अंग 1422

अंग
1422
राग Salok Vaaraan Thay Vadheek
राग: Salok Vaaraan Thay Vadheek · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਹਉ ਜੀਉ ਕਰੀ ਤਿਸ ਵਿਟਉ ਚਉ ਖੰਨੀਐ ਜੋ ਮੈ ਪਿਰੀ ਦਿਖਾਵਏ ॥
ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਹੋਇ ਦਇਆਲੁ ਤਾਂ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਮੇਲਾਵਏ ॥੫॥
ਅੰਤਰਿ ਜੋਰੁ ਹਉਮੈ ਤਨਿ ਮਾਇਆ ਕੂੜੀ ਆਵੈ ਜਾਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਕਾ ਫੁਰਮਾਇਆ ਮੰਨਿ ਨ ਸਕੀ ਦੁਤਰੁ ਤਰਿਆ ਨ ਜਾਇ ॥
ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਜਿਸੁ ਆਪਣੀ ਸੋ ਚਲੈ ਸਤਿਗੁਰ ਭਾਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਕਾ ਦਰਸਨੁ ਸਫਲੁ ਹੈ ਜੋ ਇਛੈ ਸੋ ਫਲੁ ਪਾਇ ॥
ਜਿਨੀ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮੰਨਿਆਂ ਹਉ ਤਿਨ ਕੇ ਲਾਗਉ ਪਾਇ ॥
ਨਾਨਕੁ ਤਾ ਕਾ ਦਾਸੁ ਹੈ ਜਿ ਅਨਦਿਨੁ ਰਹੈ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥੬॥
ਜਿਨਾ ਪਿਰੀ ਪਿਆਰੁ ਬਿਨੁ ਦਰਸਨ ਕਿਉ ਤ੍ਰਿਪਤੀਐ ॥
ਨਾਨਕ ਮਿਲੇ ਸੁਭਾਇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਇਹੁ ਮਨੁ ਰਹਸੀਐ ॥੭॥
ਜਿਨਾ ਪਿਰੀ ਪਿਆਰੁ ਕਿਉ ਜੀਵਨਿ ਪਿਰ ਬਾਹਰੇ ॥
ਜਾਂ ਸਹੁ ਦੇਖਨਿ ਆਪਣਾ ਨਾਨਕ ਥੀਵਨਿ ਭੀ ਹਰੇ ॥੮॥
ਜਿਨਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਅੰਦਰਿ ਨੇਹੁ ਤੈ ਪ੍ਰੀਤਮ ਸਚੈ ਲਾਇਆ ॥
ਰਾਤੀ ਅਤੈ ਡੇਹੁ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰੇਮਿ ਸਮਾਇਆ ॥੯॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਚੀ ਆਸਕੀ ਜਿਤੁ ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਸਚਾ ਪਾਈਐ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਰਹਹਿ ਅਨੰਦਿ ਨਾਨਕ ਸਹਜਿ ਸਮਾਈਐ ॥੧੦॥
ਸਚਾ ਪ੍ਰੇਮ ਪਿਆਰੁ ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਤੇ ਪਾਈਐ ॥
ਕਬਹੂ ਨ ਹੋਵੈ ਭੰਗੁ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਈਐ ॥੧੧॥
ਜਿਨੑਾ ਅੰਦਰਿ ਸਚਾ ਨੇਹੁ ਕਿਉ ਜੀਵਨਿੑ ਪਿਰੀ ਵਿਹੂਣਿਆ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਮੇਲੇ ਆਪਿ ਨਾਨਕ ਚਿਰੀ ਵਿਛੁੰਨਿਆ ॥੧੨॥
ਜਿਨ ਕਉ ਪ੍ਰੇਮ ਪਿਆਰੁ ਤਉ ਆਪੇ ਲਾਇਆ ਕਰਮੁ ਕਰਿ ॥
ਨਾਨਕ ਲੇਹੁ ਮਿਲਾਇ ਮੈ ਜਾਚਿਕ ਦੀਜੈ ਨਾਮੁ ਹਰਿ ॥੧੩॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਸੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਰੋਵੈ ॥
ਜਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਕਰੇ ਸਾਈ ਭਗਤਿ ਹੋਵੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਸੁ ਕਰੇ ਵੀਚਾਰੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਨਕ ਪਾਵੈ ਪਾਰੁ ॥੧੪॥
ਜਿਨਾ ਅੰਦਰਿ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਹੈ ਗੁਰਬਾਣੀ ਵੀਚਾਰਿ ॥
ਤਿਨ ਕੇ ਮੁਖ ਸਦ ਉਜਲੇ ਤਿਤੁ ਸਚੈ ਦਰਬਾਰਿ ॥
ਤਿਨ ਬਹਦਿਆ ਉਠਦਿਆ ਕਦੇ ਨ ਵਿਸਰੈ ਜਿ ਆਪਿ ਬਖਸੇ ਕਰਤਾਰਿ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਿਲੇ ਨ ਵਿਛੁੜਹਿ ਜਿ ਮੇਲੇ ਸਿਰਜਣਹਾਰਿ ॥੧੫॥
ਗੁਰ ਪੀਰਾਂ ਕੀ ਚਾਕਰੀ ਮਹਾਂ ਕਰੜੀ ਸੁਖ ਸਾਰੁ ॥
ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਜਿਸੁ ਆਪਣੀ ਤਿਸੁ ਲਾਏ ਹੇਤ ਪਿਆਰੁ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵੈ ਲਗਿਆ ਭਉਜਲੁ ਤਰੈ ਸੰਸਾਰੁ ॥
ਮਨ ਚਿੰਦਿਆ ਫਲੁ ਪਾਇਸੀ ਅੰਤਰਿ ਬਿਬੇਕ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਸਤਿਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਪ੍ਰਭੁ ਪਾਈਐ ਸਭੁ ਦੂਖ ਨਿਵਾਰਣਹਾਰੁ ॥੧੬॥
ਮਨਮੁਖ ਸੇਵਾ ਜੋ ਕਰੇ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਚਿਤੁ ਲਾਇ ॥
ਪੁਤੁ ਕਲਤੁ ਕੁਟੰਬੁ ਹੈ ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਵਧਾਇ ॥
ਦਰਗਹਿ ਲੇਖਾ ਮੰਗੀਐ ਕੋਈ ਅੰਤਿ ਨ ਸਕੀ ਛਡਾਇ ॥
हउ जीउ करी तिस विटउ चउ खंनीऐ जो मै पिरी दिखावए ॥
नानक हरि होइ दइआलु तां गुरु पूरा मेलावए ॥५॥
अंतरि जोरु हउमै तनि माइआ कूड़ी आवै जाइ ॥
सतिगुर का फुरमाइआ मंनि न सकी दुतरु तरिआ न जाइ ॥
नदरि करे जिसु आपणी सो चलै सतिगुर भाइ ॥
सतिगुर का दरसनु सफलु है जो इछै सो फलु पाइ ॥
जिनी सतिगुरु मंनिआं हउ तिन के लागउ पाइ ॥
नानकु ता का दासु है जि अनदिनु रहै लिव लाइ ॥६॥
जिना पिरी पिआरु बिनु दरसन किउ त्रिपतीऐ ॥
नानक मिले सुभाइ गुरमुखि इहु मनु रहसीऐ ॥७॥
जिना पिरी पिआरु किउ जीवनि पिर बाहरे ॥
जां सहु देखनि आपणा नानक थीवनि भी हरे ॥८॥
जिना गुरमुखि अंदरि नेहु तै प्रीतम सचै लाइआ ॥
राती अतै डेहु नानक प्रेमि समाइआ ॥९॥
गुरमुखि सची आसकी जितु प्रीतमु सचा पाईऐ ॥
अनदिनु रहहि अनंदि नानक सहजि समाईऐ ॥१०॥
सचा प्रेम पिआरु गुर पूरे ते पाईऐ ॥
कबहू न होवै भंगु नानक हरि गुण गाईऐ ॥११॥
जिन॑ा अंदरि सचा नेहु किउ जीवनि॑ पिरी विहूणिआ ॥
गुरमुखि मेले आपि नानक चिरी विछुंनिआ ॥१२॥
जिन कउ प्रेम पिआरु तउ आपे लाइआ करमु करि ॥
नानक लेहु मिलाइ मै जाचिक दीजै नामु हरि ॥१३॥
गुरमुखि हसै गुरमुखि रोवै ॥
जि गुरमुखि करे साई भगति होवै ॥
गुरमुखि होवै सु करे वीचारु ॥
गुरमुखि नानक पावै पारु ॥१४॥
जिना अंदरि नामु निधानु है गुरबाणी वीचारि ॥
तिन के मुख सद उजले तितु सचै दरबारि ॥
तिन बहदिआ उठदिआ कदे न विसरै जि आपि बखसे करतारि ॥
नानक गुरमुखि मिले न विछुड़हि जि मेले सिरजणहारि ॥१५॥
गुर पीरां की चाकरी महां करड़ी सुख सारु ॥
नदरि करे जिसु आपणी तिसु लाए हेत पिआरु ॥
सतिगुर की सेवै लगिआ भउजलु तरै संसारु ॥
मन चिंदिआ फलु पाइसी अंतरि बिबेक बीचारु ॥
नानक सतिगुरि मिलिऐ प्रभु पाईऐ सभु दूख निवारणहारु ॥१६॥
मनमुख सेवा जो करे दूजै भाइ चितु लाइ ॥
पुतु कलतु कुटंबु है माइआ मोहु वधाइ ॥
दरगहि लेखा मंगीऐ कोई अंति न सकी छडाइ ॥

हिन्दी अर्थ: मैं उस पर से (अपनी) जिंद चार टुकड़े कर दूँ (सदके करने को तैयार हॅूँ)। हे नानक ! जब हरी प्रभू (स्वयं) दयावान होते हैं। तब वह पूरे गुरू से मिलाते हैं (और। पूरा गुरू प्रभू-पति के चरणों में जोड़ देता है)। 5। हे भाई ! जिस मनुष्य के अंदर अहंकार भारी हुआ रहता है जिसके शरीर में माया का प्रभाव बना रहता है। वह मनुष्य (गुरू के दर पर) सिर्फ दिखावे की खातिर ही आता रहता है। वह मनुष्य गुरू के बताए हुए हुकम में श्रद्धा नहीं बना सकता। (इस वास्ते वह मनुष्य इस संसार-समुंद्र से) पार नहीं लांघ सकता जिससे पार लांघना बहुत मुश्किल है। (पर। हे भाई !) वह मनुष्य (ही) गुरू की रजा में (जीवन-चाल) चलता है। जिस पर परमात्मा अपनी मेहर की निगाह करता है। हे भाई ! गुरू का दीदार जरूर फल देता है। (गुरू के दर्शन करने वाला मनुष्य) जो मांग अपने मन में धारण करता है। वही माँग प्राप्त कर लेता है। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने गुरू पर श्रद्धा बनाई। मैं उनके चरणों में लगता हूँ। जो मनुष्य हर वक्त (गुरू-चरणों में) सुरति जोड़े रखता है। नानक उस मनुष्य का (सदा के लिए) दास है। 6। हे भाई ! जिन (मनुष्यों) के अंदर प्यारे का प्रेम होता है। (अपने प्यारे के) दर्शन के बिना उनके मन में शांति नहीं होती। हे नानक ! वह मनुष्य (प्यारे के) प्रेम में लीन रहते हैं। (इसी कारण) गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य का यह मन सदा खिला रहता है। 7। हे भाई ! जिन (मनुष्यों) के अंदर प्यारे का प्रेम होता है। वे अपने प्यारे के मिलाप के बिना सुखी नहीं जी सकते। हे नानक ! जब वे अपने पति-प्रभू का दर्शन करते हैं। तब वे दोबारा आत्मिक जीवन वाले बन जाते हैं। 8। हे नानक ! (कह-) हे प्रीतम प्रभू ! तू सदा कायम रहने वाले ने गुरू के माध्यम से जिन मनुष्यों के अंदर (अपना) प्यार पैदा किया है। वे मनुष्य तेरे प्यार में दिन-रात लीन रहते हैं। 9। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्यों के अंदर (परमात्मा के लिए) सदा कायम रहने वाला प्यार (पैदा हो जाता है)। उस प्यार की बरकति से वह सदा-स्थिर प्रीतम-प्रभू उनको मिल जाता है। और वे हर वक्त आनंद में टिके रहते हैं। हे नानक ! (प्यार की बरकति से) आत्मिक अडोलता में लीन रहा जाता है। 10। हे भाई ! (परमात्मा के साथ) सदा कायम रहने वाला प्रेम-प्यार पूरे गुरू से ही मिलता है। (और वह प्यार) कभी नहीं टूटता। हे नानक ! (इस प्यार को कायम रखने के लिए) परमात्मा की सिफतसालाह करते रहना चाहिए। 11। हे भाई ! जिन मनुष्यों के दिल में (परमात्मा के साथ) सदा कायम रहने वाला प्यार बन जाता है। वह मनुष्य परमात्मा की याद के बिना सुखी जीवन नहीं जी सकते (पर। ये उसकी अपनी ही मेहर है)। हे नानक ! चिरों से विछुड़े जीवों को प्रभू स्वयं ही गुरू के द्वारा अपने साथ मिलाता है। 12। हे नानक ! (कह-) हे हरी ! तूने खुद ही मेहर करके जिनके अंदर अपना प्रेम-प्यार पैदा किया है। उनको तू (अपने चरणों में) जोड़े रखता है। हे हरी ! मुझे मँगते को (भी) अपना नाम बख्श। 13। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य (भगती के आत्मिक आनंद में कभी) खिल उठता है (कभी भगती के बिरह रस के कारण) वैराग में आ जाता है। हे भाई ! असल भगती वही होती है जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रह कर करता है। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ा रहता है। वह (परमात्मा की सिफत-सालाह को) अपने मन में बसाए रखता है। हे नानक ! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य (इस संसार-समुंद्र का) परला छोर तलाश लेता है। 14। हे भाई ! सतिगुरू की बाणी को मन में बसा कर जिन मनुष्यों के हृदय में परमात्मा का नाम-खजाना आ बसता है। उनके मुँह उस सदा कायम रहने वाले (ईश्वरीय) दरबार में सदा रौशन रहते हैं। हे भाई ! करतार ने स्वयं जिन मनुष्यों पर मेहर की होती है। उनको बैठते-उठते किसी भी वक्त (परमात्मा का नाम) नहीं भूलता। हे नानक ! जिन मनुष्यों को सृजनहार प्रभू ने (स्वयं अपने चरणों में) जोड़ा होता है। वे मनुष्य गुरू के द्वारा (प्रभू चरणों में) मिले हुए फिर कभी नहीं बिछुड़ते। 15। हे भाई ! महा पुरुषों की (बताई हुई) कार बहुत मुश्किल होती है (क्योंकि उसमें स्वै मारना पड़ता है। पर उसमें से) श्रेष्ठ आत्मिक आनंद प्राप्त होता है। (इस सेवा को करने के लिए) उस मनुष्य के अंदर (परमात्मा) प्रीत-प्यार पैदा करता है। जिस पर अपनी मेहर की निगाह करता है। हे भाई ! गुरू की (बताई हुई) सेवा में लग के जगत संसार-समुंद्र से पार लांघ जाता है। (जो भी मनुष्य गुरू की बताई हुई सेवा करेगा वह) मन-माँगी मुरादें प्राप्त कर लेगा। उसके अंदर अच्छे-बुरे काम की परख की सूझ (पैदा हो जाएगी)। हे नानक ! अगर गुरू मिल जाए। तो वह परमात्मा मिल जाता है। जो हरेक दुख दूर करने वाला है। 16। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाल मनुष्य जो भी सेवा करता है। (उसके साथ-साथ वह अपना) चिक्त (परमात्मा के बिना) और के प्यार में जोड़े रखता है। (यह मेरा) पुत्र (है। यह मेरी) स्त्री (है। यह मेरा) परिवार है (-यह कह कह के ही वह मनुष्य अपने अंदर) माया का मोह बढ़ाए जाता है। परमात्मा की दरगाह में (किए हुए कर्मों का) हिसाब (तो) माँगा (ही) जाता है। (माया के मोह के फंदे से) अंत में कोई छुड़ा नहीं सकता।

संदर्भ: यह अंग 1422 है, राग Salok Vaaraan Thay Vadheek का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Raam Daas Ji।

Noida के office-tower की 15वीं मंज़िल से शाम का Delhi-view।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 38 पंक्तियों का है, 1 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1422” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Salok Vaaraan Thay Vadheek राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1423 →, पीछे का: ← अंग 1421

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।