राग: Salok Fareed Jee · रचयिता: Bhagat Sheikh Fareed Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
बंनि॑ उठाई पोटली किथै वंञा घति ॥2॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।
हिन्दी अर्थ: (‘दुनिया’ वाली) छोटी सी पोटली (मैंने भी) बाँध के उठाई हुई है। इसको कहाँ फेंक के जाऊँ। (भाव। दुनिया के मोह को छोड़ना कोई आसान काम नहीं है)। 2।
किझु न बुझै किझु न सुझै दुनीआ गुझी भाहि ॥ सांईं मेरै चंगा कीता नाही त हं भी दझां आहि ॥3॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
हिन्दी अर्थ: दुनिया (देखने में तो गुलज़ार है। पर इसका मोह असल में) छुपी हुई गुप्त आग है (जो अंदर ही अंदर मन में धुखती रहती है; इसमें पड़े हुए जीवों को जिंदगी के सही रास्ते की) कुछ सूझ-बूझ नहीं पड़ती। मेरे सांई ने (मेरे ऊपर) मेहर की है (और मुझे इससे बचा लिया है) नहीं तो (बाकी लोगों की तरह) मैं भी (इसमें) जल जाता (भाव। माया के मोह से प्रभू स्वयं ही मेहर करके बचाता है। हमारे अपने वश की बात नहीं कि यह ‘पोटली’ सिर से उतार के फेंक सकें)। 3।
फरीदा जे जाणा तिल थोड़ड़े संमलि बुकु भरी ॥ जे जाणा सहु नंढड़ा तां थोड़ा माणु करी ॥4॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।
हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! अगर मुझे पता हैं कि (इस शरीर-रूपी बर्तन में) बहुत थोड़े से (श्वास रूप) तिल हैं तो मैं सोच-समझ के (इनकी) मुट्ठी भरूँ (भाव। बेपरवाही से जीवन की साँसें ना गुजारी जाऊँ)। अगर मुझे समझ आ जाए कि (मेरा) पति (-प्रभू) बाल-स्वभाव वाला है (भाव। भोले स्वभाव को प्यार करता है) तो मैं भी (इस दुनिया वाली ‘पोटली’ का) गुमान छोड़ दूँ। 4।
जे जाणा लड़ु छिजणा पीडी पाईं गंढि ॥ तै जेवडु मै नाहि को सभु जगु डिठा हंढि ॥5॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
हिन्दी अर्थ: (हे पति-प्रभू !) यदि मुझे समझ हो कि (इस पोटली के कारण आपका पकड़ा हुआ) पल्ला छिज जाता है (भाव। आपके से दूरी बन जाती है) तो मैं (आपके पल्ले से ही) पक्की गाँठ डालूँ। (हे साई !) मैंने सारा जगत फिर के देख लिया है। आपके जैसा (साथी) मुझे और कोई नहीं मिला। 5।
फरीदा जे तू अकलि लतीफु काले लिखु न लेख ॥ आपनड़े गिरीवान महि सिरु नंीवां करि देखु ॥6॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।
हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! यदि आप बारीक बुद्धि वाला (समझदार) है। तो और लोगों के बुरे कर्मों की पड़ताल ना कर; अपने गिरेबान में झांक के देख (कि आपके अपने कर्म कैसे हैं)। 6।
फरीदा जो तै मारनि मुकीआं तिन॑ा न मारे घुंमि ॥ आपनड़ै घरि जाईऐ पैर तिन॑ा दे चुंमि ॥7॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! जो (मनुष्य) आपको मुक्के मारें (भाव। कोई दुख दें) उनको आप पलट के ना मारना (भाव। बदला ना लेना। बल्कि) उनके पैर चूम के अपने घर में (शांत अवस्था में) टिका रह। 7।
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।
हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! जब आपका (असल कमाई) कमाने की बेला थी तब तूने दुनिया (की ‘पोटली’) के साथ मस्त रहा। (इसी तरह) मौत की नींव पक्की होती चली गई। (भाव। मौत का समय नजदीक आता चला गया) जब सारे श्वास पूरे हो गए। तब यहाँ से कूच करना पड़ा। 8।
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! देख। जो कुछ (अब तक) हो चुका है (वह ये है कि) दाढ़ी सफेद हो गई है। मौत की तरफ से वक्त नजदीक आता जा रहा है। और पिछला पासा (जब से पैदा हुआ था) दूर (पीछे को) रह गया है। (सो। अब अंजान वाले काम ना कर। और आगे की तैयारी के लिए कमाई कर)। 9।
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।
हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! देख। (अब तक) जो हुआ है (वह यह है कि ‘दाढ़ी भूरी’ हो जाने के कारण) दुनिया के मीठे पदार्थ (भी) दुख देते हैं (रास नहीं आते। कयोंकि अब शारीरिक इन्द्रियां कमजोर पड़ जाने के कारण उन भोगों को अच्छी तरह भोग नहीं सकते) यह दुखड़ा अपने साई के अलावा किस को कहें। (भाव। प्रभू के नियमों के अनुसार हो रही इस तब्दीली में कोई रोक नहीं डाल सकता)। 10।
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! (‘सकर’ के ‘विसु’ हो जाने का कारण ये है कि) आँखें (जगत के रंग-तमाशे) देख के (अब) कमजोर हो गई हैं (जगत के रंग-तमाशे तो उसी तरह मौजूद हैं। पर आँखों में अब देखने की ताकत नहीं रही)। कान (दुनिया के राग-रंग) सुन-सुन के (अब) बहरे हो गए हैं। (सिर्फ आँखें और कान ही नहीं। सारा) शरीर ही बिरध हो गया है। इसने और ही रंग बदल लिया है (अब भोग भोगने के लायक नहीं रहा। और इन आहों का कोई इलाज नहीं है)। 11।
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।
हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! काले केसों के होते हुए जिन्होंने पति-प्रभू के साथ प्यार नहीं किया। उनमें से कोई विरला ही धउले आने पर (भाव। विरध उम्र में) ईश्वर को याद कर सकता है। (हे फरीद !) आप साई प्रभू से प्यार कर। (यह) प्यार (नित्य) नया रहेगा (दुनिया की ‘पोटली’ वाला प्यार तो शरीर- ‘साख’ पकने पर टूट जाएगा)। 12।
मः 3 ॥ फरीदा काली धउली साहिबु सदा है जे को चिति करे ॥ आपणा लाइआ पिरमु न लगई जे लोचै सभु कोइ ॥ एहु पिरमु पिआला खसम का जै भावै तै देइ ॥13॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ हे फरीद ! अगर कोई बँदा बँदगी करे। तो जवानी में भी और बुढ़ापे में भी मालिक (मिल सकता) है। पर बेशक कोई चाह व कोशिश करके देख ले। ‘यह प्यार’ अपने आप नहीं लगाया जा सकता। यह प्यार-रूपी प्याला तो मालिक का (अपना) है। जिसको उसकी मर्जी होती है देता है। 13।
फरीदा जिन॑ लोइण जगु मोहिआ से लोइण मै डिठु ॥ कजल रेख न सहदिआ से पंखी सूइ बहिठु ॥14॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।
हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! (इस दिखाई देती गुलजार। पर असल में। ‘गुझी भाहि’ अर्थात ‘गुप्त आग’ में मस्त जीव को कुछ सूझता-बूझता नहीं। खूब गुमान करता है। पर गुमान किस बात का।) जो (सुंदर) आँखों ने जगत को मोह रखा था। वह आँखें मैंने भी देखीं। (पहले तो इतनी नाजुक थीं कि) काजल की धार नहीं सह सकती थीं। फिर वे पंछियों के बच्चों का घोंसला बनीं (भाव। हमारे सामने शारीरिक सुंदरता आखिर नित्य नाश हो जाती है। इस पर गुमान झूठा है)। 14।
फरीदा कूकेदिआ चांगेदिआ मती देदिआ नित ॥ जो सैतानि वंञाइआ से कित फेरहि चित ॥15॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! (चाहे कितना ही) पुकार-पुकार के कहें (कितना ही) नित्य समझाते रहें; पर। जिन लोगों को (मन-) शैतान ने बिगाड़ा हुआ है। वह कैसे (‘दुनी’ की तरफ से) चित्त फेर सकते हैं। 15।
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।
हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! अगर आप मालिक (-प्रभू) को हर जगह ढूँढता है (भाव। देखना चाहता है) तो रास्ते की दूब (जैसा) बन जा (जिसके) एक पौधे को (लोग) तोड़ते हैं। तो कई और पौधे (उनके पैरों तले) लिताड़े जाते हैं। (यदि आप ऐसा स्वभाव बना लें) तो आप मालिक के दर पर कबूल होंगे। 16।
फरीदा खाकु न निंदीऐ खाकू जेडु न कोइ ॥ जीवदिआ पैरा तलै मुइआ उपरि होइ ॥17॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! मिट्टी को बुरा नहीं कहना चाहिए। मिट्टी की बराबरी कोई नहीं कर सकता। (मनुष्य के) पैरों तले होती है। (पर मनुष्य के) मरने पर उसके ऊपर हो जाती है। (इसी तरह ‘गरीबी-स्वभाव’ की रीस नहीं हो सकती। ‘गरीबी स्वभाव’ वाला व्यक्ति जिंदगी में चाहे सबकी ज्यादती सहता है। पर मन को मारने के कारण आत्मिक अवस्था में सबसे ऊँचा होता है)। 17।
फरीदा जा लबु ता नेहु किआ लबु त कूड़ा नेहु ॥ किचरु झति लघाईऐ छपरि तुटै मेहु ॥18॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।
हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! अगर (ईश्वर की बँदगी करते-करते बतौर इवज़ाने कोई दुनिया का) लालच है। तो (ईश्वर से) असल प्यार नहीं। (जब तक) लालच है। तब तक पयार झूठा है। टूटे हुए छप्पर पर वर्षा होने पर कितना समय निकल सकेगा। (भाव। जब दुनिया वाली गरज़ पूरी ना हुई। पयार टूटेगा)। 18।
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! हरेक जंगल को गाहने का क्या लाभ है। जंगल में काँटें क्यों लिताड़ता फिरता है। रॅब (तो आपके) हृदय में बसता है। जंगल को तलाशने का क्या फायदा। 19।
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।
हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! इन छोटी-छोटी बातों से (जवानी के वक्त) मैं थल और पहाड़ फिर आता रहा। पर आज (बुढ़ापे में) मुझे फरीद को (यह थोड़ी सी दूर पड़ा हुआ) लोटा सौ कोसों पर हो गया है (सो। बँदगी का वक्त भी जवानी ही है जब शरीर काम दे सकता है)। 20।
फरीदा राती वडीआं धुखि धुखि उठनि पास ॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! (सर्दियों की) लंबी रातों में (सो-सो के) पासे (पसलियां) अकड़ जाते हैं (इसी तरह पराई आस ताकते हुए समय खत्म नहीं होता। पराए दर पर बैठ के बोर हो जाते हैं)। सो।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है। चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
इस अंग पर 20 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(‘दुनिया’ वाली) छोटी सी पोटली (मैंने भी) बाँध के उठाई हुई है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।