अंग
36
राग Siree Raag
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਸੁਣਦਾ ਵੇਖਦਾ ਕਿਉ ਮੁਕਰਿ ਪਇਆ ਜਾਇ ॥
ਪਾਪੋ ਪਾਪੁ ਕਮਾਵਦੇ ਪਾਪੇ ਪਚਹਿ ਪਚਾਇ ॥
ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਨਦਰਿ ਨ ਆਵਈ ਮਨਮੁਖਿ ਬੂਝ ਨ ਪਾਇ ॥
ਜਿਸੁ ਵੇਖਾਲੇ ਸੋਈ ਵੇਖੈ ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਇ ॥੪॥੨੩॥੫੬॥
ਪਾਪੋ ਪਾਪੁ ਕਮਾਵਦੇ ਪਾਪੇ ਪਚਹਿ ਪਚਾਇ ॥
ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਨਦਰਿ ਨ ਆਵਈ ਮਨਮੁਖਿ ਬੂਝ ਨ ਪਾਇ ॥
ਜਿਸੁ ਵੇਖਾਲੇ ਸੋਈ ਵੇਖੈ ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਇ ॥੪॥੨੩॥੫੬॥
सभु किछु सुणदा वेखदा किउ मुकरि पइआ जाइ ॥
पापो पापु कमावदे पापे पचहि पचाइ ॥
सो प्रभु नदरि न आवई मनमुखि बूझ न पाइ ॥
जिसु वेखाले सोई वेखै नानक गुरमुखि पाइ ॥४॥२३॥५६॥
पापो पापु कमावदे पापे पचहि पचाइ ॥
सो प्रभु नदरि न आवई मनमुखि बूझ न पाइ ॥
जिसु वेखाले सोई वेखै नानक गुरमुखि पाइ ॥४॥२३॥५६॥
हिन्दी अर्थ: (हम जीव जो कुछ करते हैं अथवा बोलते~ चितवते हैं) वह सब कुछ परमात्मा देखता सुनता है (इस वास्ते उसकी हजूरी में अपने किये व चितवे बुरे कर्मों से) मुकरा नहीं जा सकता। (इसी लिए) जो लोग (सारी उम्र) पाप ही पाप कमाते रहते हैं~ वह (सदा) पाप में जलते-भुनते रहते हैं। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य को (यह) समझ नहीं पड़ती~ उन को वह (सब कुछ देखने सुनने वाला) परमात्मा नजर नहीं आता। (पर~ किसी जीव के भी क्या बस?) हे नानक ! जिस मनुष्य को परमात्मा अपना आप दिखाता है~ वही (उस को) देख सकता है~ उसी मनुष्य को गुरू की शरण पड़ कर ये समझ आती है ।4।23।56।
ਸ੍ਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਰੋਗੁ ਨ ਤੁਟਈ ਹਉਮੈ ਪੀੜ ਨ ਜਾਇ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਮਨਿ ਵਸੈ ਨਾਮੇ ਰਹੈ ਸਮਾਇ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਹਰਿ ਪਾਈਐ ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਇ ॥੧॥
ਮਨ ਰੇ ਨਿਜ ਘਰਿ ਵਾਸਾ ਹੋਇ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਸਾਲਾਹਿ ਤੂ ਫਿਰਿ ਆਵਣ ਜਾਣੁ ਨ ਹੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਰਿ ਇਕੋ ਦਾਤਾ ਵਰਤਦਾ ਦੂਜਾ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥
ਸਬਦਿ ਸਾਲਾਹੀ ਮਨਿ ਵਸੈ ਸਹਜੇ ਹੀ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥
ਸਭ ਨਦਰੀ ਅੰਦਰਿ ਵੇਖਦਾ ਜੈ ਭਾਵੈ ਤੈ ਦੇਇ ॥੨॥
ਹਉਮੈ ਸਭਾ ਗਣਤ ਹੈ ਗਣਤੈ ਨਉ ਸੁਖੁ ਨਾਹਿ ॥
ਬਿਖੁ ਕੀ ਕਾਰ ਕਮਾਵਣੀ ਬਿਖੁ ਹੀ ਮਾਹਿ ਸਮਾਹਿ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਠਉਰੁ ਨ ਪਾਇਨੀ ਜਮਪੁਰਿ ਦੂਖ ਸਹਾਹਿ ॥੩॥
ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਸਭੁ ਤਿਸ ਦਾ ਤਿਸੈ ਦਾ ਆਧਾਰੁ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਬੁਝੀਐ ਤਾ ਪਾਏ ਮੋਖ ਦੁਆਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਸਲਾਹਿ ਤੂੰ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਰਾਵਾਰੁ ॥੪॥੨੪॥੫੭॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਰੋਗੁ ਨ ਤੁਟਈ ਹਉਮੈ ਪੀੜ ਨ ਜਾਇ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਮਨਿ ਵਸੈ ਨਾਮੇ ਰਹੈ ਸਮਾਇ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਹਰਿ ਪਾਈਐ ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਇ ॥੧॥
ਮਨ ਰੇ ਨਿਜ ਘਰਿ ਵਾਸਾ ਹੋਇ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਸਾਲਾਹਿ ਤੂ ਫਿਰਿ ਆਵਣ ਜਾਣੁ ਨ ਹੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਰਿ ਇਕੋ ਦਾਤਾ ਵਰਤਦਾ ਦੂਜਾ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥
ਸਬਦਿ ਸਾਲਾਹੀ ਮਨਿ ਵਸੈ ਸਹਜੇ ਹੀ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥
ਸਭ ਨਦਰੀ ਅੰਦਰਿ ਵੇਖਦਾ ਜੈ ਭਾਵੈ ਤੈ ਦੇਇ ॥੨॥
ਹਉਮੈ ਸਭਾ ਗਣਤ ਹੈ ਗਣਤੈ ਨਉ ਸੁਖੁ ਨਾਹਿ ॥
ਬਿਖੁ ਕੀ ਕਾਰ ਕਮਾਵਣੀ ਬਿਖੁ ਹੀ ਮਾਹਿ ਸਮਾਹਿ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਠਉਰੁ ਨ ਪਾਇਨੀ ਜਮਪੁਰਿ ਦੂਖ ਸਹਾਹਿ ॥੩॥
ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਸਭੁ ਤਿਸ ਦਾ ਤਿਸੈ ਦਾ ਆਧਾਰੁ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਬੁਝੀਐ ਤਾ ਪਾਏ ਮੋਖ ਦੁਆਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਸਲਾਹਿ ਤੂੰ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਰਾਵਾਰੁ ॥੪॥੨੪॥੫੭॥
स्रीरागु महला ३ ॥
बिनु गुर रोगु न तुटई हउमै पीड़ न जाइ ॥
गुर परसादी मनि वसै नामे रहै समाइ ॥
गुर सबदी हरि पाईऐ बिनु सबदै भरमि भुलाइ ॥१॥
मन रे निज घरि वासा होइ ॥
राम नामु सालाहि तू फिरि आवण जाणु न होइ ॥१॥ रहाउ ॥
हरि इको दाता वरतदा दूजा अवरु न कोइ ॥
सबदि सालाही मनि वसै सहजे ही सुखु होइ ॥
सभ नदरी अंदरि वेखदा जै भावै तै देइ ॥२॥
हउमै सभा गणत है गणतै नउ सुखु नाहि ॥
बिखु की कार कमावणी बिखु ही माहि समाहि ॥
बिनु नावै ठउरु न पाइनी जमपुरि दूख सहाहि ॥३॥
जीउ पिंडु सभु तिस दा तिसै दा आधारु ॥
गुर परसादी बुझीऐ ता पाए मोख दुआरु ॥
नानक नामु सलाहि तूं अंतु न पारावारु ॥४॥२४॥५७॥
बिनु गुर रोगु न तुटई हउमै पीड़ न जाइ ॥
गुर परसादी मनि वसै नामे रहै समाइ ॥
गुर सबदी हरि पाईऐ बिनु सबदै भरमि भुलाइ ॥१॥
मन रे निज घरि वासा होइ ॥
राम नामु सालाहि तू फिरि आवण जाणु न होइ ॥१॥ रहाउ ॥
हरि इको दाता वरतदा दूजा अवरु न कोइ ॥
सबदि सालाही मनि वसै सहजे ही सुखु होइ ॥
सभ नदरी अंदरि वेखदा जै भावै तै देइ ॥२॥
हउमै सभा गणत है गणतै नउ सुखु नाहि ॥
बिखु की कार कमावणी बिखु ही माहि समाहि ॥
बिनु नावै ठउरु न पाइनी जमपुरि दूख सहाहि ॥३॥
जीउ पिंडु सभु तिस दा तिसै दा आधारु ॥
गुर परसादी बुझीऐ ता पाए मोख दुआरु ॥
नानक नामु सलाहि तूं अंतु न पारावारु ॥४॥२४॥५७॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ३ ॥ गुरू (की शरण) के बगैर (जनम-मरन) का रोग दूर नहीं हो सकता~ अहंकार की पीड़ा नहीं जाती। गुरू की कृपा से (जिस मनुष्य के) मन में (परमात्मा का नाम) बस जाता है वह नाम में ही टिका रहता है। गुरू के शबद में जुड़ने से ही परमात्मा मिलता है। गुरू के शबद के बिना मनुष्य भटक के (सही जीवन राह से) वंचित हो जाते हैं।1। हे (मेरे) मन! प्रभु चरणों में मेरा निवास बना रहेगा~ परमात्मा के नाम की सिफत सलाह करता रह, दुबारा जन्म-मरन का चक्कर नहीं होगा।1।रहाउ। सभ दातें देने वाला सिर्फ परमात्मा ही सारी स्मर्था वाला है~ उस जैसा और कोई नहीं। अगर मैं गुरू के शबद से उसकी सिफत सलाह करूँ~ तो वह मन में आ बसता है और सहज ही आत्मिक आनंद बन जाता है। वह दातार हरि सारी सृष्टि को अपनी मेहर की निगाह से देखता है। जिसको उसकी मर्जी हो उसे ही (यह आत्मिक आनंद) देता है।2। (जहां) अहम् है (वहां) चिंता है। चिंता को सुख नहीं हो सकता। (अहम् के अधीन रह कर आत्मिक मौत लाने वाले विकारों के) जहर वाले काम करने से जीव उस जहर में ही~ मगन रहते है। परमात्मा के नाम के बिना वह शांति वाली जगह प्राप्त नहीं कर सकते~ और जम के दर पर दु:ख सहते रहते हैं।3। ये जीवात्मा और ये शरीर सब कुछ उस परमात्मा का ही है तथा परमात्मा का ही (सभ जीवों को) आसरा~ सहारा है। जब~ गुरू की कृपा से ये बात समझ आ जाती है, तब जीव विकारों से निजात पाने का राह ढूंढ लेता है। हे नानक! उस परमात्मा के नाम की सिफत सलाह करता रह जिसके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। जिसकी स्मर्था का उरवार पार(और-छोर) भी नहीं ढूंढा जा सकता।4।24।57।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਤਿਨਾ ਅਨੰਦੁ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਹੈ ਜਿਨਾ ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਆਧਾਰੁ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਸਚੁ ਪਾਇਆ ਦੂਖ ਨਿਵਾਰਣਹਾਰੁ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਸਾਚੇ ਗੁਣ ਗਾਵਹਿ ਸਾਚੈ ਨਾਇ ਪਿਆਰੁ ॥
ਕਿਰਪਾ ਕਰਿ ਕੈ ਆਪਣੀ ਦਿਤੋਨੁ ਭਗਤਿ ਭੰਡਾਰੁ ॥੧॥
ਮਨ ਰੇ ਸਦਾ ਅਨੰਦੁ ਗੁਣ ਗਾਇ ॥
ਸਚੀ ਬਾਣੀ ਹਰਿ ਪਾਈਐ ਹਰਿ ਸਿਉ ਰਹੈ ਸਮਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਚੀ ਭਗਤੀ ਮਨੁ ਲਾਲੁ ਥੀਆ ਰਤਾ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਮਨੁ ਮੋਹਿਆ ਕਹਣਾ ਕਛੂ ਨ ਜਾਇ ॥
ਜਿਹਵਾ ਰਤੀ ਸਬਦਿ ਸਚੈ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਵੈ ਰਸਿ ਗੁਣ ਗਾਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਏਹੁ ਰੰਗੁ ਪਾਈਐ ਜਿਸ ਨੋ ਕਿਰਪਾ ਕਰੇ ਰਜਾਇ ॥੨॥
ਸੰਸਾ ਇਹੁ ਸੰਸਾਰੁ ਹੈ ਸੁਤਿਆ ਰੈਣਿ ਵਿਹਾਇ ॥
ਇਕਿ ਆਪਣੈ ਭਾਣੈ ਕਢਿ ਲਇਅਨੁ ਆਪੇ ਲਇਓਨੁ ਮਿਲਾਇ ॥
ਆਪੇ ਹੀ ਆਪਿ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਚੁਕਾਇ ॥
ਆਪਿ ਵਡਾਈ ਦਿਤੀਅਨੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਦੇਇ ਬੁਝਾਇ ॥੩॥
ਸਭਨਾ ਕਾ ਦਾਤਾ ਏਕੁ ਹੈ ਭੁਲਿਆ ਲਏ ਸਮਝਾਇ ॥
ਇਕਿ ਆਪੇ ਆਪਿ ਖੁਆਇਅਨੁ ਦੂਜੈ ਛਡਿਅਨੁ ਲਾਇ ॥
ਗੁਰਮਤੀ ਹਰਿ ਪਾਈਐ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਮਿਲਾਇ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮੇ ਰਤਿਆ ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਸਮਾਇ ॥੪॥੨੫॥੫੮॥
ਤਿਨਾ ਅਨੰਦੁ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਹੈ ਜਿਨਾ ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਆਧਾਰੁ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਸਚੁ ਪਾਇਆ ਦੂਖ ਨਿਵਾਰਣਹਾਰੁ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਸਾਚੇ ਗੁਣ ਗਾਵਹਿ ਸਾਚੈ ਨਾਇ ਪਿਆਰੁ ॥
ਕਿਰਪਾ ਕਰਿ ਕੈ ਆਪਣੀ ਦਿਤੋਨੁ ਭਗਤਿ ਭੰਡਾਰੁ ॥੧॥
ਮਨ ਰੇ ਸਦਾ ਅਨੰਦੁ ਗੁਣ ਗਾਇ ॥
ਸਚੀ ਬਾਣੀ ਹਰਿ ਪਾਈਐ ਹਰਿ ਸਿਉ ਰਹੈ ਸਮਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਚੀ ਭਗਤੀ ਮਨੁ ਲਾਲੁ ਥੀਆ ਰਤਾ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਮਨੁ ਮੋਹਿਆ ਕਹਣਾ ਕਛੂ ਨ ਜਾਇ ॥
ਜਿਹਵਾ ਰਤੀ ਸਬਦਿ ਸਚੈ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਵੈ ਰਸਿ ਗੁਣ ਗਾਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਏਹੁ ਰੰਗੁ ਪਾਈਐ ਜਿਸ ਨੋ ਕਿਰਪਾ ਕਰੇ ਰਜਾਇ ॥੨॥
ਸੰਸਾ ਇਹੁ ਸੰਸਾਰੁ ਹੈ ਸੁਤਿਆ ਰੈਣਿ ਵਿਹਾਇ ॥
ਇਕਿ ਆਪਣੈ ਭਾਣੈ ਕਢਿ ਲਇਅਨੁ ਆਪੇ ਲਇਓਨੁ ਮਿਲਾਇ ॥
ਆਪੇ ਹੀ ਆਪਿ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਚੁਕਾਇ ॥
ਆਪਿ ਵਡਾਈ ਦਿਤੀਅਨੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਦੇਇ ਬੁਝਾਇ ॥੩॥
ਸਭਨਾ ਕਾ ਦਾਤਾ ਏਕੁ ਹੈ ਭੁਲਿਆ ਲਏ ਸਮਝਾਇ ॥
ਇਕਿ ਆਪੇ ਆਪਿ ਖੁਆਇਅਨੁ ਦੂਜੈ ਛਡਿਅਨੁ ਲਾਇ ॥
ਗੁਰਮਤੀ ਹਰਿ ਪਾਈਐ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਮਿਲਾਇ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮੇ ਰਤਿਆ ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਸਮਾਇ ॥੪॥੨੫॥੫੮॥
सिरीरागु महला ३ ॥
तिना अनंदु सदा सुखु है जिना सचु नामु आधारु ॥
गुर सबदी सचु पाइआ दूख निवारणहारु ॥
सदा सदा साचे गुण गावहि साचै नाइ पिआरु ॥
किरपा करि कै आपणी दितोनु भगति भंडारु ॥१॥
मन रे सदा अनंदु गुण गाइ ॥
सची बाणी हरि पाईऐ हरि सिउ रहै समाइ ॥१॥ रहाउ ॥
सची भगती मनु लालु थीआ रता सहजि सुभाइ ॥
गुर सबदी मनु मोहिआ कहणा कछू न जाइ ॥
जिहवा रती सबदि सचै अंम्रितु पीवै रसि गुण गाइ ॥
गुरमुखि एहु रंगु पाईऐ जिस नो किरपा करे रजाइ ॥२॥
संसा इहु संसारु है सुतिआ रैणि विहाइ ॥
इकि आपणै भाणै कढि लइअनु आपे लइओनु मिलाइ ॥
आपे ही आपि मनि वसिआ माइआ मोहु चुकाइ ॥
आपि वडाई दितीअनु गुरमुखि देइ बुझाइ ॥३॥
सभना का दाता एकु है भुलिआ लए समझाइ ॥
इकि आपे आपि खुआइअनु दूजै छडिअनु लाइ ॥
गुरमती हरि पाईऐ जोती जोति मिलाइ ॥
अनदिनु नामे रतिआ नानक नामि समाइ ॥४॥२५॥५८॥
तिना अनंदु सदा सुखु है जिना सचु नामु आधारु ॥
गुर सबदी सचु पाइआ दूख निवारणहारु ॥
सदा सदा साचे गुण गावहि साचै नाइ पिआरु ॥
किरपा करि कै आपणी दितोनु भगति भंडारु ॥१॥
मन रे सदा अनंदु गुण गाइ ॥
सची बाणी हरि पाईऐ हरि सिउ रहै समाइ ॥१॥ रहाउ ॥
सची भगती मनु लालु थीआ रता सहजि सुभाइ ॥
गुर सबदी मनु मोहिआ कहणा कछू न जाइ ॥
जिहवा रती सबदि सचै अंम्रितु पीवै रसि गुण गाइ ॥
गुरमुखि एहु रंगु पाईऐ जिस नो किरपा करे रजाइ ॥२॥
संसा इहु संसारु है सुतिआ रैणि विहाइ ॥
इकि आपणै भाणै कढि लइअनु आपे लइओनु मिलाइ ॥
आपे ही आपि मनि वसिआ माइआ मोहु चुकाइ ॥
आपि वडाई दितीअनु गुरमुखि देइ बुझाइ ॥३॥
सभना का दाता एकु है भुलिआ लए समझाइ ॥
इकि आपे आपि खुआइअनु दूजै छडिअनु लाइ ॥
गुरमती हरि पाईऐ जोती जोति मिलाइ ॥
अनदिनु नामे रतिआ नानक नामि समाइ ॥४॥२५॥५८॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ३ ॥ परमात्मा का सदा स्थिर नाम जिन मनुष्यों (की जिंदगी) का आसरा बनता है~ उनको सदा आनंद मिलता है~ सदा सुख मिलता है। (क्योंकि) गुरू के शबद में जुड़ के उन्होंने वह सदा स्थिर परमात्मा पा लिया होता हैजो सारे दुख दूर करने की स्मर्था रखता है। वह मनुष्य सदा ही सदा स्थिर प्रभु के गुण गाते हैं~ वह सदा स्थिर प्रभु के नाम से प्यार करते हैं। परमात्मा ने अपनी कृपा करके उन्हें अपनी भक्ति का खजाना बख्श दिया है।1। हे (मेरे) मन! परमात्मा के गुण गाता रह, (गुण गाने से) सदा खुशी बनी रहती है। सदा स्थिर रहने वाले प्रभु की सिफत सलाह में जुड़ने से ही प्रभु मिलता है। (जो जीव सिफत सलाह करता है वह) परमात्मा की (याद में) लीन रहता है।1।रहाउ। सदा स्थिर प्रभु की भक्ति (के रंग) में जिस मनुष्य का रंग गाढ़ा रंगा जाता है~ वह आत्मिक अडोलता में प्रभु प्रेम में मस्त रहता है। गुरू के शबद में जुड़ के उस का मन (प्रभु चरणों में ऐसा) मस्त होता है कि उस (मस्ती) का बयान नहीं किया जा सकता। उसकी जीभ सदा स्थिर प्रभु की सिफत सलाह में रंगी जाती हैं~ प्रेम से प्रभु के गुण गा के वह आत्मिक जीवन देने वाला रस पीता है। पर ये रंग गुरू की शरण पड़ने से ही मिलता है (वही मनुष्य प्राप्त करता है) जिस पर प्रभु अपनी रजा मुताबिक मेहर करता है।2। जगत (का मोह) तौखले का मूल है। (मोह की नींद में) सोए हुए ही (जिंदगी रूपी) रात व्यतीत हो जाती है। कई (भाग्यशाली) जीवों को परमात्मा ने अपनी रजा में (जोड़ के इस मोह में से) निकाल लिया और खुद ही (अपने चरणों में) मिला लिया है। खुद ही (उनके अंदर से) माया का मोह दूर करके खुद ही उनके मन में आ बसा है। प्रभु ने खुद (ही) उनको इज्जत दी है। (भाग्यशाली लोगों को) परमात्मा गुरू की शरण में ला के (जीवन का सही राह) समझा देता है।3। परमात्मा ही सभ जीवों को दातें देने वाला है। जीवन राह से भटके हुओं को भी सूझ देता है। कई जीवों को उस प्रभु ने खुद ही अपने आप से दूर किया हुआ है और माया के मोह जाल में फंसा के रखा है। गुरू की मति पर चलने से परमात्मा मिलता है (गुरू की मति पर चलके जीव) अपनी सुरति को परमात्मा की ज्योति में मिलाता है~ और हे नानक! हर वक्त नाम के रंग में रंगे रह कर नाम में ही लीन रहता है।4।25।58।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਗੁਣਵੰਤੀ ਸਚੁ ਪਾਇਆ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਤਜਿ ਵਿਕਾਰ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਮਨੁ ਰੰਗਿਆ ਰਸਨਾ ਪ੍ਰੇਮ ਪਿਆਰਿ ॥
ਗੁਣਵੰਤੀ ਸਚੁ ਪਾਇਆ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਤਜਿ ਵਿਕਾਰ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਮਨੁ ਰੰਗਿਆ ਰਸਨਾ ਪ੍ਰੇਮ ਪਿਆਰਿ ॥
सिरीरागु महला ३ ॥
गुणवंती सचु पाइआ त्रिसना तजि विकार ॥
गुर सबदी मनु रंगिआ रसना प्रेम पिआरि ॥
गुणवंती सचु पाइआ त्रिसना तजि विकार ॥
गुर सबदी मनु रंगिआ रसना प्रेम पिआरि ॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ३ ॥ (हृदय में) गुण धारण करने वाली जीव-सत्री ने तृष्णा आदि विकार छोड़ के सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा को ढूंढ लिया है। उस का मन गुरू के शबद में रंगा गया है~ उसकी जीभ प्रभु के प्रेम-प्यार में रंगी गई है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 36 है, राग Siree Raag का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
Lohri की रात अगियारी के पास, गाने और तिल-गुड़।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 41 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 36” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Siree Raag राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 37 →, पीछे का: ← अंग 35।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।