अंग 34

अंग
34
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਬਦਿ ਮੰਨਿਐ ਗੁਰੁ ਪਾਈਐ ਵਿਚਹੁ ਆਪੁ ਗਵਾਇ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਭਗਤਿ ਕਰੇ ਸਦਾ ਸਾਚੇ ਕੀ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਨਾਨਕ ਸਹਜਿ ਸਮਾਇ ॥੪॥੧੯॥੫੨॥
सबदि मंनिऐ गुरु पाईऐ विचहु आपु गवाइ ॥
अनदिनु भगति करे सदा साचे की लिव लाइ ॥
नामु पदारथु मनि वसिआ नानक सहजि समाइ ॥४॥१९॥५२॥

हिन्दी अर्थ: अगर गुरू के शबद में श्रद्धा बन जाए तो गुरू मिल जाता है (जो मनुष्य गुरू के शबद में श्रद्धा बनाता है वह अपने) अंदर से अहम् दूर कर लेता है। वह हर वक्त सदा स्थिर प्रभु के चरणों में सुरति जोड़ के सदा उसकी भक्ति करता है। हे नानक ! उस के मन में परमात्मा का अमुल्य नाम आ बसता है। वह आत्मिक अडोलता में भी टिका रहता है।4।19।52।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਜਿਨੀ ਪੁਰਖੀ ਸਤਗੁਰੁ ਨ ਸੇਵਿਓ ਸੇ ਦੁਖੀਏ ਜੁਗ ਚਾਰਿ ॥
ਘਰਿ ਹੋਦਾ ਪੁਰਖੁ ਨ ਪਛਾਣਿਆ ਅਭਿਮਾਨਿ ਮੁਠੇ ਅਹੰਕਾਰਿ ॥
ਸਤਗੁਰੂ ਕਿਆ ਫਿਟਕਿਆ ਮੰਗਿ ਥਕੇ ਸੰਸਾਰਿ ॥
ਸਚਾ ਸਬਦੁ ਨ ਸੇਵਿਓ ਸਭਿ ਕਾਜ ਸਵਾਰਣਹਾਰੁ ॥੧॥
ਮਨ ਮੇਰੇ ਸਦਾ ਹਰਿ ਵੇਖੁ ਹਦੂਰਿ ॥
ਜਨਮ ਮਰਨ ਦੁਖੁ ਪਰਹਰੈ ਸਬਦਿ ਰਹਿਆ ਭਰਪੂਰਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਚੁ ਸਲਾਹਨਿ ਸੇ ਸਚੇ ਸਚਾ ਨਾਮੁ ਅਧਾਰੁ ॥
ਸਚੀ ਕਾਰ ਕਮਾਵਣੀ ਸਚੇ ਨਾਲਿ ਪਿਆਰੁ ॥
ਸਚਾ ਸਾਹੁ ਵਰਤਦਾ ਕੋਇ ਨ ਮੇਟਣਹਾਰੁ ॥
ਮਨਮੁਖ ਮਹਲੁ ਨ ਪਾਇਨੀ ਕੂੜਿ ਮੁਠੇ ਕੂੜਿਆਰ ॥੨॥
ਹਉਮੈ ਕਰਤਾ ਜਗੁ ਮੁਆ ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਘੋਰ ਅੰਧਾਰੁ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਵਿਸਾਰਿਆ ਸੁਖਦਾਤਾ ਦਾਤਾਰੁ ॥
ਸਤਗੁਰੁ ਸੇਵਹਿ ਤਾ ਉਬਰਹਿ ਸਚੁ ਰਖਹਿ ਉਰ ਧਾਰਿ ॥
ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਹਰਿ ਪਾਈਐ ਸਚਿ ਸਬਦਿ ਵੀਚਾਰਿ ॥੩॥
ਸਤਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲਾ ਹਉਮੈ ਤਜਿ ਵਿਕਾਰ ॥
ਆਪੁ ਛੋਡਿ ਜੀਵਤ ਮਰੈ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਵੀਚਾਰ ॥
ਧੰਧਾ ਧਾਵਤ ਰਹਿ ਗਏ ਲਾਗਾ ਸਾਚਿ ਪਿਆਰੁ ॥
ਸਚਿ ਰਤੇ ਮੁਖ ਉਜਲੇ ਤਿਤੁ ਸਾਚੈ ਦਰਬਾਰਿ ॥੪॥
ਸਤਗੁਰੁ ਪੁਰਖੁ ਨ ਮੰਨਿਓ ਸਬਦਿ ਨ ਲਗੋ ਪਿਆਰੁ ॥
ਇਸਨਾਨੁ ਦਾਨੁ ਜੇਤਾ ਕਰਹਿ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਖੁਆਰੁ ॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਆਪਣੀ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇ ਤਾ ਲਾਗੈ ਨਾਮ ਪਿਆਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਿ ਤੂ ਗੁਰ ਕੈ ਹੇਤਿ ਅਪਾਰਿ ॥੫॥੨੦॥੫੩॥
सिरीरागु महला ३ ॥
जिनी पुरखी सतगुरु न सेविओ से दुखीए जुग चारि ॥
घरि होदा पुरखु न पछाणिआ अभिमानि मुठे अहंकारि ॥
सतगुरू किआ फिटकिआ मंगि थके संसारि ॥
सचा सबदु न सेविओ सभि काज सवारणहारु ॥१॥
मन मेरे सदा हरि वेखु हदूरि ॥
जनम मरन दुखु परहरै सबदि रहिआ भरपूरि ॥१॥ रहाउ ॥
सचु सलाहनि से सचे सचा नामु अधारु ॥
सची कार कमावणी सचे नालि पिआरु ॥
सचा साहु वरतदा कोइ न मेटणहारु ॥
मनमुख महलु न पाइनी कूड़ि मुठे कूड़िआर ॥२॥
हउमै करता जगु मुआ गुर बिनु घोर अंधारु ॥
माइआ मोहि विसारिआ सुखदाता दातारु ॥
सतगुरु सेवहि ता उबरहि सचु रखहि उर धारि ॥
किरपा ते हरि पाईऐ सचि सबदि वीचारि ॥३॥
सतगुरु सेवि मनु निरमला हउमै तजि विकार ॥
आपु छोडि जीवत मरै गुर कै सबदि वीचार ॥
धंधा धावत रहि गए लागा साचि पिआरु ॥
सचि रते मुख उजले तितु साचै दरबारि ॥४॥
सतगुरु पुरखु न मंनिओ सबदि न लगो पिआरु ॥
इसनानु दानु जेता करहि दूजै भाइ खुआरु ॥
हरि जीउ आपणी क्रिपा करे ता लागै नाम पिआरु ॥
नानक नामु समालि तू गुर कै हेति अपारि ॥५॥२०॥५३॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ३ ॥ जिन लोगों ने गुरू की बताई हुई सेवा नहीं की~ वह चारों युगों में दुखी रहते हैं। (अर्थात~ युग चाहे कोई भी हो गुरू की शरण के बिना दुख है)। वो मनुष्य हृदय घर में बसते परमात्मा को नहीं पहिचान सकते~ वह अहंकार में अभिमान में (फंसे रहके आत्मिक जीवन की रास पूँजी) लुटा बैठते हैं। गुरू द्वारा बेमुख मनुष्य जगत में मांगते फिरते है। (माया खातिर भटकते फिरते हैं)। वह बंदे उस अटल गुर शबद को नहीं सिमरते जो सारे कार्य सवारने में समर्थ है।1। हे मेरे मन ! परमात्मा को सदा (अपने) अंग संग देख। परमात्मा (जीवों का) जन्म-मरन का दूख दूर कर देता है। वह गुरू के शबद में भरपूर बस रहा है (इस वास्ते~ हे मन ! गुरू का शबद अपने अंदर धारण कर)।1।रहाउ। जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभु की सिफत सलाह करते हैं वह उस सदा स्थिर का ही रूप् हो जाते हैं। परमात्मा का सदा स्थिर नाम उनकी (जिंदगी का) आसरा बन जाता है। जिन्होंने सिमरन की ये सदा स्थिर रहने वाली कार की है~ उनका प्यार सदा स्थिर प्रभु से बन जाता है। परमात्मा ही सदा स्थिर रहने वाला शाह है~ (जिसका हुकम जगत में) चल रहा है। कोई भी जीव उसके हुकम की उलंघना नहीं कर सकता। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य परमात्मा का दर घर नहीं ढूंढ सकता। नाशवंत जगत के व्यापारी झूठे मोह में ही (आत्मिक जीवन की रास पूँजी) ठगा बैठते हैं।2। जगत ‘मैं मैं’ करता ही (भाव~ मैं बड़ा हूं~ मैं बड़ा हूं- इस अहंकार में) जीव आत्मिक मौत ले लेता है। गुरू की शरण से वंचित रह कर (उसके जीवन में) घोर अंधकार (बना रहता) है। माया के मोह में फस के (इस ने) सुखदायक और सभ पदार्थ देने वाले परमात्मा को भुला दिया है। जब जीव गुरू की बताई हुई सेवा करते हैं~ तब (माया के मोह के घोर अंधेरे में) बच जाते हैं तथा सदा स्थिर प्रभु को अपने दिल में बसा के रखते हैं। प्रभु अपनी मेहर से ही मिलता है। (सिमरन से ही) सदा स्थिर गुरू शबद के द्वारा (उस के गुणों की) विचार की जा सकती है।3। गुरू द्वारा बताई सेवा करके अहम् से पैदा होने वाले विकार छोड़ के (मनुष्य का) मन पवित्र हो जाता है। गुरू के शबद द्वारा (प्रभु के गुणों के) विचार (हृदय में टिका के)~ और स्वै-भाव दूर करके मनुष्य दुनिया के कार्य-व्यवहार करता हुआ विकारों से बचा रहता है। जिन मनुष्यों का सदा स्थिर प्रभु (के चरणों में) प्यार बन जाता है~ वह मोह के झमेलों की भटकनों से बच जाते हैं। सदा स्थिर प्रभु के रंग में रंगे हुए लोग सदा स्थिर प्रभु के दरबार में सुर्खरू हो जाते हैं।4। जिन लोगों ने सतगुरू को (अपने जीवन का रहिबर) नहीं माना~ जिन का गुरू शबद में प्यार नहीं बना~ वे जितना भी (तीर्थ) स्नान करते हैं~ जितना भी दान पुंन करते हैं~ माया के प्यार के कारण वह सारा उन्हें खुआर ही करता है। जब परमात्मा खुद अपनी मेहर करे~ तब ही जीव का उसके नाम से प्यार बनता है। हे नानक! गुरू के अटुट प्रेम की बरकति सेतू परमात्मा का नाम (अपने हृदय में) सम्भाल के रख।5।20।53।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਕਿਸੁ ਹਉ ਸੇਵੀ ਕਿਆ ਜਪੁ ਕਰੀ ਸਤਗੁਰ ਪੂਛਉ ਜਾਇ ॥
ਸਤਗੁਰ ਕਾ ਭਾਣਾ ਮੰਨਿ ਲਈ ਵਿਚਹੁ ਆਪੁ ਗਵਾਇ ॥
ਏਹਾ ਸੇਵਾ ਚਾਕਰੀ ਨਾਮੁ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥
ਨਾਮੈ ਹੀ ਤੇ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਸੁਹਾਇ ॥੧॥
ਮਨ ਮੇਰੇ ਅਨਦਿਨੁ ਜਾਗੁ ਹਰਿ ਚੇਤਿ ॥
ਆਪਣੀ ਖੇਤੀ ਰਖਿ ਲੈ ਕੂੰਜ ਪੜੈਗੀ ਖੇਤਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਨ ਕੀਆ ਇਛਾ ਪੂਰੀਆ ਸਬਦਿ ਰਹਿਆ ਭਰਪੂਰਿ ॥
ਭੈ ਭਾਇ ਭਗਤਿ ਕਰਹਿ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਹਰਿ ਜੀਉ ਵੇਖੈ ਸਦਾ ਹਦੂਰਿ ॥
ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਸਦਾ ਮਨੁ ਰਾਤਾ ਭ੍ਰਮੁ ਗਇਆ ਸਰੀਰਹੁ ਦੂਰਿ ॥
ਨਿਰਮਲੁ ਸਾਹਿਬੁ ਪਾਇਆ ਸਾਚਾ ਗੁਣੀ ਗਹੀਰੁ ॥੨॥
ਜੋ ਜਾਗੇ ਸੇ ਉਬਰੇ ਸੂਤੇ ਗਏ ਮੁਹਾਇ ॥
ਸਚਾ ਸਬਦੁ ਨ ਪਛਾਣਿਓ ਸੁਪਨਾ ਗਇਆ ਵਿਹਾਇ ॥
ਸੁੰਞੇ ਘਰ ਕਾ ਪਾਹੁਣਾ ਜਿਉ ਆਇਆ ਤਿਉ ਜਾਇ ॥
सिरीरागु महला ३ ॥
किसु हउ सेवी किआ जपु करी सतगुर पूछउ जाइ ॥
सतगुर का भाणा मंनि लई विचहु आपु गवाइ ॥
एहा सेवा चाकरी नामु वसै मनि आइ ॥
नामै ही ते सुखु पाईऐ सचै सबदि सुहाइ ॥१॥
मन मेरे अनदिनु जागु हरि चेति ॥
आपणी खेती रखि लै कूंज पड़ैगी खेति ॥१॥ रहाउ ॥
मन कीआ इछा पूरीआ सबदि रहिआ भरपूरि ॥
भै भाइ भगति करहि दिनु राती हरि जीउ वेखै सदा हदूरि ॥
सचै सबदि सदा मनु राता भ्रमु गइआ सरीरहु दूरि ॥
निरमलु साहिबु पाइआ साचा गुणी गहीरु ॥२॥
जो जागे से उबरे सूते गए मुहाइ ॥
सचा सबदु न पछाणिओ सुपना गइआ विहाइ ॥
सुंञे घर का पाहुणा जिउ आइआ तिउ जाइ ॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ३ ॥ जब मैं अपने गुरू से पूछता हूँ कि (विकारों से बचनेके लिए) मैं किस की सेवा करूँ और कौन सा जप करूँ। (तो गुरू की ओर से उपदेश मिलता है कि) मैं अपने अंदर के अहंकार को दूर करके गुरू का हुकम मानूं। (गुरू का हुकम मानना ही एक) ऐसी सेवा है एैसी चाकरी है (जिसकी बरकति से परमात्मा का) नाम मन में आ बसता है। परमात्मा के नाम से ही आत्मिक आनन्द मिलता है~ और परमात्मा की सिफत सलाह की बाणी से ही आत्मिक जीवन खूबसूरत बन जाता है।1। हे मेरे मन ! हर वक्त (विकारों के हमले से) सुचेत रह और परमात्मा का नाम सिमर। इस तरह अपने आत्मिक जीवन की फसल (इन विकारों से) बचा ले। अंत को तेरे उम्र के खेत में कूँज आ पड़ेगी (भाव~ वृद्ध अवस्था आ पहुँचेगी)।1।रहाउ। जो लोग परमात्मा के अदब व प्रेम में रह के उसकी भक्ति दिन रात करते हैं~ उनके मन की इच्छाएं पूरी हो जाती हैं (अर्थात~ मन कामना रहित हो जाता है)। गुरू के शबद की बरकति से उनको परमात्मा हर जगह व्यापक दिखता है (उन्हें यकीन बन जाता है कि) परमात्मा हर जगह हाजर-नाजर (हो के सभ जीवों की) संभाल करता है। उनका मन सदा स्थिर प्रभु की सिफत सलाह की बाणी में रंगा रहता है। भटकन उनके शरीर में से बिल्कुल ही खत्म हो जाती है। वह सदा स्थिर रहने वाले गुणों के खजाने पवित्र स्वरूप मालक प्रभु को मिल जाते हैं।2। जो लोग (माया के हमलों से) सुचेत रहते हैं~ वह (विकारों से) बच जाते हैं। जो (माया की) नींद में सो जाते हैं~ वे आत्मिक जीवन की राशि पूँजी लुटा जाते हैं। वो सदा स्थिर प्रभु की सिफत सलाह की बाणी की सार नहीं जानते। उनकी जिंदगी सुपने की तरह (व्यर्थ) बीत जाती है। वह जगत से ठीक उसी तरह खाली हाथ चले जाते हैं जैसे किसी सूने घर से कोई मेहमान आ के चला जाता है।

संदर्भ: यह अंग 34 है, राग Siree Raag का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।

Holi के दूसरे दिन (puddva), सब रंग धुल चुके, और घर का calm।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 40 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 34” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Siree Raag राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 35 →, पीछे का: ← अंग 33

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।