सलोक शेख़ फ़रीद जी ॥ जितु दिहाड़ै धन वरी साहे लए लिखाइ ॥ मलकु जि कंनी सुणीदा मुहु देखाले आइ ॥1॥
सलोक 2 ॥ जे जाणा मरि जाईऐ घुमि न आईऐ ॥ झूठी दुनीआ लगि न आपु वंञाईऐ ॥2॥
फ़रीद की सीधी बात: अगर पता है कि मरना है, और लौटकर नहीं आना, तो झूठी दुनिया में लगकर अपने आप को व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिए।
दो उपकरण इस सलोक में हैं। पहला, “मरि जाईऐ घुमि न आईऐ”, मर जाना है, लौटकर नहीं आना। यह assumption है। फ़रीद यहाँ पुनर्जन्म पर बहस नहीं कर रहे। वो सिर्फ़ कह रहे हैं, चाहे लौटें या नहीं, इस जन्म में दूसरा chance नहीं।
दूसरा, “झूठी दुनीआ”। दुनिया का “झूठ” क्या है? वो promise जो वो करती है। यह जॉब तेरी है, यह घर तेरा है, यह रिश्ता तेरा है। सब अस्थायी, सब किराये पर। मगर हम इन्हें permanent मानते हैं।
“आपु वंञाईऐ” यानी अपने आप को waste करना। इस झूठ में लगकर हम अपनी असली पूँजी (समय, ध्यान, presence) फेंक देते हैं। फ़रीद का यह सलोक 800 साल पुराना है, मगर बात आज भी वही, हम WhatsApp में, news में, gossip में अपनी ज़िंदगी fund कर रहे हैं।
सलोक 3 ॥ बोलीऐ सचु धरमु झूठु न बोलीऐ ॥ जो गुरु दसै वाट मुरीदा जोलीऐ ॥3॥
फ़रीद का सबसे simple सलोक, और शायद सबसे hard भी। “बोलीऐ सचु धरमु।” सच बोलो, यही धर्म है। “झूठु न बोलीऐ।” झूठ मत बोलो।
इतना plain कि किसी और के लिए शायद clichéd लगता, मगर फ़रीद के मुँह से आता है तो वज़न है। क्योंकि फ़रीद का सूफ़ी background पता है: वो ख़ानक़ाहों में रहे, राजाओं की दया-दृष्टि से दूर। उन्होंने सच बोलने की क़ीमत चुकाई।
“जो गुरु दसै वाट मुरीदा जोलीऐ।” जो गुरु बताए वो रास्ता, मुरीद (शिष्य) उस पर चलता है।
“वाट” शब्द ध्यान दीजिए, पंजाबी में सीधा रास्ता। और “जोलीऐ”, चलते जाओ। फ़रीद कह रहे हैं, अपना ख़ुद का रास्ता मत बनाओ। गुरु ने जो बताया, वो चलो। ego को बीच में मत लाओ।
दिल्ली में हम सब अपना google maps खोल कर बैठे हैं। हर कोई shortcuts बता रहा है, हर कोई कहता है “मैं तुझे एक trick बताता हूँ।” फ़रीद का जवाब: shortcut नहीं, गुरु का रास्ता। गुरु शायद थोड़ा लम्बा रास्ता बताए। मगर वो रास्ता end तक पहुँचाता है।
सलोक 4 ॥ छैल लंघंदे पारि गोरी मनु धीरिआ ॥ कंचन वंना पासा कलवति चीरिआ ॥4॥
यह सलोक एक scene paint करता है। “छैल लंघंदे पारि।” युवक पार कर रहे हैं (नदी या ज़िंदगी की चढ़ाई)। “गोरी मनु धीरिआ।” गोरी (एक स्त्री, प्रतीक रूप में आत्मा) का मन ढाढ़स पाता है।
समझो: नदी पार करते देख कर, खड़ी हुई स्त्री सोचती है “इतने लोग पार कर रहे हैं, मैं भी कर लूँगी।” मगर फ़रीद इसी moment पर रुक कर एक चेतावनी देते हैं।
“कंचन वंना पासा कलवति चीरिआ।” सोने जैसे सुंदर शरीर भी, “कलवती” (आरी) से चीर दिए जाते हैं। यानी सब काट दिए जाते हैं, चाहे कितने भी सुंदर हों।
फ़रीद का message: दूसरों को पार होते देख कर अपने आप को मत compare करो। तेरी अपनी आरी (मौत) भी उसी तरह तेरे ऊपर चलेगी जैसे उनके ऊपर चली। हर इन्सान की अपनी आरी है। उसे time से याद रखो।
Instagram पर scroll करते हुए हम सब वही गोरी हैं। दूसरों के “success stories” देख कर मन धीरज पकड़ता है, “हाँ, ज़िंदगी पार हो जाएगी।” फ़रीद बहुत soft tone में कह रहे हैं, हर कंचन-वर्णा (gold-coloured) शरीर एक दिन कट जाता है।
सलोक 5 ॥ सेख फरीदै खैरु दीजै बंदगी ॥ जे चलहि कलमी सिजदा करै इकु बंदगी ॥5॥
फ़रीद बाबा अपनी ही प्रार्थना: “खैरु दीजै बंदगी।” मुझे ख़ैर (अच्छाई, blessing) के नाम पर बन्दगी दीजिए।
यह बहुत powerful है। फ़रीद धन नहीं माँग रहे, स्वास्थ्य नहीं माँग रहे, perfect family नहीं माँग रहे। वो माँग रहे हैं: मुझे झुकने की क्षमता दो।
“जे चलहि कलमी सिजदा करै इकु बंदगी।” “कलमी” (शायद “क़लम” से, या “कलमा” से) का सिजदा भी, बस एक बन्दगी हो। फ़रीद कह रहे हैं, अगर मेरी कलम कुछ लिखे भी, तो वो भी एक प्रार्थना ही हो।
यह writer का sufi-rule है। फ़रीद ने सूफ़ी पंजाबी कविता शुरू की। और वो कह रहे हैं, हर शब्द जो मैं लिखूँ, वो भी एक बन्दगी, एक नमाज़, एक सजदा। यह writing-as-prayer का सबसे सुन्दर formula है।
हम सब कुछ न कुछ लिखते हैं रोज़। emails, messages, posts, reports। अगर हर शब्द को सजदा माने, तो भाषा भी बदल जाए। फ़रीद का यह वर्ण्न self-conscious नहीं, यह एक pledge है।
सलोक 6 ॥ फरीदा बारि पराइऐ बैसणा सांई मुझै न देहि ॥ जे तू एवै रखसी जीउ सरीरहु लेहि ॥6॥
फ़रीद की एक duआ। “बारि पराइऐ बैसणा सांई मुझै न देहि।” साईं, मुझे दूसरे के “बार” (दरवाज़े) पर बैठने का बल मत देना।
यानी मुझे किसी और के सामने भीख माँगने पर निर्भर मत करना। आत्म-निर्भरता की प्रार्थना है, मगर ज़बर्दस्ती की नहीं।
“जे तू एवै रखसी जीउ सरीरहु लेहि।” अगर तू मुझे इस अवस्था में रखेगा (कि दूसरों पर निर्भर रहूँ), तो शरीर से जान निकाल ले।
यह intense है। फ़रीद कह रहे हैं, जीने के लिए अगर दूसरों की दया पर निर्भर रहना है, तो मरना बेहतर। यह pride नहीं, यह dignity है।
दिल्ली के बुज़ुर्गों में यह बात अक्सर सुनते हैं, “बेटा, बीमारी कोई नहीं चाहिए, बस ख़ुदा बिस्तर पर न डाले।” वही फ़रीद की duआ है। अपने पैरों पर खड़े रहने की ख़ैरात मिले, और जब वो न रहे, तो ज़िंदगी भी न रहे।
सलोक 7 ॥ कंधि कुहाड़ा सिरि घड़ा वणि कै सरु लोहारु ॥ फरीदा हउ लोड़ी सहु आपणा तू लोड़हि अंगिआर ॥7॥
फ़रीद एक लोहार की तस्वीर खड़ी कर रहे हैं। “कंधि कुहाड़ा सिरि घड़ा।” कन्धे पर कुल्हाड़ी, सिर पर घड़ा। “वणि कै सरु लोहारु।” जंगल के तालाब पर लोहार खड़ा है।
यह scene एक रोज़मर्रा का गाँव का दृश्य है। लोहार जंगल जा रहा है, लकड़ी काटने (कोयला बनाने के लिए)। कुल्हाड़ी है, पानी भरने का घड़ा भी।
“फरीदा हउ लोड़ी सहु आपणा।” फ़रीद कहते हैं, मुझे अपने “सह” (साईं, असली पति, यानी ईश्वर) की तलाश है। “तू लोड़हि अंगिआर।” तू तो अंगारे (कोयले) ढूँढ़ रहा है।
पूरा सलोक एक comparison है। लोहार जंगल में कोयला ढूँढ़ने जाता है, अपने धंधे के लिए। फ़रीद कह रहे हैं, मैं अपना धंधा छोड़कर असली saaiñ की तलाश में हूँ।
और implicit critique: हम सब कोयले-इकट्ठा करने वाले लोहार हैं। पूरी ज़िंदगी material इकट्ठा करते हैं, धन, status, possessions। और एक फ़रीद-जैसा कोई एक होता है जो उसी जंगल में जाकर साईं ढूँढ़ता है। दोनों जंगल में हैं, मगर देख कुछ और रहे हैं।
सलोक 8 ॥ फरीदा इकना आटा अगला इकना नाही लोणु ॥ अगै गए सिञापसनि चोटां खासी कउणु ॥8॥
फ़रीद रसोई की बात कर रहे हैं। “इकना आटा अगला।” कुछ के यहाँ आटा बहुत है (atta = flour, जो रोटी का base है)। “इकना नाही लोणु।” कुछ के यहाँ नमक तक नहीं।
यह visible economic inequality है। हम सब रोज़ देखते हैं। कुछ लोग fridge में leftover फेंक रहे हैं, कुछ लोग एक रोटी पर नमक नहीं रख पा रहे।
“अगै गए सिञापसनि।” आगे जाकर सब सिञापे जाएँगे, यानी पहचाने जाएँगे। “चोटां खासी कउणु।” चोटें किसको पड़ेंगी?
फ़रीद का प्रश्न: सामने यह inequality है। आगे जाकर हिसाब किसका होगा? जिसके पास नहीं था, उसका शायद उसकी ग़रीबी का कोई हिसाब नहीं। मगर जिसके पास था, उसका हिसाब बहुत detailed होगा। ज़्यादा वाले को ज़्यादा सवाल।
यह सिर्फ़ economic statement नहीं। यह एक theological mirror है: जिसको ज़्यादा मिला, उसकी ज़िम्मेदारी ज़्यादा। फ़रीद यह बात बहुत soft कह रहे हैं, मगर वो कह रहे हैं।
सलोक 9 ॥ फरीदा बुरे दा भला करि गुसा मनि न हढाइ ॥ देही रोगु न लगई पलै सभु किछु पाइ ॥9॥
फ़रीद बाबा कहते हैं: बुरे के साथ भी भला करो। और गुस्सा? उसे मन में पालो मत।
अब यह सुनने में उपदेश लगता है, लेकिन अगली line देखो: “देही रोगु न लगई।” शरीर को रोग नहीं लगेगा। फ़रीद कह रहे हैं कि गुस्सा सिर्फ़ moral problem नहीं, यह medical problem है। 13वीं सदी में बैठकर फ़रीद वही बात कह रहे हैं जो आज cortisol research कहती है: chronic anger शरीर को खाती है।
और “पलै सभु किछु पाइ।” पल्ले में सब कुछ आ जाएगा। यानी जो तुमने माँगा नहीं, वो भी मिलेगा। यह transaction नहीं है (भलाई करो तो reward मिलेगा)। यह physics है: जो energy बाहर भेजोगे, वही लौटकर आएगी। फ़रीद को karma शब्द की ज़रूरत नहीं, वो Punjabi में वही बात कह रहे हैं जो गीता संस्कृत में कहती है।
सलोक 10 ॥ फरीदा जो तै मारनि मुक्कीआं तिनां न मारे घुमि ॥ आपनड़ै घरि जाईऐ पैर तिनां दे चुमि ॥10॥
पिछले सलोक का continuation। “जो तै मारनि मुक्कीआं।” जो तुझे घूँसे मारते हैं, “तिनां न मारे घुमि।” उनको लौट कर मत मारना।
फ़रीद non-violence का सिख-सूफ़ी version दे रहे हैं। और यह passive non-violence नहीं। अगली line में active step है:
“आपनड़ै घरि जाईऐ पैर तिनां दे चुमि।” अपने घर जाओ, और उनके पैर चूम कर।
यह radical है। न केवल वापस नहीं मारना, बल्कि उनके पैर चूम कर अपने घर जाओ। फ़रीद कह रहे हैं, यह कोई “मैं बेहतर हूँ” वाली revenge नहीं। यह genuine humility है।
और एक practical बात: “अपने घर जाने” का मतलब है शान्ति वाली जगह। यानी जो तुम्हें मारता है, उसे माफ़ करके अपनी शान्ति में लौट जाओ। उसे मारकर तुम उसके level पर रह जाओगे।
कोई पाठक यहाँ कहेगा, “यह तो impossible है।” फ़रीद का जवाब: हाँ, मुश्किल है। मगर देखो, यह 800 साल पहले एक सूफ़ी फ़क़ीर ने कहा, और आज भी इस ग्रंथ में पढ़ी जाती है। मतलब किसी ने तो कर के दिखाया।
सलोक 11 ॥ फरीदा जां तउ खटण वेल तां तू रता दुनी सिउ ॥ मरग सवाई नीहि जां भरिआ तां लदिआ ॥11॥
फ़रीद एक merchant की life-cycle describe कर रहे हैं। “जां तउ खटण वेल।” जब तेरा कमाने का समय था। “तां तू रता दुनी सिउ।” तब तू दुनिया में रंगा रहा।
यानी जब काम करने का, सीखने का, बचाने का समय था, तब तू दुनिया के मज़े में लगा रहा। outings, parties, status games, सब।
“मरग सवाई नीहि जां भरिआ तां लदिआ।” मरग (मौत) की नींव डलवाई जब तू भरा हुआ (मद से, पुराने आदमी से) था। यानी मौत तेरी नींव डाल रही थी जब तू अपनी youth के नशे में था।
फ़रीद का message: जब “खटण वेल” थी (when you should have invested), तू invest नहीं कर रहा था। और जब “लदिआ” (loaded with junk) था, मौत आ गयी।
यह बहुत modern observation है। एक 25 साल का engineer, ज़बरदस्त income, मगर वो सिर्फ़ चीज़ें ख़रीद रहा है। 50 साल का होकर realise करेगा “मैंने अपने आप में invest नहीं किया।” फ़रीद कह रहे हैं, यह pattern नया नहीं। 800 साल से चल रहा है।
सलोक 12 ॥ देखु फरीदा जु थीआ दाड़ी होई भूर ॥ अगहु नेड़ा आइआ पिछा रहिआ दूरि ॥12॥
फ़रीद बाबा अपनी ही उम्र की बात कर रहे हैं। “देखु फरीदा जु थीआ।” देख फ़रीद, क्या हुआ। “दाड़ी होई भूर।” दाढ़ी भूरी (सफ़ेद) हो गयी।
यह self-talk है। फ़रीद आइने के सामने खड़े हो कर ख़ुद से बात कर रहे हैं। और देख रहे हैं अपनी सफ़ेद दाढ़ी।
“अगहु नेड़ा आइआ।” आगे (मौत) नज़दीक आ गयी। “पिछा रहिआ दूरि।” पीछा (बीती ज़िंदगी) दूर रह गयी।
यह बहुत soft, बहुत honest moment है। हम सब आइने में देखते हैं, सफ़ेद बाल बढ़ रहे हैं। फ़रीद उसी बात को कह रहे हैं, मगर बहुत quiet आवाज़ में: मौत की तरफ़ क़दम बढ़ रहे हैं, बीती ज़िंदगी छूट रही है।
और implicit है: तू अभी भी ऐसे जी रहा है जैसे जवान है। फ़रीद कह रहे हैं, अब time है priorities बदलने का। दाढ़ी सफ़ेद हो गयी, मगर मन अभी जवानी की list पूरी कर रहा है। यह alignment ठीक करनी है।
सलोक 13 ॥ देखु फरीदा जु थीआ साकर सहु अहारु ॥ जा फिटि गई हडक्क हडक्क रहिआ ममि कारु ॥13॥
फ़रीद एक consumer की कहानी कह रहे हैं। “देखु फरीदा जु थीआ।” देख फ़रीद, क्या हुआ। “साकर सहु अहारु।” शक्कर भोजन में डलता रहा (सब कुछ मीठा खाया)।
यानी जब फ़रीद जवान थे, उन्होंने स्वाद वाला खाना, मीठा, बढ़िया खाना, सब enjoy किया।
“जा फिटि गई हडक्क।” जब हड्डी फिट हो गयी (टूट गयी, weak हो गयी), “हडक्क रहिआ ममि कारु।” तो हड्डी का मामला (मम-कारु, ख़ुद का काम) रह गया।
यानी अब जब उम्र हो गयी और शरीर कमज़ोर है, अब diet ध्यान रखना पड़ रहा है, “मेरी हड्डी के लिए क्या ठीक है।” फ़रीद observe कर रहे हैं कि हम सब जवानी में reckless होते हैं, और बुढ़ापे में परवाह करते हैं, उल्टा क्रम।
दिल्ली के डायबिटीज़ patients इस बात पर हँसेंगे। हर doctor कहता है, “अब आप यह खा नहीं सकते।” और patient सोचता है, “काश 20 साल पहले यह सावधानी रखी होती।” फ़रीद 13वीं सदी में बिल्कुल वही observation कर चुके।
सलोक 14 ॥ फरीदा कोठे मंडप मारीआ एते कुस लाहि ॥ बुलाइआ बुलि न बोलई धन उठि रही ज मलाइ ॥14॥
फ़रीद बड़े-बड़े महलों की बात कर रहे हैं। “कोठे मंडप मारीआ।” बड़े-बड़े महल, मंडप, ऊँचे घर। “एते कुस लाहि।” इतना सब लगाया।
यानी आदमी ने life-time लगा कर बहुत कुछ बनाया, बड़ा घर, सजावट, status।
“बुलाइआ बुलि न बोलई।” मगर एक दिन बुलाया गया, तो जवाब नहीं दे पाया। “धन उठि रही ज मलाइ।” धन (शरीर, या ध्यान देने वाला) उठकर चला गया।
यह दोहरी image है। एक है मृत्यु: मलक-उल-मौत ने बुलाया, और inhabitant नहीं बोल पाया। दूसरा है partner-image: पंजाबी विवाह की रस्म जहाँ “धन” शब्द का अर्थ है दुल्हन। उसके लिए सब बनाया, मगर वो “उठ रही मलाइ” (इकट्ठा कर रही)।
फ़रीद का play यह है: दोनों ही जगह आदमी का construction useless हो जाता है। महल बनाए, दुल्हन के लिए, मगर वो ख़ुद ही चला जाए या वो उठ कर चली जाए, तो महल किस काम का। यह property-focused ज़िंदगी की futility है।
सलोक 15 ॥ फरीदा खाकु न निंदीऐ खाकू जेडु न कोइ ॥ जीवदिआ पैरां तले मुइआ उपरि होइ ॥15॥
फ़रीद का famous सलोक। “खाकु न निंदीऐ।” खाक (मिट्टी, धूल) की निन्दा मत करो। “खाकू जेडु न कोइ।” खाक जैसा बड़ा कोई नहीं।
मिट्टी? बड़ी? हम इस पर रोज़ चलते हैं, यह तो सबसे नीचे है।
फ़रीद की reasoning: “जीवदिआ पैरां तले।” ज़िंदा रहते हुए वो हमारे पैरों के नीचे है। “मुइआ उपरि होइ।” मरने पर हमारे ऊपर होती है।
यानी आज तू मिट्टी पर चलता है, गर्व से। एक दिन वही मिट्टी तेरे ऊपर होगी, तेरी क़ब्र में। तेरा सर उसी मिट्टी के नीचे। तेरी पूरी identity (नाम, उपलब्धियाँ, designations) उसी एक मिट्टी की एक मुट्ठी के नीचे।
फ़रीद कह रहे हैं, इसलिए मिट्टी को कमतर मत समझो। इसे honour दो। यह तेरी असली identity है। ग़ालिब बहुत साल बाद यही कहेगा: “हुई मुद्दत कि ग़ालिब मर गया पर याद आता है।” मिट्टी ने ग़ालिब को भी रखा, फ़रीद को भी। और जो उसे आज नकारता है, वो भी कल वहीं जाएगा।
फ़रीद बाबा 13वीं सदी के पंजाब में रहते थे, सूफ़ी फ़क़ीर, मुलतान-पाकपटन के। उनकी ज़बान पंजाबी, मगर सूफ़ी भाव से भरी हुई। यह उनका पहला सलोक है ग्रंथ साहिब में।
पहली ही line रूपक है। पंजाबी विवाह की रस्म: “जितु दिहाड़ै धन वरी।” जिस दिन धन (दुल्हन) ब्याही जाती है। “साहे लए लिखाइ।” मुहूर्त लिखा जाता है।
मगर यह विवाह कौनसा? “मलकु जि कंनी सुणीदा मुहु देखाले आइ।” वो मलक (मौत का फ़रिश्ता) जिसकी बात कानों से सुनी थी, वो मुँह दिखा कर आ जाता है।
पूरा रूपक यह है: जिस दिन दुल्हन (आत्मा) ब्याही जाएगी, उसी दिन मलक-उल-मौत (मौत का दूत) आता है। शादी की रस्म और मृत्यु की रस्म, दोनों में मुहूर्त है, दोनों में विदाई है, दोनों में नये घर जाना है। फ़रीद का genius यह है कि उन्होंने मृत्यु को एक celebration की तरह describe किया।
सोचो: जब अंग्रेज़ी में हम कहते हैं “एक मर गया”, तो उदास। फ़रीद के यहाँ “ब्याह हो गया”, तो उदास भी, उत्सव भी। यही सूफ़ी रुख़ है। मौत डरावनी चीज़ नहीं, asli शादी।