सदके जाता हूँ~ जिसने परमात्मा दिखा दिया (जो दिखा देता है)।1।रहाउ। (मेरा मन चाहता है कि) मैं और मान-सम्मान आसरे छोड़ के पूरे सतिगुरू के चरणों पे गिर जाऊँ। गुरू उनका मान आसरा है~ जिनका और कोई आसरा नहीं होता। (निमाणियों को) गुरू दिलासा देता है। गुरू की महानताओं का बयान कर कर के मेरा मन नहीं भरता। गुरू मुझे मेरे पास ही बसते परमात्मा को मिलाने के समर्थ है।2। जितना ये सारा जगत है हरेक जीव सत्गुरू को मिलने की चाह रखता है~ पर खुश-किस्मती के बगैर सतिगुरू के दर्शन नहीं होते (गुरू की कद्र नहीं पड़ती)। (गुरू से विछुड़ के) दुर्भाग्यवान जीव स्त्री बैठी दुखी होती है। (पर~ जीवों के भी क्या बस?) जो कुछ परमात्मा को ठीक लगता है वही होता है। धुर से प्रभु की दरगाह से लिखे हुकम को कोई मिटा नहीं सकता।3। परमात्मा खुद ही सतिगुरू मिलाता है (और गुरू के द्वारा) अपने चरणों में मिलाता है। प्रभु (जीवों को) स्वयं ही सतिगुरू से जोड़ के मेहर करके अपने साथ मिलाने के स्मर्थ है। हे नानक! जगत (के जीवों) का सहारा परमात्मा जगत में हर जगह खुद ही खुद है (जिस जीव को वह अपने चरणों से जोड़ता है वह उस से इस प्रकार घुल-मिल के एक हो जाता है जैसे) पानी पानी में एक रूप हो जाता है।4।4।68।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੪ ॥
ਰਸੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਨਾਮੁ ਰਸੁ ਅਤਿ ਭਲਾ ਕਿਤੁ ਬਿਧਿ ਮਿਲੈ ਰਸੁ ਖਾਇ ॥
ਜਾਇ ਪੁਛਹੁ ਸੋਹਾਗਣੀ ਤੁਸਾ ਕਿਉ ਕਰਿ ਮਿਲਿਆ ਪ੍ਰਭੁ ਆਇ ॥
ਓਇ ਵੇਪਰਵਾਹ ਨ ਬੋਲਨੀ ਹਉ ਮਲਿ ਮਲਿ ਧੋਵਾ ਤਿਨ ਪਾਇ ॥੧॥
ਭਾਈ ਰੇ ਮਿਲਿ ਸਜਣ ਹਰਿ ਗੁਣ ਸਾਰਿ ॥
ਸਜਣੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੁਰਖੁ ਹੈ ਦੁਖੁ ਕਢੈ ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਰਮੁਖੀਆ ਸੋਹਾਗਣੀ ਤਿਨ ਦਇਆ ਪਈ ਮਨਿ ਆਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਵਚਨੁ ਰਤੰਨੁ ਹੈ ਜੋ ਮੰਨੇ ਸੁ ਹਰਿ ਰਸੁ ਖਾਇ ॥
ਸੇ ਵਡਭਾਗੀ ਵਡ ਜਾਣੀਅਹਿ ਜਿਨ ਹਰਿ ਰਸੁ ਖਾਧਾ ਗੁਰ ਭਾਇ ॥੨॥
ਇਹੁ ਹਰਿ ਰਸੁ ਵਣਿ ਤਿਣਿ ਸਭਤੁ ਹੈ ਭਾਗਹੀਣ ਨਹੀ ਖਾਇ ॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਪਲੈ ਨਾ ਪਵੈ ਮਨਮੁਖ ਰਹੇ ਬਿਲਲਾਇ ॥
ਓਇ ਸਤਿਗੁਰ ਆਗੈ ਨਾ ਨਿਵਹਿ ਓਨਾ ਅੰਤਰਿ ਕ੍ਰੋਧੁ ਬਲਾਇ ॥੩॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਰਸੁ ਆਪਿ ਹੈ ਆਪੇ ਹਰਿ ਰਸੁ ਹੋਇ ॥
ਆਪਿ ਦਇਆ ਕਰਿ ਦੇਵਸੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਚੋਇ ॥
ਸਭੁ ਤਨੁ ਮਨੁ ਹਰਿਆ ਹੋਇਆ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਵਸਿਆ ਮਨਿ ਸੋਇ ॥੪॥੫॥੬੯॥
सिरीरागु महला ४ ॥
रसु अंम्रितु नामु रसु अति भला कितु बिधि मिलै रसु खाइ ॥
जाइ पुछहु सोहागणी तुसा किउ करि मिलिआ प्रभु आइ ॥
ओइ वेपरवाह न बोलनी हउ मलि मलि धोवा तिन पाइ ॥१॥
भाई रे मिलि सजण हरि गुण सारि ॥
सजणु सतिगुरु पुरखु है दुखु कढै हउमै मारि ॥१॥ रहाउ ॥
गुरमुखीआ सोहागणी तिन दइआ पई मनि आइ ॥
सतिगुर वचनु रतंनु है जो मंने सु हरि रसु खाइ ॥
से वडभागी वड जाणीअहि जिन हरि रसु खाधा गुर भाइ ॥२॥
इहु हरि रसु वणि तिणि सभतु है भागहीण नही खाइ ॥
बिनु सतिगुर पलै ना पवै मनमुख रहे बिललाइ ॥
ओइ सतिगुर आगै ना निवहि ओना अंतरि क्रोधु बलाइ ॥३॥
हरि हरि हरि रसु आपि है आपे हरि रसु होइ ॥
आपि दइआ करि देवसी गुरमुखि अंम्रितु चोइ ॥
सभु तनु मनु हरिआ होइआ नानक हरि वसिआ मनि सोइ ॥४॥५॥६९॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ੪ ॥ परमात्मा का नाम बड़ा श्रेष्ठ रस है~ आत्मिक जीवन देने वाला है। ये रस किस तरह मिल सकता है? कैसे कोई मनुष्य यह रस खा सकता है? (अगर यह भेद समझना है तो हे भाई!) उन जीव सि्त्रयों को जा के पूछो~ जिन्होंने प्रभु पति को प्रसन्न कर लिया है। (उनको पूछो कि तुम्हें) प्रभु कैसे आ के मिला है। (जिन जीव सि्त्रयों ने प्रभु पति को प्रसन्न कर लिया है) वह (दुनियां की शोभा आदि से) बेमुहताज हो जाती हैं (इस वास्ते वह ज्यादा) नहीं बोलतीं। मैं उनके पैर मल मल के धोती हूँ।1। हे भाई! (गुरू) सज्जन को मिल के परमात्मा के गुण (अपने हृदय में) संभाल। सज्जन गुरू अकाल-पुरख का रूप है~ वह (शरण आए मनुष्य के हृदय में से) अहंकार का दुख मार के निकाल देता है।1।रहाउ। जे जीव सि्त्रयां गुरू के सन्मुख रहती हैं~ वही सुहाग भाग वाली हो जाती हैं। (उनसे जीनव युक्ति पूछने से) उनके मन में तरस आ जाता है (और वह बताती हैं कि) सतिगुरू के वचन एक कीमती रतन है~ जो जीव (गुरू के बचनों पर) श्रद्धा बना लेता है वह परमात्मा का रस चख लेता है। जिन मनुष्यों ने गुरू के अनुसार रहके परमात्मा का नाम रस चखा है वह बड़े भाग्यशाली समझे जीते हैं।2। (जैसे जल सारी बनस्पति को हरा भरा कर देने वाला है~ वैसे ही) परमात्मा का यह नाम-रस वन-तृण में हर जगह मौजूद है (और सारी सृष्टि की जीवात्मा का आसरा है) पर दुर्भाग्यपूर्ण जीव स्त्री इस नाम रस को नहीं चखती। गुरू की शरण पड़े बिना ये नाम-रस नहीं प्राप्त होता। अपने मन के पीछे चलने वाले लोग (नाम रस से वंचित रह कर) बिलकते ही रहते हैं। उनके अंदर क्रोध की आफ़त टिकी रहती है~ वे सतिगुरू के आगे सिर नहीं झुकाते।3। (परमात्मा व परमात्मा के नाम रस में कोई फर्क नहीं है) परमात्मा खुद ही (सब जीवों की जीवात्मा का सहारा) रस है। परमात्मा खुद ही मेहर करके यह नाम रस देता है (जैसे शहद के छत्ते में से शहद चूता है~ वैसे ही) गुरू की शरण पड़ने से आत्मिक जीवन देने वाला रस (जीव के अंदर से) टपकता है। हे नानक! जिस मनुष्य के मन में वह परमात्मा आ बसता है (नाम आ बसता है) उसका सारा शरीर~ उसका मन हरा हो जाता है (खिल पड़ता है)।4।5।69।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੪ ॥
ਦਿਨਸੁ ਚੜੈ ਫਿਰਿ ਆਥਵੈ ਰੈਣਿ ਸਬਾਈ ਜਾਇ ॥
ਆਵ ਘਟੈ ਨਰੁ ਨਾ ਬੁਝੈ ਨਿਤਿ ਮੂਸਾ ਲਾਜੁ ਟੁਕਾਇ ॥
ਗੁੜੁ ਮਿਠਾ ਮਾਇਆ ਪਸਰਿਆ ਮਨਮੁਖੁ ਲਗਿ ਮਾਖੀ ਪਚੈ ਪਚਾਇ ॥੧॥
ਭਾਈ ਰੇ ਮੈ ਮੀਤੁ ਸਖਾ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਇ ॥
ਪੁਤੁ ਕਲਤੁ ਮੋਹੁ ਬਿਖੁ ਹੈ ਅੰਤਿ ਬੇਲੀ ਕੋਇ ਨ ਹੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਹਰਿ ਲਿਵ ਉਬਰੇ ਅਲਿਪਤੁ ਰਹੇ ਸਰਣਾਇ ॥
सिरीरागु महला ४ ॥
दिनसु चड़ै फिरि आथवै रैणि सबाई जाइ ॥
आव घटै नरु ना बुझै निति मूसा लाजु टुकाइ ॥
गुड़ु मिठा माइआ पसरिआ मनमुखु लगि माखी पचै पचाइ ॥१॥
भाई रे मै मीतु सखा प्रभु सोइ ॥
पुतु कलतु मोहु बिखु है अंति बेली कोइ न होइ ॥१॥ रहाउ ॥
गुरमति हरि लिव उबरे अलिपतु रहे सरणाइ ॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ੪ ॥ दिन चढ़ता है फिर डूब जाता है~ सारी रात भी गुजर जाती है (इस तरह सहजे सहजे) वह घटती जाती है पर मनुष्य समझता नहीं (गुजरता समय मनुष्य की उम्र को इस तरह काटता जा रहा है~ जैसे) चूहा सदा रॅस्सी को कुतरता जाता है। (जैसे) गुड़ (जीवों को) मीठा (लगता है~ तैसे ही) माया का मीठा मोह प्रभाव डाल रहा है। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य माया की मिठास में फंस के खुआर होता है जैसे मक्खी गुड़ पर चिपक कर मर जाती है।1। हे भाई! मेरे वास्ते तो वह परमात्मा ही मित्र है~ साथी है। पुत्र का~ स्त्री का मोह जहर है। (जो आत्मिक जीवन को खत्म कर देता है~ और पुत्र स्त्री में से) अंत में कोई भी साथी नहीं बनता।1।रहाउ। (जो मनुष्य गुरू की मति ले के परमात्मा में सुरति जोड़ते हैं) वह (इस मौत से) बच जाते हैं~ प्रभु की शरण पड़ के वह निर्लिप रहते हैं।

संदर्भ: यह अंग 41 है, राग Siree Raag का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Raam Daas Ji।

Civil Services के interview के बाद का wait, घर का माहौल।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 37 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 41” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Siree Raag राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 42 →, पीछे का: ← अंग 40

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।