अंग
33
राग Siree Raag
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਤਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਸਦ ਭੈ ਰਚੈ ਆਪਿ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥੧॥
ਭਾਈ ਰੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੂਝੈ ਕੋਇ ॥
ਬਿਨੁ ਬੂਝੇ ਕਰਮ ਕਮਾਵਣੇ ਜਨਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਖੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਿਨੀ ਚਾਖਿਆ ਤਿਨੀ ਸਾਦੁ ਪਾਇਆ ਬਿਨੁ ਚਾਖੇ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਇ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਸਾਚਾ ਨਾਮੁ ਹੈ ਕਹਣਾ ਕਛੂ ਨ ਜਾਇ ॥
ਪੀਵਤ ਹੂ ਪਰਵਾਣੁ ਭਇਆ ਪੂਰੈ ਸਬਦਿ ਸਮਾਇ ॥੨॥
ਆਪੇ ਦੇਇ ਤ ਪਾਈਐ ਹੋਰੁ ਕਰਣਾ ਕਿਛੂ ਨ ਜਾਇ ॥
ਦੇਵਣ ਵਾਲੇ ਕੈ ਹਥਿ ਦਾਤਿ ਹੈ ਗੁਰੂ ਦੁਆਰੈ ਪਾਇ ॥
ਜੇਹਾ ਕੀਤੋਨੁ ਤੇਹਾ ਹੋਆ ਜੇਹੇ ਕਰਮ ਕਮਾਇ ॥੩॥
ਜਤੁ ਸਤੁ ਸੰਜਮੁ ਨਾਮੁ ਹੈ ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਨਿਰਮਲੁ ਨ ਹੋਇ ॥
ਪੂਰੈ ਭਾਗਿ ਨਾਮੁ ਮਨਿ ਵਸੈ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਵਾ ਹੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਸਹਜੇ ਹੀ ਰੰਗਿ ਵਰਤਦਾ ਹਰਿ ਗੁਣ ਪਾਵੈ ਸੋਇ ॥੪॥੧੭॥੫੦॥
ਭਾਈ ਰੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੂਝੈ ਕੋਇ ॥
ਬਿਨੁ ਬੂਝੇ ਕਰਮ ਕਮਾਵਣੇ ਜਨਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਖੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਿਨੀ ਚਾਖਿਆ ਤਿਨੀ ਸਾਦੁ ਪਾਇਆ ਬਿਨੁ ਚਾਖੇ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਇ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਸਾਚਾ ਨਾਮੁ ਹੈ ਕਹਣਾ ਕਛੂ ਨ ਜਾਇ ॥
ਪੀਵਤ ਹੂ ਪਰਵਾਣੁ ਭਇਆ ਪੂਰੈ ਸਬਦਿ ਸਮਾਇ ॥੨॥
ਆਪੇ ਦੇਇ ਤ ਪਾਈਐ ਹੋਰੁ ਕਰਣਾ ਕਿਛੂ ਨ ਜਾਇ ॥
ਦੇਵਣ ਵਾਲੇ ਕੈ ਹਥਿ ਦਾਤਿ ਹੈ ਗੁਰੂ ਦੁਆਰੈ ਪਾਇ ॥
ਜੇਹਾ ਕੀਤੋਨੁ ਤੇਹਾ ਹੋਆ ਜੇਹੇ ਕਰਮ ਕਮਾਇ ॥੩॥
ਜਤੁ ਸਤੁ ਸੰਜਮੁ ਨਾਮੁ ਹੈ ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਨਿਰਮਲੁ ਨ ਹੋਇ ॥
ਪੂਰੈ ਭਾਗਿ ਨਾਮੁ ਮਨਿ ਵਸੈ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਵਾ ਹੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਸਹਜੇ ਹੀ ਰੰਗਿ ਵਰਤਦਾ ਹਰਿ ਗੁਣ ਪਾਵੈ ਸੋਇ ॥੪॥੧੭॥੫੦॥
सतगुरि मिलिऐ सद भै रचै आपि वसै मनि आइ ॥१॥
भाई रे गुरमुखि बूझै कोइ ॥
बिनु बूझे करम कमावणे जनमु पदारथु खोइ ॥१॥ रहाउ ॥
जिनी चाखिआ तिनी सादु पाइआ बिनु चाखे भरमि भुलाइ ॥
अंम्रितु साचा नामु है कहणा कछू न जाइ ॥
पीवत हू परवाणु भइआ पूरै सबदि समाइ ॥२॥
आपे देइ त पाईऐ होरु करणा किछू न जाइ ॥
देवण वाले कै हथि दाति है गुरू दुआरै पाइ ॥
जेहा कीतोनु तेहा होआ जेहे करम कमाइ ॥३॥
जतु सतु संजमु नामु है विणु नावै निरमलु न होइ ॥
पूरै भागि नामु मनि वसै सबदि मिलावा होइ ॥
नानक सहजे ही रंगि वरतदा हरि गुण पावै सोइ ॥४॥१७॥५०॥
भाई रे गुरमुखि बूझै कोइ ॥
बिनु बूझे करम कमावणे जनमु पदारथु खोइ ॥१॥ रहाउ ॥
जिनी चाखिआ तिनी सादु पाइआ बिनु चाखे भरमि भुलाइ ॥
अंम्रितु साचा नामु है कहणा कछू न जाइ ॥
पीवत हू परवाणु भइआ पूरै सबदि समाइ ॥२॥
आपे देइ त पाईऐ होरु करणा किछू न जाइ ॥
देवण वाले कै हथि दाति है गुरू दुआरै पाइ ॥
जेहा कीतोनु तेहा होआ जेहे करम कमाइ ॥३॥
जतु सतु संजमु नामु है विणु नावै निरमलु न होइ ॥
पूरै भागि नामु मनि वसै सबदि मिलावा होइ ॥
नानक सहजे ही रंगि वरतदा हरि गुण पावै सोइ ॥४॥१७॥५०॥
हिन्दी अर्थ: गुरू के मिलने से मनुष्य का हृदय सदा परमत्मा के डर-अदब में भीगा रहता है। (और इस तरह) परमात्मा स्वयं मनुष्य के हृदय में आ बसता है।1। हे भाई ! जो कोई मनुष्य (सही जीवन जुगति) समझता है वह गुरू के द्वारा ही समझता है। (सही जीवन जुगति) समझने के बिना (निहित धार्मिक) कर्म करने से मनुष्य कीमती मानव जनम गवा लेता है।1।रहाउ। जिन्होंने ये अमृत चखा है उन्होंने इसके स्वाद का आनन्द लिया है। (नाम अमृत का स्वाद) चखने के बिना मनुष्य माया की भटकन में पड़ कर गलत रास्ते पर पड़ जाता है। परमात्मा का सदा स्थिर एक नाम आत्मिक जीवन देने वाला रस है। इसके स्वाद का वर्णन नहीं किया जा सकता। पूरे गुरू के शबद में लीन हो के नाम अमृत पीते ही मनुष्य (प्रभु की हजूरी में) कबूल हो जाता है।2। (नाम अमृत की दात) अगर परमात्मा खुद ही दे तो मिलती है। (अगर उसकी मेहर ना हो तो) और कोई चारा नहीं किया जा सकता। (नाम की दाति) देने वाले परमात्मा के अपने हाथ में यह दात है। (उसकी रजा के अनुसार) गुरू के दर से ही मिलती है। (परमात्मा ने जीव को) जिस तरह का बनाया~ जीव वैसा ही बन गया। (फिर) वैसे ही कर्म जीव करता है। (उसकी रजा अनुसार ही जीव गुरू के दर पर आता है)।3। (मनुष्य अपने जीवन को पवित्र करने के लिए जत सत संजम साधनाएं करता है~ पर नाम सिमरन के बिना ये किसी काम के नहीं।) परमात्मा का नाम-अमृत ही जत है~ नाम ही सत है और नाम ही संजम है। नाम के बिना मनुष्य पवित्र जीवन वाला नहीं हो सकता। बहुत किस्मत के साथ जिस मनुष्य के मन में परमात्मा का नाम आ बसता है~ गुरू के शबद द्वारा मनुष्य का प्रभु से मिलाप हो जाता है। हे नानक! (गुरू के शबद की बरकति से) जो मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिक के परमात्मा के प्रेम रंग में जीवन व्यतीत करता है वह मनुष्य परमात्मा के गुण अपने अंदर बसा लेता है।4।17।50।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਕਾਂਇਆ ਸਾਧੈ ਉਰਧ ਤਪੁ ਕਰੈ ਵਿਚਹੁ ਹਉਮੈ ਨ ਜਾਇ ॥
ਅਧਿਆਤਮ ਕਰਮ ਜੇ ਕਰੇ ਨਾਮੁ ਨ ਕਬ ਹੀ ਪਾਇ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਜੀਵਤੁ ਮਰੈ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥੧॥
ਸੁਣਿ ਮਨ ਮੇਰੇ ਭਜੁ ਸਤਗੁਰ ਸਰਣਾ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਛੁਟੀਐ ਬਿਖੁ ਭਵਜਲੁ ਸਬਦਿ ਗੁਰ ਤਰਣਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਸਭਾ ਧਾਤੁ ਹੈ ਦੂਜਾ ਭਾਉ ਵਿਕਾਰੁ ॥
ਪੰਡਿਤੁ ਪੜੈ ਬੰਧਨ ਮੋਹ ਬਾਧਾ ਨਹ ਬੂਝੈ ਬਿਖਿਆ ਪਿਆਰਿ ॥
ਸਤਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਤ੍ਰਿਕੁਟੀ ਛੂਟੈ ਚਉਥੈ ਪਦਿ ਮੁਕਤਿ ਦੁਆਰੁ ॥੨॥
ਗੁਰ ਤੇ ਮਾਰਗੁ ਪਾਈਐ ਚੂਕੈ ਮੋਹੁ ਗੁਬਾਰੁ ॥
ਸਬਦਿ ਮਰੈ ਤਾ ਉਧਰੈ ਪਾਏ ਮੋਖ ਦੁਆਰੁ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਮਿਲਿ ਰਹੈ ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਕਰਤਾਰੁ ॥੩॥
ਇਹੁ ਮਨੂਆ ਅਤਿ ਸਬਲ ਹੈ ਛਡੇ ਨ ਕਿਤੈ ਉਪਾਇ ॥
ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਦੁਖੁ ਲਾਇਦਾ ਬਹੁਤੀ ਦੇਇ ਸਜਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਲਗੇ ਸੇ ਉਬਰੇ ਹਉਮੈ ਸਬਦਿ ਗਵਾਇ ॥੪॥੧੮॥੫੧॥
ਕਾਂਇਆ ਸਾਧੈ ਉਰਧ ਤਪੁ ਕਰੈ ਵਿਚਹੁ ਹਉਮੈ ਨ ਜਾਇ ॥
ਅਧਿਆਤਮ ਕਰਮ ਜੇ ਕਰੇ ਨਾਮੁ ਨ ਕਬ ਹੀ ਪਾਇ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਜੀਵਤੁ ਮਰੈ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥੧॥
ਸੁਣਿ ਮਨ ਮੇਰੇ ਭਜੁ ਸਤਗੁਰ ਸਰਣਾ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਛੁਟੀਐ ਬਿਖੁ ਭਵਜਲੁ ਸਬਦਿ ਗੁਰ ਤਰਣਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਸਭਾ ਧਾਤੁ ਹੈ ਦੂਜਾ ਭਾਉ ਵਿਕਾਰੁ ॥
ਪੰਡਿਤੁ ਪੜੈ ਬੰਧਨ ਮੋਹ ਬਾਧਾ ਨਹ ਬੂਝੈ ਬਿਖਿਆ ਪਿਆਰਿ ॥
ਸਤਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਤ੍ਰਿਕੁਟੀ ਛੂਟੈ ਚਉਥੈ ਪਦਿ ਮੁਕਤਿ ਦੁਆਰੁ ॥੨॥
ਗੁਰ ਤੇ ਮਾਰਗੁ ਪਾਈਐ ਚੂਕੈ ਮੋਹੁ ਗੁਬਾਰੁ ॥
ਸਬਦਿ ਮਰੈ ਤਾ ਉਧਰੈ ਪਾਏ ਮੋਖ ਦੁਆਰੁ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਮਿਲਿ ਰਹੈ ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਕਰਤਾਰੁ ॥੩॥
ਇਹੁ ਮਨੂਆ ਅਤਿ ਸਬਲ ਹੈ ਛਡੇ ਨ ਕਿਤੈ ਉਪਾਇ ॥
ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਦੁਖੁ ਲਾਇਦਾ ਬਹੁਤੀ ਦੇਇ ਸਜਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਲਗੇ ਸੇ ਉਬਰੇ ਹਉਮੈ ਸਬਦਿ ਗਵਾਇ ॥੪॥੧੮॥੫੧॥
सिरीरागु महला ३ ॥
कांइआ साधै उरध तपु करै विचहु हउमै न जाइ ॥
अधिआतम करम जे करे नामु न कब ही पाइ ॥
गुर कै सबदि जीवतु मरै हरि नामु वसै मनि आइ ॥१॥
सुणि मन मेरे भजु सतगुर सरणा ॥
गुर परसादी छुटीऐ बिखु भवजलु सबदि गुर तरणा ॥१॥ रहाउ ॥
त्रै गुण सभा धातु है दूजा भाउ विकारु ॥
पंडितु पड़ै बंधन मोह बाधा नह बूझै बिखिआ पिआरि ॥
सतगुरि मिलिऐ त्रिकुटी छूटै चउथै पदि मुकति दुआरु ॥२॥
गुर ते मारगु पाईऐ चूकै मोहु गुबारु ॥
सबदि मरै ता उधरै पाए मोख दुआरु ॥
गुर परसादी मिलि रहै सचु नामु करतारु ॥३॥
इहु मनूआ अति सबल है छडे न कितै उपाइ ॥
दूजै भाइ दुखु लाइदा बहुती देइ सजाइ ॥
नानक नामि लगे से उबरे हउमै सबदि गवाइ ॥४॥१८॥५१॥
कांइआ साधै उरध तपु करै विचहु हउमै न जाइ ॥
अधिआतम करम जे करे नामु न कब ही पाइ ॥
गुर कै सबदि जीवतु मरै हरि नामु वसै मनि आइ ॥१॥
सुणि मन मेरे भजु सतगुर सरणा ॥
गुर परसादी छुटीऐ बिखु भवजलु सबदि गुर तरणा ॥१॥ रहाउ ॥
त्रै गुण सभा धातु है दूजा भाउ विकारु ॥
पंडितु पड़ै बंधन मोह बाधा नह बूझै बिखिआ पिआरि ॥
सतगुरि मिलिऐ त्रिकुटी छूटै चउथै पदि मुकति दुआरु ॥२॥
गुर ते मारगु पाईऐ चूकै मोहु गुबारु ॥
सबदि मरै ता उधरै पाए मोख दुआरु ॥
गुर परसादी मिलि रहै सचु नामु करतारु ॥३॥
इहु मनूआ अति सबल है छडे न कितै उपाइ ॥
दूजै भाइ दुखु लाइदा बहुती देइ सजाइ ॥
नानक नामि लगे से उबरे हउमै सबदि गवाइ ॥४॥१८॥५१॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ३ ॥ मानव शरीर को (ज्ञानेन्द्रियों को) अपने बस में रखने के कई प्रयत्न करता है। उल्टा लटक के तप करता है। (पर इस तरह) अंदर का अहम् दूर नहीं होता। अगर मनुष्य आत्मिक उन्नति संबंधी (ऐसे नियत धार्मिक) कर्म करता रहे~ तो कभी भी वह परमात्मा का नाम प्राप्त नहीं कर सकता। जो मनुष्य गुरू के शबद की सहायता से दुनिया की कृत कार करता हुआ ही विकारों से बचता है~ उसके मन में प्रभु का नाम आ बसता है।1। हे मेरे मन ! (मेरी बात) सुन। सत्गुरू की शरण पड़। (माया के प्रभाव से) गुरू की कृपा से बचते हैं। ये जहर (भरा) संसार समुंद्र गुरू के शबद द्वारा ही तैर सकते हैं।1 रहाउ। तीन गुणों के अधीन रह कर काम करना~ यह सारा माया का ही प्रभाव है। और माया का ही प्यार (मन में) विकार पैदा करता है। माया के बंधनों के मोह में फंसा हुआ पंडित (धर्म पुस्तकें) पढ़ता है~ पर माया के प्यार में (फंसा रहने के कारण वह जीवन का सही रास्ता) नहीं समझ सकता। अगर सतिगुरू मिल जाए तो (माया मोह के कारण पैदा हुई अंदर की खिज) दूर हो जाती है। माया के तीन गुणों से ऊपर के आत्मिक दर्जे में (पहुँचने से) (माया के मोह से खलासी) का दरवाजा मिल जाता है।2। गुरू से जीवन का सही राह मिल जाता है। (मन में से) मोह का अंधेरा दूर हो जाता है। अगर मनुष्य गुरू के शबद से जुड़ के माया के मोह से मर जाए तो (संसार समुंद्र में डूबने से बच जाता है) और विकारों से खलासी का राह मिल जाता है। गुरू की कृपा से ही मनुष्य (प्रभु चरणों में) जुड़ा रह सकता है और प्रभु का सदा स्थिर नाम प्राप्त कर सकता है।3। (नहीं तो) यह मन (तो) बड़ा बलवान है (गुरू की शरण के बिना और) किसी भी तरीके से ये (गलत रास्ते पड़ने से) हटता नहीं। माया के प्यार में फसा के (मनुष्य को) दुख चिपका लेता है~ तथा बड़ी सजा देता है। हे नानक ! जो लोग गुरू के शबद से अहम् दूर करके परमात्मा के नाम में जुड़ते हैं वह (इसके पंजे से) बचते हैं।4।18।51।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਕਿਰਪਾ ਕਰੇ ਗੁਰੁ ਪਾਈਐ ਹਰਿ ਨਾਮੋ ਦੇਇ ਦ੍ਰਿੜਾਇ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਕਿਨੈ ਨ ਪਾਇਓ ਬਿਰਥਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਇ ॥
ਮਨਮੁਖ ਕਰਮ ਕਮਾਵਣੇ ਦਰਗਹ ਮਿਲੈ ਸਜਾਇ ॥੧॥
ਮਨ ਰੇ ਦੂਜਾ ਭਾਉ ਚੁਕਾਇ ॥
ਅੰਤਰਿ ਤੇਰੈ ਹਰਿ ਵਸੈ ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਸੁਖੁ ਪਾਇ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਚੁ ਬਾਣੀ ਸਚੁ ਸਬਦੁ ਹੈ ਜਾ ਸਚਿ ਧਰੇ ਪਿਆਰੁ ॥
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਮਨਿ ਵਸੈ ਹਉਮੈ ਕ੍ਰੋਧੁ ਨਿਵਾਰਿ ॥
ਮਨਿ ਨਿਰਮਲ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈਐ ਤਾ ਪਾਏ ਮੋਖ ਦੁਆਰੁ ॥੨॥
ਹਉਮੈ ਵਿਚਿ ਜਗੁ ਬਿਨਸਦਾ ਮਰਿ ਜੰਮੈ ਆਵੈ ਜਾਇ ॥
ਮਨਮੁਖ ਸਬਦੁ ਨ ਜਾਣਨੀ ਜਾਸਨਿ ਪਤਿ ਗਵਾਇ ॥
ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਨਾਉ ਪਾਈਐ ਸਚੇ ਰਹੈ ਸਮਾਇ ॥੩॥
ਕਿਰਪਾ ਕਰੇ ਗੁਰੁ ਪਾਈਐ ਹਰਿ ਨਾਮੋ ਦੇਇ ਦ੍ਰਿੜਾਇ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਕਿਨੈ ਨ ਪਾਇਓ ਬਿਰਥਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਇ ॥
ਮਨਮੁਖ ਕਰਮ ਕਮਾਵਣੇ ਦਰਗਹ ਮਿਲੈ ਸਜਾਇ ॥੧॥
ਮਨ ਰੇ ਦੂਜਾ ਭਾਉ ਚੁਕਾਇ ॥
ਅੰਤਰਿ ਤੇਰੈ ਹਰਿ ਵਸੈ ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਸੁਖੁ ਪਾਇ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਚੁ ਬਾਣੀ ਸਚੁ ਸਬਦੁ ਹੈ ਜਾ ਸਚਿ ਧਰੇ ਪਿਆਰੁ ॥
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਮਨਿ ਵਸੈ ਹਉਮੈ ਕ੍ਰੋਧੁ ਨਿਵਾਰਿ ॥
ਮਨਿ ਨਿਰਮਲ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈਐ ਤਾ ਪਾਏ ਮੋਖ ਦੁਆਰੁ ॥੨॥
ਹਉਮੈ ਵਿਚਿ ਜਗੁ ਬਿਨਸਦਾ ਮਰਿ ਜੰਮੈ ਆਵੈ ਜਾਇ ॥
ਮਨਮੁਖ ਸਬਦੁ ਨ ਜਾਣਨੀ ਜਾਸਨਿ ਪਤਿ ਗਵਾਇ ॥
ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਨਾਉ ਪਾਈਐ ਸਚੇ ਰਹੈ ਸਮਾਇ ॥੩॥
सिरीरागु महला ३ ॥
किरपा करे गुरु पाईऐ हरि नामो देइ द्रिड़ाइ ॥
बिनु गुर किनै न पाइओ बिरथा जनमु गवाइ ॥
मनमुख करम कमावणे दरगह मिलै सजाइ ॥१॥
मन रे दूजा भाउ चुकाइ ॥
अंतरि तेरै हरि वसै गुर सेवा सुखु पाइ ॥ रहाउ ॥
सचु बाणी सचु सबदु है जा सचि धरे पिआरु ॥
हरि का नामु मनि वसै हउमै क्रोधु निवारि ॥
मनि निरमल नामु धिआईऐ ता पाए मोख दुआरु ॥२॥
हउमै विचि जगु बिनसदा मरि जंमै आवै जाइ ॥
मनमुख सबदु न जाणनी जासनि पति गवाइ ॥
गुर सेवा नाउ पाईऐ सचे रहै समाइ ॥३॥
किरपा करे गुरु पाईऐ हरि नामो देइ द्रिड़ाइ ॥
बिनु गुर किनै न पाइओ बिरथा जनमु गवाइ ॥
मनमुख करम कमावणे दरगह मिलै सजाइ ॥१॥
मन रे दूजा भाउ चुकाइ ॥
अंतरि तेरै हरि वसै गुर सेवा सुखु पाइ ॥ रहाउ ॥
सचु बाणी सचु सबदु है जा सचि धरे पिआरु ॥
हरि का नामु मनि वसै हउमै क्रोधु निवारि ॥
मनि निरमल नामु धिआईऐ ता पाए मोख दुआरु ॥२॥
हउमै विचि जगु बिनसदा मरि जंमै आवै जाइ ॥
मनमुख सबदु न जाणनी जासनि पति गवाइ ॥
गुर सेवा नाउ पाईऐ सचे रहै समाइ ॥३॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ३ ॥ (जब परमात्मा) कृपा करता है (तो) गुरू मिलता है (गुरू मनुष्य के हृदय में) परमात्मा का नाम पक्का कर देता है। (कभी भी) किसी मनुष्य ने गुरू के बिना (परमात्मा को) नहीं प्राप्त किया। (जो मनुष्य गुरू की शरण नहीं आता वह) अपना मानव जन्म व्यर्थ गवा लेता है। अपने मन के पीछे चल के (नीयत धार्मिक) कर्म (भी) करने से प्रभु की दरगाह में सजा ही मिलती है।1। हे मेरे मन ! (गुरू की शरण पड़ कर अपने अंदर से) माया का प्यार दूर कर। परमात्मा तेरे अंदर बसता है (फिर भी तू सुखी नहीं है) गुरू द्वारा बताई सेवा भक्ति करने से ही आत्मिक सुख की प्राप्ति होती है।1। रहाउ। जब मनुष्य सदा स्थिर प्रभु में प्यार जोड़ता है~ तब उस को गुरू की बाणी गुरू का शबद यर्थाथ प्रतीत होता है (गुरू के शबद द्वारा अंदर से) अहम् व क्रोध दूर करके परमात्मा का नाम मनुष्य के मन में आ बसता है। परमात्मा का नाम पवित्र मन के द्वारा ही सिमरा जा सकता है (जब मनुष्य सिमरता है) तब विकारों से निजात की राह ढूँढ लेता है ।2। जगत अहम् में फंस कर आत्मिक मौत सहता है और बारंबार पैदा होता मरता रहता है। अपने मन के पीछे चलने वाले लोग गुरू के शबद (की कद्र) नहीं जानते। वह अपनी इज्जत गवा के ही (जगत में से) जाऐंगे। गुरू की बताई सेवा-भक्ति करने से परमात्मा का नाम प्राप्त होता है (जो मनुष्य गुरू की बताई सेवा करता है वह) सदा स्थिर परमात्मा में लीन रहता है।3।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 33 है, राग Siree Raag का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
Diwali की पहली रात, अकेले बालकनी में पटाख़ों के बीच एक specific shift।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 39 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 33” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Siree Raag राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 34 →, पीछे का: ← अंग 32।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।