अंग
35
राग Siree Raag
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਮਨਮੁਖ ਜਨਮੁ ਬਿਰਥਾ ਗਇਆ ਕਿਆ ਮੁਹੁ ਦੇਸੀ ਜਾਇ ॥੩॥
ਸਭ ਕਿਛੁ ਆਪੇ ਆਪਿ ਹੈ ਹਉਮੈ ਵਿਚਿ ਕਹਨੁ ਨ ਜਾਇ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਪਛਾਣੀਐ ਦੁਖੁ ਹਉਮੈ ਵਿਚਹੁ ਗਵਾਇ ॥
ਸਤਗੁਰੁ ਸੇਵਨਿ ਆਪਣਾ ਹਉ ਤਿਨ ਕੈ ਲਾਗਉ ਪਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਦਰਿ ਸਚੈ ਸਚਿਆਰ ਹਹਿ ਹਉ ਤਿਨ ਬਲਿਹਾਰੈ ਜਾਉ ॥੪॥੨੧॥੫੪॥
ਸਭ ਕਿਛੁ ਆਪੇ ਆਪਿ ਹੈ ਹਉਮੈ ਵਿਚਿ ਕਹਨੁ ਨ ਜਾਇ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਪਛਾਣੀਐ ਦੁਖੁ ਹਉਮੈ ਵਿਚਹੁ ਗਵਾਇ ॥
ਸਤਗੁਰੁ ਸੇਵਨਿ ਆਪਣਾ ਹਉ ਤਿਨ ਕੈ ਲਾਗਉ ਪਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਦਰਿ ਸਚੈ ਸਚਿਆਰ ਹਹਿ ਹਉ ਤਿਨ ਬਲਿਹਾਰੈ ਜਾਉ ॥੪॥੨੧॥੫੪॥
मनमुख जनमु बिरथा गइआ किआ मुहु देसी जाइ ॥३॥
सभ किछु आपे आपि है हउमै विचि कहनु न जाइ ॥
गुर कै सबदि पछाणीऐ दुखु हउमै विचहु गवाइ ॥
सतगुरु सेवनि आपणा हउ तिन कै लागउ पाइ ॥
नानक दरि सचै सचिआर हहि हउ तिन बलिहारै जाउ ॥४॥२१॥५४॥
सभ किछु आपे आपि है हउमै विचि कहनु न जाइ ॥
गुर कै सबदि पछाणीऐ दुखु हउमै विचहु गवाइ ॥
सतगुरु सेवनि आपणा हउ तिन कै लागउ पाइ ॥
नानक दरि सचै सचिआर हहि हउ तिन बलिहारै जाउ ॥४॥२१॥५४॥
हिन्दी अर्थ: अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य का जीवन व्यर्थ बीत जाता है। वह यहां से जा के आगे क्या मुँह दिखाएगा? (भाव~ प्रभु की हाजिरी में शर्मिन्दा ही होएगा)।3। (जीवों के भी क्या बस?) परमात्मा खुद ही सब कुछ करने के स्मर्थ है। (वैसे) अहम् में फसे हुए द्वारा (यह सच्चाई) नहीं बयान की जा सकती (भाव~ अहंकार में फंसे जीव को यह समझ नहीं आती कि परमात्मा खुद ही सब कुछ करने योग्य है)। गुरू के शबद की बरकति से अपने अंदर अहंकार का दुख दूर करके ये समझ आती है। जो लोग अपने गुरू की सेवा करते हैं (भाव~ गुरू के बताए राह पर चलते हैं)~ मैं उनके चरण छूता हूँ। हे नानक! (कह ) मैं उन लोगों से कुर्बान जाता हूँ~ जो सदा स्थिर प्रभु के दर पे सुर्खरू होते हैं।4।21।54।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਜੇ ਵੇਲਾ ਵਖਤੁ ਵੀਚਾਰੀਐ ਤਾ ਕਿਤੁ ਵੇਲਾ ਭਗਤਿ ਹੋਇ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮੇ ਰਤਿਆ ਸਚੇ ਸਚੀ ਸੋਇ ॥
ਇਕੁ ਤਿਲੁ ਪਿਆਰਾ ਵਿਸਰੈ ਭਗਤਿ ਕਿਨੇਹੀ ਹੋਇ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਸੀਤਲੁ ਸਾਚ ਸਿਉ ਸਾਸੁ ਨ ਬਿਰਥਾ ਕੋਇ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਮਨ ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇ ॥
ਸਾਚੀ ਭਗਤਿ ਤਾ ਥੀਐ ਜਾ ਹਰਿ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਹਜੇ ਖੇਤੀ ਰਾਹੀਐ ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਬੀਜੁ ਪਾਇ ॥
ਖੇਤੀ ਜੰਮੀ ਅਗਲੀ ਮਨੂਆ ਰਜਾ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥
ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਹੈ ਜਿਤੁ ਪੀਤੈ ਤਿਖ ਜਾਇ ॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਸਾਚਾ ਸਚਿ ਰਤਾ ਸਚੇ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥੨॥
ਆਖਣੁ ਵੇਖਣੁ ਬੋਲਣਾ ਸਬਦੇ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥
ਬਾਣੀ ਵਜੀ ਚਹੁ ਜੁਗੀ ਸਚੋ ਸਚੁ ਸੁਣਾਇ ॥
ਹਉਮੈ ਮੇਰਾ ਰਹਿ ਗਇਆ ਸਚੈ ਲਇਆ ਮਿਲਾਇ ॥
ਤਿਨ ਕਉ ਮਹਲੁ ਹਦੂਰਿ ਹੈ ਜੋ ਸਚਿ ਰਹੇ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥੩॥
ਨਦਰੀ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈਐ ਵਿਣੁ ਕਰਮਾ ਪਾਇਆ ਨ ਜਾਇ ॥
ਪੂਰੈ ਭਾਗਿ ਸਤਸੰਗਤਿ ਲਹੈ ਸਤਗੁਰੁ ਭੇਟੈ ਜਿਸੁ ਆਇ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮੇ ਰਤਿਆ ਦੁਖੁ ਬਿਖਿਆ ਵਿਚਹੁ ਜਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਵੜਾ ਨਾਮੇ ਨਾਮਿ ਸਮਾਇ ॥੪॥੨੨॥੫੫॥
ਜੇ ਵੇਲਾ ਵਖਤੁ ਵੀਚਾਰੀਐ ਤਾ ਕਿਤੁ ਵੇਲਾ ਭਗਤਿ ਹੋਇ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮੇ ਰਤਿਆ ਸਚੇ ਸਚੀ ਸੋਇ ॥
ਇਕੁ ਤਿਲੁ ਪਿਆਰਾ ਵਿਸਰੈ ਭਗਤਿ ਕਿਨੇਹੀ ਹੋਇ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਸੀਤਲੁ ਸਾਚ ਸਿਉ ਸਾਸੁ ਨ ਬਿਰਥਾ ਕੋਇ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਮਨ ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇ ॥
ਸਾਚੀ ਭਗਤਿ ਤਾ ਥੀਐ ਜਾ ਹਰਿ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਹਜੇ ਖੇਤੀ ਰਾਹੀਐ ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਬੀਜੁ ਪਾਇ ॥
ਖੇਤੀ ਜੰਮੀ ਅਗਲੀ ਮਨੂਆ ਰਜਾ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥
ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਹੈ ਜਿਤੁ ਪੀਤੈ ਤਿਖ ਜਾਇ ॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਸਾਚਾ ਸਚਿ ਰਤਾ ਸਚੇ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥੨॥
ਆਖਣੁ ਵੇਖਣੁ ਬੋਲਣਾ ਸਬਦੇ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥
ਬਾਣੀ ਵਜੀ ਚਹੁ ਜੁਗੀ ਸਚੋ ਸਚੁ ਸੁਣਾਇ ॥
ਹਉਮੈ ਮੇਰਾ ਰਹਿ ਗਇਆ ਸਚੈ ਲਇਆ ਮਿਲਾਇ ॥
ਤਿਨ ਕਉ ਮਹਲੁ ਹਦੂਰਿ ਹੈ ਜੋ ਸਚਿ ਰਹੇ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥੩॥
ਨਦਰੀ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈਐ ਵਿਣੁ ਕਰਮਾ ਪਾਇਆ ਨ ਜਾਇ ॥
ਪੂਰੈ ਭਾਗਿ ਸਤਸੰਗਤਿ ਲਹੈ ਸਤਗੁਰੁ ਭੇਟੈ ਜਿਸੁ ਆਇ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮੇ ਰਤਿਆ ਦੁਖੁ ਬਿਖਿਆ ਵਿਚਹੁ ਜਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਵੜਾ ਨਾਮੇ ਨਾਮਿ ਸਮਾਇ ॥੪॥੨੨॥੫੫॥
सिरीरागु महला ३ ॥
जे वेला वखतु वीचारीऐ ता कितु वेला भगति होइ ॥
अनदिनु नामे रतिआ सचे सची सोइ ॥
इकु तिलु पिआरा विसरै भगति किनेही होइ ॥
मनु तनु सीतलु साच सिउ सासु न बिरथा कोइ ॥१॥
मेरे मन हरि का नामु धिआइ ॥
साची भगति ता थीऐ जा हरि वसै मनि आइ ॥१॥ रहाउ ॥
सहजे खेती राहीऐ सचु नामु बीजु पाइ ॥
खेती जंमी अगली मनूआ रजा सहजि सुभाइ ॥
गुर का सबदु अंम्रितु है जितु पीतै तिख जाइ ॥
इहु मनु साचा सचि रता सचे रहिआ समाइ ॥२॥
आखणु वेखणु बोलणा सबदे रहिआ समाइ ॥
बाणी वजी चहु जुगी सचो सचु सुणाइ ॥
हउमै मेरा रहि गइआ सचै लइआ मिलाइ ॥
तिन कउ महलु हदूरि है जो सचि रहे लिव लाइ ॥३॥
नदरी नामु धिआईऐ विणु करमा पाइआ न जाइ ॥
पूरै भागि सतसंगति लहै सतगुरु भेटै जिसु आइ ॥
अनदिनु नामे रतिआ दुखु बिखिआ विचहु जाइ ॥
नानक सबदि मिलावड़ा नामे नामि समाइ ॥४॥२२॥५५॥
जे वेला वखतु वीचारीऐ ता कितु वेला भगति होइ ॥
अनदिनु नामे रतिआ सचे सची सोइ ॥
इकु तिलु पिआरा विसरै भगति किनेही होइ ॥
मनु तनु सीतलु साच सिउ सासु न बिरथा कोइ ॥१॥
मेरे मन हरि का नामु धिआइ ॥
साची भगति ता थीऐ जा हरि वसै मनि आइ ॥१॥ रहाउ ॥
सहजे खेती राहीऐ सचु नामु बीजु पाइ ॥
खेती जंमी अगली मनूआ रजा सहजि सुभाइ ॥
गुर का सबदु अंम्रितु है जितु पीतै तिख जाइ ॥
इहु मनु साचा सचि रता सचे रहिआ समाइ ॥२॥
आखणु वेखणु बोलणा सबदे रहिआ समाइ ॥
बाणी वजी चहु जुगी सचो सचु सुणाइ ॥
हउमै मेरा रहि गइआ सचै लइआ मिलाइ ॥
तिन कउ महलु हदूरि है जो सचि रहे लिव लाइ ॥३॥
नदरी नामु धिआईऐ विणु करमा पाइआ न जाइ ॥
पूरै भागि सतसंगति लहै सतगुरु भेटै जिसु आइ ॥
अनदिनु नामे रतिआ दुखु बिखिआ विचहु जाइ ॥
नानक सबदि मिलावड़ा नामे नामि समाइ ॥४॥२२॥५५॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ३ ॥ अगर (भक्ति करने के लिए) कोई खास बेला~ खास वक्त नियत करना विचारते रहें~ तो किसी वक्त भी भगती नहीं हो सकती। हर समय ही परमात्मा के नाम रंग में रंगे रह के सदा स्थिर प्रभु का रूप हो जाना है तभी सदा स्थिर रहने वाली शोभा मिलती है। वह कैसी भक्ति हुई अगर एक छिन भर भी प्यारा परमात्मा बिसर जाए? अगर एक श्वास भी परमात्मा की याद से खाली ना जाए तो सदा स्थिर प्रभु के साथ जुड़ा मन शांत हो जाता है~ शरीर भी शांत हो जाता है।1। हे मेरे मन! परमात्मा का नाम सिमर। सदा स्थिर रहने वाले प्रभु की भक्ति तभी हो सकती है जब (सिमरन की बरकति से) परमात्मा मनुष्य के मन में आ बसे।1।रहाउ। अगर आत्मिक अडोलता में टिक के प्रभु का सदा स्थिर नाम बीज बीज के (आत्मिक जीवन की) फसल बीजें; तो यह फसल बहुत उगती है। इस फसल को बीजने वाले मनुष्य का मन आत्मिक अडोलता व प्रेम में जुड़ के (तृष्णा की ओर से) तृप्त हो जाता है। सतिगुरू का शबद ऐसा अंमृत है (आत्मिक जीवन देने वाला जल है) जिसके पीने से (माया की) तृष्णा दूर हो जाती है। (नाम अंमृत पीने वाले मनुष्य का) यह मन अडोल हो जाता है। सदा स्थिर प्रभु में रंगा जाता है। और सदा स्थिर प्रभु की याद में ही लीन रहता है।2। जिन मनुष्यों का कहना~ देखना और बोलना (प्रभु की सिफत सलाह वाले) शबद में ही लीन रहता है (भाव~ जो लोग सदा सिफत सलाह में ही मगन रहते हैं) व हर तरफ परमात्मा को ही देखते हैं। सदा स्थिर प्रभु का नाम ही (औरों को) सुना सुना के उनकी शोभा (सारे संसार में) सदा के लिए कायम हो जाती है। इस वास्ते उनका अहम् समाप्त हो जाता है उनकी अपनॅत दूर हो जाती है। सदा स्थिर रहने वाला परमात्मा उनको अपनी याद में जोड़े रखता है। जो लोग सदा स्थिर रहने वाले प्रभु में लिव लगा के रखते हैं~ उनको प्रभु की हजूरी में जगह मिलती है।3। परमात्मा के मेहर की नजर से ही परमात्मा का नाम सिमरा जा सकता है। परमात्मा की मेहर के बिना वह मिल नहीं सकता। जिस मनुष्य की बड़िया किस्मत से साध-संगति मिल जाती है~ जिस को गुरू आ के मिलता है (इसकी बरकति से) हर वक्त प्रभु के नाम (रंग) में रंगे रहने के कारण उस मनुष्य के अंदर माया (के मोह) का दुख दूर हो जाता है। हे नानक ! गुरू के शबद द्वारा (परमात्मा से) मिलाप होता है (जिस मनुष्य को गुरू का शबद प्राप्त हो जाता है वह) परमात्मा के नाम में ही लीन रहता है।4।22।55।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਆਪਣਾ ਭਉ ਤਿਨ ਪਾਇਓਨੁ ਜਿਨ ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਬੀਚਾਰਿ ॥
ਸਤਸੰਗਤੀ ਸਦਾ ਮਿਲਿ ਰਹੇ ਸਚੇ ਕੇ ਗੁਣ ਸਾਰਿ ॥
ਦੁਬਿਧਾ ਮੈਲੁ ਚੁਕਾਈਅਨੁ ਹਰਿ ਰਾਖਿਆ ਉਰ ਧਾਰਿ ॥
ਸਚੀ ਬਾਣੀ ਸਚੁ ਮਨਿ ਸਚੇ ਨਾਲਿ ਪਿਆਰੁ ॥੧॥
ਮਨ ਮੇਰੇ ਹਉਮੈ ਮੈਲੁ ਭਰ ਨਾਲਿ ॥
ਹਰਿ ਨਿਰਮਲੁ ਸਦਾ ਸੋਹਣਾ ਸਬਦਿ ਸਵਾਰਣਹਾਰੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਮਨੁ ਮੋਹਿਆ ਪ੍ਰਭਿ ਆਪੇ ਲਏ ਮਿਲਾਇ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮੇ ਰਤਿਆ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਸਮਾਇ ॥
ਜੋਤੀ ਹੂ ਪ੍ਰਭੁ ਜਾਪਦਾ ਬਿਨੁ ਸਤਗੁਰ ਬੂਝ ਨ ਪਾਇ ॥
ਜਿਨ ਕਉ ਪੂਰਬਿ ਲਿਖਿਆ ਸਤਗੁਰੁ ਭੇਟਿਆ ਤਿਨ ਆਇ ॥੨॥
ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਸਭ ਡੁਮਣੀ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਖੁਆਇ ॥
ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਘੜੀ ਨ ਜੀਵਦੀ ਦੁਖੀ ਰੈਣਿ ਵਿਹਾਇ ॥
ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਣਾ ਅੰਧੁਲਾ ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਆਵੈ ਜਾਇ ॥
ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਪ੍ਰਭੁ ਆਪਣੀ ਆਪੇ ਲਏ ਮਿਲਾਇ ॥੩॥
ਆਪਣਾ ਭਉ ਤਿਨ ਪਾਇਓਨੁ ਜਿਨ ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਬੀਚਾਰਿ ॥
ਸਤਸੰਗਤੀ ਸਦਾ ਮਿਲਿ ਰਹੇ ਸਚੇ ਕੇ ਗੁਣ ਸਾਰਿ ॥
ਦੁਬਿਧਾ ਮੈਲੁ ਚੁਕਾਈਅਨੁ ਹਰਿ ਰਾਖਿਆ ਉਰ ਧਾਰਿ ॥
ਸਚੀ ਬਾਣੀ ਸਚੁ ਮਨਿ ਸਚੇ ਨਾਲਿ ਪਿਆਰੁ ॥੧॥
ਮਨ ਮੇਰੇ ਹਉਮੈ ਮੈਲੁ ਭਰ ਨਾਲਿ ॥
ਹਰਿ ਨਿਰਮਲੁ ਸਦਾ ਸੋਹਣਾ ਸਬਦਿ ਸਵਾਰਣਹਾਰੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਮਨੁ ਮੋਹਿਆ ਪ੍ਰਭਿ ਆਪੇ ਲਏ ਮਿਲਾਇ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮੇ ਰਤਿਆ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਸਮਾਇ ॥
ਜੋਤੀ ਹੂ ਪ੍ਰਭੁ ਜਾਪਦਾ ਬਿਨੁ ਸਤਗੁਰ ਬੂਝ ਨ ਪਾਇ ॥
ਜਿਨ ਕਉ ਪੂਰਬਿ ਲਿਖਿਆ ਸਤਗੁਰੁ ਭੇਟਿਆ ਤਿਨ ਆਇ ॥੨॥
ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਸਭ ਡੁਮਣੀ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਖੁਆਇ ॥
ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਘੜੀ ਨ ਜੀਵਦੀ ਦੁਖੀ ਰੈਣਿ ਵਿਹਾਇ ॥
ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਣਾ ਅੰਧੁਲਾ ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਆਵੈ ਜਾਇ ॥
ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਪ੍ਰਭੁ ਆਪਣੀ ਆਪੇ ਲਏ ਮਿਲਾਇ ॥੩॥
सिरीरागु महला ३ ॥
आपणा भउ तिन पाइओनु जिन गुर का सबदु बीचारि ॥
सतसंगती सदा मिलि रहे सचे के गुण सारि ॥
दुबिधा मैलु चुकाईअनु हरि राखिआ उर धारि ॥
सची बाणी सचु मनि सचे नालि पिआरु ॥१॥
मन मेरे हउमै मैलु भर नालि ॥
हरि निरमलु सदा सोहणा सबदि सवारणहारु ॥१॥ रहाउ ॥
सचै सबदि मनु मोहिआ प्रभि आपे लए मिलाइ ॥
अनदिनु नामे रतिआ जोती जोति समाइ ॥
जोती हू प्रभु जापदा बिनु सतगुर बूझ न पाइ ॥
जिन कउ पूरबि लिखिआ सतगुरु भेटिआ तिन आइ ॥२॥
विणु नावै सभ डुमणी दूजै भाइ खुआइ ॥
तिसु बिनु घड़ी न जीवदी दुखी रैणि विहाइ ॥
भरमि भुलाणा अंधुला फिरि फिरि आवै जाइ ॥
नदरि करे प्रभु आपणी आपे लए मिलाइ ॥३॥
आपणा भउ तिन पाइओनु जिन गुर का सबदु बीचारि ॥
सतसंगती सदा मिलि रहे सचे के गुण सारि ॥
दुबिधा मैलु चुकाईअनु हरि राखिआ उर धारि ॥
सची बाणी सचु मनि सचे नालि पिआरु ॥१॥
मन मेरे हउमै मैलु भर नालि ॥
हरि निरमलु सदा सोहणा सबदि सवारणहारु ॥१॥ रहाउ ॥
सचै सबदि मनु मोहिआ प्रभि आपे लए मिलाइ ॥
अनदिनु नामे रतिआ जोती जोति समाइ ॥
जोती हू प्रभु जापदा बिनु सतगुर बूझ न पाइ ॥
जिन कउ पूरबि लिखिआ सतगुरु भेटिआ तिन आइ ॥२॥
विणु नावै सभ डुमणी दूजै भाइ खुआइ ॥
तिसु बिनु घड़ी न जीवदी दुखी रैणि विहाइ ॥
भरमि भुलाणा अंधुला फिरि फिरि आवै जाइ ॥
नदरि करे प्रभु आपणी आपे लए मिलाइ ॥३॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ३ ॥ उस परमात्मा ने अपना डर-अदब उन लोगों के हृदय में डाल दिया है~ जिन्होंने गुरू के शबद को अपने सोच-मण्डल में टिकाया है। वह लोग सदा स्थिर प्रभु के गुणों को (अपने हृदय में) सम्भाल के साध-संगति में मिल के रहते हैं। उस (परमात्मा) ने खुद उन लोगों की दुबिधा की मैल दूर कर कर दी है~ वह लोग परमात्मा के नाम को अपने हृदय में टिका के रखते हैं। सदा स्थिर प्रभु की सिफत सलाह की बाणी उनके मन में बसती है। सदा स्थिर प्रभु खुद उनके मन में बसता है~ उन लोगों का सदा स्थिर प्रभु से प्यार हो जाता है।1। हे मेरे मन ! संसार समुंद्र में अहम् की मैल (प्रबल) है। परमात्मा (इस) मैल के बगैर है और (इस वास्ते) सदा सुंदर है। (वह निर्मल परमात्मा जीवों को गुरू के) शबद में जोड़ के सुंदर बनाने के समरथ है (हे मन ! तू भी गुरू के शबद में जुड़)।1।रहाउ। जिन मनुष्यों का मन सदा स्थिर प्रभु की सिफत सलाह के शबद में मस्त रहता है~ उनको सदा स्थिर प्रभु ने स्वयं ही (अपने चरणों में) जोड़ लिया है। हर वक्त प्रभु के नाम में रंगे रहने के कारण उनकी जोति प्रभु की जोति में लीन रहती है। परमात्मा उस अंदरूनी ज्योति के द्वारा ही दिखाई देता है। पर गुरू के बिना उस ज्योति (प्रकाश) की समझ नहीं पड़ती और गुरू उन लोगों को आ के मिलता है जिनके भाग्य में धुर (प्रभु की दरगाह) से ही लेख लिखे हों।2। सारा ही संसार परमात्मा के नाम के बिना दुबिधा में फंसा रहता है~ और माया के प्यार में (पड़ के सही जीवन राह से) वंचित रह जाता है। उस (प्रभु नाम) के बिनां एक घड़ी भर भी आत्मिक जीवन नहीं जी सकते~ दुखों में ही जिंदगी की रात बीत जाती है। माया के मोह में अंधा हुआ जीव भटकनों में पड़ कर जीवन राह से भटक जाता है और बार बार पैदा होता रहता है। जब प्रभु मेहर की निगाह करता है~ तब~ खुद ही (उसको अपने चरणों में) जोड़ लेता है।3।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 35 है, राग Siree Raag का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
Karwa Chauth की रात, चाँद का इंतज़ार, और बीच में हाथों की मेहंदी।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 39 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 35” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Siree Raag राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 36 →, पीछे का: ← अंग 34।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।