Chapter 2 – सांख्य योग 

अध्याय 2

सांख्य योग

The Knowledge of the Self
कृष्ण का असली उपदेश यहाँ से शुरू होता है। आत्मा अमर है, शरीर नश्वर। और सबसे मशहूर सूत्र: कर्म पर तुम्हारा अधिकार है, फल पर नहीं।
72 श्लोक · पढ़ने का समय: लगभग 12 मिनट
रथ का रूपक, कृष्ण सारथी, अर्जुन सवारी
आप अर्जुन हैं। कृष्ण रथ को रास्ता दिखाते हैं। घोड़े आपकी इन्द्रियाँ हैं। आप बस अपना कर्म कीजिए।

अध्याय का सार

दूसरा अध्याय अर्जुन के मानसिक संघर्ष (अवसाद से बाहर निकलने की struggle) को दूर करने और उन्हें कर्तव्य के मार्ग पर प्रेरित करने का पहला बड़ा कदम है। कृष्ण अर्जुन को सिखाते हैं कि आत्मा अमर है, और अपने धर्म का पालन करना जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य है। यह अध्याय कर्म योग और सांख्य योग की बुनियादी समझ देता है।

कर्म योग का मूल यह है: हर व्यक्ति का अधिकार केवल अपने कार्य (कर्म) पर है। अपने कर्तव्यों का पालन पूरी लगन और निष्ठा से करना चाहिए। हमारे कार्यों का क्या परिणाम होगा, यह हमारे नियंत्रण में नहीं। इसलिए फल की चिंता में उलझने की बजाय अपने प्रयास पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।

हर काम को सेवा समझकर करो। केवल लाभ-हानि के लिए कर्म करना अनुचित है। कर्म, ख़ासकर सेवा, निष्काम (स्वार्थ-रहित) होना चाहिए। और फल की चिंता से घबराकर या आलस्य में पड़कर कर्म छोड़ देना (अकर्म) भी ग़लत है। कर्म न करना भी एक तरह की चूक है।

अध्याय का दूसरा बड़ा हिस्सा आत्मा के बारे में है: आत्मा अमर, अजर, अविनाशी है। शरीर नश्वर है और नष्ट हो सकता है, लेकिन आत्मा को कोई नष्ट नहीं कर सकता। मृत्यु के बाद आत्मा केवल पुराने कपड़े की तरह शरीर को त्यागती है और नया धारण करती है।

यह विचार सीधे कठोपनिषद् 1.2.18 से आया है, जिसे कृष्ण अर्जुन के सामने दोहराते हैं।

मुख्य श्लोक

श्लोक 2.11

अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥
साधारण अनुवाद‘जिनके लिए शोक नहीं करना चाहिए, उनके लिए तू शोक कर रहा है, और बातें पंडितों जैसी कर रहा है। मगर पंडित न मरे हुओं के लिए शोक करते हैं, न जीवित के लिए।’

कृष्ण का पहला हथौड़ा। अर्जुन ने अपने तर्क पंडिताऊ शब्दों में रखे थे; कृष्ण कह रहे हैं, ‘शब्द ठीक हैं, समझ ग़लत है।’

श्लोक 2.20

न जायते म्रियते वा कदाचि-
न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥
साधारण अनुवाद‘यह आत्मा न कभी जन्म लेता है, न मरता है। न यह उत्पन्न हुआ है, न उत्पन्न होगा। अजन्मा, नित्य, शाश्वत, पुराण है। शरीर के मरने पर भी यह नहीं मरता।’

पूरी गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक। मूल कठोपनिषद् 1.2.18 में है।

श्लोक 2.22

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्
यन्यानि संयाति नवानि देही ॥
साधारण अनुवाद‘जैसे मनुष्य पुराने कपड़े छोड़कर नए कपड़े पहनता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीरों को छोड़कर नए शरीर धारण करता है।’

पुनर्जन्म का सबसे सरल और शक्तिशाली रूपक। शरीर एक कपड़े जैसा है, इसकी पहचान आपकी असली पहचान नहीं।

श्लोक 2.47

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥
साधारण अनुवाद‘तेरा अधिकार केवल कर्म पर है, फल पर कभी नहीं। न तू कर्म-फल का कारण बन, न तेरा लगाव अकर्म (काम न करने) में हो।’

गीता का सबसे famous सूत्र। यह वो एक श्लोक है जो हर भारतीय बच्चा कहीं न कहीं सुन ही लेता है।

श्लोक 2.48

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥
साधारण अनुवाद‘हे धनंजय, योग में स्थित होकर, आसक्ति छोड़कर कर्म कर। सफलता-असफलता में सम (बराबर) रह। इस समता को ही योग कहते हैं।’

यहाँ कृष्ण योग की पहली परिभाषा देते हैं: ‘समत्वं योग उच्यते।’ सफलता-असफलता दोनों में एक जैसा भाव।

श्लोक 2.62-63

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात् सञ्जायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते ॥
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥
साधारण अनुवाद‘विषयों का चिंतन करते-करते उनमें आसक्ति होती है। आसक्ति से इच्छा। इच्छा से क्रोध। क्रोध से moh। moh से स्मृति-भ्रम। स्मृति-भ्रम से बुद्धि का नाश। और बुद्धि के नाश से आदमी ख़ुद नष्ट हो जाता है।’

पतन की पूरी सीढ़ी। हर step छोटा है, मगर अंत में गिरना बड़ा। चिंतन से शुरू, विनाश पर अंत।

श्लोक 2.70

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् ।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥
साधारण अनुवाद‘जैसे सब नदियों का पानी सागर में आते हुए भी सागर भरता नहीं, स्थिर रहता है, वैसे ही जिस मनुष्य में सब इच्छाएँ आती हैं और वो स्थिर रहता है, उसी को शान्ति मिलती है। इच्छाओं के पीछे भागने वाले को नहीं।’

शान्ति का सबसे सुंदर रूपक। सागर बनो। नदियाँ आती जाएँ, तुम भरते नहीं, बहते नहीं, बस रहते हो।

सारएक वाक्य में: कर्म करो, फल मत माँगो; सुख-दुख में समान रहो; और याद रखो कि जो शरीर के साथ चलता है, वो असली तुम नहीं हो।