अंग
1424
राग Salok Vaaraan Thay Vadheek
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਤਿਗੁਰ ਵਿਚਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਹੈ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਕਹੈ ਕਹਾਇ ॥
ਗੁਰਮਤੀ ਨਾਮੁ ਨਿਰਮਲੋੁ ਨਿਰਮਲ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਾਣੀ ਤਤੁ ਹੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥
ਹਿਰਦੈ ਕਮਲੁ ਪਰਗਾਸਿਆ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਮਿਲਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਸਤਿਗੁਰੁ ਤਿਨ ਕਉ ਮੇਲਿਓਨੁ ਜਿਨ ਧੁਰਿ ਮਸਤਕਿ ਭਾਗੁ ਲਿਖਾਇ ॥੨੫॥
ਅੰਦਰਿ ਤਿਸਨਾ ਅਗਿ ਹੈ ਮਨਮੁਖ ਭੁਖ ਨ ਜਾਇ ॥
ਮੋਹੁ ਕੁਟੰਬੁ ਸਭੁ ਕੂੜੁ ਹੈ ਕੂੜਿ ਰਹਿਆ ਲਪਟਾਇ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਚਿੰਤਾ ਚਿੰਤਵੈ ਚਿੰਤਾ ਬਧਾ ਜਾਇ ॥
ਜੰਮਣੁ ਮਰਣੁ ਨ ਚੁਕਈ ਹਉਮੈ ਕਰਮ ਕਮਾਇ ॥
ਗੁਰ ਸਰਣਾਈ ਉਬਰੈ ਨਾਨਕ ਲਏ ਛਡਾਇ ॥੨੬॥
ਸਤਿਗੁਰ ਪੁਰਖੁ ਹਰਿ ਧਿਆਇਦਾ ਸਤਸੰਗਤਿ ਸਤਿਗੁਰ ਭਾਇ ॥
ਸਤਸੰਗਤਿ ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵਦੇ ਹਰਿ ਮੇਲੇ ਗੁਰੁ ਮੇਲਾਇ ॥
ਏਹੁ ਭਉਜਲੁ ਜਗਤੁ ਸੰਸਾਰੁ ਹੈ ਗੁਰੁ ਬੋਹਿਥੁ ਨਾਮਿ ਤਰਾਇ ॥
ਗੁਰਸਿਖੀ ਭਾਣਾ ਮੰਨਿਆ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਪਾਰਿ ਲੰਘਾਇ ॥
ਗੁਰਸਿਖਾਂ ਕੀ ਹਰਿ ਧੂੜਿ ਦੇਹਿ ਹਮ ਪਾਪੀ ਭੀ ਗਤਿ ਪਾਂਹਿ ॥
ਧੁਰਿ ਮਸਤਕਿ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭ ਲਿਖਿਆ ਗੁਰ ਨਾਨਕ ਮਿਲਿਆ ਆਇ ॥
ਜਮਕੰਕਰ ਮਾਰਿ ਬਿਦਾਰਿਅਨੁ ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਲਏ ਛਡਾਇ ॥
ਗੁਰਸਿਖਾ ਨੋ ਸਾਬਾਸਿ ਹੈ ਹਰਿ ਤੁਠਾ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਇ ॥੨੭॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਦਿੜਾਇਆ ਜਿਨਿ ਵਿਚਹੁ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਇਆ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਹਰਿ ਕੀਰਤਿ ਗਾਇ ਕਰਿ ਚਾਨਣੁ ਮਗੁ ਦੇਖਾਇਆ ॥
ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ਏਕ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ਅੰਤਰਿ ਨਾਮੁ ਵਸਾਇਆ ॥
ਗੁਰਮਤੀ ਜਮੁ ਜੋਹਿ ਨ ਸਕੈ ਸਚੈ ਨਾਇ ਸਮਾਇਆ ॥
ਸਭੁ ਆਪੇ ਆਪਿ ਵਰਤੈ ਕਰਤਾ ਜੋ ਭਾਵੈ ਸੋ ਨਾਇ ਲਾਇਆ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕੁ ਨਾਉ ਲਏ ਤਾਂ ਜੀਵੈ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਖਿਨੁ ਮਰਿ ਜਾਇਆ ॥੨੮॥
ਮਨ ਅੰਤਰਿ ਹਉਮੈ ਰੋਗੁ ਭ੍ਰਮਿ ਭੂਲੇ ਹਉਮੈ ਸਾਕਤ ਦੁਰਜਨਾ ॥
ਨਾਨਕ ਰੋਗੁ ਗਵਾਇ ਮਿਲਿ ਸਤਿਗੁਰ ਸਾਧੂ ਸਜਣਾ ॥੨੯॥
ਗੁਰਮਤੀ ਹਰਿ ਹਰਿ ਬੋਲੇ ॥
ਹਰਿ ਪ੍ਰੇਮਿ ਕਸਾਈ ਦਿਨਸੁ ਰਾਤਿ ਹਰਿ ਰਤੀ ਹਰਿ ਰੰਗਿ ਚੋਲੇ ॥
ਹਰਿ ਜੈਸਾ ਪੁਰਖੁ ਨ ਲਭਈ ਸਭੁ ਦੇਖਿਆ ਜਗਤੁ ਮੈ ਟੋਲੇ ॥
ਗੁਰ ਸਤਿਗੁਰਿ ਨਾਮੁ ਦਿੜਾਇਆ ਮਨੁ ਅਨਤ ਨ ਕਾਹੂ ਡੋਲੇ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕੁ ਹਰਿ ਕਾ ਦਾਸੁ ਹੈ ਗੁਰ ਸਤਿਗੁਰ ਕੇ ਗੁਲ ਗੋਲੇ ॥੩੦॥
ਗੁਰਮਤੀ ਨਾਮੁ ਨਿਰਮਲੋੁ ਨਿਰਮਲ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਾਣੀ ਤਤੁ ਹੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥
ਹਿਰਦੈ ਕਮਲੁ ਪਰਗਾਸਿਆ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਮਿਲਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਸਤਿਗੁਰੁ ਤਿਨ ਕਉ ਮੇਲਿਓਨੁ ਜਿਨ ਧੁਰਿ ਮਸਤਕਿ ਭਾਗੁ ਲਿਖਾਇ ॥੨੫॥
ਅੰਦਰਿ ਤਿਸਨਾ ਅਗਿ ਹੈ ਮਨਮੁਖ ਭੁਖ ਨ ਜਾਇ ॥
ਮੋਹੁ ਕੁਟੰਬੁ ਸਭੁ ਕੂੜੁ ਹੈ ਕੂੜਿ ਰਹਿਆ ਲਪਟਾਇ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਚਿੰਤਾ ਚਿੰਤਵੈ ਚਿੰਤਾ ਬਧਾ ਜਾਇ ॥
ਜੰਮਣੁ ਮਰਣੁ ਨ ਚੁਕਈ ਹਉਮੈ ਕਰਮ ਕਮਾਇ ॥
ਗੁਰ ਸਰਣਾਈ ਉਬਰੈ ਨਾਨਕ ਲਏ ਛਡਾਇ ॥੨੬॥
ਸਤਿਗੁਰ ਪੁਰਖੁ ਹਰਿ ਧਿਆਇਦਾ ਸਤਸੰਗਤਿ ਸਤਿਗੁਰ ਭਾਇ ॥
ਸਤਸੰਗਤਿ ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵਦੇ ਹਰਿ ਮੇਲੇ ਗੁਰੁ ਮੇਲਾਇ ॥
ਏਹੁ ਭਉਜਲੁ ਜਗਤੁ ਸੰਸਾਰੁ ਹੈ ਗੁਰੁ ਬੋਹਿਥੁ ਨਾਮਿ ਤਰਾਇ ॥
ਗੁਰਸਿਖੀ ਭਾਣਾ ਮੰਨਿਆ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਪਾਰਿ ਲੰਘਾਇ ॥
ਗੁਰਸਿਖਾਂ ਕੀ ਹਰਿ ਧੂੜਿ ਦੇਹਿ ਹਮ ਪਾਪੀ ਭੀ ਗਤਿ ਪਾਂਹਿ ॥
ਧੁਰਿ ਮਸਤਕਿ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭ ਲਿਖਿਆ ਗੁਰ ਨਾਨਕ ਮਿਲਿਆ ਆਇ ॥
ਜਮਕੰਕਰ ਮਾਰਿ ਬਿਦਾਰਿਅਨੁ ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਲਏ ਛਡਾਇ ॥
ਗੁਰਸਿਖਾ ਨੋ ਸਾਬਾਸਿ ਹੈ ਹਰਿ ਤੁਠਾ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਇ ॥੨੭॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਦਿੜਾਇਆ ਜਿਨਿ ਵਿਚਹੁ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਇਆ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਹਰਿ ਕੀਰਤਿ ਗਾਇ ਕਰਿ ਚਾਨਣੁ ਮਗੁ ਦੇਖਾਇਆ ॥
ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ਏਕ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ਅੰਤਰਿ ਨਾਮੁ ਵਸਾਇਆ ॥
ਗੁਰਮਤੀ ਜਮੁ ਜੋਹਿ ਨ ਸਕੈ ਸਚੈ ਨਾਇ ਸਮਾਇਆ ॥
ਸਭੁ ਆਪੇ ਆਪਿ ਵਰਤੈ ਕਰਤਾ ਜੋ ਭਾਵੈ ਸੋ ਨਾਇ ਲਾਇਆ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕੁ ਨਾਉ ਲਏ ਤਾਂ ਜੀਵੈ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਖਿਨੁ ਮਰਿ ਜਾਇਆ ॥੨੮॥
ਮਨ ਅੰਤਰਿ ਹਉਮੈ ਰੋਗੁ ਭ੍ਰਮਿ ਭੂਲੇ ਹਉਮੈ ਸਾਕਤ ਦੁਰਜਨਾ ॥
ਨਾਨਕ ਰੋਗੁ ਗਵਾਇ ਮਿਲਿ ਸਤਿਗੁਰ ਸਾਧੂ ਸਜਣਾ ॥੨੯॥
ਗੁਰਮਤੀ ਹਰਿ ਹਰਿ ਬੋਲੇ ॥
ਹਰਿ ਪ੍ਰੇਮਿ ਕਸਾਈ ਦਿਨਸੁ ਰਾਤਿ ਹਰਿ ਰਤੀ ਹਰਿ ਰੰਗਿ ਚੋਲੇ ॥
ਹਰਿ ਜੈਸਾ ਪੁਰਖੁ ਨ ਲਭਈ ਸਭੁ ਦੇਖਿਆ ਜਗਤੁ ਮੈ ਟੋਲੇ ॥
ਗੁਰ ਸਤਿਗੁਰਿ ਨਾਮੁ ਦਿੜਾਇਆ ਮਨੁ ਅਨਤ ਨ ਕਾਹੂ ਡੋਲੇ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕੁ ਹਰਿ ਕਾ ਦਾਸੁ ਹੈ ਗੁਰ ਸਤਿਗੁਰ ਕੇ ਗੁਲ ਗੋਲੇ ॥੩੦॥
सतिगुर विचि अंम्रित नामु है अंम्रितु कहै कहाइ ॥
गुरमती नामु निरमलोु निरमल नामु धिआइ ॥
अंम्रित बाणी ततु है गुरमुखि वसै मनि आइ ॥
हिरदै कमलु परगासिआ जोती जोति मिलाइ ॥
नानक सतिगुरु तिन कउ मेलिओनु जिन धुरि मसतकि भागु लिखाइ ॥२५॥
अंदरि तिसना अगि है मनमुख भुख न जाइ ॥
मोहु कुटंबु सभु कूड़ु है कूड़ि रहिआ लपटाइ ॥
अनदिनु चिंता चिंतवै चिंता बधा जाइ ॥
जंमणु मरणु न चुकई हउमै करम कमाइ ॥
गुर सरणाई उबरै नानक लए छडाइ ॥२६॥
सतिगुर पुरखु हरि धिआइदा सतसंगति सतिगुर भाइ ॥
सतसंगति सतिगुर सेवदे हरि मेले गुरु मेलाइ ॥
एहु भउजलु जगतु संसारु है गुरु बोहिथु नामि तराइ ॥
गुरसिखी भाणा मंनिआ गुरु पूरा पारि लंघाइ ॥
गुरसिखां की हरि धूड़ि देहि हम पापी भी गति पांहि ॥
धुरि मसतकि हरि प्रभ लिखिआ गुर नानक मिलिआ आइ ॥
जमकंकर मारि बिदारिअनु हरि दरगह लए छडाइ ॥
गुरसिखा नो साबासि है हरि तुठा मेलि मिलाइ ॥२७॥
गुरि पूरै हरि नामु दिड़ाइआ जिनि विचहु भरमु चुकाइआ ॥
राम नामु हरि कीरति गाइ करि चानणु मगु देखाइआ ॥
हउमै मारि एक लिव लागी अंतरि नामु वसाइआ ॥
गुरमती जमु जोहि न सकै सचै नाइ समाइआ ॥
सभु आपे आपि वरतै करता जो भावै सो नाइ लाइआ ॥
जन नानकु नाउ लए तां जीवै बिनु नावै खिनु मरि जाइआ ॥२८॥
मन अंतरि हउमै रोगु भ्रमि भूले हउमै साकत दुरजना ॥
नानक रोगु गवाइ मिलि सतिगुर साधू सजणा ॥२९॥
गुरमती हरि हरि बोले ॥
हरि प्रेमि कसाई दिनसु राति हरि रती हरि रंगि चोले ॥
हरि जैसा पुरखु न लभई सभु देखिआ जगतु मै टोले ॥
गुर सतिगुरि नामु दिड़ाइआ मनु अनत न काहू डोले ॥
जन नानकु हरि का दासु है गुर सतिगुर के गुल गोले ॥३०॥
गुरमती नामु निरमलोु निरमल नामु धिआइ ॥
अंम्रित बाणी ततु है गुरमुखि वसै मनि आइ ॥
हिरदै कमलु परगासिआ जोती जोति मिलाइ ॥
नानक सतिगुरु तिन कउ मेलिओनु जिन धुरि मसतकि भागु लिखाइ ॥२५॥
अंदरि तिसना अगि है मनमुख भुख न जाइ ॥
मोहु कुटंबु सभु कूड़ु है कूड़ि रहिआ लपटाइ ॥
अनदिनु चिंता चिंतवै चिंता बधा जाइ ॥
जंमणु मरणु न चुकई हउमै करम कमाइ ॥
गुर सरणाई उबरै नानक लए छडाइ ॥२६॥
सतिगुर पुरखु हरि धिआइदा सतसंगति सतिगुर भाइ ॥
सतसंगति सतिगुर सेवदे हरि मेले गुरु मेलाइ ॥
एहु भउजलु जगतु संसारु है गुरु बोहिथु नामि तराइ ॥
गुरसिखी भाणा मंनिआ गुरु पूरा पारि लंघाइ ॥
गुरसिखां की हरि धूड़ि देहि हम पापी भी गति पांहि ॥
धुरि मसतकि हरि प्रभ लिखिआ गुर नानक मिलिआ आइ ॥
जमकंकर मारि बिदारिअनु हरि दरगह लए छडाइ ॥
गुरसिखा नो साबासि है हरि तुठा मेलि मिलाइ ॥२७॥
गुरि पूरै हरि नामु दिड़ाइआ जिनि विचहु भरमु चुकाइआ ॥
राम नामु हरि कीरति गाइ करि चानणु मगु देखाइआ ॥
हउमै मारि एक लिव लागी अंतरि नामु वसाइआ ॥
गुरमती जमु जोहि न सकै सचै नाइ समाइआ ॥
सभु आपे आपि वरतै करता जो भावै सो नाइ लाइआ ॥
जन नानकु नाउ लए तां जीवै बिनु नावै खिनु मरि जाइआ ॥२८॥
मन अंतरि हउमै रोगु भ्रमि भूले हउमै साकत दुरजना ॥
नानक रोगु गवाइ मिलि सतिगुर साधू सजणा ॥२९॥
गुरमती हरि हरि बोले ॥
हरि प्रेमि कसाई दिनसु राति हरि रती हरि रंगि चोले ॥
हरि जैसा पुरखु न लभई सभु देखिआ जगतु मै टोले ॥
गुर सतिगुरि नामु दिड़ाइआ मनु अनत न काहू डोले ॥
जन नानकु हरि का दासु है गुर सतिगुर के गुल गोले ॥३०॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! (परमात्मा का) आत्मिक जीवन देने वाला नाम गुरू (के दिल) में बसता है। (गुरू स्वयं यह) अमृत नाम जपता है (व औरों से) जपाता है। गुरू की मति पर चलने से ही (यह) पवित्र नाम (प्राप्त होता है। गुरू की मति पर चल के ही मनुष्य यह) पवित्र-नाम जप (सकता है)। हे भाई ! (मनुष्य जीवन का) तत्व (हरी-नाम गुरू की) आत्मिक जीवन देने वाली बाणी से ही मिलता है। गुरू की शरण पड़ने से ही (हरी-नाम मनुष्य के) मन में आ बसता है (जिस मनुष्य के अंदर हरी-नाम आ बसता है। उसके) हृदय में कमल-फूल खिल उठता है। (उसकी) जिंद परमात्मा की जोति में मिली रहती है। पर। हे नानक ! उस (परमात्मा) ने गुरू उन (मनुष्यों) को मिलाया। जिनके माथे पर (उसने) धुर-दरगाह से (ये) अच्छी किस्मत लिख दी। 25। हे भाई ! अपने मन के मुरीद मनुष्य के हृदय में तृष्णा की (आग जलती) रहती है। (उसके अंदर से माया की) भूख (कभी) दूर नहीं होती। हे भाई ! (जगत का यह) मोह नाशवंत पसारा है। (यह) परिवार (भी) नाशवान है। (पर। मन का मुरीद मनुष्य इस) नाशवान पसारे में (सदा) फसा रहता है। हर वक्त (माया के मोह की) सोचें सोचता रहता है। सोचों में बँधा हुआ (ही जगत से) चला जाता है। अहंकार के आसरे ही (सारे) काम करता रहता है (तभी तो उसका) जनम-मरण का चक्कर (कभी) खत्म नहीं होता। पर। हे नानक ! गुरू की शरण पड़ कर (वह मनुष्य भी मोह के जाल में से) बच निकलता है। गुरू (इस मोह-जाल में से) छुड़ा लेता है। 26। हे भाई ! गुरू महापुरख साध-संगति में गुरू के प्यार में टिक के परमात्मा का सिमरन करता रहता है। (जो मनुष्य) साध-संगति में आ के गुरू की शरण पड़ते हैं। गुरू उनको परमात्मा में जोड़ देता है परमात्मा के साथ मिला देता है। (हे भाई ! वैसे तो) यह जगत इस संसार में भयानक समुंद्र है। पर गुरू-जहाज (शरण आए जीवों को) हरी-नाम में (जोड़ के इस समुंद्र से) पार लंघा देता है। (जिन) गुरसिखों ने (गुरू का) हुकम मान लिया। पूरा गुरू (उनको संसार-समुंद्र से) पार लंघाता है। हे हरी ! हम जीवों को गुरसिखों के चरणों की धूल बख्श। ताकि हम विकारी जीव भी उच्च आत्मिक अवस्था प्राप्त कर सकें। हे नानक ! धुर-दरगाह से हरी-प्रभू का लिखा लेख (जिस मनुष्य के) माथे पर उघड़ पड़ता है वह मनुष्य गुरू को आ मिलता है। उस (गुरू) ने (सारे) जमदूत मार के खत्म कर दिए। (गुरू उसको) परमात्मा के दरगाह में सुर्खरू करा लेता है। हे भाई ! गुरसिखों को (लोक-परलोक में) आदर-सत्कार मिलता है। प्रभू उन पर प्रसन्न हो के (उनको अपने साथ) मिला लेता है। 27। हे भाई ! (जिस) पूरे गुरू ने (जीव के अंदर सदा) परमात्मा का नाम पक्का किया है। जिस (पूरे गुरू) ने (जीव के) अंदर से भटकना (सदा) खत्म की है। (उस गुरू ने खुद) परमात्मा का नाम (सिमर के)। परमात्मा की सिफतसालाह गा गा के (शरण आए मनुष्य के दिल में आत्मिक जीवन का) प्रकाश पैदा करके (उसको आत्मिक जीवन का सही) रास्ता (सदा) दिखाया है। हे भाई ! (पूरे गुरू से) अहंकार दूर करके (जिस मनुष्य के अंदर) एक परमात्मा की लगन लग गई। (उसने अपने) दिल में परमात्मा का नाम बसा लिया। गुरू की मति पर चलने के कारण जमराज भी (उस मनुष्य की ओर) ताक नहीं सकता। (वह मनुष्य) सदा-स्थिर हरी-नाम में (सदा) लीन रहता है। (उसको यह निश्चय बन जाता है कि) हर जगह करतार स्वयं ही स्वयं मौजूद है। जो मनुष्य उसको अच्छा लगने लगता है उसको अपने नाम में जोड़ लेता है। हे भाई ! दास नानक (भी जब परमात्मा का) नाम जपता है तब आत्मिक जीवन हासिल कर लेता है। भाई ! परमात्मा के नाम के बिना तो जीव एक छिन में ही आत्मिक मौत सहेड़ लेता है। 28। हे भाई ! परमात्मा से टूटे हुए दुराचारी मनुष्यों के मन में अहंकार का रोग (सदा टिका रहता है)। इस अहंकार के कारण भटकना में पड़ कर वे (जीवन के) ग़लत रास्ते पड़े रहते हैं। हे नानक ! (साकत मनुष्य भी) सज्जन साधू गुरू को मिल के (अहंकार का यह) रोग दूर कर लेता है। 29। हे भाई ! (जो जीव-स्त्री) गुरू की मति पर चल कर (सदा) परमात्मा का नाम जपती रहती है। वह दिन-रात परमात्मा के प्यार में खिंची रहती है। परमात्मा (के नाम) में रति रहती है। वह परमात्मा के (प्रेम-) रंग में (आत्मिक आनंद) माणती रहती है। हे भाई ! मैंने सारा संसार तलाश के देख लिया है। परमात्मा जैसा पति (किसी और जगह) नहीं मिलता। हे भाई ! गुरू सतिगुरू ने (जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का) नाम पक्का कर दिया। (उसका) मन किसी भी और तरफ नहीं डोलता। हे भाई ! दास नानक (भी) परमात्मा का दास है। गुरू सतिगुरू के दासों के दासों का दास है। 30।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1424 है, राग Salok Vaaraan Thay Vadheek का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Raam Daas Ji।
दिल्ली-यूनिवर्सिटी के North Campus में exam-season की tension।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 31 पंक्तियों का है, 1 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1424” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Salok Vaaraan Thay Vadheek राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1425 →, पीछे का: ← अंग 1423।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।