सांख्य योग
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अध्याय का सार
दूसरा अध्याय अर्जुन के मानसिक संघर्ष (अवसाद से बाहर निकलने की struggle) को दूर करने और उन्हें कर्तव्य के मार्ग पर प्रेरित करने का पहला बड़ा कदम है। कृष्ण अर्जुन को सिखाते हैं कि आत्मा अमर है, और अपने धर्म का पालन करना जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य है। यह अध्याय कर्म योग और सांख्य योग की बुनियादी समझ देता है।
कर्म योग का मूल यह है: हर व्यक्ति का अधिकार केवल अपने कार्य (कर्म) पर है। अपने कर्तव्यों का पालन पूरी लगन और निष्ठा से करना चाहिए। हमारे कार्यों का क्या परिणाम होगा, यह हमारे नियंत्रण में नहीं। इसलिए फल की चिंता में उलझने की बजाय अपने प्रयास पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।
हर काम को सेवा समझकर करो। केवल लाभ-हानि के लिए कर्म करना अनुचित है। कर्म, ख़ासकर सेवा, निष्काम (स्वार्थ-रहित) होना चाहिए। और फल की चिंता से घबराकर या आलस्य में पड़कर कर्म छोड़ देना (अकर्म) भी ग़लत है। कर्म न करना भी एक तरह की चूक है।
अध्याय का दूसरा बड़ा हिस्सा आत्मा के बारे में है: आत्मा अमर, अजर, अविनाशी है। शरीर नश्वर है और नष्ट हो सकता है, लेकिन आत्मा को कोई नष्ट नहीं कर सकता। मृत्यु के बाद आत्मा केवल पुराने कपड़े की तरह शरीर को त्यागती है और नया धारण करती है।
यह विचार सीधे कठोपनिषद् 1.2.18 से आया है, जिसे कृष्ण अर्जुन के सामने दोहराते हैं।
मुख्य श्लोक
श्लोक 2.11
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥
श्लोक 2.20
न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥
पूरी गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक। मूल कठोपनिषद् 1.2.18 में है।
श्लोक 2.22
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्
यन्यानि संयाति नवानि देही ॥
पुनर्जन्म का सबसे सरल और शक्तिशाली रूपक। शरीर एक कपड़े जैसा है, इसकी पहचान आपकी असली पहचान नहीं।
श्लोक 2.47
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥
गीता का सबसे famous सूत्र। यह वो एक श्लोक है जो हर भारतीय बच्चा कहीं न कहीं सुन ही लेता है।
श्लोक 2.48
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥
यहाँ कृष्ण योग की पहली परिभाषा देते हैं: ‘समत्वं योग उच्यते।’ सफलता-असफलता दोनों में एक जैसा भाव।
श्लोक 2.62-63
सङ्गात् सञ्जायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते ॥
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥
पतन की पूरी सीढ़ी। हर step छोटा है, मगर अंत में गिरना बड़ा। चिंतन से शुरू, विनाश पर अंत।
श्लोक 2.70
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् ।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥
शान्ति का सबसे सुंदर रूपक। सागर बनो। नदियाँ आती जाएँ, तुम भरते नहीं, बहते नहीं, बस रहते हो।
कृष्ण का पहला हथौड़ा। अर्जुन ने अपने तर्क पंडिताऊ शब्दों में रखे थे; कृष्ण कह रहे हैं, ‘शब्द ठीक हैं, समझ ग़लत है।’