सलोक 16 ॥ फरीदा खाकु निंदीऐ खाकू जेडु न कोइ ॥ जीवदिआ पैरां तले मुइआ उपरि होइ ॥16॥
सलोक 17 ॥ फरीदा जा लबु ता नेहु किआ लबु त कूड़ा नेह ॥ किचरु झति लघाईऐ छपरि टुटै मेह ॥17॥
फ़रीद बहुत direct हो रहे हैं। “जा लबु ता नेहु किआ।” जहाँ “लब” (lust, greed, desire) है, वहाँ “नेहु” (प्रेम) क्या?
“लब” शब्द फ़ारसी-अरबी से, मूल अर्थ “होंठ” मगर metaphorical रूप से “इच्छा”। फ़रीद कह रहे हैं, जहाँ इच्छा है, वहाँ असली प्रेम नहीं हो सकता।
“लबु त कूड़ा नेह।” लब है तो प्रेम झूठा है। यानी अगर तुम्हारा “प्रेम” किसी चीज़ की चाह पर टिका है, वो प्रेम नहीं, transaction है।
फिर एक homely image: “किचरु झति लघाईऐ।” कितनी देर तक यह झति (बारिश का छप्पर, टपकता हुआ छत) बनाए रखोगे। “छपरि टुटै मेह।” छप्पर टूट जाएगा बारिश में।
फ़रीद कह रहे हैं, जो प्रेम तुमने desire पर बनाया है, वो ऐसा है जैसे एक टपकता हुआ छत बारिश में। टूटेगा। जब tough time आएगा, यह “प्रेम” काम नहीं करेगा। और हर रिश्ता एक दिन tough test में आता है।
Delhi के arranged marriages, या काम के colleagues, या business partnerships, सब “लब” पर ज़्यादातर खड़े होते हैं। कोई बात हो (status, money, convenience)। फिर वो बात बदले, “प्रेम” बदल जाता है। फ़रीद इसी fragility को बता रहे हैं।
सलोक 18 ॥ फरीदा कालीं जिनी न रावीआ धउली रावै कोइ ॥ करि साईं सिउ पिरहड़ी रंगु नवेला होइ ॥18॥
फ़रीद एक दिलचस्प observation दे रहे हैं। “कालीं जिनी न रावीआ।” जिन्होंने काले बालों (जवानी) में “रावीआ” (आनन्द लिया, प्रेम किया) नहीं। “धउली रावै कोइ।” क्या वो धोले बालों (बुढ़ापे) में रावेगा?
यानी अगर तू जवानी में हरि की भक्ति नहीं की, क्या तू बुढ़ापे में करेगा? Probably नहीं। habit जवानी में बनती है, बुढ़ापे में नहीं।
मगर फ़रीद optimist भी हैं: “करि साईं सिउ पिरहड़ी रंगु नवेला होइ।” साईं से “पिरहड़ी” (दोस्ती, प्रेम) कर ले। तो “रंगु नवेला होइ”, रंग नया हो जाएगा।
“नवेला” शब्द ध्यान देने योग्य है, नया, fresh। यानी अगर तू बुढ़ापे में भी हरि से प्रीत कर ले, तेरा रंग नया हो जाएगा। पुरानी आदतें नहीं चलेंगी, नयी जान आएगी।
यह बहुत गहरी बात है। फ़रीद कह रहे हैं, यह सच है कि जवानी में करना best है। मगर अगर नहीं किया, तो despair मत हो। बुढ़ापे में भी अगर तू “साईं सिउ पिरहड़ी” कर ले, तेरा रंग नया हो जाएगा। यह possibility हमेशा खुली है। बस तू करना चाहो।
सलोक 19 ॥ मु फरीदा रबु खजूरी पकीआ माखिओं भरे घुम्बि ॥ जिन फरीद कुलाहां माथे तिन तर तर खाधीआ धम्मि ॥19॥
फ़रीद बहुत intimate ढंग से बात कर रहे हैं। “मु फरीदा।” मुझ फ़रीद के लिए। “रबु खजूरी पकीआ।” रब के खजूर पके हुए हैं। “माखिओं भरे घुम्बि।” शहद से भरे घड़े-जैसे।
सूफ़ी imagery: खजूर मीठा फल। शहद और भी मीठा। यानी रब के पास unlimited मिठास है। पके खजूर, शहद से भरे।
मगर अगली line में एक sharp turn: “जिन फरीद कुलाहां माथे।” जिनके माथे पर कुलाह (टोपी, top-hat) है। “तिन तर तर खाधीआ धम्मि।” वो “धम्मि” (पैरों की ठोकर, धमक) से खाते हैं।
यह कौन हैं? “कुलाह” शब्द ख़ास है, यह ख़ानक़ाह के बड़े सूफ़ी पीरों की टोपी है। यानी जो ऊँचे क़द के हैं, बड़े नाम वाले हैं, वो रब के खजूर “धम्मि” से (हल्के से, हाथ बढ़ाकर) उठा लेते हैं।
फ़रीद का self-deprecating point: “मेरे लिए (मुझ अदना के लिए) तो रब के पास बहुत है, मगर जो बड़े पीर हैं, उनके लिए तो वो खुद ही आसानी से देता है।” यह जलन नहीं, यह humility का statement है। “मैं कितना भाग्यशाली हूँ, मुझे भी हिस्सा मिल रहा है।”
और implicit: हर इन्सान को रब का खजूर मिलता है, उसके अपने level पर। बड़े सूफ़ी आसानी से उठा लेते हैं, छोटे “मु फ़रीद” को भी कुछ-कुछ मिलता है। rejection कभी नहीं।
सलोक 20 ॥ फरीदा बारि पराइऐ बैसणा सांई मुझै न देहि ॥ जे तू एवै रखसी जीउ सरीरहु लेहि ॥20॥
फ़रीद पिछले अंग के सलोक 6 की repeat कर रहे हैं। शायद editor (गुरु अर्जन देव जी) ने इसे intentionally बार-बार रखा है, क्योंकि यह बहुत important सलोक है।
फिर वही बात: “बारि पराइऐ बैसणा” यानी दूसरे के दरवाज़े पर निर्भर रहना। फ़रीद नहीं चाहते। आत्म-निर्भरता की प्रार्थना है।
“जे तू एवै रखसी जीउ सरीरहु लेहि।” अगर ऐसा रखेगा, तो जान निकाल ले।
यह repeat इसलिए important है क्योंकि बुढ़ापे में dignity का सवाल बहुत relevant होता है। हम सब बूढ़े होते हैं, और अक्सर दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं। फ़रीद यह बार-बार कह रहे हैं ताकि हम याद रखें: dignity के लिए duआ करो।
सिर्फ़ physical नहीं, mental dependence भी। दूसरों की approval, social media validation, बच्चों की रिझाई। फ़रीद इस सब से आज़ाद रहने की duआ कर रहे हैं। अपने पैरों पर खड़े रहो, यह physical नहीं, soul-level statement है।
सलोक 21 ॥ फरीदा चारि गवाइआ हंढि कै चारि गवाइआ सम्मि ॥ लेखा रबु मंगेसीआ तू आंहो केरै कम्मि ॥21॥
फ़रीद ज़िंदगी का timeline बना रहे हैं। आदमी की पूरी ज़िंदगी को कैसे ख़र्च करते हैं।
“चारि गवाइआ हंढि कै।” चार (पहर, यानी quarter of life) “हंढि कै” (हँढना यानी घूमना-फिरना, फालतू में, मटरगश्ती में) गँवाया।
“चारि गवाइआ सम्मि।” चार “सम्मि” (नींद) में गँवाया।
यानी आधा जीवन idle घूमने में, आधा सोने में। और बीच का जो बचा, वो भी काम-धाम में।
“लेखा रबु मंगेसीआ।” रब हिसाब माँगेगा। “तू आंहो केरै कम्मि।” तू आख़िर किस काम में था?
यह interrogation है। जब असली पूछताछ होगी, तू क्या जवाब देगा? “मैं तो busy था” यह जवाब नहीं चलेगा। “किस काम में busy था?” यह सवाल अहम है।
दिल्ली के executives का timetable देखो। 6 बजे gym, 9 बजे office, 7 बजे gym again, 10 बजे dinner, 1 बजे social media scrolling। फ़रीद कह रहे हैं, “रब इन सब का हिसाब माँगेगा।” ज़िंदगी busy होने और meaningful होने में बहुत फ़र्क़ है।
सलोक 22 ॥ फरीदा दरि दरवाजै जाइ कै किउ डिठो घड़ीआलु ॥ एहु निदोसां मारीदा मुहि चोटा सहीआलु ॥22॥
फ़रीद एक interesting scene describe कर रहे हैं। “दरि दरवाजै जाइ कै।” दरवाज़े पर जाकर। “किउ डिठो घड़ीआलु।” क्यों देखा घड़ियाल (gong, समय बजाने वाला brass disk)।
पुराने ज़माने में मस्जिदों और मन्दिरों के बाहर एक बड़ा brass disk हुआ करता था। उसको लाठी से मार कर समय बजाते थे।
फ़रीद observe कर रहे हैं: “एहु निदोसां मारीदा।” यह निर्दोष (कुछ नहीं किया जिसने) मारा जाता है। “मुहि चोटा सहीआलु।” मुँह पर चोटें सहता है।
फ़रीद का question: यह घड़ियाल क्यों मारा जा रहा है रोज़, इसने क्या किया? यह तो निर्दोष है।
और implicit philosophical question: ज़िंदगी में हमें भी मारा जा रहा है, चोटें मिल रही हैं, मगर “मुहि चोटा सहीआलु”, हम मुँह से सब सह रहे हैं। हम भी निर्दोष हैं अक्सर। फिर भी मार पड़ती है।
यह existential observation है। सब निर्दोष हैं, फिर भी सब मारे जाते हैं। यह करुणा है। फ़रीद ज़िंदगी की संरचना को observe कर रहे हैं, और एक तरह से ख़ुद को (और हम सब को) घड़ियाल बता रहे हैं। हर रोज़ चोट खाते हैं, हर रोज़ बजते हैं, मगर “मुहि चोटा सहीआलु”, सहते जाते हैं।
सलोक 23 ॥ फरीदा घड़ीआलु निदोसु ओहु निदोसु मेरा पिरु ॥ निदोसी जा बहु आइ सी निदोसां सिरि करे ज़ुलमु ॥23॥
पिछले सलोक का continuation। “घड़ीआलु निदोसु।” घड़ियाल निर्दोष है। “ओहु निदोसु मेरा पिरु।” और मेरा पिर (प्रेमी, हरि) भी निर्दोष है।
फ़रीद रिश्ते बदल रहे हैं। पहले घड़ियाल को निर्दोष कहा। अब हरि को भी निर्दोष कह रहे हैं। यह interesting parallel है।
“निदोसी जा बहु आइ सी।” निर्दोष जब इकट्ठा आए। “निदोसां सिरि करे ज़ुलमु।” तो निर्दोषों पर ही ज़ुल्म होगा।
यानी इस दुनिया में, अगर सब “निर्दोष” हो जाएँ, फिर भी एक-दूसरे पर ज़ुल्म होगा। क्योंकि duniya की संरचना ही ऐसी है। यह fatalistic statement है।
दूसरा reading: हरि की ही सब लीला है। वो ख़ुद “निर्दोष” है (कोई दोष उस पर नहीं रखा जा सकता), मगर उसकी सृष्टि में निर्दोषों पर ही ज़ुल्म होता है। यह theodicy का सूफ़ी version है: “ईश्वर अच्छा है, फिर दुनिया में पीड़ा क्यों?” फ़रीद का जवाब: कुछ भी कह नहीं सकते, मगर हरि “निदोस” है।
यह acceptance है, escape नहीं। फ़रीद कह रहे हैं, सब्र। हरि निर्दोष, हम निर्दोष, मगर पीड़ा होती ही है। इसका कारण ढूँढ़ने में time waste नहीं करना। बस सहना है, और भीतर का “पिर” याद रखना है।
सलोक 24 ॥ फरीदा रोटी मेरी काठ की लाव मेरी भुख ॥ जिना खाधी चोपड़ी घणे सहनिगे दुख ॥24॥
फ़रीद का सबसे memorable सलोक। “रोटी मेरी काठ की।” मेरी रोटी काठ (लकड़ी) की है। “लाव मेरी भुख।” मेरा “लाव” (मसाला, अचार) मेरी भूख है।
यानी मैं बहुत साधारण खाना खाता हूँ। एक रूखी रोटी, और मेरा अचार सिर्फ़ भूख है। भूख अच्छी हो तो रूखी रोटी भी मीठी।
“जिना खाधी चोपड़ी।” जिन्होंने “चोपड़ी” (मक्खन-लगी, अच्छी, घी-शक्कर वाली) खायी। “घणे सहनिगे दुख।” वो बहुत दुख सहेंगे।
यह क्यों? क्योंकि मक्खन-लगी रोटी की आदत आदमी को नरम बनाती है। फिर जब मुश्किल आती है, झेल नहीं पाता। फ़रीद कह रहे हैं, साधारण रहो, simple रहो, फिर ज़िंदगी की चोटें कम लगेंगी।
यह hardcore सूफ़ी instruction है। आज के self-care, comfort-first culture के साथ बिल्कुल opposite। फ़रीद कह रहे हैं, comfort तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन है। आज comfort, कल inability to handle anything। आज “चोपड़ी रोटी”, कल “घणे दुख”।
और एक secondary reading: चोपड़ी रोटी = exploitation की रोटी, दूसरे के हक़ पर बनी रोटी। फ़रीद उसको भी indict करते हैं। मेरी सूखी रोटी, मगर ईमान की।
सलोक 25 ॥ रुखी सुखी खाइ कै ठंढा पाणी पीउ ॥ फरीदा देखि पराई चोपड़ी न तरसाए जीउ ॥25॥
पिछले सलोक का continuation, और शायद सबसे famous फ़रीदी सलोक। “रुखी सुखी खाइ कै।” सूखी रूखी खाओ। “ठंढा पाणी पीउ।” ठंडा पानी पीओ।
यह बहुत simple instruction है। मगर अगली line में सूफ़ी का असली काम है: “फरीदा देखि पराई चोपड़ी।” फ़रीद कहते हैं, दूसरे की मक्खन-लगी रोटी देखकर, “न तरसाए जीउ।” मन को मत तरसाओ।
यह सबसे tough है। अपनी सूखी रोटी खाना आसान है, अगर दूसरा भी सूखी खा रहा हो। मगर जब बग़ल वाला आदमी मक्खन-घी की रोटी खा रहा है, और तू सूखी, मन तरसता है। यही है असली परीक्षा।
फ़रीद कह रहे हैं, सूखी खा रहा है तो जयचंद नहीं हो। मक्खन वाले की तरफ़ नज़र मत डालो। तुम्हारी रोटी तुम्हारी, उसकी उसकी।
Instagram-age का सबसे relevant सलोक। हम अपनी ज़िंदगी में happy होते हैं, फिर scroll करते हैं, और देखते हैं किसी की vacation, किसी का house, किसी की designer life। तुरंत तरस लगती है। फ़रीद कह रहे हैं, 800 साल पहले भी यही pattern था। नज़र अपनी प्लेट पर रखो।
फ़रीद कुछ साम्बादिक repetition के साथ बात आगे बढ़ा रहे हैं। पिछले अंग के 15वें सलोक की echo, मगर थोड़ा संशोधित। हम मानते हैं कि sufi paramparas में repetition एक teaching device है।
मिट्टी की निन्दा क्यों न करो? “जीवदिआ पैरां तले।” ज़िंदा रहते हुए पैरों के तले। “मुइआ उपरि होइ।” मरने पर ऊपर।
फ़रीद यह बात repeat इसलिए कर रहे हैं क्योंकि यह truth बहुत आसान है, मगर भुलाने में हमें कोई दिक़्क़त नहीं। हम तुरंत भूल जाते हैं कि मिट्टी हमारी destination है, और चलते-चलते उस पर thump-thump-thump करते रहते हैं।
सूफ़ी क़ब्रिस्तान का concept इस बात पर बहुत reflect करता है। मुसलमान दफ़न होते हैं, मिट्टी के नीचे। फ़रीद उसी realization पर रोज़ बैठते थे। आइने में नहीं, क़ब्र की मिट्टी पर।