अंग
39
राग Siree Raag
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਤਿਨ ਕੀ ਸੇਵਾ ਧਰਮ ਰਾਇ ਕਰੈ ਧੰਨੁ ਸਵਾਰਣਹਾਰੁ ॥੨॥
ਮਨ ਕੇ ਬਿਕਾਰ ਮਨਹਿ ਤਜੈ ਮਨਿ ਚੂਕੈ ਮੋਹੁ ਅਭਿਮਾਨੁ ॥
ਆਤਮ ਰਾਮੁ ਪਛਾਣਿਆ ਸਹਜੇ ਨਾਮਿ ਸਮਾਨੁ ॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਮੁਕਤਿ ਨ ਪਾਈਐ ਮਨਮੁਖਿ ਫਿਰੈ ਦਿਵਾਨੁ ॥
ਸਬਦੁ ਨ ਚੀਨੈ ਕਥਨੀ ਬਦਨੀ ਕਰੇ ਬਿਖਿਆ ਮਾਹਿ ਸਮਾਨੁ ॥੩॥
ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਆਪੇ ਆਪਿ ਹੈ ਦੂਜਾ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥
ਜਿਉ ਬੋਲਾਏ ਤਿਉ ਬੋਲੀਐ ਜਾ ਆਪਿ ਬੁਲਾਏ ਸੋਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਬਾਣੀ ਬ੍ਰਹਮੁ ਹੈ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਵਾ ਹੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਿ ਤੂ ਜਿਤੁ ਸੇਵਿਐ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥੪॥੩੦॥੬੩॥
ਮਨ ਕੇ ਬਿਕਾਰ ਮਨਹਿ ਤਜੈ ਮਨਿ ਚੂਕੈ ਮੋਹੁ ਅਭਿਮਾਨੁ ॥
ਆਤਮ ਰਾਮੁ ਪਛਾਣਿਆ ਸਹਜੇ ਨਾਮਿ ਸਮਾਨੁ ॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਮੁਕਤਿ ਨ ਪਾਈਐ ਮਨਮੁਖਿ ਫਿਰੈ ਦਿਵਾਨੁ ॥
ਸਬਦੁ ਨ ਚੀਨੈ ਕਥਨੀ ਬਦਨੀ ਕਰੇ ਬਿਖਿਆ ਮਾਹਿ ਸਮਾਨੁ ॥੩॥
ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਆਪੇ ਆਪਿ ਹੈ ਦੂਜਾ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥
ਜਿਉ ਬੋਲਾਏ ਤਿਉ ਬੋਲੀਐ ਜਾ ਆਪਿ ਬੁਲਾਏ ਸੋਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਬਾਣੀ ਬ੍ਰਹਮੁ ਹੈ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਵਾ ਹੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਿ ਤੂ ਜਿਤੁ ਸੇਵਿਐ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥੪॥੩੦॥੬੩॥
तिन की सेवा धरम राइ करै धंनु सवारणहारु ॥२॥
मन के बिकार मनहि तजै मनि चूकै मोहु अभिमानु ॥
आतम रामु पछाणिआ सहजे नामि समानु ॥
बिनु सतिगुर मुकति न पाईऐ मनमुखि फिरै दिवानु ॥
सबदु न चीनै कथनी बदनी करे बिखिआ माहि समानु ॥३॥
सभु किछु आपे आपि है दूजा अवरु न कोइ ॥
जिउ बोलाए तिउ बोलीऐ जा आपि बुलाए सोइ ॥
गुरमुखि बाणी ब्रहमु है सबदि मिलावा होइ ॥
नानक नामु समालि तू जितु सेविऐ सुखु होइ ॥४॥३०॥६३॥
मन के बिकार मनहि तजै मनि चूकै मोहु अभिमानु ॥
आतम रामु पछाणिआ सहजे नामि समानु ॥
बिनु सतिगुर मुकति न पाईऐ मनमुखि फिरै दिवानु ॥
सबदु न चीनै कथनी बदनी करे बिखिआ माहि समानु ॥३॥
सभु किछु आपे आपि है दूजा अवरु न कोइ ॥
जिउ बोलाए तिउ बोलीऐ जा आपि बुलाए सोइ ॥
गुरमुखि बाणी ब्रहमु है सबदि मिलावा होइ ॥
नानक नामु समालि तू जितु सेविऐ सुखु होइ ॥४॥३०॥६३॥
हिन्दी अर्थ: धर्मराज (भी) उन लोगों की सेवा करता है। धन्य है वह परमात्मा जो (अपने सेवकों का जीवन) इतना सुहाना बना देता है (कि खुद धर्मराज भी उनका आदर करते हैं)।2। जो मनुष्य अपने मन में से मन के विकार छोड़ देता है~ जिसके मन में से माया का अहंकार दूर हो जाता है~ वह सर्व व्यापक परमात्मा के साथ जान पहिचान बना लेता है। वह आत्मिक अडोलता में टिक के परमात्मा के नाम में लीनता हासिल कर लेता है। (पर~) गुरू की शरण के बिना (विकारों से) छुटकारा नहीं मिल सकता। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (विकारों के पीछे) पागल हुआ फिरता है~ वह गुरू के शबद (की कद्र) को नहीं समझता। वह (जबानी-जबानी धार्मिक) बातें चाहे जितनी करता फिरे~ पर माया के मोह में ही गरक रहता है।3। (जीवों के भी क्या बस?) परमात्मा खुद ही सभ कुछ कराने वाला है~ और कोई जीव दम नहीं मार सकता। (अपनी सिफत सलाह वह खुद ही करवाता है) जैसे परमात्मा बोलने की प्रेरणा करे वैसे ही जीव बोल सकता है। (जीव तब ही सिफत सलाह कर सकता है) जबवह परमात्मा खुद प्रेरता है। गुरू की शरण पड़ कर सिफत सलाह की बाणी में जुड़ने से प्रभु मिलता है~ गुरू के शबद के द्वारा (ही प्रभु से) मिलाप होता है। हे नानक! (गुरू की शरण पड़ कर) परमात्मा के नाम को हृदय में संभाल~ इस नाम के सिमरन से ही आत्मिक आनन्द प्राप्त होता है।4।30।63।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਜਗਿ ਹਉਮੈ ਮੈਲੁ ਦੁਖੁ ਪਾਇਆ ਮਲੁ ਲਾਗੀ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ॥
ਮਲੁ ਹਉਮੈ ਧੋਤੀ ਕਿਵੈ ਨ ਉਤਰੈ ਜੇ ਸਉ ਤੀਰਥ ਨਾਇ ॥
ਬਹੁ ਬਿਧਿ ਕਰਮ ਕਮਾਵਦੇ ਦੂਣੀ ਮਲੁ ਲਾਗੀ ਆਇ ॥
ਪੜਿਐ ਮੈਲੁ ਨ ਉਤਰੈ ਪੂਛਹੁ ਗਿਆਨੀਆ ਜਾਇ ॥੧॥
ਮਨ ਮੇਰੇ ਗੁਰ ਸਰਣਿ ਆਵੈ ਤਾ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਇ ॥
ਮਨਮੁਖ ਹਰਿ ਹਰਿ ਕਰਿ ਥਕੇ ਮੈਲੁ ਨ ਸਕੀ ਧੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਨਿ ਮੈਲੈ ਭਗਤਿ ਨ ਹੋਵਈ ਨਾਮੁ ਨ ਪਾਇਆ ਜਾਇ ॥
ਮਨਮੁਖ ਮੈਲੇ ਮੈਲੇ ਮੁਏ ਜਾਸਨਿ ਪਤਿ ਗਵਾਇ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਮਨਿ ਵਸੈ ਮਲੁ ਹਉਮੈ ਜਾਇ ਸਮਾਇ ॥
ਜਿਉ ਅੰਧੇਰੈ ਦੀਪਕੁ ਬਾਲੀਐ ਤਿਉ ਗੁਰ ਗਿਆਨਿ ਅਗਿਆਨੁ ਤਜਾਇ ॥੨॥
ਹਮ ਕੀਆ ਹਮ ਕਰਹਗੇ ਹਮ ਮੂਰਖ ਗਾਵਾਰ ॥
ਕਰਣੈ ਵਾਲਾ ਵਿਸਰਿਆ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਪਿਆਰੁ ॥
ਮਾਇਆ ਜੇਵਡੁ ਦੁਖੁ ਨਹੀ ਸਭਿ ਭਵਿ ਥਕੇ ਸੰਸਾਰੁ ॥
ਗੁਰਮਤੀ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਉਰ ਧਾਰਿ ॥੩॥
ਜਿਸ ਨੋ ਮੇਲੇ ਸੋ ਮਿਲੈ ਹਉ ਤਿਸੁ ਬਲਿਹਾਰੈ ਜਾਉ ॥
ਏ ਮਨ ਭਗਤੀ ਰਤਿਆ ਸਚੁ ਬਾਣੀ ਨਿਜ ਥਾਉ ॥
ਮਨਿ ਰਤੇ ਜਿਹਵਾ ਰਤੀ ਹਰਿ ਗੁਣ ਸਚੇ ਗਾਉ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਨ ਵੀਸਰੈ ਸਚੇ ਮਾਹਿ ਸਮਾਉ ॥੪॥੩੧॥੬੪॥
ਜਗਿ ਹਉਮੈ ਮੈਲੁ ਦੁਖੁ ਪਾਇਆ ਮਲੁ ਲਾਗੀ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ॥
ਮਲੁ ਹਉਮੈ ਧੋਤੀ ਕਿਵੈ ਨ ਉਤਰੈ ਜੇ ਸਉ ਤੀਰਥ ਨਾਇ ॥
ਬਹੁ ਬਿਧਿ ਕਰਮ ਕਮਾਵਦੇ ਦੂਣੀ ਮਲੁ ਲਾਗੀ ਆਇ ॥
ਪੜਿਐ ਮੈਲੁ ਨ ਉਤਰੈ ਪੂਛਹੁ ਗਿਆਨੀਆ ਜਾਇ ॥੧॥
ਮਨ ਮੇਰੇ ਗੁਰ ਸਰਣਿ ਆਵੈ ਤਾ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਇ ॥
ਮਨਮੁਖ ਹਰਿ ਹਰਿ ਕਰਿ ਥਕੇ ਮੈਲੁ ਨ ਸਕੀ ਧੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਨਿ ਮੈਲੈ ਭਗਤਿ ਨ ਹੋਵਈ ਨਾਮੁ ਨ ਪਾਇਆ ਜਾਇ ॥
ਮਨਮੁਖ ਮੈਲੇ ਮੈਲੇ ਮੁਏ ਜਾਸਨਿ ਪਤਿ ਗਵਾਇ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਮਨਿ ਵਸੈ ਮਲੁ ਹਉਮੈ ਜਾਇ ਸਮਾਇ ॥
ਜਿਉ ਅੰਧੇਰੈ ਦੀਪਕੁ ਬਾਲੀਐ ਤਿਉ ਗੁਰ ਗਿਆਨਿ ਅਗਿਆਨੁ ਤਜਾਇ ॥੨॥
ਹਮ ਕੀਆ ਹਮ ਕਰਹਗੇ ਹਮ ਮੂਰਖ ਗਾਵਾਰ ॥
ਕਰਣੈ ਵਾਲਾ ਵਿਸਰਿਆ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਪਿਆਰੁ ॥
ਮਾਇਆ ਜੇਵਡੁ ਦੁਖੁ ਨਹੀ ਸਭਿ ਭਵਿ ਥਕੇ ਸੰਸਾਰੁ ॥
ਗੁਰਮਤੀ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਉਰ ਧਾਰਿ ॥੩॥
ਜਿਸ ਨੋ ਮੇਲੇ ਸੋ ਮਿਲੈ ਹਉ ਤਿਸੁ ਬਲਿਹਾਰੈ ਜਾਉ ॥
ਏ ਮਨ ਭਗਤੀ ਰਤਿਆ ਸਚੁ ਬਾਣੀ ਨਿਜ ਥਾਉ ॥
ਮਨਿ ਰਤੇ ਜਿਹਵਾ ਰਤੀ ਹਰਿ ਗੁਣ ਸਚੇ ਗਾਉ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਨ ਵੀਸਰੈ ਸਚੇ ਮਾਹਿ ਸਮਾਉ ॥੪॥੩੧॥੬੪॥
सिरीरागु महला ३ ॥
जगि हउमै मैलु दुखु पाइआ मलु लागी दूजै भाइ ॥
मलु हउमै धोती किवै न उतरै जे सउ तीरथ नाइ ॥
बहु बिधि करम कमावदे दूणी मलु लागी आइ ॥
पड़िऐ मैलु न उतरै पूछहु गिआनीआ जाइ ॥१॥
मन मेरे गुर सरणि आवै ता निरमलु होइ ॥
मनमुख हरि हरि करि थके मैलु न सकी धोइ ॥१॥ रहाउ ॥
मनि मैलै भगति न होवई नामु न पाइआ जाइ ॥
मनमुख मैले मैले मुए जासनि पति गवाइ ॥
गुर परसादी मनि वसै मलु हउमै जाइ समाइ ॥
जिउ अंधेरै दीपकु बालीऐ तिउ गुर गिआनि अगिआनु तजाइ ॥२॥
हम कीआ हम करहगे हम मूरख गावार ॥
करणै वाला विसरिआ दूजै भाइ पिआरु ॥
माइआ जेवडु दुखु नही सभि भवि थके संसारु ॥
गुरमती सुखु पाईऐ सचु नामु उर धारि ॥३॥
जिस नो मेले सो मिलै हउ तिसु बलिहारै जाउ ॥
ए मन भगती रतिआ सचु बाणी निज थाउ ॥
मनि रते जिहवा रती हरि गुण सचे गाउ ॥
नानक नामु न वीसरै सचे माहि समाउ ॥४॥३१॥६४॥
जगि हउमै मैलु दुखु पाइआ मलु लागी दूजै भाइ ॥
मलु हउमै धोती किवै न उतरै जे सउ तीरथ नाइ ॥
बहु बिधि करम कमावदे दूणी मलु लागी आइ ॥
पड़िऐ मैलु न उतरै पूछहु गिआनीआ जाइ ॥१॥
मन मेरे गुर सरणि आवै ता निरमलु होइ ॥
मनमुख हरि हरि करि थके मैलु न सकी धोइ ॥१॥ रहाउ ॥
मनि मैलै भगति न होवई नामु न पाइआ जाइ ॥
मनमुख मैले मैले मुए जासनि पति गवाइ ॥
गुर परसादी मनि वसै मलु हउमै जाइ समाइ ॥
जिउ अंधेरै दीपकु बालीऐ तिउ गुर गिआनि अगिआनु तजाइ ॥२॥
हम कीआ हम करहगे हम मूरख गावार ॥
करणै वाला विसरिआ दूजै भाइ पिआरु ॥
माइआ जेवडु दुखु नही सभि भवि थके संसारु ॥
गुरमती सुखु पाईऐ सचु नामु उर धारि ॥३॥
जिस नो मेले सो मिलै हउ तिसु बलिहारै जाउ ॥
ए मन भगती रतिआ सचु बाणी निज थाउ ॥
मनि रते जिहवा रती हरि गुण सचे गाउ ॥
नानक नामु न वीसरै सचे माहि समाउ ॥४॥३१॥६४॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ३ ॥ जगत में अहम् की मैल (के कारण सदा) दुख (ही) सहना पड़ा है (क्योंकि) माया में प्यार के कारन जगत को (विकारों की) मैल चिपकी रहती है। अगर मनुष्य सौ तीर्थों पर भी स्नान करे तो भी (ऐसे) किसी तरीके से यह अहंकार की मैल धोने से (मन से) दूर नहीं होती। लोग कई किस्मों के (नियत) धार्मिक कर्म करते हैं। (इस तरह बल्कि पहले से) दुगनी (अहं की) मैल आ लगती है। (विद्या आदि) पढ़ने से भी यह मैल दूर नहीं होती~ बेशक~ पढ़े-लिखे लोगों को जा के पूछ लो (अर्थात~ पढ़े हुए लोगों को विद्या का गुमान ही बना रहता है)।1। हे मेरे मन! (जब मनुष्य) गुरू की शरण में आता है तब (ही) पवित्र होता है। अपने मन के पीछे चलने वाले लोग राम राम कह कह के थक जाते हैं (फिर भी अहम् की) मैल (उनसे) धोई नहीं जा सकती।1।रहाउ। अहम् की मैल से भरे हुए मन से परमात्मा की भक्ति नहीं हो सकती~ (इस तरह) परमात्मा का नाम हासिल नहीं होता (हृदय में टिक नहीं सकता)। अपने मन के पीछे चलने वाले लोग सदा अहंकार के कारण मलीन मन रहते हैं~ और आत्मिक मौत मरे रहते हैं~ (वह दुनिया से) इज्जत गवा के ही जाएंगे। गुरू की कृपा से जिस मनुष्य के मन में परमात्मा का नाम बस जाता है~ उस का अहंकार दूर हो जाता है~ वह प्रभु चरणों में लीन रहता है। जैसे अगर अंधेरे में दिया जला दें (तो अंधेरा दूर हो जाता है) ऐसे ही गुरू की बख्शी हुई समझ की बरकति से (अहम्-रूप) बेसमझी (का अंधकार) दूर हो जाता है।2। (यह काम) ‘हमने’ किया है~ ‘हम’ ही कर सकते हैं। इस तरह “मैं मैं’ ‘हम हम’ कहने वाले लोग मूर्ख उजड्ड होते हैं उन्हें पैदा करने वाला परमात्मा भूला रहता है। वे सदा माया से ही प्यार डाल के रखते हैं। (दुनिया में) माया के मोह जितना (और कोई) दुख नहीं। माया के मोह में फंस के सारे जीव (माया) की खातर भटक भटक के खपते रहते हैं। गुरू की मति पर चलने से सदा स्थिर प्रभु का नाम हृदय में टिका के ही आत्मिक आनन्द मिलता है।3। (पर~ जीवों के भी क्या बस?) जिस भाग्यशाली मनुष्य को प्रभु (अपने चरणों में) जोड़ता है~ वही प्रभु को मिलता है। मैं ऐसे शख्स से कुर्बान जाता हूं। हे मन! (परमात्मा की कृपा) जो मनुष्य प्रभु की भक्ति (के रंग) में रंगे जाते हैं~ प्रभु का सदा स्थिर नाम ही जिन की बाणी बन जाती है। उनको ‘अपना घर’ प्राप्त हो जाता है (अर्थात~ वह सदा उस आत्मिक ठिकाने में टिके रहते हैं~ जहां माया का मोह उन्हें धक्का नहीं दे सकता)। मैं श्रद्धा से प्रभु के चरण पकड़ती हूँ (और गुरू के आगे विनती करती हूँ कि) मुझे परमेश्वर-पति से मिलन करवा दे उनको~ हे नानक! परमात्मा का नाम कभी नहीं भूलता~ वह सदा स्थिर प्रभु में लीन रहते हैं।4।33।31।64।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੪ ਘਰੁ ੧ ॥
ਮੈ ਮਨਿ ਤਨਿ ਬਿਰਹੁ ਅਤਿ ਅਗਲਾ ਕਿਉ ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਮਿਲੈ ਘਰਿ ਆਇ ॥
ਜਾ ਦੇਖਾ ਪ੍ਰਭੁ ਆਪਣਾ ਪ੍ਰਭਿ ਦੇਖਿਐ ਦੁਖੁ ਜਾਇ ॥
ਜਾਇ ਪੁਛਾ ਤਿਨ ਸਜਣਾ ਪ੍ਰਭੁ ਕਿਤੁ ਬਿਧਿ ਮਿਲੈ ਮਿਲਾਇ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਸਤਿਗੁਰਾ ਮੈ ਤੁਝ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥
ਹਮ ਮੂਰਖ ਮੁਗਧ ਸਰਣਾਗਤੀ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਮੇਲੇ ਹਰਿ ਸੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਦਾਤਾ ਹਰਿ ਨਾਮ ਕਾ ਪ੍ਰਭੁ ਆਪਿ ਮਿਲਾਵੈ ਸੋਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਬੁਝਿਆ ਗੁਰ ਜੇਵਡੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥
ਹਉ ਗੁਰ ਸਰਣਾਈ ਢਹਿ ਪਵਾ ਕਰਿ ਦਇਆ ਮੇਲੇ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਇ ॥੨॥
ਮਨਹਠਿ ਕਿਨੈ ਨ ਪਾਇਆ ਕਰਿ ਉਪਾਵ ਥਕੇ ਸਭੁ ਕੋਇ ॥
ਮੈ ਮਨਿ ਤਨਿ ਬਿਰਹੁ ਅਤਿ ਅਗਲਾ ਕਿਉ ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਮਿਲੈ ਘਰਿ ਆਇ ॥
ਜਾ ਦੇਖਾ ਪ੍ਰਭੁ ਆਪਣਾ ਪ੍ਰਭਿ ਦੇਖਿਐ ਦੁਖੁ ਜਾਇ ॥
ਜਾਇ ਪੁਛਾ ਤਿਨ ਸਜਣਾ ਪ੍ਰਭੁ ਕਿਤੁ ਬਿਧਿ ਮਿਲੈ ਮਿਲਾਇ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਸਤਿਗੁਰਾ ਮੈ ਤੁਝ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥
ਹਮ ਮੂਰਖ ਮੁਗਧ ਸਰਣਾਗਤੀ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਮੇਲੇ ਹਰਿ ਸੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਦਾਤਾ ਹਰਿ ਨਾਮ ਕਾ ਪ੍ਰਭੁ ਆਪਿ ਮਿਲਾਵੈ ਸੋਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਬੁਝਿਆ ਗੁਰ ਜੇਵਡੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥
ਹਉ ਗੁਰ ਸਰਣਾਈ ਢਹਿ ਪਵਾ ਕਰਿ ਦਇਆ ਮੇਲੇ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਇ ॥੨॥
ਮਨਹਠਿ ਕਿਨੈ ਨ ਪਾਇਆ ਕਰਿ ਉਪਾਵ ਥਕੇ ਸਭੁ ਕੋਇ ॥
सिरीरागु महला ४ घरु १ ॥
मै मनि तनि बिरहु अति अगला किउ प्रीतमु मिलै घरि आइ ॥
जा देखा प्रभु आपणा प्रभि देखिऐ दुखु जाइ ॥
जाइ पुछा तिन सजणा प्रभु कितु बिधि मिलै मिलाइ ॥१॥
मेरे सतिगुरा मै तुझ बिनु अवरु न कोइ ॥
हम मूरख मुगध सरणागती करि किरपा मेले हरि सोइ ॥१॥ रहाउ ॥
सतिगुरु दाता हरि नाम का प्रभु आपि मिलावै सोइ ॥
सतिगुरि हरि प्रभु बुझिआ गुर जेवडु अवरु न कोइ ॥
हउ गुर सरणाई ढहि पवा करि दइआ मेले प्रभु सोइ ॥२॥
मनहठि किनै न पाइआ करि उपाव थके सभु कोइ ॥
मै मनि तनि बिरहु अति अगला किउ प्रीतमु मिलै घरि आइ ॥
जा देखा प्रभु आपणा प्रभि देखिऐ दुखु जाइ ॥
जाइ पुछा तिन सजणा प्रभु कितु बिधि मिलै मिलाइ ॥१॥
मेरे सतिगुरा मै तुझ बिनु अवरु न कोइ ॥
हम मूरख मुगध सरणागती करि किरपा मेले हरि सोइ ॥१॥ रहाउ ॥
सतिगुरु दाता हरि नाम का प्रभु आपि मिलावै सोइ ॥
सतिगुरि हरि प्रभु बुझिआ गुर जेवडु अवरु न कोइ ॥
हउ गुर सरणाई ढहि पवा करि दइआ मेले प्रभु सोइ ॥२॥
मनहठि किनै न पाइआ करि उपाव थके सभु कोइ ॥
हिन्दी अर्थ: श्रीरागु महला ੪ घरु १॥ मेरे मन में~ शरीर में (प्रीतम प्रभु के) बिछोड़े का भारी दर्द है। (मेरा मन तड़प रहा है कि) कैसे प्रीतम प्रभु मेरे हृदय घर में मुझे आ मिले। जब मैं प्यारे प्रभु के दर्शन करता हूँ प्रभु के दर्शन करने से मेरा (विछोड़े का) दुख दूर हो जाता है। (जिन सत्संगी सज्जनों ने प्रीतम प्रभु का दर्शन किया है) मैं उन सज्जनों को जा के पूछता हूँ कि प्रभु किस तरीके से मिलाए मिलता है।1। हे मेरे सतिगुरू! तेरे बगैर मेरा और कोई (सहारा) नहीं। हम जीव मूर्ख हैं~ अन्जान है। (पर) तेरी शरण आए हैं (जो भाग्यशाली गुरू की शरण में आता है उस को) वह परमात्मा खुद मेहर करके (अपने चरणों में) मिला लेता है।1।रहाउ। गुरू हरि नाम की दात देने वाला है (जिस को गुरू से यह दात मिलती है उस को) वह प्रभु अपने आप साथ मिला लेता है। गुरू ने हरि प्रभु के साथ गहरी सांझ डाली हुई है (इस वास्ते) गुरू जितनी (ऊँची आत्मिक अवस्था वाला) और कोई नहीं। (मेरी यही तमन्ना है कि) मैं गुरू की शरण~ अहं भाव मिटा के आ पड़ूं। (गुरू की शरण पड़ने से ही) वह प्रभु मेहर करके अपने साथ मिला लेता है।2। मन के हठ से (किए तप आदि के साधनों से) कभी किसी ने परमात्मा को नहीं ढूढा। (ऐसे) उपाय करके सभ थक ही जाते हैं।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 39 है, राग Siree Raag का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
CBSE board-exam का दिन सुबह, बच्चा pencil-box check कर रहा, माँ चुप।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 38 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 39” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Siree Raag राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 40 →, पीछे का: ← अंग 38।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।