अंग 38

अंग
38
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਮੁੰਧੇ ਕੂੜਿ ਮੁਠੀ ਕੂੜਿਆਰਿ ॥
ਪਿਰੁ ਪ੍ਰਭੁ ਸਾਚਾ ਸੋਹਣਾ ਪਾਈਐ ਗੁਰ ਬੀਚਾਰਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਕੰਤੁ ਨ ਪਛਾਣਈ ਤਿਨ ਕਿਉ ਰੈਣਿ ਵਿਹਾਇ ॥
ਗਰਬਿ ਅਟੀਆ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਜਲਹਿ ਦੁਖੁ ਪਾਵਹਿ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ॥
ਸਬਦਿ ਰਤੀਆ ਸੋਹਾਗਣੀ ਤਿਨ ਵਿਚਹੁ ਹਉਮੈ ਜਾਇ ॥
ਸਦਾ ਪਿਰੁ ਰਾਵਹਿ ਆਪਣਾ ਤਿਨਾ ਸੁਖੇ ਸੁਖਿ ਵਿਹਾਇ ॥੨॥
ਗਿਆਨ ਵਿਹੂਣੀ ਪਿਰ ਮੁਤੀਆ ਪਿਰਮੁ ਨ ਪਾਇਆ ਜਾਇ ॥
ਅਗਿਆਨ ਮਤੀ ਅੰਧੇਰੁ ਹੈ ਬਿਨੁ ਪਿਰ ਦੇਖੇ ਭੁਖ ਨ ਜਾਇ ॥
ਆਵਹੁ ਮਿਲਹੁ ਸਹੇਲੀਹੋ ਮੈ ਪਿਰੁ ਦੇਹੁ ਮਿਲਾਇ ॥
ਪੂਰੈ ਭਾਗਿ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਪਿਰੁ ਪਾਇਆ ਸਚਿ ਸਮਾਇ ॥੩॥
ਸੇ ਸਹੀਆ ਸੋਹਾਗਣੀ ਜਿਨ ਕਉ ਨਦਰਿ ਕਰੇਇ ॥
ਖਸਮੁ ਪਛਾਣਹਿ ਆਪਣਾ ਤਨੁ ਮਨੁ ਆਗੈ ਦੇਇ ॥
ਘਰਿ ਵਰੁ ਪਾਇਆ ਆਪਣਾ ਹਉਮੈ ਦੂਰਿ ਕਰੇਇ ॥
ਨਾਨਕ ਸੋਭਾਵੰਤੀਆ ਸੋਹਾਗਣੀ ਅਨਦਿਨੁ ਭਗਤਿ ਕਰੇਇ ॥੪॥੨੮॥੬੧॥
मुंधे कूड़ि मुठी कूड़िआरि ॥
पिरु प्रभु साचा सोहणा पाईऐ गुर बीचारि ॥१॥ रहाउ ॥
मनमुखि कंतु न पछाणई तिन किउ रैणि विहाइ ॥
गरबि अटीआ त्रिसना जलहि दुखु पावहि दूजै भाइ ॥
सबदि रतीआ सोहागणी तिन विचहु हउमै जाइ ॥
सदा पिरु रावहि आपणा तिना सुखे सुखि विहाइ ॥२॥
गिआन विहूणी पिर मुतीआ पिरमु न पाइआ जाइ ॥
अगिआन मती अंधेरु है बिनु पिर देखे भुख न जाइ ॥
आवहु मिलहु सहेलीहो मै पिरु देहु मिलाइ ॥
पूरै भागि सतिगुरु मिलै पिरु पाइआ सचि समाइ ॥३॥
से सहीआ सोहागणी जिन कउ नदरि करेइ ॥
खसमु पछाणहि आपणा तनु मनु आगै देइ ॥
घरि वरु पाइआ आपणा हउमै दूरि करेइ ॥
नानक सोभावंतीआ सोहागणी अनदिनु भगति करेइ ॥४॥२८॥६१॥

हिन्दी अर्थ: हे स्वै भाव में मस्त व झूठ की बंजारन जीव स्त्री! तुझे माया के पसारे ने लूट लिया है। (इस तरह प्रभु पति के साथ तेरा मेल नहीं हो सकता)। सदा स्थिर रहने वाला सुहाना पति गुरू की बताई विचार पे चलने से ही मिलता है।1।रहाउ। जो जीव सि्त्रयां अपने ही मन के पीछे चलती हैं~ खसम प्रभु उन्हें पहचाता भी नहीं। उनकी (जिंदगी रूपी) रात कैसे बीतती होगी? ( भाव~ वह सारी उम्र दुखी ही रहती हैं)। वह अहंकार में पूरी तरह भरी हुई तृष्णा की आग में जलती हैं~ वह माया के मोह में पड़ कर दुख बर्दाश्त करती हैं। (जो जीव सि्त्रयां गुरू के) शबद में रंगी रहती हैं वह भाग्यशाली हैं (शबद की बरकति से) उनके अंदर से अहम् दूर हो जाता है। वह सदा अपने प्रभु पति से मिलीे रहती हैं~ उनकी उम्र पूरी तरह सुख में ही बीतती है।2। जो जीव-स्त्री प्रभु पति के साथ गहरी सांझ डाले बगैर ही रही~ वह प्रभु-पति से छुटी ही रह जाती है। वह प्रभु-पति का प्यार हासिल नहीं कर सकती। अज्ञान में मत (बुद्धि) ली हुई जीव स्त्री को (माया के मोह का) अंधेरा व्याप्त रहता है। पति प्रभु के दर्शन के बिना उसकी यह माया की भूख तृप्त नहीं होती। हे सत्संगी जीव सि्त्रयो! आओ~ मुझे मिलो और मुझे प्रभु पति मिला दो। जिस जीव स्त्री के सौभाग्य से गुरू मिल जाता है~ वह प्रभु पति को मिल जाती है। वह सदा स्थिर प्रभु में लीन रहती है।3। वह सत्संगी जीव सि्त्रयां भाग्यशाली हैं जिन पर प्रभु पति मेहर की निगाह करता है। वह अपना तन अपना मन उसके आगे भेट रख के अपने प्रभु पति से सांझ (समझ / पहचान) पाती हैं। जो जीव स्त्री अपने अंदर से अहंकार दूर करती है वह अपने हृदय घर में (ही) प्रभु-पति को ढूँढ लेती है। हे नानक! वह शोभनीय हैं वह भाग्यशाली हैं~ वह हर वक्त प्रभु-पति की भक्ति करती हैं।4।28।61।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਇਕਿ ਪਿਰੁ ਰਾਵਹਿ ਆਪਣਾ ਹਉ ਕੈ ਦਰਿ ਪੂਛਉ ਜਾਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੀ ਭਾਉ ਕਰਿ ਮੈ ਪਿਰੁ ਦੇਹੁ ਮਿਲਾਇ ॥
ਸਭੁ ਉਪਾਏ ਆਪੇ ਵੇਖੈ ਕਿਸੁ ਨੇੜੈ ਕਿਸੁ ਦੂਰਿ ॥
ਜਿਨਿ ਪਿਰੁ ਸੰਗੇ ਜਾਣਿਆ ਪਿਰੁ ਰਾਵੇ ਸਦਾ ਹਦੂਰਿ ॥੧॥
ਮੁੰਧੇ ਤੂ ਚਲੁ ਗੁਰ ਕੈ ਭਾਇ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਰਾਵਹਿ ਪਿਰੁ ਆਪਣਾ ਸਹਜੇ ਸਚਿ ਸਮਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਬਦਿ ਰਤੀਆ ਸੋਹਾਗਣੀ ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਸੀਗਾਰਿ ॥
ਹਰਿ ਵਰੁ ਪਾਇਨਿ ਘਰਿ ਆਪਣੈ ਗੁਰ ਕੈ ਹੇਤਿ ਪਿਆਰਿ ॥
ਸੇਜ ਸੁਹਾਵੀ ਹਰਿ ਰੰਗਿ ਰਵੈ ਭਗਤਿ ਭਰੇ ਭੰਡਾਰ ॥
ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਮਨਿ ਵਸੈ ਜਿ ਸਭਸੈ ਦੇਇ ਅਧਾਰੁ ॥੨॥
ਪਿਰੁ ਸਾਲਾਹਨਿ ਆਪਣਾ ਤਿਨ ਕੈ ਹਉ ਸਦ ਬਲਿਹਾਰੈ ਜਾਉ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਅਰਪੀ ਸਿਰੁ ਦੇਈ ਤਿਨ ਕੈ ਲਾਗਾ ਪਾਇ ॥
ਜਿਨੀ ਇਕੁ ਪਛਾਣਿਆ ਦੂਜਾ ਭਾਉ ਚੁਕਾਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਪਛਾਣੀਐ ਨਾਨਕ ਸਚਿ ਸਮਾਇ ॥੩॥੨੯॥੬੨॥
सिरीरागु महला ३ ॥
इकि पिरु रावहि आपणा हउ कै दरि पूछउ जाइ ॥
सतिगुरु सेवी भाउ करि मै पिरु देहु मिलाइ ॥
सभु उपाए आपे वेखै किसु नेड़ै किसु दूरि ॥
जिनि पिरु संगे जाणिआ पिरु रावे सदा हदूरि ॥१॥
मुंधे तू चलु गुर कै भाइ ॥
अनदिनु रावहि पिरु आपणा सहजे सचि समाइ ॥१॥ रहाउ ॥
सबदि रतीआ सोहागणी सचै सबदि सीगारि ॥
हरि वरु पाइनि घरि आपणै गुर कै हेति पिआरि ॥
सेज सुहावी हरि रंगि रवै भगति भरे भंडार ॥
सो प्रभु प्रीतमु मनि वसै जि सभसै देइ अधारु ॥२॥
पिरु सालाहनि आपणा तिन कै हउ सद बलिहारै जाउ ॥
मनु तनु अरपी सिरु देई तिन कै लागा पाइ ॥
जिनी इकु पछाणिआ दूजा भाउ चुकाइ ॥
गुरमुखि नामु पछाणीऐ नानक सचि समाइ ॥३॥२९॥६२॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ३ ॥ कई (भाग्यशाली जीवसि्त्रयां) अपने प्रभु पति को प्रसन्न करती हैं (उनको देख के मेरे मन अंदर भी चाह पैदा होती है कि) मैं किस के दर पे जा के (प्रभु पति को प्रसंन्न करने का तरीका) पूछूँ। मैं श्रद्धा से प्रभु के चरण पकड़ती हूँ (और गुरू के आगे विनती करती हूँ कि) प्रभु खुद ही सारा जगत पैदा करता है तथा (सभ की) संभाल करता है~ हरेक जीव में एक समान मौजूद है। जिस (जीव स्त्री) ने (गुरू की शरण पड़ के) उस प्रभु पति को अपने अंग-संग जान लिया है~ वह उस हाजिर नाजिर बसते को सदा अपने हृदय में बसा के रखती है।1। हे जीव स्त्री! तू गुरू के प्रेम में (रह कर जीवन सफर पे) चल। (जो जीव सि्त्रयां गुरू के प्रेम में चलती हैं वह) आत्मक अडोलता से सदा स्थिर प्रभु में लीन हो के हर वक्त अपने प्रभु पति को मिली रहती हैं।1।रहाउ। जो जीव सि्त्रयां गुरू के शबद में रंगी रहती हैं~ वह भाग्यशाली हो जाती हैं। वह सदा सिफत सलाह की बाणी से अपने जीवन को सवार लेती हैं। वह अपने गुरू के प्रेम में~ प्यार में टिक के प्रभु पति को अपने हृदय घर में ढूंढ लेती हैं। प्रभु (पति) उनके सुंदर हृदय सेज पर प्रेम से आकर प्रगट होता है। उनके भगती के खजाने भर जाते है। उनके मन में वह प्रभु प्रीतम आ बसता है~ जो हरेक जीव को आसरा दे रहा है।2। जो जीव सि्त्रयां अपने प्रभु पति की सिफत सलाह करती हैं~ मैं उन से सदा कुर्बान जाती हूँ। मैं उनके आगे अपना तन भेटा करती हूँ। मैं (उनके चरणों में) अपना शीश रखती हूं। मैं उनके चरण लगती हूं~ क्योंकि उन्होंने माया का प्यार (अपने अंदर से) दूर करके सिर्फ प्रभु पति से जान-पहिचान बना ली है। हे नानक! गुरू के सन्मुख हो के सदा स्थिर प्रभु में लीन हो के उसके नाम के साथ जान पहिचान बन सकती है।4।29।62।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਹਰਿ ਜੀ ਸਚਾ ਸਚੁ ਤੂ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਤੇਰੈ ਚੀਰੈ ॥
ਲਖ ਚਉਰਾਸੀਹ ਤਰਸਦੇ ਫਿਰੇ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਭੇਟੇ ਪੀਰੈ ॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਬਖਸੇ ਬਖਸਿ ਲਏ ਸੂਖ ਸਦਾ ਸਰੀਰੈ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਸੇਵ ਕਰੀ ਸਚੁ ਗਹਿਰ ਗੰਭੀਰੈ ॥੧॥
ਮਨ ਮੇਰੇ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥
ਗੁਰਮਤੀ ਨਾਮੁ ਸਲਾਹੀਐ ਦੂਜਾ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਧਰਮ ਰਾਇ ਨੋ ਹੁਕਮੁ ਹੈ ਬਹਿ ਸਚਾ ਧਰਮੁ ਬੀਚਾਰਿ ॥
ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਦੁਸਟੁ ਆਤਮਾ ਓਹੁ ਤੇਰੀ ਸਰਕਾਰ ॥
ਅਧਿਆਤਮੀ ਹਰਿ ਗੁਣ ਤਾਸੁ ਮਨਿ ਜਪਹਿ ਏਕੁ ਮੁਰਾਰਿ ॥
सिरीरागु महला ३ ॥
हरि जी सचा सचु तू सभु किछु तेरै चीरै ॥
लख चउरासीह तरसदे फिरे बिनु गुर भेटे पीरै ॥
हरि जीउ बखसे बखसि लए सूख सदा सरीरै ॥
गुर परसादी सेव करी सचु गहिर गंभीरै ॥१॥
मन मेरे नामि रते सुखु होइ ॥
गुरमती नामु सलाहीऐ दूजा अवरु न कोइ ॥१॥ रहाउ ॥
धरम राइ नो हुकमु है बहि सचा धरमु बीचारि ॥
दूजै भाइ दुसटु आतमा ओहु तेरी सरकार ॥
अधिआतमी हरि गुण तासु मनि जपहि एकु मुरारि ॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ३ ॥ हे प्रभू जी ! तू (ही) सदा स्थिर रहने वाला है और सारा जगत तेरे वस में है। (पर तू मिलता है गुरू के द्वारा) गुरू पीर को मिले बिना (अर्थात~ गुरू की शरण आए बिना) चौरासी लाख योनियों के जीव (तेरे दर्शन को) तरसते फिरते हैं। जिस जीव पे परमात्मा खुद मेहर करता है बख्शिश करता है~ उसके हृदय में सदा आत्मिक आनन्द बना रहता है। (मेरे अंदर भी चाह है कि) मैं गुरू की मेहर से सदा स्थिर व गहरे जिगरे वाले परमात्मा का सिमरन करता रहूँ।1। हे मेरे मन! अगर परमात्मा के नाम रंग में रंगे जाएं~ तो आत्मिक आनन्द मिलता है। (पर~) गुरू की मति पर चल के ही परमात्मा का नाम सलाहना चाहिए। (नाम सिमरन का) और कोई तरीका नहीं।1।रहाउ। धर्मराज को (भी परमात्मा का) हुकम है ( हे धर्मराज ! तू !) बैठ के (यह) अटल धर्म (न्याय) याद रख कि वह विकारी मनुष्य तेरी सरकार है~ रईअत है~ जो माया के प्यार में (फंसा) रहता है। आत्मिक जीवन वाले बंदों के मन में गुणों का खजाना परमात्मा खुद बसता है~ वह परमात्मा को ही सिमरते रहते है।

संदर्भ: यह अंग 38 है, राग Siree Raag का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।

दिल्ली का summer-shaadi, मंडप के बीच bride-groom, और परिवार की उम्मीदें।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 39 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 38” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Siree Raag राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 39 →, पीछे का: ← अंग 37

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।