अंग
37
राग Siree Raag
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਕਿਨੈ ਨ ਪਾਇਓ ਕਰਿ ਵੇਖਹੁ ਮਨਿ ਵੀਚਾਰਿ ॥
ਮਨਮੁਖ ਮੈਲੁ ਨ ਉਤਰੈ ਜਿਚਰੁ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਨ ਕਰੇ ਪਿਆਰੁ ॥੧॥
ਮਨ ਮੇਰੇ ਸਤਿਗੁਰ ਕੈ ਭਾਣੈ ਚਲੁ ॥
ਨਿਜ ਘਰਿ ਵਸਹਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਵਹਿ ਤਾ ਸੁਖ ਲਹਹਿ ਮਹਲੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਉਗੁਣਵੰਤੀ ਗੁਣੁ ਕੋ ਨਹੀ ਬਹਣਿ ਨ ਮਿਲੈ ਹਦੂਰਿ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਸਬਦੁ ਨ ਜਾਣਈ ਅਵਗਣਿ ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਦੂਰਿ ॥
ਜਿਨੀ ਸਚੁ ਪਛਾਣਿਆ ਸਚਿ ਰਤੇ ਭਰਪੂਰਿ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਮਨੁ ਬੇਧਿਆ ਪ੍ਰਭੁ ਮਿਲਿਆ ਆਪਿ ਹਦੂਰਿ ॥੨॥
ਆਪੇ ਰੰਗਣਿ ਰੰਗਿਓਨੁ ਸਬਦੇ ਲਇਓਨੁ ਮਿਲਾਇ ॥
ਸਚਾ ਰੰਗੁ ਨ ਉਤਰੈ ਜੋ ਸਚਿ ਰਤੇ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਚਾਰੇ ਕੁੰਡਾ ਭਵਿ ਥਕੇ ਮਨਮੁਖ ਬੂਝ ਨ ਪਾਇ ॥
ਜਿਸੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮੇਲੇ ਸੋ ਮਿਲੈ ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਸਮਾਇ ॥੩॥
ਮਿਤ੍ਰ ਘਣੇਰੇ ਕਰਿ ਥਕੀ ਮੇਰਾ ਦੁਖੁ ਕਾਟੈ ਕੋਇ ॥
ਮਿਲਿ ਪ੍ਰੀਤਮ ਦੁਖੁ ਕਟਿਆ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਵਾ ਹੋਇ ॥
ਸਚੁ ਖਟਣਾ ਸਚੁ ਰਾਸਿ ਹੈ ਸਚੇ ਸਚੀ ਸੋਇ ॥
ਸਚਿ ਮਿਲੇ ਸੇ ਨ ਵਿਛੁੜਹਿ ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਇ ॥੪॥੨੬॥੫੯॥
ਮਨਮੁਖ ਮੈਲੁ ਨ ਉਤਰੈ ਜਿਚਰੁ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਨ ਕਰੇ ਪਿਆਰੁ ॥੧॥
ਮਨ ਮੇਰੇ ਸਤਿਗੁਰ ਕੈ ਭਾਣੈ ਚਲੁ ॥
ਨਿਜ ਘਰਿ ਵਸਹਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਵਹਿ ਤਾ ਸੁਖ ਲਹਹਿ ਮਹਲੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਉਗੁਣਵੰਤੀ ਗੁਣੁ ਕੋ ਨਹੀ ਬਹਣਿ ਨ ਮਿਲੈ ਹਦੂਰਿ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਸਬਦੁ ਨ ਜਾਣਈ ਅਵਗਣਿ ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਦੂਰਿ ॥
ਜਿਨੀ ਸਚੁ ਪਛਾਣਿਆ ਸਚਿ ਰਤੇ ਭਰਪੂਰਿ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਮਨੁ ਬੇਧਿਆ ਪ੍ਰਭੁ ਮਿਲਿਆ ਆਪਿ ਹਦੂਰਿ ॥੨॥
ਆਪੇ ਰੰਗਣਿ ਰੰਗਿਓਨੁ ਸਬਦੇ ਲਇਓਨੁ ਮਿਲਾਇ ॥
ਸਚਾ ਰੰਗੁ ਨ ਉਤਰੈ ਜੋ ਸਚਿ ਰਤੇ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਚਾਰੇ ਕੁੰਡਾ ਭਵਿ ਥਕੇ ਮਨਮੁਖ ਬੂਝ ਨ ਪਾਇ ॥
ਜਿਸੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮੇਲੇ ਸੋ ਮਿਲੈ ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਸਮਾਇ ॥੩॥
ਮਿਤ੍ਰ ਘਣੇਰੇ ਕਰਿ ਥਕੀ ਮੇਰਾ ਦੁਖੁ ਕਾਟੈ ਕੋਇ ॥
ਮਿਲਿ ਪ੍ਰੀਤਮ ਦੁਖੁ ਕਟਿਆ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਵਾ ਹੋਇ ॥
ਸਚੁ ਖਟਣਾ ਸਚੁ ਰਾਸਿ ਹੈ ਸਚੇ ਸਚੀ ਸੋਇ ॥
ਸਚਿ ਮਿਲੇ ਸੇ ਨ ਵਿਛੁੜਹਿ ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਇ ॥੪॥੨੬॥੫੯॥
बिनु सतिगुर किनै न पाइओ करि वेखहु मनि वीचारि ॥
मनमुख मैलु न उतरै जिचरु गुर सबदि न करे पिआरु ॥१॥
मन मेरे सतिगुर कै भाणै चलु ॥
निज घरि वसहि अंम्रितु पीवहि ता सुख लहहि महलु ॥१॥ रहाउ ॥
अउगुणवंती गुणु को नही बहणि न मिलै हदूरि ॥
मनमुखि सबदु न जाणई अवगणि सो प्रभु दूरि ॥
जिनी सचु पछाणिआ सचि रते भरपूरि ॥
गुर सबदी मनु बेधिआ प्रभु मिलिआ आपि हदूरि ॥२॥
आपे रंगणि रंगिओनु सबदे लइओनु मिलाइ ॥
सचा रंगु न उतरै जो सचि रते लिव लाइ ॥
चारे कुंडा भवि थके मनमुख बूझ न पाइ ॥
जिसु सतिगुरु मेले सो मिलै सचै सबदि समाइ ॥३॥
मित्र घणेरे करि थकी मेरा दुखु काटै कोइ ॥
मिलि प्रीतम दुखु कटिआ सबदि मिलावा होइ ॥
सचु खटणा सचु रासि है सचे सची सोइ ॥
सचि मिले से न विछुड़हि नानक गुरमुखि होइ ॥४॥२६॥५९॥
मनमुख मैलु न उतरै जिचरु गुर सबदि न करे पिआरु ॥१॥
मन मेरे सतिगुर कै भाणै चलु ॥
निज घरि वसहि अंम्रितु पीवहि ता सुख लहहि महलु ॥१॥ रहाउ ॥
अउगुणवंती गुणु को नही बहणि न मिलै हदूरि ॥
मनमुखि सबदु न जाणई अवगणि सो प्रभु दूरि ॥
जिनी सचु पछाणिआ सचि रते भरपूरि ॥
गुर सबदी मनु बेधिआ प्रभु मिलिआ आपि हदूरि ॥२॥
आपे रंगणि रंगिओनु सबदे लइओनु मिलाइ ॥
सचा रंगु न उतरै जो सचि रते लिव लाइ ॥
चारे कुंडा भवि थके मनमुख बूझ न पाइ ॥
जिसु सतिगुरु मेले सो मिलै सचै सबदि समाइ ॥३॥
मित्र घणेरे करि थकी मेरा दुखु काटै कोइ ॥
मिलि प्रीतम दुखु कटिआ सबदि मिलावा होइ ॥
सचु खटणा सचु रासि है सचे सची सोइ ॥
सचि मिले से न विछुड़हि नानक गुरमुखि होइ ॥४॥२६॥५९॥
हिन्दी अर्थ: (हे भाई!) अपने मन में विचार करके देख लो~ सतिगुरू (की शरण) के बिना किसी ने भी परमात्मा को नहीं ढूंढा। (क्योंकि) अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य जब तक गुरू के शबद से प्यार नहीं डालता~ उस के मन के (विकारों की) मैल नहीं उतरती।1। हे मेरे मन! सतिगुरू की रजा में चल। (गुरू की रजा में चल के) अपने अंतरात्मे टिका रहेगा (अर्थात~ भटकनों से बच जाएगा)। आत्मिक जीवन देने वाला नाम-धन पीएगा~ उस की बरकति से सुखें का ठिकाना ढूंढ लेगा।1।रहाउ। जिस जीव-स्त्री के भीतर औगुण ही औगुण हों और गुण कोई भी नहीं~ उसको परमात्मा की हजूरी में जगह नहीं मिलती। अपने मन के पीछे चलने वाली जीव-स्त्री गुरू के शबद की कद्र नहीं जानती~ औगुणों के कारण वह परमात्मा उसे कहीं दूर ही प्रतीत होता है। जिन लोगों ने सदा स्थिर परमात्मा को हर जगह बसता पहिचान लिया है वह उस सदा स्थिर प्रभु (के प्यार रंग) में रंगे रहते है। उनका मन गुरू के शबद में परोया रहता है। उनको परमात्मा मिल जाता हैऔर अंग-संग बसता दिखाई देता है।2। (पर~ जीवों के भी क्या बस?) जिन जीवों को प्रभु ने खुद ही साध-संगति में (रख के नाम रंग से) रंगा है~ गुरू शबद में जोड़ के उनको अपने (चरणों) में मिला लिया है। जो लोग सदा स्थिर प्रभु में सुरति जोड़ के (नाम रंग से) रंगे जाते हैं~ उनका ये सदा स्थिर रहने वाला रंग कभी नहीं उतरता। अपने मन के पीछे चलने वाले लोग (माया की खातिर) चारों तरफ भटक भटक के थक जाते हैं (अर्थात~ आत्मिक जीवन कमजोर कर लेते हैं) उनको (सही जीवन राह की) सूझ नहीं होती। जिस मनुष्य को गुरू मिलाता है वह प्रभु प्रीतम को मिल जाता है। वह सदा स्थिर प्रभु की सिफत सलाह बकी बाणी में लीन रहता है।3। (दुनिया के) बहुत सारे (सम्बंधियों) को मित्र बना बना के मैं थक चुकी हूँ (मैं समझती रही कि कोई साक-संबंधी) मेरा दुख काट सकेगा। प्रभु-प्रीतम को मिल के ही दुख काटा जाता है~ गुरू के शबद द्वारा ही उसका मिलाप होता है। हे नानक! गुरू के सन्मुख हो के जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभु में मिल जाते हैं वह (दुबारा उस से) जुदा नहीं होते। जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभु का रूप् हो जाता है सदा स्थिर प्रभु का नाम ही उसकी लाभ कमायी हो जाती है~ नाम ही उसकी राशि पूँजी बन जाती है तथा उसको सदा कायम रहने वाली शोभा मिलती है।4।26।59।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਆਪੇ ਕਾਰਣੁ ਕਰਤਾ ਕਰੇ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਦੇਖੈ ਆਪਿ ਉਪਾਇ ॥
ਸਭ ਏਕੋ ਇਕੁ ਵਰਤਦਾ ਅਲਖੁ ਨ ਲਖਿਆ ਜਾਇ ॥
ਆਪੇ ਪ੍ਰਭੂ ਦਇਆਲੁ ਹੈ ਆਪੇ ਦੇਇ ਬੁਝਾਇ ॥
ਗੁਰਮਤੀ ਸਦ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਸਚਿ ਰਹੇ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥੧॥
ਮਨ ਮੇਰੇ ਗੁਰ ਕੀ ਮੰਨਿ ਲੈ ਰਜਾਇ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਸੀਤਲੁ ਸਭੁ ਥੀਐ ਨਾਮੁ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਿਨਿ ਕਰਿ ਕਾਰਣੁ ਧਾਰਿਆ ਸੋਈ ਸਾਰ ਕਰੇਇ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਪਛਾਣੀਐ ਜਾ ਆਪੇ ਨਦਰਿ ਕਰੇਇ ॥
ਸੇ ਜਨ ਸਬਦੇ ਸੋਹਣੇ ਤਿਤੁ ਸਚੈ ਦਰਬਾਰਿ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਰਤੇ ਆਪਿ ਮੇਲੇ ਕਰਤਾਰਿ ॥੨॥
ਗੁਰਮਤੀ ਸਚੁ ਸਲਾਹਣਾ ਜਿਸ ਦਾ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਰਾਵਾਰੁ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਆਪੇ ਹੁਕਮਿ ਵਸੈ ਹੁਕਮੇ ਕਰੇ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਸਾਲਾਹੀਐ ਹਉਮੈ ਵਿਚਹੁ ਖੋਇ ॥
ਸਾ ਧਨ ਨਾਵੈ ਬਾਹਰੀ ਅਵਗਣਵੰਤੀ ਰੋਇ ॥੩॥
ਸਚੁ ਸਲਾਹੀ ਸਚਿ ਲਗਾ ਸਚੈ ਨਾਇ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਹੋਇ ॥
ਗੁਣ ਵੀਚਾਰੀ ਗੁਣ ਸੰਗ੍ਰਹਾ ਅਵਗੁਣ ਕਢਾ ਧੋਇ ॥
ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਇਦਾ ਫਿਰਿ ਵੇਛੋੜਾ ਨ ਹੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰੁ ਸਾਲਾਹੀ ਆਪਣਾ ਜਿਦੂ ਪਾਈ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਇ ॥੪॥੨੭॥੬੦॥
ਆਪੇ ਕਾਰਣੁ ਕਰਤਾ ਕਰੇ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਦੇਖੈ ਆਪਿ ਉਪਾਇ ॥
ਸਭ ਏਕੋ ਇਕੁ ਵਰਤਦਾ ਅਲਖੁ ਨ ਲਖਿਆ ਜਾਇ ॥
ਆਪੇ ਪ੍ਰਭੂ ਦਇਆਲੁ ਹੈ ਆਪੇ ਦੇਇ ਬੁਝਾਇ ॥
ਗੁਰਮਤੀ ਸਦ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਸਚਿ ਰਹੇ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥੧॥
ਮਨ ਮੇਰੇ ਗੁਰ ਕੀ ਮੰਨਿ ਲੈ ਰਜਾਇ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਸੀਤਲੁ ਸਭੁ ਥੀਐ ਨਾਮੁ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਿਨਿ ਕਰਿ ਕਾਰਣੁ ਧਾਰਿਆ ਸੋਈ ਸਾਰ ਕਰੇਇ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਪਛਾਣੀਐ ਜਾ ਆਪੇ ਨਦਰਿ ਕਰੇਇ ॥
ਸੇ ਜਨ ਸਬਦੇ ਸੋਹਣੇ ਤਿਤੁ ਸਚੈ ਦਰਬਾਰਿ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਰਤੇ ਆਪਿ ਮੇਲੇ ਕਰਤਾਰਿ ॥੨॥
ਗੁਰਮਤੀ ਸਚੁ ਸਲਾਹਣਾ ਜਿਸ ਦਾ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਰਾਵਾਰੁ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਆਪੇ ਹੁਕਮਿ ਵਸੈ ਹੁਕਮੇ ਕਰੇ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਸਾਲਾਹੀਐ ਹਉਮੈ ਵਿਚਹੁ ਖੋਇ ॥
ਸਾ ਧਨ ਨਾਵੈ ਬਾਹਰੀ ਅਵਗਣਵੰਤੀ ਰੋਇ ॥੩॥
ਸਚੁ ਸਲਾਹੀ ਸਚਿ ਲਗਾ ਸਚੈ ਨਾਇ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਹੋਇ ॥
ਗੁਣ ਵੀਚਾਰੀ ਗੁਣ ਸੰਗ੍ਰਹਾ ਅਵਗੁਣ ਕਢਾ ਧੋਇ ॥
ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਇਦਾ ਫਿਰਿ ਵੇਛੋੜਾ ਨ ਹੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰੁ ਸਾਲਾਹੀ ਆਪਣਾ ਜਿਦੂ ਪਾਈ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਇ ॥੪॥੨੭॥੬੦॥
सिरीरागु महला ३ ॥
आपे कारणु करता करे स्रिसटि देखै आपि उपाइ ॥
सभ एको इकु वरतदा अलखु न लखिआ जाइ ॥
आपे प्रभू दइआलु है आपे देइ बुझाइ ॥
गुरमती सद मनि वसिआ सचि रहे लिव लाइ ॥१॥
मन मेरे गुर की मंनि लै रजाइ ॥
मनु तनु सीतलु सभु थीऐ नामु वसै मनि आइ ॥१॥ रहाउ ॥
जिनि करि कारणु धारिआ सोई सार करेइ ॥
गुर कै सबदि पछाणीऐ जा आपे नदरि करेइ ॥
से जन सबदे सोहणे तितु सचै दरबारि ॥
गुरमुखि सचै सबदि रते आपि मेले करतारि ॥२॥
गुरमती सचु सलाहणा जिस दा अंतु न पारावारु ॥
घटि घटि आपे हुकमि वसै हुकमे करे बीचारु ॥
गुर सबदी सालाहीऐ हउमै विचहु खोइ ॥
सा धन नावै बाहरी अवगणवंती रोइ ॥३॥
सचु सलाही सचि लगा सचै नाइ त्रिपति होइ ॥
गुण वीचारी गुण संग्रहा अवगुण कढा धोइ ॥
आपे मेलि मिलाइदा फिरि वेछोड़ा न होइ ॥
नानक गुरु सालाही आपणा जिदू पाई प्रभु सोइ ॥४॥२७॥६०॥
आपे कारणु करता करे स्रिसटि देखै आपि उपाइ ॥
सभ एको इकु वरतदा अलखु न लखिआ जाइ ॥
आपे प्रभू दइआलु है आपे देइ बुझाइ ॥
गुरमती सद मनि वसिआ सचि रहे लिव लाइ ॥१॥
मन मेरे गुर की मंनि लै रजाइ ॥
मनु तनु सीतलु सभु थीऐ नामु वसै मनि आइ ॥१॥ रहाउ ॥
जिनि करि कारणु धारिआ सोई सार करेइ ॥
गुर कै सबदि पछाणीऐ जा आपे नदरि करेइ ॥
से जन सबदे सोहणे तितु सचै दरबारि ॥
गुरमुखि सचै सबदि रते आपि मेले करतारि ॥२॥
गुरमती सचु सलाहणा जिस दा अंतु न पारावारु ॥
घटि घटि आपे हुकमि वसै हुकमे करे बीचारु ॥
गुर सबदी सालाहीऐ हउमै विचहु खोइ ॥
सा धन नावै बाहरी अवगणवंती रोइ ॥३॥
सचु सलाही सचि लगा सचै नाइ त्रिपति होइ ॥
गुण वीचारी गुण संग्रहा अवगुण कढा धोइ ॥
आपे मेलि मिलाइदा फिरि वेछोड़ा न होइ ॥
नानक गुरु सालाही आपणा जिदू पाई प्रभु सोइ ॥४॥२७॥६०॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ३ ॥ करतार खुद ही (जगत का) मूल रचता है तथा फिर जगत पैदा करके स्वयं ही उसकी संभाल करता है। (इस जगत में) हर जगह करतार स्वयं ही व्यापक है (फिर भी) वह (जीवों की) समझ में नहीं आ सकता। वह प्रभु खुद ही (जब) दयाल होता है (तब) स्वयं ही (सही जीवन की) समझ बख्शता है। जिन मनुष्यों के मन में गुरू की मति की बरकति से परमात्मा बस जाता है। वह मनुष्य उस सदा स्थिर प्रभु में सदा सुरति जोड़ के रखते हैं।1। हे मेरे मन! गुरू के हुकम में चल। (जो मनुष्य गुरू का हुकम मानता है उस का) मन (उसका शरीर) शांत हो जाता है। (उस के) मन में परमात्मा का नाम आ बसता है।1।रहाउ। जिस करतार ने जगत का मूल रच के जगत को पैदा किया है~ वही इसकी संभाल करता है। पर उसकी कद्र गुरू के शबद द्वारा तब पड़ती है जबवह स्वयं ही मेहर की निगाह करता है। (जिनपे मेहर की निगाह करता है) वह मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ के उस सदा स्थिर प्रभु के दरबार में शोभा पाते हैं। जिन को करतार ने खुद ही (गुरू चरणों में) जोड़ा है वह गुरू के सन्मुख रह कर सदा स्थिर प्रभु की सिफत सलाह के शबद में रंगे रहते हैं।2। (हे भाई!) गुरू की मति ले के उस सदा स्थिर परमात्मा की सिफत सलाह करनी चाहिए जिसके (गुणों का) अंत नहीं पड़ सकता~ इस पार उस पार का सिरा नहीं ढूंढा जा सकता। (वह सदा स्थिर प्रभु) खुद ही अपने हुकम अनुसार हरेक शरीर में बसता है~ और अपने हुकम में ही (जीवों की संभाल की) विचार करता है। (हे भाई!) गुरू के शबद में जुड़ के अपने अंदर से अहम् दूर करके परमात्मा की सिफत सलाह करनी चाहिए। जो जीव स्त्री प्रभु के नाम से वंचित रहती है वह औगुणों से भर जाती है और दुखी होती है।3। मैं सदा स्थिर प्रभु की सिफत सलाह करता रहूँ। सदा स्थिर प्रभु (की याद) में जुड़ा रहूँ। सदा स्थिर प्रभु के नाम में जुड़ा रह के ही तृष्णा मिटती है। (मेरी अरदास है कि) मैं परमात्मा के गुणों को विचारता रहूँ। उनके गुणों को (अपने हृदय में) इकट्ठा करता रहूँ तथा (इस तरह अपने अंदर से) औगुणों को धो के निकाल दूँ। जिस मनुष्य को प्रभु खुद ही अपने चरणों में जोड़ता है~ उसे दुबारा कभी प्रभु से विछोड़ा नहीं होता। हे नानक! (कह~ मेरी यही अरदास है कि) मैं अपने गुरू की सिफत करता रहूँ~ क्योंकि गुरू के द्वारा ही वह प्रभु मिल सकता है।4।27।60।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਸੁਣਿ ਸੁਣਿ ਕਾਮ ਗਹੇਲੀਏ ਕਿਆ ਚਲਹਿ ਬਾਹ ਲੁਡਾਇ ॥
ਆਪਣਾ ਪਿਰੁ ਨ ਪਛਾਣਹੀ ਕਿਆ ਮੁਹੁ ਦੇਸਹਿ ਜਾਇ ॥
ਜਿਨੀ ਸਖਂੀ ਕੰਤੁ ਪਛਾਣਿਆ ਹਉ ਤਿਨ ਕੈ ਲਾਗਉ ਪਾਇ ॥
ਤਿਨ ਹੀ ਜੈਸੀ ਥੀ ਰਹਾ ਸਤਸੰਗਤਿ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਇ ॥੧॥
ਸੁਣਿ ਸੁਣਿ ਕਾਮ ਗਹੇਲੀਏ ਕਿਆ ਚਲਹਿ ਬਾਹ ਲੁਡਾਇ ॥
ਆਪਣਾ ਪਿਰੁ ਨ ਪਛਾਣਹੀ ਕਿਆ ਮੁਹੁ ਦੇਸਹਿ ਜਾਇ ॥
ਜਿਨੀ ਸਖਂੀ ਕੰਤੁ ਪਛਾਣਿਆ ਹਉ ਤਿਨ ਕੈ ਲਾਗਉ ਪਾਇ ॥
ਤਿਨ ਹੀ ਜੈਸੀ ਥੀ ਰਹਾ ਸਤਸੰਗਤਿ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਇ ॥੧॥
सिरीरागु महला ३ ॥
सुणि सुणि काम गहेलीए किआ चलहि बाह लुडाइ ॥
आपणा पिरु न पछाणही किआ मुहु देसहि जाइ ॥
जिनी सखंी कंतु पछाणिआ हउ तिन कै लागउ पाइ ॥
तिन ही जैसी थी रहा सतसंगति मेलि मिलाइ ॥१॥
सुणि सुणि काम गहेलीए किआ चलहि बाह लुडाइ ॥
आपणा पिरु न पछाणही किआ मुहु देसहि जाइ ॥
जिनी सखंी कंतु पछाणिआ हउ तिन कै लागउ पाइ ॥
तिन ही जैसी थी रहा सतसंगति मेलि मिलाइ ॥१॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ३ ॥ हे स्वार्थ में फंसी हुई जीव स्त्री! ध्यान से सुन! क्यूँ इतनी लापरवाही से (जीवन राह में) चल रही है? (स्वार्थ में फंस के) तू अपने प्रभु पति को (अब) पहचानती नहीं~ परलोक में जा के क्या मुंह दिखाएगी? जिन सत्संगी जीव सि्त्रयों ने अपने खसम प्रभु के साथ जान-पहिचान बना रखी है (वह भाग्यशाली हैं) मैं उनके चरण छूती हूँ। (मेरा चित्त करता है कि) मैं उनके सत्संग के एकत्र में मिल के उन जैसी ही बन जाऊँ।1।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 37 है, राग Siree Raag का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
Janmashtami की मधुर रात, मंदिर में 12 बजे का दर्शन।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 40 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 37” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Siree Raag राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 38 →, पीछे का: ← अंग 36।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।