सलोक 22 ॥ कबीर सूरज चांद कै उदै भई सभ देह ॥ गुर परसादी जानिआ चूका भनिता एह ॥22॥
सलोक 23 ॥ कबीर साकत संगु न कीजीऐ डूबै काली धार ॥ पाहन सिउ पीसै नहीं भगति न पावै पारु ॥23॥
“साकत” वो आदमी है जिसने ईश्वर का स्वाद नहीं लिया। कबीर कहते हैं, साकत के साथ रहो मत। डूबोगे, और काली धार में डूबोगे।
“पाहन सिउ पीसै नहीं।” पत्थर के साथ कोई कुछ नहीं पीसता। कोई पीसना हो (हल्दी, चन्दन, मसाला), तो दो पत्थरों के बीच रखना होता है, या एक पत्थर के नीचे। मगर पत्थर के “साथ” नहीं पीसा जाता। कबीर साकत को पत्थर बता रहे हैं। उसके साथ कुछ नहीं पकता।
“भगति न पावै पारु।” और भक्ति भी पार नहीं लगती। यह बहुत strict statement है। कबीर कह रहे हैं, संगत भक्ति की raw material है। ग़लत संगत में बैठकर भक्ति की कोशिश करोगे, dough नहीं चढ़ेगा।
Delhi में एक रिवाज है, WhatsApp groups से अपने आप को measure करना। पूरा दिन unsolicited opinions, sarcasm, मज़ाक, gossip। आप अगर वहाँ बैठे हैं, तो आप उन्हीं group की धार में हैं। कबीर 600 साल पहले यही बात कह गए। साकत-संग आपकी spiritual ज़मीन को acidic कर देती है, उसमें कुछ नहीं उगता।
सलोक 24 ॥ कबीर जगि किआ करहि बस्तू मांगै बीर ॥ एवह करहि सरीर सिउ करहि न माटी कीर ॥24॥
कबीर एक common scene देख रहे हैं। जग में लोग क्या कर रहे हैं? सब “बस्तू” यानी चीज़ों की भीख माँग रहे हैं। एक के लिए नौकरी, दूसरे के लिए घर, तीसरे के लिए परिवार। “मांगै बीर”, माँगने वाला एक भाई जैसा खड़ा है।
“एवह करहि सरीर सिउ।” यह सब तुम अपने शरीर के लिए कर रहे हो। शरीर माँग रहा है, और तुम पूरी ज़िंदगी शरीर की list पूरी कर रहे हो।
“करहि न माटी कीर।” मगर मिट्टी (आत्मा का असली घर) की पुकार पर ज़रा कान नहीं देते। कबीर का pun यहाँ है: माटी का अर्थ है जो ख़त्म हो जाएगा (शरीर), और माटी का अर्थ है जो शुरू से था (तू ख़ुद, मिट्टी से बना)। कौनसी माटी की पुकार सुन रहे हो, यह तुम पर है।
आज वही है। दिन भर inbox देख रहे हैं, फलाँ deliverable, फलाँ deal। शरीर की list बढ़ रही है। और अन्दर एक धीमी आवाज़ है जो कहती है “ठहर, साँस ले, मुझे देख।” कबीर वही धीमी आवाज़ हैं, बस उन्हें record किया है।
सलोक 25 ॥ कबीर हरि का सिमरनु छाडि कै पालिओ बहुतु कुटंबु ॥ धंधा करता रहि गइआ भाई रहिआ न बंधु ॥25॥
कबीर अपनी ज़बान सीधी रखते हैं। हरि का सिमरन छोड़ा, और परिवार पाला। बहुत बड़ा परिवार, बहुत respectable, बहुत successful।
अब result? “धंधा करता रहि गइआ।” बस धंधा रह गया, करते-करते। ज़िंदगी बीत गयी। और जब अन्त आया, “भाई रहिआ न बंधु।” न भाई पास खड़ा, न बन्धु। सब अपने-अपने धंधे में चले गए।
यह कबीर का सबसे आम observation है। हम सोचते हैं हम परिवार के लिए जी रहे हैं। मगर परिवार भी अपने-अपने धंधे में busy है। आख़िर में हर इन्सान अकेला है, और जो साथ चलेगा वो सिर्फ़ वो है जिसका सिमरन ज़िंदगी भर किया।
दिल्ली के बड़े-बड़े बंगलों में यह scene रोज़ चलता है। 80 साल के बुज़ुर्ग, अकेले बैठे हैं, बच्चे Bangalore में Singapore में San Francisco में। फ़ोन उठाते नहीं, “busy हैं।” कबीर 600 साल पहले यह दृश्य देख चुके। शायद उन्हें पता था कि यह pattern बदलने वाला नहीं।
सलोक 26 ॥ कबीर एक मरंते दुइ मूए दोइ मरंतह चारि ॥ चारि मरंतह छह मूए चारि पुरख दुइ नारि ॥26॥
पहली बार में यह गिनती-सी लगती है। एक मरा तो दो मरे। दो मरे तो चार। चार मरे तो छह। चार पुरुष और दो स्त्री। क्या बकवास?
मगर कबीर riddle डाल रहे हैं। यह genealogy नहीं, psychology है। जब एक “मैं” मरता है, उसके साथ उसका हर रिश्ता मरता है। एक तू, और एक तेरी पहचान। दो।
फिर जब वो “मैं” लौटकर दूसरे जन्म में आता है, उसके साथ नये रिश्ते बनते हैं। पुराने रिश्ते भी memory में रह जाते हैं। तो हर मृत्यु एक multiplier है। कबीर गिन रहे हैं कि एक “अहंकार” की मौत कितनी मौतें लाती है।
चार पुरुष और दो स्त्री, यह संख्या भी प्रतीक है। चार पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) और दो वृत्तियाँ (राग और द्वेष)। हर इन्सान इन छह में बँधा है। जब “मैं” गया, सब छह गए। यह philosophical maths है, mantra के रूप में।
सलोक 27 ॥ कबीर देखि देखि जगु ढूंढिआ कहूं न पाइआ ठाउ ॥ जिनि हरि का नामु न चेतिओ कहा भुलाने नाउ ॥27॥
कबीर बहुत घूमे। जगन्नाथ, कशी, बनारस के घाट, सूफ़ी ख़ानक़ाह, मुसलमान फ़क़ीर। “देखि देखि जगु ढूंढिआ”, देख-देख कर पूरा जग ढूँढ़ लिया।
“कहूं न पाइआ ठाउ।” कहीं ठाँव (विश्राम) नहीं मिली। एक तीर्थ से दूसरा, एक गुरु से दूसरा, एक mantra से दूसरा। हर जगह वही uncertainty।
“जिनि हरि का नामु न चेतिओ कहा भुलाने नाउ।” जिन्होंने हरि का नाम नहीं चेता, उनका नाम कहाँ रह गया? यानी जो हरि-नाम याद नहीं करते, उनको दुनिया भी याद नहीं रखती। नाम के बदले नाम, यह transaction है।
आज के social media age में यह बहुत clear है। हर इन्सान चाहता है कि उसका नाम रहे, “legacy” बने। followers बढ़ें, views बढ़ें। मगर कबीर कह रहे हैं, गुप्त में हरि-नाम जपने वाला आदमी, उसका नाम सच में रहता है। और जो दिन भर अपना नाम बढ़ाने में लगा है, उसका नाम तीन-चार दिन में मिट जाता है।
सलोक 28 ॥ कबीर लूटि लेहु जे लूटना साधू-संग की लूटि ॥ पाछै बहुरि न लूटीऐ जिउ रहिआ नटे ट्रूठि ॥28॥
कबीर का सबसे प्रसिद्ध सलोक। “लूटि लेहु जे लूटना”, अगर लूटना है तो लूट लो। मगर क्या? “साधू-संग की लूटि।” साधू-संगति की लूट।
पंजाबी “लूट” शब्द में थोड़ी playfulness है। यह डाका नहीं, यह जल्दबाज़ी से बटोरना है। जैसे शादी में लड्डू बँट रहे हों और लोग जल्दी-जल्दी अपनी जेब भर रहे हों। कबीर कह रहे हैं, साधू-संगति की लूट उसी spirit में करो।
“पाछै बहुरि न लूटीऐ।” बाद में फिर नहीं लूट सकोगे। मौक़ा एक है। “जिउ रहिआ नटे ट्रूठि।” जैसे नट का खेल ख़त्म हो गया, परदा गिर गया, अब कोई chance नहीं।
दिल्ली के gurdwaras में अक्सर शाम को कीर्तन हो रहा होता है। हम सोचते हैं “अगले हफ़्ते जाऊँगा।” अगला हफ़्ता आता है, फिर अगला। कबीर कह रहे हैं, साधू-संगति एक performance की तरह है। पर्दा गिरने वाला है। बैठ जाओ, अभी।
सलोक 29 ॥ कबीर सूता क्या करहि उठि कि न जपहि मुरारि ॥ इक दिन सोवनु होइगो लांबे गोड पसारि ॥29॥
कबीर सीधे जगा रहे हैं। सोते क्यों हो? उठो, मुरारी (कृष्ण/ईश्वर) का जप क्यों नहीं करते?
और फिर वो काटने वाली line: “इक दिन सोवनु होइगो लांबे गोड पसारि।” एक दिन तो सोना ही है, लम्बे पैर फैलाकर। यानी मौत। उस “लम्बी नींद” से पहले इस छोटी नींद की क्या ज़रूरत?
यह उपदेश नहीं, यह arithmetic है। आप 70 साल जिएंगे, 23 साल सोएंगे (एक तिहाई)। उसके बाद हमेशा का सोना। कबीर पूछ रहे हैं, क्या अभी जागने का समय नहीं?
सुबह 5 बजे का अंधेरा हर sadhana का best दोस्त माना जाता है। अमृत-वेला। कबीर उसी बात को अपनी ज़बान में कह रहे हैं। सोने का समय आएगा बहुत, अभी जागो।
सलोक 30 ॥ कबीर सूता क्या करहि बैठा रहु अरु जागु ॥ जा के संग ते बीछुरा ता ही के संगि लागु ॥30॥
पिछले सलोक का continuation। फिर वही बात, मगर अब soft। “सूता क्या करहि”, सोते क्यों हो। “बैठा रहु अरु जागु।” बैठ कर जागते रहो।
“जागु” शब्द ध्यान से समझना। यह सिर्फ़ neck-up activity नहीं। यह alertness है, attention है। बैठो, और जागते रहो।
“जा के संग ते बीछुरा।” जिसके साथ से बिछुड़ा है। बीछुरा means separated। हम सब किसी समय किसी से बिछुड़े हैं। माँ की कोख से बिछुड़े। अपने मूल स्रोत से बिछुड़े।
“ता ही के संगि लागु।” उसी के संग लग जा। यानी जिससे बिछड़े, उसी की तरफ़ लौटो। कबीर का formula simple है: separation का इलाज वही है जिससे separation हुआ। बीच में नये रिश्ते बनाने से दर्द कम नहीं होगा, सिर्फ़ delay होगा।
सलोक 31 ॥ कबीर संत मूऐ का किआ रोईऐ जो अपने गृहि जाइ ॥ रोवहु साकत बापुरे जु हाटै हाटि बिकाइ ॥31॥
कबीर की unique theology यहाँ। संत मरा तो रोने की क्या ज़रूरत? वो तो अपने घर गया।
इस एक line में कबीर मृत्यु की पूरी फ़िलॉसफ़ी पलट रहे हैं। हम मानते हैं मरना सबसे बड़ा loss है। कबीर कह रहे हैं, संत के लिए मरना घर लौटना है। जिस घर से आया था (हरि के पास से), उसी घर लौट गया।
“रोवहु साकत बापुरे।” रोना है तो साकत के लिए रोओ, बेचारा। “जु हाटै हाटि बिकाइ।” जो हाट-हाट में बिकता रहता है। यानी जो जीते-जी मार्केट में बिक रहा है, status, money, image के लिए, उसके लिए रोओ।
यह बहुत strong observation है। ज़िंदा रहते भी हम बिक रहे हैं, हर रोज़, हर meeting में। और मरने वाले संत के लिए हम रो रहे हैं? कबीर का कहना है, priorities सही करो। दुख का घर ज़िंदगी में है, मौत में नहीं।
सलोक 32 ॥ कबीर साकतु ऐसा है जैसी लसन की खानि ॥ कोने बैठे खाईऐ परगट होइ निदानि ॥32॥
कबीर का कमाल इस इमेज में है। साकत (दुनियावी आदमी) कैसा है? लहसुन की खान जैसा।
लहसुन के बारे में हम जानते हैं, कितनी भी छुपा कर खा लो, मुँह से उसकी गंध आ ही जाएगी। हर gurdwara में sevadar कहते हैं, “लहसुन-प्याज़ खाकर नहीं आओ।” क्यों? वो दूर तक चली जाती है।
“कोने बैठे खाईऐ।” कोने में बैठ कर खाओ, छुप कर खाओ। “परगट होइ निदानि।” फिर भी निदान (अन्त में) पता चल ही जाता है।
साकत के बारे में भी यही है। चाहे कितना भी spiritual दिखो, कितनी भी अच्छी बातें करो, अगर अन्दर साकत हो, बाहर आ जाता है। आँखों में, बोली में, नज़र में। कबीर कह रहे हैं, छुपा नहीं सकते। पहचान बाहर निकलती है। तो अन्दर बदलो, बाहर अपने आप बदलेगा।
सलोक 33 ॥ कबीरा मरता मरता जगु मुआ मरि भि न जानै कोइ ॥ ऐसी मरनी जो मरै बहुरि न मरना होइ ॥33॥
यह कबीर का सबसे प्रसिद्ध सलोक है। पूरा जग मरते-मरते मर गया, मगर “मरि भि न जानै कोइ”, मरना भी किसी ने जाना नहीं।
गहरी बात है। हर इन्सान मरता है, मगर मरना समझा नहीं। क्योंकि मरते वक़्त तक मन इतने projects में उलझा है, इतने अधूरे काम हैं, कि सीखने का मौक़ा ही नहीं रहा।
“ऐसी मरनी जो मरै बहुरि न मरना होइ।” ऐसी मौत मरो कि फिर मरना न पड़े। कबीर एक नयी मौत की बात कर रहे हैं। यह physical नहीं। यह अहंकार की मौत है।
अष्टावक्र गीता में भी यही बात है, “मुक्ति अभी हो सकती है।” मगर इसके लिए “मरना” पड़ता है, इस “मैं” को जो खाता-पीता है, intrigues करता है, ख़ुश होता है, उदास होता है। कबीर कह रहे हैं, इसी ज़िंदगी में, कोई एक बार ऐसे मरे कि बस फिर कोई जन्म नहीं। यह काम बच्चे का नहीं, मगर असम्भव भी नहीं।
सलोक 34 ॥ कबीर मानस जनमु दुलंभु है होइ न बारै बार ॥ जिउ बन फल पाके भुइ गिरहि बहुरि न लागहि डार ॥34॥
कबीर बेसहारा सच कहते हैं। मनुष्य जन्म दुर्लभ है। बार-बार नहीं मिलता।
फिर एक beautiful image: “जिउ बन फल पाके भुइ गिरहि।” जैसे जंगल का पका फल ज़मीन पर गिर जाता है। “बहुरि न लागहि डार।” फिर डाली पर नहीं लगता।
पका फल एक बार गिरा, बात ख़त्म। न तो फिर डाली पर जाएगा, न पका हुआ अधपका हो जाएगा। यह irrevocable है।
कबीर कह रहे हैं, ज़िंदगी एक पका फल है। आप कह सकते हैं “मैं अगले जन्म में देखूँगा”, पर वो जन्म वही होगा क्या? पता नहीं। शायद आदमी का जन्म ही नहीं मिले। शायद याद ही न रहे। यह पका फल जब गिरने को है, उठा लो। यह पिछली बात नहीं है।
Delhi में हम 30 साल की उम्र में सोचते हैं “अभी समय है, बाद में करूँगा।” 40 में लगता है थोड़ा देर हो गयी। 50 में लगता है, अब क्या? यह fruit जो पका है, आज पकेगा फिर कब? कबीर बहुत calm voice में बोल रहे हैं, मगर बात बहुत urgent है।
सलोक 35 ॥ कबीर सिकंदर के सलाम बंदगी कह जाइ ॥ जे साकत मेरि साकत होइ तउ मो कउ नरकि पठाइ ॥35॥
कबीर का defiance यहाँ है। सिकन्दर (Alexander, या एक प्रतीकात्मक राजा) की सलामी और बन्दगी छोड़ो। “बंदगी” यानी समर्पण, झुकना।
“जे साकत मेरि साकत होइ।” अगर कोई साकत मेरा साकत हो जाए, यानी मेरा अनुयायी, “तउ मो कउ नरकि पठाइ।” तो मुझे नरक भेज दिया जाए।
यह radical है। कबीर कह रहे हैं, मेरे followers में अगर साकत होंगे, यानी lukewarm आदमी, सतही भक्त, तो मेरी पूरी journey ही व्यर्थ। मुझे नरक भेज दिया जाए।
आज के time में हर “spiritual influencer” चाहता है ज़्यादा से ज़्यादा followers। कबीर का stance opposite है। मुझे numbers नहीं चाहिए। मुझे पाँच असली चाहिए, पाँच हज़ार ढोंगी नहीं।
सलोक 36 ॥ कबीर हरदी पीअरी चूना ऊजल भाइ ॥ राम सनेही ता मिलै दोनउ बरन गवाइ ॥36॥
कबीर एक रासायनिक observation से बात शुरू करते हैं। हल्दी पीली है, चूना उजला (सफ़ेद) है। दोनों के अपने रंग हैं।
अब हम जानते हैं, अगर हल्दी और चूना मिला दो, क्या होता है? लाल हो जाता है। दोनों के अपने रंग ख़त्म, कुछ नया।
“राम सनेही ता मिलै दोनउ बरन गवाइ।” राम का sneha (प्रेम) तब मिलता है जब दोनों अपने वर्ण गँवा दें। यानी पीला (अपने ego) और सफ़ेद (अपने fake purity), दोनों को छोड़ो।
इन्सान दो तरह के होते हैं। एक जो अपनी पहचान को flaunt करता है (“मैं ज्ञानी हूँ” = पीला)। दूसरा जो अपनी पहचान को सब से छुपाता है, अपने को simple दिखाता है (“मैं humble हूँ” = सफ़ेद)। कबीर कह रहे हैं, दोनों identity-games हैं। राम-प्रेम के लिए दोनों गिरने हैं।
सलोक 37 ॥ कबीर हरदी पीरतनु हरै चून चिहनु न रहाइ ॥ बलिहारी इह पीस कै जो रंगि चूना खाइ ॥37॥
पिछले सलोक का continuation। हल्दी अपना पीलापन छोड़ देती है, और चूना अपना चिह्न (whiteness) नहीं रखता।
“बलिहारी इह पीस कै।” मैं इस पीसने पर बलिहारी (curtail) जाता हूँ। “जो रंगि चूना खाइ।” जो रंग चूने को खा जाता है।
यानी जब हल्दी और चूना ओखली में पीसे जाते हैं, और एक तीसरा रंग बनता है, यह alchemy है। दो अलग-अलग चीज़ें मिटकर एक नयी चीज़ बनती है। कबीर इसी पीसने पर मुग्ध हैं।
हम ज़िंदगी में बहुत कोशिश करते हैं अपनी identity protect करने की। “मैं Tamil हूँ”, “मैं engineer हूँ”, “मैं vegetarian हूँ”। कबीर का proposal है: इन सब को एक ओखले में डाल कर पीस दो। जो बचेगा, वो असली तुम। आत्म-संगत के बाद का “मैं”, न पीला न सफ़ेद।
सूरज और चाँद के उदय से दुनिया रोशन होती है। यह हम सब जानते हैं। मगर कबीर इसी देखी-सुनी बात को मोड़ देते हैं।
देह यानी यह शरीर, तभी “उदय” हुआ जब सूरज और चाँद उगे। यानी हम सब इन्हीं दो रोशनियों से बने हैं। शरीर मिट्टी का नहीं, time का है। दिन का एक टुकड़ा, रात का एक टुकड़ा, और बस।
“गुर परसादी जानिआ चूका भनिता एह।” गुरु की कृपा से यह जाना, तब भनिता (बक-बक, कथा-कथन) ख़त्म हुआ। यानी जब तक यह नहीं समझे, हम बस बहस कर रहे थे। शरीर क्या, आत्मा क्या, यह सब philosophical chatter। गुरु ने एक टका सीधी बात बताई, और कथा ख़त्म।
आज भी हम यही करते हैं। पाँच घंटे की debate, scripture पढ़ी, ज़ूम call पर discussions, और अंत में कोई एक वाक्य आता है जो सब कुछ शान्त कर देता है। कबीर का “भनिता” वही है, हमारी मानसिक crosstalk। कब चुप होती है? जब कोई एक चीज़ देख ली।