सलोक 38 ॥ कबीर भलि भली सिमरि चाजि कै सिमरण थीआ अनंदु ॥ जिन कउ हरि का संगु है कतहूं नहीं हो दंदु ॥38॥
सलोक 39 ॥ कबीर तू तू करता तू हूआ मुझ महि रहा न हूं ॥ जब आपा पर का मिटि गइआ जत देखउ तत तू ॥39॥
कबीर का सबसे जादूई सलोक। “तू तू करता तू हूआ।” तू-तू करते-करते, मैं तू ही हो गया।
यह सूफ़ी फ़ना का सिख-संत version है। हर रोज़ “तू (हरि)” का नाम लेते-लेते, धीरे-धीरे “मैं” का सेन्स छूट गया, और “तू” ही रह गया।
“मुझ महि रहा न हूं।” मुझ में अब “मैं” नहीं रहा। यह past tense है। यानी कबीर अब आज लिख रहे हैं, उस moment के बाद की clarity से।
“जब आपा पर का मिटि गइआ।” जब “अपना-पराया” मिट गया। यह key line है। “मेरा-तेरा” का सेन्स ही पूरी identity का base है। जब वो गया, “जत देखउ तत तू”, जिधर देखूँ, उधर तू ही है।
यह अद्वैत का pure expression है, उपनिषदों की भाषा में नहीं, बनारस के एक जुलाहे की भाषा में। संस्कृत में जो “तत् त्वम् असि” है, वो कबीर ने “तू-तू करता तू हूआ” में कह दिया। यह geniality का चरम है।
सलोक 40 ॥ कबीर बिखु की बेलि न बीजीऐ बीजे की फलु लेइ ॥ काइरु बीज न बीजहु मरि बीजे की फल खेइ ॥40॥
कबीर एक किसान का logic use कर रहे हैं। “बिखु की बेलि न बीजीऐ।” विष की बेल मत बोओ। “बीजे की फलु लेइ।” जो बोओगे, वही फल पाओगे।
यह सबको पता है। मगर कबीर repeat इसलिए कर रहे हैं क्योंकि हम भूल जाते हैं। हम चाहते हैं फल मीठा हो, मगर बीज विष का बोते हैं। बच्चे को chocolate से पाला, फिर सोचते हैं वो healthy बने।
“काइरु बीज न बीजहु।” कायर वाला बीज मत बोओ। यानी डर का बीज, fear-based decisions। “मरि बीजे की फल खेइ।” मरते समय उसी बीज का फल खाओगे (या भुगतोगे)।
फ़रीद की भलाई-वाली सलोक से थोड़ा अलग version। फ़रीद कहते हैं “बुरे का भला करो।” कबीर कहते हैं “विष का बीज ही मत बोओ।” दोनों एक ही बात कह रहे हैं, मगर angles अलग।
दिल्ली के माँ-बाप अक्सर बच्चों से कहते हैं, “बेटा, fail मत होना।” यह डर का बीज है। कबीर कह रहे हैं, यह बीज मरते वक़्त भुगतना होगा (बच्चा anxious-driven life जिएगा)। आज जो बीज बोते हैं, उसकी फसल बहुत बाद कटती है।
सलोक 41 ॥ कबीर ऐसा बीजु बीजि करि निरबाही माटि ॥ दसो दिसा फूल हुए जिसु रंग रंगाहि ॥41॥
पिछले सलोक का continuation, मगर अब positive side। ऐसा बीज बोओ कि मिट्टी पर “निरबाही” (निर्वाह) हो जाए। यानी बिना ज़्यादा देखभाल के, बीज ख़ुद उगता रहे।
“दसो दिसा फूल हुए।” फिर दसों दिशाओं में फूल खिलें। “जिसु रंग रंगाहि।” और सब उसी रंग में रंगे जाएँ।
क्या बीज ऐसा? कबीर directly नहीं बताते, मगर सलोक का context (हरि-संग, नाम-सिमरन) यह hint देता है। नाम का बीज ऐसा है। एक बार बो दो, फिर वो ख़ुद बढ़ता है, फूल देता है, और हर तरफ़ का रंग एक हो जाता है।
दसों दिशा में फूल खिलना, यह नाम-सिमरन की ख़ुशबू है। आप कुछ भी कर रहे हों, अगर अन्दर नाम चल रहा है, हर action में उसी की महक है। यह forced नहीं, यह spontaneous है। कबीर इसी spontaneity को “बीज” कह रहे हैं।
और implicit: हर action एक बीज है। एक kind word, एक favor, एक moment of presence। यह सब वही “ऐसा बीज” हैं जो बढ़ते-बढ़ते दसों दिशाओं में फूल खिलाते हैं। आज एक छोटा बीज, कल जंगल।
सलोक 42 ॥ कबीर अइसा कोई न जनमिओ अपनै घरि लावै आगि ॥ पांचउ लरिका जारि कै रहै राम लिव लागि ॥42॥
कबीर एक shocking image use कर रहे हैं। “अइसा कोई न जनमिओ।” ऐसा कोई पैदा नहीं हुआ। “अपनै घरि लावै आगि।” जो अपने घर में आग लगा दे।
सुनने में पागलपन। मगर अगली line में context: “पांचउ लरिका जारि कै।” पाँचों बच्चों को जला कर। “रहै राम लिव लागि।” राम की लिव (तपस्या) में लगा रहे।
पाँचों बच्चे कौन? पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (देखना, सुनना, सूँघना, चखना, छूना)। या पाँच विकार (काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार)। यह घर हमारा शरीर है। और उसी घर में आग लगानी है, उन्हीं पाँच बच्चों को मारना है।
कबीर provocateur हैं। यह violent image जान-बूझकर है, ताकि shake-up हो। हम सोचते हैं अध्यात्म एक soft, gentle journey है। कबीर कह रहे हैं, नहीं, यह violent है, यह self-destruction है, मगर वो “self” जो false है।
और “अइसा कोई न जनमिओ” का अर्थ: ऐसे कम लोग पैदा होते हैं। ज़्यादातर लोग अपने पाँचों बच्चों को बहुत प्यार से पालते हैं, उन्हें खिलाते हैं। कुछ rare लोग ही उनको जला कर असली “राम” की तरफ़ बढ़ते हैं।
सलोक 43 ॥ कबीर सुलहै निसुलहै एकु करि देखणि लाइआ ॥ सुलहै सिउ हसि बोलणा निसुलहै परा रंगु लाइआ ॥43॥
कबीर सबसे observation दे रहे हैं। “सुलहै निसुलहै।” शान्त और अशान्त, अमन-पसन्द और तकलीफ़-पसन्द। दुनिया में दोनों तरह के लोग हैं।
“एकु करि देखणि लाइआ।” एक ही नज़र से देखो दोनों को।
अगली line: “सुलहै सिउ हसि बोलणा।” शान्त के साथ हँस कर बोलना। “निसुलहै परा रंगु लाइआ।” अशान्त के साथ अलग रंग में बात करना।
यानी कबीर कह रहे हैं, हर इन्सान के साथ same approach नहीं। शान्त के साथ हँसी से बात, अशान्त के साथ अलग strategy। मगर अन्दर से दोनों को same समझना।
यह बहुत practical wisdom है। दिल्ली के office में, हर boss अलग। एक के साथ हँसी काम करती है, दूसरे के साथ formal होना पड़ता है। कबीर कह रहे हैं, surface पर adapt करो, मगर अन्दर से सब को बराबर देखो। यह fakeness नहीं, यह skillful means है।
सलोक 44 ॥ कबीर दीनु गवाइआ दुनी सिउ दुनी न चाली साथि ॥ पाइ कुहाड़ा मारिआ गाफलि अपुनै हाथि ॥44॥
कबीर एक काटने वाली बात कह रहे हैं। “दीनु गवाइआ दुनी सिउ।” “दीन” (धर्म, असली बात) गँवाया दुनिया के साथ रहकर। “दुनी न चाली साथि।” और दुनिया तो साथ चली ही नहीं।
यह सबसे bitter realisation है। आदमी ज़िंदगी भर “दीन” को side पर रखता है, सोचता है “पहले दुनिया settle कर लूँ, फिर अध्यात्म।” Then दुनिया settle ही नहीं होती, और दीन भी छूट गया।
“पाइ कुहाड़ा मारिआ गाफलि अपुनै हाथि।” अपने ही हाथ से अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारी, ग़ाफ़िल (लापरवाह) बन कर।
कबीर का judgment सीधा है। हम सोचते हैं हम बहुत smart investors हैं, mutual funds choose कर रहे हैं, real estate ले रहे हैं। मगर असली investment, “दीन” वाला, miss हो रहा है। यह “ग़ाफ़िली” है, sleep-walking through life।
और कोई आकर नहीं कहेगा “तेरा दीन miss हो रहा है।” यह self-realisation है। एक दिन रुक कर देखना है, मैं किस-किस के लिए दौड़ रहा हूँ। उन में से कितने आख़िर में मेरे साथ चलेंगे? और कुल्हाड़ी अपने ही हाथ में है।
सलोक 45 ॥ कबीर बिखिआ बिआपी बहुतु जना उपाव सोवे न कोइ ॥ रस मिठे माइआ जारिऐ राम भगति जिनि बनाइ ॥45॥
कबीर describing the human condition: “बिखिआ बिआपी बहुतु जना।” विष (माया) ने बहुत लोगों को व्याप्त किया है। “उपाव सोवे न कोइ।” इसका उपाय कोई नहीं सोचता।
यानी सब लोग infected हैं, मगर कोई इलाज नहीं सोच रहा। एक बीमारी जिसका पता तो है, मगर medication किसी ने ली नहीं।
“रस मिठे माइआ जारिऐ।” माया के मीठे रस को जला डालो। “राम भगति जिनि बनाइ।” राम-भक्ति से ही यह बने (अर्थात् भक्ति ही वो आग है जो माया के मिठास को जलाती है)।
माया मीठी है, यह कबीर मान रहे हैं। कड़वी नहीं। इसी वजह से हमें पकड़ती है। जो कड़वी होती, उसे थूक देते। मगर मीठी, इसलिए और चाहते हैं। एक के बाद एक “रस” लेते जाते हैं।
और “जारिऐ” शब्द ध्यान देने योग्य है, जलाओ। मीठे को जलाओ। यानी delicious-looking माया को आग में डालो, बजाय इसके कि उसे sweet smile दो। यह hardcore practice है। राम-भक्ति इसी जलाने का काम है।
सलोक 46 ॥ कबीर पंडितु हूआ सो खंडितु काटि कै तटि टंगिआ देही ॥ सचा सबदु बिचारि कै आइ मिलिआ बेपरवाह ॥46॥
कबीर पंडितों पर critique कर रहे हैं। “पंडितु हूआ सो खंडितु।” पंडित बना तो खंडित हो गया।
“पंडित” शब्द कबीर के यहाँ ख़ास है। यह वो आदमी है जो पढ़ा-लिखा है, संस्कृत जानता है, शास्त्र जानता है। मगर कबीर के यहाँ pandit अक्सर ego का प्रतीक है।
“काटि कै तटि टंगिआ देही।” काट कर तट (किनारे) पर शरीर टांग दिया। यह violent image है। यानी पंडित अपने ज्ञान से ख़ुद को काट लेता है, और किनारे लटका हुआ रह जाता है।
“सचा सबदु बिचारि कै।” सच्चे शब्द का विचार कर के, “आइ मिलिआ बेपरवाह।” बेपरवाह (कबीर ख़ुद का संदर्भ शायद) आ कर मिला।
कबीर खुद को “बेपरवाह” कहते हैं। एक जुलाहा, गली का आदमी, जो शास्त्र नहीं जानता। मगर सच्चा शब्द जो है (राम-नाम), उसका विचार कर के मिल गया। पंडित खंडित हो गया, कबीर मिल गया। यह कबीर का self-deprecating humour है, मगर wisdom भी।
दिल्ली में आज भी यही है। कोई IIT-IIM का graduate ज़िंदगी में confused है, कोई पान वाला बहुत सेटल है। पढ़ाई और ज्ञान दो अलग चीज़ें हैं। कबीर 600 साल पहले यह note कर गए।
सलोक 47 ॥ कबीर ज्ञानै कारणि करम करि खरचि करि नाउ ॥ जे कुछ करिओ साइ साइ है उस ही उतपति ठाउ ॥47॥
“ज्ञान के कारण कर्म करो।” यानी ज्ञान को goal रखो, और उसी की वजह से कर्म करो। “खरचि करि नाउ।” नाम-धन को ख़र्च करो (यानी बाँटो, share करो)।
यह paradoxical है। आम तौर पर हम सोचते हैं ख़र्च करने से कम होता है। मगर नाम-धन की unique property यह है: जितना बाँटो, उतना बढ़ता है। एक दीये से दूसरा दीया जलाओ, दोनों जलते रहते हैं।
“जे कुछ करिओ साइ साइ है।” जो कुछ किया, वो साईं ही था। “उस ही उतपति ठाउ।” उसी ने पैदा किया, उसी की जगह है।
यह कर्म-निष्काम philosophy का कबीरी version है। तू doer नहीं, सब साईं कर रहा है। तेरा काम सिर्फ़ ज्ञान के लिए कर्म करना, और जो “नाम” मिल जाए, उसे ख़र्च करना। यह कर्म-योग का सबसे simple statement है।
गीता 2.47 के “कर्मण्येवाधिकारस्ते” के साथ यह सलोक resonates। दोनों कह रहे हैं, करो, मगर doer मत बनो। कर्म करो, कारक नहीं। और जो result आए, बाँटो, जमा मत करो।
सलोक 48 ॥ कबीर साधू की संगति रहउ जउ की भूसी खाउ ॥ होनहारु सो होइहै साकत संगि न जाउ ॥48॥
कबीर का सबसे direct preference statement। “साधू की संगति रहउ।” साधू की संगति में रहूँगा। “जउ की भूसी खाउ।” चाहे जौ की भूसी खानी पड़े।
भूसी मतलब छिलका, anaaj का बाहरी हिस्सा, जो आम तौर पर पशुओं को खिलाया जाता है। कबीर कह रहे हैं, अगर साधू-संगति में रहना है तो भूसी खाकर भी रहूँगा।
“होनहारु सो होइहै।” जो होना है, वो होगा। “साकत संगि न जाउ।” साकत (दुनियावी) की संगति में नहीं जाऊँगा।
यह uncompromising position है। कबीर अपनी economic situation पर बहस नहीं कर रहे। वो कह रहे हैं, मेरी company is non-negotiable। चाहे भूख रहूँ, साधू के साथ रहूँगा। चाहे भूसी मिले, साकत के टेबल पर bhanditi नहीं खाऊँगा।
यह आज भी relevant है। बहुत लोग better lifestyle के लिए company compromise करते हैं। बेहतर district, बेहतर apartment, बेहतर office crowd। कबीर का stance: मैं company पर compromise नहीं करूँगा। बाक़ी सब adjust हो जाएगा।
सलोक 49 ॥ कबीर संगति साधू की मिलि सालाहहु राम ॥ इहु जगु बंदी ट्रोप का साकत मिले न पाइ ॥49॥
पिछले सलोक का continuation। “संगति साधू की मिलि।” साधू की संगति में मिलकर। “सालाहहु राम।” राम की सलाहना (प्रशंसा) करो।
फिर एक powerful image: “इहु जगु बंदी ट्रोप का।” यह जग एक बंदी (क़ैदखाने) की “ट्रोप” (दीवार, या रास्ता) की तरह है।
“साकत मिले न पाइ।” इस से बच निकलने के लिए साकत की संगति काम नहीं आती। बल्कि वो तो तुम्हें और गहरे क़ैद में डाल देती है।
कबीर का world-view यहाँ revealed है। जग = बंदी = क़ैदखाना। हम सब क़ैद में हैं। और साकत साथी सिर्फ़ क़ैदी हैं जो escape plan नहीं जानते। साधू वो है जिसके पास plan है। उसी के साथ बैठो।
यह pessimism नहीं। यह clarity है। दुनिया एक prison नहीं है इसलिए हम कुछ नहीं कर सकते। यह prison है, और हमें escape plan चाहिए। और साधू-संगति वो plan है। साधू वही जो ख़ुद बाहर निकल चुका।
सलोक 50 ॥ कबीर संगति साकत की भगति प्राण विणि नही जाइ ॥ जे को संगति साकत करै सो भगति न करै निरमाइ ॥50॥
पिछले theme को एक और angle से कह रहे हैं। “संगति साकत की।” साकत की संगति में, “भगति प्राण विणि नही जाइ।” भक्ति के प्राण नहीं रहते।
भक्ति की “प्राण” क्या? वो vital force जो उसे चलाती है। नाम-स्मरण, सत्संग, स्वाध्याय, यही उसकी ऑक्सीजन है। साकत-संग में वो ऑक्सीजन नहीं।
“जे को संगति साकत करै।” जो भी साकत की संगति करता है। “सो भगति न करै निरमाइ।” वो निर्मल भक्ति नहीं कर सकता।
“निरमाइ” शब्द ध्यान देने योग्य है, निर्मल, बिना धुंध के। यानी साकत-संगति में भक्ति हो भी सकती है, मगर वो शुद्ध नहीं रहेगी। उसमें doubt, judgment, comparison का धुंध मिल जाएगा।
practical example: अगर आप daily meditation करते हैं, और साथ ही WhatsApp groups में 50 negative messages पढ़ते हैं, meditation की quality drop हो जाएगी। कबीर कह रहे हैं, यह physics है। आप input control नहीं कर रहे, तो output भी contaminated होगा।
सलोक 51 ॥ कबीर जगु बाधिओ जिह जेवरी तिह मतु बंधहु कबीर ॥ जैहहि आटा लोणु जिउ सोनु समानि सरीर ॥51॥
कबीर ख़ुद को warning दे रहे हैं। “जगु बाधिओ जिह जेवरी।” जिस रस्सी से जग बँधा है। “तिह मतु बंधहु कबीर।” उसी रस्सी से तू मत बँधना, ओ कबीर।
यह self-talk है। कबीर देख रहे हैं कि लोग कैसे bound हैं, और ख़ुद से कह रहे हैं, “देख कर मत फँसना।”
“जैहहि आटा लोणु जिउ।” जैसे आटे में नमक घुल जाता है। “सोनु समानि सरीर।” वैसा ही तेरा सोने जैसा शरीर भी।
आटे में नमक घुलने का metaphor क्या कहता है? घुलने के बाद, नमक अलग नहीं किया जा सकता। पूरे आटे में बँट गया। शरीर भी ऐसा ही है, माया के आटे में घुल जाएगा, अलग नहीं किया जा सकेगा।
कबीर का warning: देख कर भी न समझा तो बाद में अलग नहीं हो सकोगे। आज alert रहो। तेरा शरीर सोने जैसा क़ीमती है, उसे आटे में मत घोलो।
सलोक 52 ॥ कबीर हंसु उडिओ तनु गाडिओ सोझी ससी न आइ ॥ जिह ठाकुर सिउ जो हुआ अनहद बाजै राइ ॥52॥
कबीर एक scene paint कर रहे हैं। “हंसु उडिओ तनु गाडिओ।” हंस (आत्मा) उड़ गया, शरीर गाड़ दिया। “सोझी ससी न आइ।” मगर सही समझ नहीं आयी।
यानी आदमी मर गया, दफ़न हो गया। मगर ज़िंदगी भर उसको असली बात समझ नहीं आयी कि वो क्या है।
“जिह ठाकुर सिउ जो हुआ।” जिस ठाकुर (हरि) के साथ जो हुआ। “अनहद बाजै राइ।” अनहद नाद बजता रहा।
“अनहद नाद” वो आवाज़ है जो बिना बजाए बजती है। ब्रह्म का continuous music। हर इन्सान के अन्दर है, मगर सुनने वाला चाहिए।
कबीर कह रहे हैं, इन्सान मर गया, “हंस उड़ गया”, मगर वो अनहद नाद जो ज़िंदगी भर बजता रहा, उसने सुना नहीं। तो असल में, मरने से पहले भी “गाड़ा हुआ” ही था, अन्दर से। मौत तो बस physical confirmation है।
सुनना है तो अभी सुनो। नाद बज रहा है, बाहर ट्रैफ़िक नहीं चाहिए होगा, सिर्फ़ ध्यान देना है। यह कबीर का सबसे “esoteric” सलोक है, मगर बात बहुत simple है: तुम्हारे अन्दर बहुत कुछ चल रहा है, ध्यान कहाँ है?
कबीर एक practical observation दे रहे हैं। “भलि भली सिमरि चाजि कै।” अच्छी तरह से सिमरन कर के, “सिमरण थीआ अनंदु।” सिमरन से आनन्द हो गया।
यानी सिमरन कोई duty नहीं, यह source of joy है। मगर शर्त है, “भलि भली” यानी proper way से करो। mechanical नहीं, conscious।
“जिन कउ हरि का संगु है।” जिनको हरि का संग है। “कतहूं नहीं हो दंदु।” उनको कहीं भी “दंदु” (दुख, झगड़ा, conflict) नहीं।
कबीर बहुत simple ढंग से कह रहे हैं: हरि का संग किसी भी situation को defuse कर देता है। बहस हो, अपमान हो, loss हो, कुछ भी, अगर अन्दर हरि का संग है तो outer conflict भीतर तक नहीं पहुँचता।
यह testing पर सच भी निकलता है। शान्त लोग वो नहीं हैं जिनकी ज़िंदगी में मुश्किल नहीं। वो हैं जो किसी से अन्दर जुड़े हैं, मुश्किल आती है और चली जाती है, अन्दर वही calm रहता है।