अंग
40
राग Siree Raag
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਹਸ ਸਿਆਣਪ ਕਰਿ ਰਹੇ ਮਨਿ ਕੋਰੈ ਰੰਗੁ ਨ ਹੋਇ ॥
ਕੂੜਿ ਕਪਟਿ ਕਿਨੈ ਨ ਪਾਇਓ ਜੋ ਬੀਜੈ ਖਾਵੈ ਸੋਇ ॥੩॥
ਸਭਨਾ ਤੇਰੀ ਆਸ ਪ੍ਰਭੁ ਸਭ ਜੀਅ ਤੇਰੇ ਤੂੰ ਰਾਸਿ ॥
ਪ੍ਰਭ ਤੁਧਹੁ ਖਾਲੀ ਕੋ ਨਹੀ ਦਰਿ ਗੁਰਮੁਖਾ ਨੋ ਸਾਬਾਸਿ ॥
ਬਿਖੁ ਭਉਜਲ ਡੁਬਦੇ ਕਢਿ ਲੈ ਜਨ ਨਾਨਕ ਕੀ ਅਰਦਾਸਿ ॥੪॥੧॥੬੫॥
ਕੂੜਿ ਕਪਟਿ ਕਿਨੈ ਨ ਪਾਇਓ ਜੋ ਬੀਜੈ ਖਾਵੈ ਸੋਇ ॥੩॥
ਸਭਨਾ ਤੇਰੀ ਆਸ ਪ੍ਰਭੁ ਸਭ ਜੀਅ ਤੇਰੇ ਤੂੰ ਰਾਸਿ ॥
ਪ੍ਰਭ ਤੁਧਹੁ ਖਾਲੀ ਕੋ ਨਹੀ ਦਰਿ ਗੁਰਮੁਖਾ ਨੋ ਸਾਬਾਸਿ ॥
ਬਿਖੁ ਭਉਜਲ ਡੁਬਦੇ ਕਢਿ ਲੈ ਜਨ ਨਾਨਕ ਕੀ ਅਰਦਾਸਿ ॥੪॥੧॥੬੫॥
सहस सिआणप करि रहे मनि कोरै रंगु न होइ ॥
कूड़ि कपटि किनै न पाइओ जो बीजै खावै सोइ ॥३॥
सभना तेरी आस प्रभु सभ जीअ तेरे तूं रासि ॥
प्रभ तुधहु खाली को नही दरि गुरमुखा नो साबासि ॥
बिखु भउजल डुबदे कढि लै जन नानक की अरदासि ॥४॥१॥६५॥
कूड़ि कपटि किनै न पाइओ जो बीजै खावै सोइ ॥३॥
सभना तेरी आस प्रभु सभ जीअ तेरे तूं रासि ॥
प्रभ तुधहु खाली को नही दरि गुरमुखा नो साबासि ॥
बिखु भउजल डुबदे कढि लै जन नानक की अरदासि ॥४॥१॥६५॥
हिन्दी अर्थ: (तप आदि वाली) हजारों होशियारियां (जो लोग) करते हैं (उनका मन प्रभु प्रेम की ओर से कोरा ही रहता है~ तथा) अगर मन (प्रभु प्रेम से) कोरा ही रहे तो नाम रंग नहीं चढ़ता। माया के मोह में फंसे रह के (बाहर से हठ कर्मों की) ठगी से कभी किसी ने परमात्मा को नहीं पाया। (यह पक्का नियम है कि) जो कुछ कोई बीजता है वही कुछ वो खाता है।3। हे प्रभु ! (संसार समुंद्र से बचने के वास्ते) सभ जीवों को तेरी (सहायता की) आस है~ सभ जीव तेरे ही (पैदा किए हुए) हैं~ तू ही (सभ जीवों की आत्मिक) राशि पूँजी है। हे प्रभु ! तेरे दर से कोई खाली नहीं मुड़ता। गुरू शरण में पड़ने वाले लोगों को तेरे दर पे आदर मान मिलता हैं। हे प्रभु ! तेरे दास नानक की तेरे आगे अरजोई है कि तू संसार समुंद्र के (विकारों के) जहर में डूबते हुए जीवों को निकाल ले।4।1।65।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੪ ॥
ਨਾਮੁ ਮਿਲੈ ਮਨੁ ਤ੍ਰਿਪਤੀਐ ਬਿਨੁ ਨਾਮੈ ਧ੍ਰਿਗੁ ਜੀਵਾਸੁ ॥
ਕੋਈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਜਣੁ ਜੇ ਮਿਲੈ ਮੈ ਦਸੇ ਪ੍ਰਭੁ ਗੁਣਤਾਸੁ ॥
ਹਉ ਤਿਸੁ ਵਿਟਹੁ ਚਉ ਖੰਨੀਐ ਮੈ ਨਾਮ ਕਰੇ ਪਰਗਾਸੁ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਪ੍ਰੀਤਮਾ ਹਉ ਜੀਵਾ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਜੀਵਣੁ ਨਾ ਥੀਐ ਮੇਰੇ ਸਤਿਗੁਰ ਨਾਮੁ ਦ੍ਰਿੜਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਾਮੁ ਅਮੋਲਕੁ ਰਤਨੁ ਹੈ ਪੂਰੇ ਸਤਿਗੁਰ ਪਾਸਿ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵੈ ਲਗਿਆ ਕਢਿ ਰਤਨੁ ਦੇਵੈ ਪਰਗਾਸਿ ॥
ਧੰਨੁ ਵਡਭਾਗੀ ਵਡ ਭਾਗੀਆ ਜੋ ਆਇ ਮਿਲੇ ਗੁਰ ਪਾਸਿ ॥੨॥
ਜਿਨਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੁਰਖੁ ਨ ਭੇਟਿਓ ਸੇ ਭਾਗਹੀਣ ਵਸਿ ਕਾਲ ॥
ਓਇ ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਜੋਨਿ ਭਵਾਈਅਹਿ ਵਿਚਿ ਵਿਸਟਾ ਕਰਿ ਵਿਕਰਾਲ ॥
ਓਨਾ ਪਾਸਿ ਦੁਆਸਿ ਨ ਭਿਟੀਐ ਜਿਨ ਅੰਤਰਿ ਕ੍ਰੋਧੁ ਚੰਡਾਲ ॥੩॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੁਰਖੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਸਰੁ ਵਡਭਾਗੀ ਨਾਵਹਿ ਆਇ ॥
ਉਨ ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੀ ਮੈਲੁ ਉਤਰੈ ਨਿਰਮਲ ਨਾਮੁ ਦ੍ਰਿੜਾਇ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਉਤਮ ਪਦੁ ਪਾਇਆ ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥੪॥੨॥੬੬॥
ਨਾਮੁ ਮਿਲੈ ਮਨੁ ਤ੍ਰਿਪਤੀਐ ਬਿਨੁ ਨਾਮੈ ਧ੍ਰਿਗੁ ਜੀਵਾਸੁ ॥
ਕੋਈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਜਣੁ ਜੇ ਮਿਲੈ ਮੈ ਦਸੇ ਪ੍ਰਭੁ ਗੁਣਤਾਸੁ ॥
ਹਉ ਤਿਸੁ ਵਿਟਹੁ ਚਉ ਖੰਨੀਐ ਮੈ ਨਾਮ ਕਰੇ ਪਰਗਾਸੁ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਪ੍ਰੀਤਮਾ ਹਉ ਜੀਵਾ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਜੀਵਣੁ ਨਾ ਥੀਐ ਮੇਰੇ ਸਤਿਗੁਰ ਨਾਮੁ ਦ੍ਰਿੜਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਾਮੁ ਅਮੋਲਕੁ ਰਤਨੁ ਹੈ ਪੂਰੇ ਸਤਿਗੁਰ ਪਾਸਿ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵੈ ਲਗਿਆ ਕਢਿ ਰਤਨੁ ਦੇਵੈ ਪਰਗਾਸਿ ॥
ਧੰਨੁ ਵਡਭਾਗੀ ਵਡ ਭਾਗੀਆ ਜੋ ਆਇ ਮਿਲੇ ਗੁਰ ਪਾਸਿ ॥੨॥
ਜਿਨਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੁਰਖੁ ਨ ਭੇਟਿਓ ਸੇ ਭਾਗਹੀਣ ਵਸਿ ਕਾਲ ॥
ਓਇ ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਜੋਨਿ ਭਵਾਈਅਹਿ ਵਿਚਿ ਵਿਸਟਾ ਕਰਿ ਵਿਕਰਾਲ ॥
ਓਨਾ ਪਾਸਿ ਦੁਆਸਿ ਨ ਭਿਟੀਐ ਜਿਨ ਅੰਤਰਿ ਕ੍ਰੋਧੁ ਚੰਡਾਲ ॥੩॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੁਰਖੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਸਰੁ ਵਡਭਾਗੀ ਨਾਵਹਿ ਆਇ ॥
ਉਨ ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੀ ਮੈਲੁ ਉਤਰੈ ਨਿਰਮਲ ਨਾਮੁ ਦ੍ਰਿੜਾਇ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਉਤਮ ਪਦੁ ਪਾਇਆ ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥੪॥੨॥੬੬॥
सिरीरागु महला ४ ॥
नामु मिलै मनु त्रिपतीऐ बिनु नामै ध्रिगु जीवासु ॥
कोई गुरमुखि सजणु जे मिलै मै दसे प्रभु गुणतासु ॥
हउ तिसु विटहु चउ खंनीऐ मै नाम करे परगासु ॥१॥
मेरे प्रीतमा हउ जीवा नामु धिआइ ॥
बिनु नावै जीवणु ना थीऐ मेरे सतिगुर नामु द्रिड़ाइ ॥१॥ रहाउ ॥
नामु अमोलकु रतनु है पूरे सतिगुर पासि ॥
सतिगुर सेवै लगिआ कढि रतनु देवै परगासि ॥
धंनु वडभागी वड भागीआ जो आइ मिले गुर पासि ॥२॥
जिना सतिगुरु पुरखु न भेटिओ से भागहीण वसि काल ॥
ओइ फिरि फिरि जोनि भवाईअहि विचि विसटा करि विकराल ॥
ओना पासि दुआसि न भिटीऐ जिन अंतरि क्रोधु चंडाल ॥३॥
सतिगुरु पुरखु अंम्रित सरु वडभागी नावहि आइ ॥
उन जनम जनम की मैलु उतरै निरमल नामु द्रिड़ाइ ॥
जन नानक उतम पदु पाइआ सतिगुर की लिव लाइ ॥४॥२॥६६॥
नामु मिलै मनु त्रिपतीऐ बिनु नामै ध्रिगु जीवासु ॥
कोई गुरमुखि सजणु जे मिलै मै दसे प्रभु गुणतासु ॥
हउ तिसु विटहु चउ खंनीऐ मै नाम करे परगासु ॥१॥
मेरे प्रीतमा हउ जीवा नामु धिआइ ॥
बिनु नावै जीवणु ना थीऐ मेरे सतिगुर नामु द्रिड़ाइ ॥१॥ रहाउ ॥
नामु अमोलकु रतनु है पूरे सतिगुर पासि ॥
सतिगुर सेवै लगिआ कढि रतनु देवै परगासि ॥
धंनु वडभागी वड भागीआ जो आइ मिले गुर पासि ॥२॥
जिना सतिगुरु पुरखु न भेटिओ से भागहीण वसि काल ॥
ओइ फिरि फिरि जोनि भवाईअहि विचि विसटा करि विकराल ॥
ओना पासि दुआसि न भिटीऐ जिन अंतरि क्रोधु चंडाल ॥३॥
सतिगुरु पुरखु अंम्रित सरु वडभागी नावहि आइ ॥
उन जनम जनम की मैलु उतरै निरमल नामु द्रिड़ाइ ॥
जन नानक उतम पदु पाइआ सतिगुर की लिव लाइ ॥४॥२॥६६॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ੪ ॥ (जिस मनुष्य को परमात्मा का) नाम मिल जाता है (उस का) मन (माया की तृष्णा की ओर से) तृप्त हो जाता है। नाम विहीन जीना धिक्कारयोग्य है (नाम से खाली रह कर जिंदगी को गुजारने से तिरस्कार ही प्राप्त होता है)। यदि गुरू के सन्मुख रहने वाला कोई भला मनुष्य मुझे मिल जाए~ और मुझे गुणों के खजाने परमात्मा के बारे में बता दे~ मैं उस पर से कुर्बान होने को तैयार हूँ।1। हे मेरे प्रीतम प्रभु! तेरा नाम सिमर के ही मैं आत्मिक जीवन जी सकता हूँ। हे मेरे सतिगुरू ! (मेरे हृदय में परमात्मा का) नाम पक्का कर दे (क्योंकि) प्रभु नाम के बिना आत्मिक जीवन नहीं बन सकता।1।रहाउ। परमात्मा का नाम एक ऐसा रतन है~ जिस जितनी कीमती शै और कोई नहीं। यह नाम पूरे गुरू के पास ही है। अगर गुरू की बताई सेवा में लग जाएं~ तो वह हृदय में ज्ञान का प्रकाश करके (अपने पास से नाम) रतन निकाल के देता है। (इस वास्ते) वह मनुष्य भाग्यशाली हैं~ सराहनीय हैं~ जो आ कर गुरू की शरण में पड़ते हैं।2। (पर~) जिन लोगों को अकाल-पुरख का रूप् सतिगुरू कभी नहीं मिला~ वह दुर्भाग्यशाली हैं वह आत्मिक मौत के बस में रहते हैं। वह विकारों के गंद में पड़े रहने के कारण भयानक आत्मिक जीवन वाले बना के बार बार जन्म व मरन के चक्क्र में डाले जाते हैं। (हे भाई! नाम से वंचित) जिन लोगों के अंदर चण्डाल क्रोध बसता रहता है उनके कभी भी नजदीक नहीं फटकना चाहिए।3। (पर यह विकारों का गंद~ यह चण्डाल क्रोध आदि का प्रभाव तीर्थों से स्नान आदि से दूर नहीं हो सकता) अकाल-पुरख का रूप् सत्गुरू ही अंमृत का सरोवर है। जो लोग इन तीर्थों पे आ के स्नान करते हैं वह बड़े भाग्यशाली हैं। (गुरू की शरण पड़ कर) पवित्र प्रभु नाम हृदय में पक्का करने के कारण उनकी (भाग्यशालियों की) जन्मों जन्मांतरों की (विकारों की) मैल उतर जाती है। हे दास नानक! (कह) सतिगुरू की शिक्षा में सुरति जोड़ के वह मनुष्य सब से श्रेष्ठ आत्मिक जीवन का दर्जा हासिल कर लेते हैं।4।2।66।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੪ ॥
ਗੁਣ ਗਾਵਾ ਗੁਣ ਵਿਥਰਾ ਗੁਣ ਬੋਲੀ ਮੇਰੀ ਮਾਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਜਣੁ ਗੁਣਕਾਰੀਆ ਮਿਲਿ ਸਜਣ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਇ ॥
ਹੀਰੈ ਹੀਰੁ ਮਿਲਿ ਬੇਧਿਆ ਰੰਗਿ ਚਲੂਲੈ ਨਾਇ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਗੋਵਿੰਦਾ ਗੁਣ ਗਾਵਾ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਮਨਿ ਹੋਇ ॥
ਅੰਤਰਿ ਪਿਆਸ ਹਰਿ ਨਾਮ ਕੀ ਗੁਰੁ ਤੁਸਿ ਮਿਲਾਵੈ ਸੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਨੁ ਰੰਗਹੁ ਵਡਭਾਗੀਹੋ ਗੁਰੁ ਤੁਠਾ ਕਰੇ ਪਸਾਉ ॥
ਗੁਰੁ ਨਾਮੁ ਦ੍ਰਿੜਾਏ ਰੰਗ ਸਿਉ ਹਉ ਸਤਿਗੁਰ ਕੈ ਬਲਿ ਜਾਉ ॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਨ ਲਭਈ ਲਖ ਕੋਟੀ ਕਰਮ ਕਮਾਉ ॥੨॥
ਬਿਨੁ ਭਾਗਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਨਾ ਮਿਲੈ ਘਰਿ ਬੈਠਿਆ ਨਿਕਟਿ ਨਿਤ ਪਾਸਿ ॥
ਅੰਤਰਿ ਅਗਿਆਨ ਦੁਖੁ ਭਰਮੁ ਹੈ ਵਿਚਿ ਪੜਦਾ ਦੂਰਿ ਪਈਆਸਿ ॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਭੇਟੇ ਕੰਚਨੁ ਨਾ ਥੀਐ ਮਨਮੁਖੁ ਲੋਹੁ ਬੂਡਾ ਬੇੜੀ ਪਾਸਿ ॥੩॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਬੋਹਿਥੁ ਹਰਿ ਨਾਵ ਹੈ ਕਿਤੁ ਬਿਧਿ ਚੜਿਆ ਜਾਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਕੈ ਭਾਣੈ ਜੋ ਚਲੈ ਵਿਚਿ ਬੋਹਿਥ ਬੈਠਾ ਆਇ ॥
ਧੰਨੁ ਧੰਨੁ ਵਡਭਾਗੀ ਨਾਨਕਾ ਜਿਨਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਲਏ ਮਿਲਾਇ ॥੪॥੩॥੬੭॥
ਗੁਣ ਗਾਵਾ ਗੁਣ ਵਿਥਰਾ ਗੁਣ ਬੋਲੀ ਮੇਰੀ ਮਾਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਜਣੁ ਗੁਣਕਾਰੀਆ ਮਿਲਿ ਸਜਣ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਇ ॥
ਹੀਰੈ ਹੀਰੁ ਮਿਲਿ ਬੇਧਿਆ ਰੰਗਿ ਚਲੂਲੈ ਨਾਇ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਗੋਵਿੰਦਾ ਗੁਣ ਗਾਵਾ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਮਨਿ ਹੋਇ ॥
ਅੰਤਰਿ ਪਿਆਸ ਹਰਿ ਨਾਮ ਕੀ ਗੁਰੁ ਤੁਸਿ ਮਿਲਾਵੈ ਸੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਨੁ ਰੰਗਹੁ ਵਡਭਾਗੀਹੋ ਗੁਰੁ ਤੁਠਾ ਕਰੇ ਪਸਾਉ ॥
ਗੁਰੁ ਨਾਮੁ ਦ੍ਰਿੜਾਏ ਰੰਗ ਸਿਉ ਹਉ ਸਤਿਗੁਰ ਕੈ ਬਲਿ ਜਾਉ ॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਨ ਲਭਈ ਲਖ ਕੋਟੀ ਕਰਮ ਕਮਾਉ ॥੨॥
ਬਿਨੁ ਭਾਗਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਨਾ ਮਿਲੈ ਘਰਿ ਬੈਠਿਆ ਨਿਕਟਿ ਨਿਤ ਪਾਸਿ ॥
ਅੰਤਰਿ ਅਗਿਆਨ ਦੁਖੁ ਭਰਮੁ ਹੈ ਵਿਚਿ ਪੜਦਾ ਦੂਰਿ ਪਈਆਸਿ ॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਭੇਟੇ ਕੰਚਨੁ ਨਾ ਥੀਐ ਮਨਮੁਖੁ ਲੋਹੁ ਬੂਡਾ ਬੇੜੀ ਪਾਸਿ ॥੩॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਬੋਹਿਥੁ ਹਰਿ ਨਾਵ ਹੈ ਕਿਤੁ ਬਿਧਿ ਚੜਿਆ ਜਾਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਕੈ ਭਾਣੈ ਜੋ ਚਲੈ ਵਿਚਿ ਬੋਹਿਥ ਬੈਠਾ ਆਇ ॥
ਧੰਨੁ ਧੰਨੁ ਵਡਭਾਗੀ ਨਾਨਕਾ ਜਿਨਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਲਏ ਮਿਲਾਇ ॥੪॥੩॥੬੭॥
सिरीरागु महला ४ ॥
गुण गावा गुण विथरा गुण बोली मेरी माइ ॥
गुरमुखि सजणु गुणकारीआ मिलि सजण हरि गुण गाइ ॥
हीरै हीरु मिलि बेधिआ रंगि चलूलै नाइ ॥१॥
मेरे गोविंदा गुण गावा त्रिपति मनि होइ ॥
अंतरि पिआस हरि नाम की गुरु तुसि मिलावै सोइ ॥१॥ रहाउ ॥
मनु रंगहु वडभागीहो गुरु तुठा करे पसाउ ॥
गुरु नामु द्रिड़ाए रंग सिउ हउ सतिगुर कै बलि जाउ ॥
बिनु सतिगुर हरि नामु न लभई लख कोटी करम कमाउ ॥२॥
बिनु भागा सतिगुरु ना मिलै घरि बैठिआ निकटि नित पासि ॥
अंतरि अगिआन दुखु भरमु है विचि पड़दा दूरि पईआसि ॥
बिनु सतिगुर भेटे कंचनु ना थीऐ मनमुखु लोहु बूडा बेड़ी पासि ॥३॥
सतिगुरु बोहिथु हरि नाव है कितु बिधि चड़िआ जाइ ॥
सतिगुर कै भाणै जो चलै विचि बोहिथ बैठा आइ ॥
धंनु धंनु वडभागी नानका जिना सतिगुरु लए मिलाइ ॥४॥३॥६७॥
गुण गावा गुण विथरा गुण बोली मेरी माइ ॥
गुरमुखि सजणु गुणकारीआ मिलि सजण हरि गुण गाइ ॥
हीरै हीरु मिलि बेधिआ रंगि चलूलै नाइ ॥१॥
मेरे गोविंदा गुण गावा त्रिपति मनि होइ ॥
अंतरि पिआस हरि नाम की गुरु तुसि मिलावै सोइ ॥१॥ रहाउ ॥
मनु रंगहु वडभागीहो गुरु तुठा करे पसाउ ॥
गुरु नामु द्रिड़ाए रंग सिउ हउ सतिगुर कै बलि जाउ ॥
बिनु सतिगुर हरि नामु न लभई लख कोटी करम कमाउ ॥२॥
बिनु भागा सतिगुरु ना मिलै घरि बैठिआ निकटि नित पासि ॥
अंतरि अगिआन दुखु भरमु है विचि पड़दा दूरि पईआसि ॥
बिनु सतिगुर भेटे कंचनु ना थीऐ मनमुखु लोहु बूडा बेड़ी पासि ॥३॥
सतिगुरु बोहिथु हरि नाव है कितु बिधि चड़िआ जाइ ॥
सतिगुर कै भाणै जो चलै विचि बोहिथ बैठा आइ ॥
धंनु धंनु वडभागी नानका जिना सतिगुरु लए मिलाइ ॥४॥३॥६७॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ੪ ॥ हे मेरी माँ ! (मेरा मन तरसता है कि) मैं (प्रभु के) गुण गाता रहूँ। गुणों का विस्तार करता रहूँ और प्रभु के गुण उचारता रहूँ। गुरू के सन्मुख रहने वाला कोई संत जन ही (प्रभु के गुण गाने की यह) सिफत पैदा कर सकता है। किसी गुरमुख को ही मिल के प्रभु के गुण कोई गा सकता है। (जो मनुष्य प्रभु के गुण गाता है~ उसका) मन-हीरा~ गुरू हीरे को मिल के (उस में) मिल जाता है~ प्रभु के नाम में (लीन हो के) वह प्रभु के गाढ़े प्यार रंग में (रंगा) जाता है।1। हे मेरे गोबिंद ! (कृपा करो कि) मैं तेरे गुण गाता रहूँ। (तेरे गुण गाते ही) मन में (माया की) तृष्णा से खलासी होती है। हे गोबिंद ! मेरे अंदर तेरे नाम की प्यास है (मुझे गुरू मिला) गुरू प्रसन्न हो के उस नाम का मिलाप कराता है।1।रहाउ। हे बड़े भाग्य वालो ! (गुरू की शरण पड़ कर अपना) मन (प्रभु के नाम रंग में) रंग लो। गुरू प्रसन्न हो के (नाम की यह) बख्शिश करता है। गुरू प्यार से परमात्मा का नाम (शरण आए सिख के हृदय में) पक्का कर देता है। (इस वजह से) मैं गुरू से सदके जाता हूँ। अगर मैं लाखों करोड़ों (और और धार्मिक) कर्म करूँ तो भी सतगुरू की शरण के बिना परमात्मा का नाम प्राप्त नहीं होता।2। अच्छी किस्मत के बगैर गुरू नहीं मिलता (और गुरू के बिना परमात्मा का मिलाप नहीं होता~ चाहे) हमारे हृदय में बैठा हर वक्त हमारे नजदीक है~ हमारे पास है। जिस जीव के अंदर अज्ञानता (के अंधेरे) का दुख टिका रहे~ जिसको माया भटकाती रहे~ उसके अंदर परमात्मा से माया के मोह का व भटकने का पर्दा बना रहता है। उसकी जीवात्मा अंदर बसते प्रभु से दूर पड़ी रहती है। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (मानो) लोहा है जो गुरू पारस को मिले बगैर सोना नहीं बन सकता। गुरू-बेड़ी उस मनमुख लोहे के पास ही है~ पर वह (विकारों की नदी में) डूबता है। सत्गुरू~ परमात्मा के नाम का जहाज है (पर उस जहाज में चढ़ने का भी तरीका होना चाहिए~ फिर) किस तरह (उस जहाज में) चढ़ा जाए? जो मनुष्य सतिगुरू के हुकम में चलता है वह उस जहाज में सवार हो गया समझो। हे नानक! वे मनुष्य बड़े भाग्यवान हैं~ धन्य हैं~ धन्य हैं~ जिन को सतिगुरू (प्रभु चरणों में) मिला लेता है।4।3।67।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 40 है, राग Siree Raag का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Raam Daas Ji।
IIT-JEE result का दिन, परिवार phones के पास बैठा।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 35 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 40” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Siree Raag राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 41 →, पीछे का: ← अंग 39।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।