सौन्दर्य लहरी · भाग 1 · आनन्द लहरी

सौन्दर्य लहरी · Saundarya Lahari

भाग 1 · आनन्द लहरी · श्लोक 1-41

भीतर की लहरें। पहले ही श्लोक में एक चौंकाने वाली बात: शिव भी शक्ति के बिना हिल नहीं सकते। बाक़ी चालीस श्लोक इसी एक बात को खोलते हैं।

41 श्लोक · पढ़ने का समय ~ 50 मिनट · पहले से कुछ ज़रूरी नहीं · आगे-पीछे: सौन्दर्य लहरी मुख्य पृष्ठ

🟢 पूरा — सभी 41 श्लोक भाष्य सहित।

पहले एक बात

आनन्द लहरी का मतलब है “आनंद की लहरें।” और यह नाम ठीक है — यह हिस्सा देवी को एक रूप, एक चेहरा देने से पहले, उन्हें शुद्ध शक्ति के रूप में देखता है। वह ऊर्जा जो सृष्टि को चलाती है, जो आपकी रीढ़ में सोई पड़ी है, जो हर देवता के पीछे का असली ज़ोर है।

यह हिस्सा थोड़ा गूढ़ है — कुंडलिनी, चक्र, श्री चक्र, मंत्र। पर घबराइए मत। हर गूढ़ बात के नीचे एक सीधी बात है, और हम वही सीधी बात पकड़ेंगे। इसे एक भीतरी नक्शे की तरह पढ़िए, किसी जादू-टोने की किताब की तरह नहीं।

इसे कैसे पढ़ें

क्रम से, धीरे। हर श्लोक एक छोटा रत्न है। असली खंभे: श्लोक 1 (शिव-शक्ति), 8-10 (श्री चक्र और कुंडलिनी), 21 और 35 (देवी ही सब कुछ हैं)। हर श्लोक पर anchor है।

1

शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं
न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि ।
अतस्त्वामाराध्यां हरिहरविरिञ्चादिभिरपि
प्रणन्तुं स्तोतुं वा कथमकृतपुण्यः प्रभवति ॥ १॥

śivaḥ śaktyā yukto yadi bhavati śaktaḥ prabhavituṁ · na ced evaṁ devo na khalu kuśalaḥ spanditum api · atas tvām ārādhyāṁ hari-hara-viriñcādibhir api · praṇantuṁ stotuṁ vā katham akṛta-puṇyaḥ prabhavati

शब्दार्थ: शक्त्या युक्तः · शक्ति से जुड़ा हुआ · प्रभवितुं · सृजन करने में समर्थ · स्पन्दितुम् अपि · हिलने तक · अकृत-पुण्यः · जिसने पुण्य न कमाया हो।

अर्थ: शिव शक्ति से जुड़े हों, तभी सृजन कर सकते हैं। अगर ऐसा न हो, तो यह देव हिल भी नहीं सकते। तब हरि, हर, ब्रह्मा तक जिसकी आराधना करते हैं, उस तुझ देवी को प्रणाम या स्तुति करने की सामर्थ्य बिना पुण्य के किसी में कैसे आए?

भावार्थ: पूरी सौन्दर्य लहरी का thesis पहली ही लाइन में रख दिया गया है, और यह एक हिम्मत वाली बात है। शिव — जो परम चेतना हैं — शक्ति के बिना “हिल भी नहीं सकते।” यानी जागरूकता अकेली कुछ नहीं करती; करने के लिए ऊर्जा चाहिए, और वह ऊर्जा देवी हैं।

एक रोज़ की तस्वीर: आपको पता है कि क्या करना है (वह शिव है, जानना)। पर जब तक एक धक्का, एक ऊर्जा भीतर न उठे, हाथ-पैर हिलते नहीं (वह शक्ति है)। जानना और करने की ताक़त — सौन्दर्य लहरी कहती है, असली पूजा उस दूसरी की है।

2

तनीयांसं पांसुं तव चरणपङ्केरुहभवं
विरिञ्चिस्सञ्चिन्वन् विरचयति लोकानविकलम् ।
वहत्येनं शौरिः कथमपि सहस्रेण शिरसां
हरस्संक्षुद्यैनं भजति भसितोद्धूलनविधिम् ॥ २॥

tanīyāṁsaṁ pāṁsuṁ tava caraṇa-paṅkeruha-bhavaṁ · viriñciḥ sañcinvan viracayati lokān avikalam · vahaty enaṁ śauriḥ katham api sahasreṇa śirasāṁ · haraḥ saṁkṣudya enaṁ bhajati bhasitoddhūlana-vidhim

शब्दार्थ: तनीयांसं पांसुं · ज़र्रा भर धूल · चरण-पङ्केरुह-भव · चरण-कमल से उठी · विरिञ्चि · ब्रह्मा · शौरि · विष्णु · भसित-उद्धूलन · भस्म मलना।

अर्थ: तेरे चरण-कमल की एक नन्ही सी धूल को बटोर कर ब्रह्मा पूरे लोक रच डालते हैं। उसी धूल को विष्णु अपने हज़ार सिरों पर बड़ी मुश्किल से सँभालते हैं। और शिव उसे पीस कर अपने शरीर पर भस्म की तरह मल लेते हैं।

भावार्थ: देखिए कवि क्या कर रहा है — देवी के चरण की सिर्फ़ “धूल” से तीनों बड़े देवताओं का सारा काम चल रहा है। ब्रह्मा उससे सृष्टि बना रहे हैं, विष्णु उसे ढो रहे हैं, शिव उसे पहन रहे हैं।

बात यह है: जिसे हम सबसे ऊँचा मानते हैं — ब्रह्मा, विष्णु, शिव — वे भी उस मूल शक्ति के एक कण पर चल रहे हैं। यह श्लोक 1 की बात आगे बढ़ा रहा है, और थोड़ा शरारत से।

3

अविद्यानामन्तस्तिमिरमिहिरद्वीपनगरी
जडानां चैतन्यस्तबकमकरन्दस्रुतिझरी ।
दरिद्राणां चिन्तामणिगुणनिका जन्मजलधौ
निमग्नानां दंष्ट्रा मुररिपुवराहस्य भवति ॥ ३॥

avidyānām antas-timira-mihira-dvīpa-nagarī · jaḍānāṁ caitanya-stabaka-makaranda-sruti-jharī · daridrāṇāṁ cintāmaṇi-guṇanikā janma-jaladhau · nimagnānāṁ daṁṣṭrā mura-ripu-varāhasya bhavati

शब्दार्थ: अविद्या · न जानने वाले · तिमिर · अँधेरा · मिहिर · सूरज · जड़ · मंद-बुद्धि · चैतन्य · चेतना · चिन्तामणि · हर इच्छा पूरी करने वाला रत्न · जन्म-जलधि · जन्मों का समुद्र।

अर्थ: जो अज्ञान में हैं, उनके भीतर के अँधेरे के लिए तू सूरज-जैसे द्वीप की नगरी है। जो जड़-बुद्धि हैं, उनके लिए तू चेतना के फूल से झरता मधु है। दरिद्रों के लिए चिन्तामणि की माला। और जन्मों के समुद्र में डूबे हुओं के लिए तू वही दाँत है जिस पर वराह-रूपी विष्णु ने धरती उठा ली थी।

भावार्थ: चार तरह के लोग, चार तरह की मुसीबत — अज्ञान, जड़ता, ग़रीबी, और जन्म-मरण में फँसना। और देवी हर एक के लिए ठीक वही चीज़ बन जाती हैं जो उस मुसीबत का इलाज है: अँधेरे के लिए सूरज, सूखे मन के लिए मधु, अभाव के लिए रत्न, डूबने वालों के लिए सहारा।

यह श्लोक एक भरोसा है: देवी कोई एक तय रूप नहीं। आप जिस हाल में हैं, वे उसी हाल का जवाब बन कर आती हैं।

4

त्वदन्यः पाणिभ्यामभयवरदो दैवतगणः
त्वमेका नैवासि प्रकटितवराभीत्यभिनया ।
भयात् त्रातुं दातुं फलमपि च वाञ्छासमधिकं
शरण्ये लोकानां तव हि चरणावेव निपुणौ ॥ ४॥

tvad anyaḥ pāṇibhyām abhaya-varado daivata-gaṇaḥ · tvam ekā naivāsi prakaṭita-varābhīty-abhinayā · bhayāt trātuṁ dātuṁ phalam api ca vāñchā-samadhikaṁ · śaraṇye lokānāṁ tava hi caraṇāv eva nipuṇau

शब्दार्थ: अभय-वरद · “डरो मत” और “वर देता हूँ” वाली मुद्राएँ · अभिनय · हाव-भाव · वाञ्छा-समधिकं · माँगे से भी ज़्यादा · शरण्ये · शरण देने वाली।

अर्थ: तेरे सिवा बाक़ी सब देवता हाथों से “अभय” और “वरद” की मुद्राएँ दिखाते हैं। सिर्फ़ तू ऐसी है जो ये मुद्राएँ बना कर दिखाती ही नहीं — क्योंकि हे शरण देने वाली, तेरे तो चरण ही डर से बचाने और माँगे से ज़्यादा देने में निपुण हैं।

भावार्थ: बाक़ी देवता हाथ से इशारा करते हैं — “डरो मत”, “ले लो”। देवी को वह इशारा करने की ज़रूरत ही नहीं। क्यों? क्योंकि उनके चरण ख़ुद वह काम कर देते हैं — और माँगे से भी ज़्यादा।

एक प्यारा फ़र्क यहाँ है: इशारा करना एक बात है, और वह होना दूसरी। देवी अभय का वादा नहीं करतीं; वे अभय हैं।

5

हरिस्त्वामाराध्य प्रणतजनसौभाग्यजननीं
पुरा नारी भूत्वा पुररिपुमपि क्षोभमनयत् ।
स्मरोऽपि त्वां नत्वा रतिनयनलेह्येन वपुषा
मुनीनामप्यन्तः प्रभवति हि मोहाय महताम् ॥ ५॥

haris tvām ārādhya praṇata-jana-saubhāgya-jananīṁ · purā nārī bhūtvā pura-ripum api kṣobham anayat · smaro ‘pi tvāṁ natvā rati-nayana-lehyena vapuṣā · munīnām apy antaḥ prabhavati hi mohāya mahatām

शब्दार्थ: पुर-रिपु · त्रिपुर का शत्रु, शिव · क्षोभम् अनयत् · विचलित कर दिया · स्मर · कामदेव · रति-नयन-लेह्य · रति की आँखों से चखने योग्य।

अर्थ: विष्णु ने तेरी आराधना की, फिर मोहिनी-रूप धर कर शिव तक को विचलित कर दिया। और कामदेव ने भी तुझे प्रणाम करके ऐसा रूप पाया कि बड़े-बड़े मुनियों के मन तक उससे डोल जाते हैं।

भावार्थ: कवि कह रहा है — जो भी आकर्षण-शक्ति विष्णु में या कामदेव में दिखती है, वह उधार की है, देवी से माँगी हुई। मोहिनी का रूप, कामदेव की सुंदरता — सब उसी एक स्रोत से।

यानी सुंदरता और आकर्षण भी एक “शक्ति” हैं, और उनका भी एक मूल है। श्लोक 1 की बात फिर लौट आई: हर ताक़त के पीछे वही एक।

6

धनुः पौष्पं मौर्वी मधुकरमयी पञ्च विशिखाः
वसन्तः सामन्तो मलयमरुदायोधनरथः ।
तथाप्येकः सर्वं हिमगिरिसुते कामपि कृपाम्
अपाङ्गात्ते लब्ध्वा जगदिदमनङ्गो विजयते ॥ ६॥

dhanuḥ pauṣpaṁ maurvī madhukara-mayī pañca viśikhāḥ · vasantaḥ sāmanto malaya-marud-āyodhana-rathaḥ · tathāpy ekaḥ sarvaṁ hima-giri-sute kām api kṛpām · apāṅgāt te labdhvā jagad idam anaṅgo vijayate

शब्दार्थ: धनुः पौष्पं · फूलों का धनुष · मौर्वी · प्रत्यंचा · विशिख · बाण · अपाङ्ग · कनखी, तिरछी नज़र · अनङ्ग · बिना शरीर वाला कामदेव।

अर्थ: कामदेव का धनुष फूलों का, प्रत्यंचा भौंरों की, बाण सिर्फ़ पाँच, सेनापति वसंत, और रथ बस मलय-पवन। इतने हल्के साज़-सामान के बावजूद, हे हिमालय-पुत्री, वह अकेला, बिना शरीर वाला कामदेव तेरी एक कनखी की कृपा पा कर पूरे जगत को जीत लेता है।

भावार्थ: कामदेव का सारा हथियार हास्यास्पद रूप से कमज़ोर है — फूल, भौंरे, हवा। फिर वह पूरी दुनिया कैसे जीत लेता है? सिर्फ़ एक चीज़ से: देवी की तिरछी नज़र की कृपा।

बात साफ़ है: असली ताक़त साज़-सामान में नहीं, उस कृपा में है जो पीछे से आती है। एक छोटे से औज़ार के साथ भी, अगर वह कृपा साथ हो, तो काम बन जाता है।

7

क्वणत्काञ्चीदामा करिकलभकुम्भस्तननता
परिक्षीणा मध्ये परिणतशरच्चन्द्रवदना ।
धनुर्बाणान् पाशं सृणिमपि दधाना करतलैः
पुरस्तादास्तां नः पुरमथितुराहोपुरुषिका ॥ ७॥

kvaṇat-kāñcī-dāmā kari-kalabha-kumbha-stana-natā · parikṣīṇā madhye pariṇata-śarac-candra-vadanā · dhanur bāṇān pāśaṁ sṛṇim api dadhānā kara-talaiḥ · purastād āstāṁ naḥ pura-mathitur āho-puruṣikā

शब्दार्थ: क्वणत्-काञ्ची-दामा · छनछनाती करधनी वाली · पाश · फंदा · सृणि · अंकुश · पुर-मथितुः · त्रिपुर को मथने वाले शिव की · आहोपुरुषिका · गौरव, शान।

अर्थ: छनछनाती करधनी पहने, हाथी के बच्चे के मस्तक जैसे वक्ष के भार से थोड़ी झुकी, कमर से पतली, पूर्ण शरद-चंद्र जैसे मुख वाली, और हाथों में धनुष, बाण, पाश और अंकुश थामे — शिव की वह शान, वह देवी, हमारे सामने प्रकट हों।

भावार्थ: पहली बार कवि देवी को एक रूप देता है — और देखिए वह रूप कैसा है। एक तरफ़ कोमलता (छनछनाती करधनी, चाँद जैसा मुख), दूसरी तरफ़ चार हथियार (धनुष, बाण, पाश, अंकुश)।

हर हथियार का एक भीतरी अर्थ है: धनुष-बाण मन और इन्द्रियाँ, पाश वह डोर जो जोड़ती है, अंकुश वह जो रोकता है। देवी सिर्फ़ सुंदर नहीं, वे सँभालने वाली भी हैं।

8

सुधासिन्धोर्मध्ये सुरविटपिवाटीपरिवृते
मणिद्वीपे नीपोपवनवति चिन्तामणिगृहे ।
शिवाकारे मञ्चे परमशिवपर्यङ्कनिलयां
भजन्ति त्वां धन्याः कतिचन चिदानन्दलहरीम् ॥ ८॥

sudhā-sindhor madhye sura-viṭapi-vāṭī-parivṛte · maṇi-dvīpe nīpopavana-vati cintāmaṇi-gṛhe · śivākāre mañce parama-śiva-paryaṅka-nilayāṁ · bhajanti tvāṁ dhanyāḥ katicana cid-ānanda-laharīm

शब्दार्थ: सुधा-सिन्धु · अमृत का समुद्र · मणि-द्वीप · रत्नों का द्वीप · चिन्तामणि-गृह · चिन्तामणि का घर · चिद्-आनन्द-लहरी · चेतना-आनंद की लहर।

अर्थ: अमृत के समुद्र के बीच, कल्पवृक्षों के बाग़ से घिरे, रत्नों के द्वीप पर, चिन्तामणि के घर में, शिव-आकार के मंच पर, परम शिव की शय्या पर विराजमान — चेतना-आनंद की लहर रूपी तुझ को कुछ धन्य लोग ही भजते हैं।

भावार्थ: यह श्री विद्या का प्रसिद्ध मणि-द्वीप वर्णन है — देवी का दिव्य निवास, परत-दर-परत। पर इसे भूगोल मत समझिए। यह एक भीतरी जगह का नक्शा है।

हर परत एक भाव है: अमृत का समुद्र (असीम), कल्पवृक्ष (हर इच्छा पूरी), रत्न-द्वीप (अनमोल), और बीच में देवी “चिद्-आनन्द-लहरी” — चेतना और आनंद की एक लहर। ध्यान की गहराई में पहुँचा हुआ मन ठीक यही पाता है: एक जगह जहाँ सब कुछ पहले से भरा-पूरा है।

9

महीं मूलाधारे कमपि मणिपूरे हुतवहं
स्थितं स्वाधिष्ठाने हृदि मरुतमाकाशमुपरि ।
मनोऽपि भ्रूमध्ये सकलमपि भित्वा कुलपथं
सहस्रारे पद्मे सह रहसि पत्या विहरसे ॥ ९॥

mahīṁ mūlādhāre kam api maṇipūre hutavahaṁ · sthitaṁ svādhiṣṭhāne hṛdi marutam ākāśam upari · mano ‘pi bhrū-madhye sakalam api bhittvā kula-pathaṁ · sahasrāre padme saha rahasi patyā viharase

शब्दार्थ: मही · पृथ्वी-तत्व · हुतवह · अग्नि · मरुत · वायु · कुल-पथ · कुंडलिनी का मार्ग · सहस्रार · सिर का शिखर-चक्र।

अर्थ: मूलाधार में पृथ्वी, मणिपूर में जल, स्वाधिष्ठान में अग्नि, हृदय में वायु, उससे ऊपर आकाश, और भ्रू-मध्य में मन — इन सब चक्रों के मार्ग को भेद कर, हे देवी, तू सहस्रार-कमल में अपने पति के साथ एकांत में विहार करती है।

भावार्थ: यह कुंडलिनी का पूरा सफ़र एक श्लोक में है। देवी एक ऊर्जा हैं जो रीढ़ के सबसे नीचे (मूलाधार) सोई पड़ी हैं, और जब जागती हैं तो एक-एक चक्र भेदती हुई ऊपर उठती हैं — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन — और सबसे ऊपर सहस्रार में शिव से मिलती हैं।

इसे एक तस्वीर की तरह देखिए: ऊर्जा का सबसे मोटे, ज़मीनी स्तर से उठ कर सबसे सूक्ष्म, खुले स्तर तक पहुँचना। और वहाँ “रहसि” — एकांत में — शक्ति और शिव का मिलन। यह योग का चरम है, भक्ति की भाषा में कहा हुआ।

10

सुधाधारासारैश्चरणयुगलान्तर्विगलितैः
प्रपञ्चं सिञ्चन्ती पुनरपि रसाम्नायमहसः ।
अवाप्य स्वां भूमिं भुजगनिभमध्युष्टवलयं
स्वमात्मानं कृत्वा स्वपिषि कुलकुण्डे कुहरिणि ॥ १०॥

sudhā-dhārā-sāraiḥ caraṇa-yugalāntar-vigalitaiḥ · prapañcaṁ siñcantī punar api rasāmnāya-mahasaḥ · avāpya svāṁ bhūmiṁ bhujaga-nibham adhyuṣṭa-valayaṁ · svam ātmānaṁ kṛtvā svapiṣi kula-kuṇḍe kuhariṇi

शब्दार्थ: सुधा-धारा · अमृत की धार · प्रपञ्च · सारा संसार · सिञ्चन्ती · सींचती हुई · भुजग-निभ · साँप के समान · अध्युष्ट-वलय · साढ़े तीन कुंडली · कुल-कुण्ड · मूलाधार का गड्ढा।

अर्थ: सहस्रार से अमृत की धारा अपने चरण-युगल से बहाती हुई, उससे पूरे संसार को सींचती हुई, फिर तू अपनी जगह लौट आती है — और साढ़े तीन कुंडली वाले साँप का रूप ले कर, अपने को समेट कर, मूलाधार के गहरे गड्ढे में सो जाती है।

भावार्थ: श्लोक 9 में ऊर्जा ऊपर उठी थी; श्लोक 10 में वह नीचे लौटती है। ऊपर सहस्रार में शिव से मिल कर, वह अमृत बरसाती है — और वह अमृत पूरे संसार को सींचता है। फिर वह वापस मूलाधार में आ कर साढ़े तीन कुंडली में सिमट कर सो जाती है।

यह एक चक्र है, एक साँस की तरह — ऊपर, फिर नीचे। और बीच में जो होता है, वह “अमृत” है: ऊपर के मिलन से जो रस उतरता है, वही नीचे की सारी ज़िंदगी को तर रखता है।

11

चतुर्भिः श्रीकण्ठैः शिवयुवतिभिः पञ्चभिरपि
प्रभिन्नाभिः शम्भोर्नवभिरपि मूलप्रकृतिभिः ।
चतुश्चत्वारिंशद्वसुदलकलाश्रत्रिवलय-
त्रिरेखाभिः सार्धं तव शरणकोणाः परिणताः ॥ ११॥

caturbhiḥ śrī-kaṇṭhaiḥ śiva-yuvatibhiḥ pañcabhir api · prabhinnābhiḥ śambhor navabhir api mūla-prakṛtibhiḥ · catuś-catvāriṁśad-vasu-dala-kalāśra-tri-valaya-tri-rekhābhiḥ · sārdhaṁ tava śaraṇa-koṇāḥ pariṇatāḥ

शब्दार्थ: श्रीकण्ठ · शिव के चार त्रिकोण · शिव-युवति · शक्ति के पाँच त्रिकोण · वसु-दल · आठ पंखुड़ियाँ · चतुश्चत्वारिंशत् · चवालीस।

अर्थ: शिव के चार त्रिकोण और शक्ति के पाँच त्रिकोण — कुल नौ मूल त्रिकोण — आठ और सोलह पंखुड़ियों के कमलों, तीन वलयों और तीन रेखाओं के साथ मिल कर, हे देवी, तेरा वह श्री चक्र चवालीस कोणों में खुलता है।

भावार्थ: यह श्री चक्र का ज्यामितीय वर्णन है — श्री विद्या का सबसे पवित्र यंत्र। नौ त्रिकोण आपस में गुँथ कर चवालीस छोटे त्रिकोण बनाते हैं।

संख्याओं में मत उलझिए। असली बात यह है: ऊपर की ओर वाले त्रिकोण शिव हैं (चेतना), नीचे की ओर वाले शक्ति (ऊर्जा), और वे एक-दूसरे में इस तरह गुँथे हैं कि अलग किए ही नहीं जा सकते। श्री चक्र एक तस्वीर है उस बात की जो श्लोक 1 ने कही थी — चेतना और ऊर्जा, हमेशा साथ।

12

त्वदीयं सौन्दर्यं तुहिनगिरिकन्ये तुलयितुं
कवीन्द्राः कल्पन्ते कथमपि विरिञ्चिप्रभृतयः ।
यदालोकौत्सुक्यादमरललना यान्ति मनसा
तपोभिर्दुष्प्रापामपि गिरिशसायुज्यपदवीम् ॥ १२॥

tvadīyaṁ saundaryaṁ tuhina-giri-kanye tulayituṁ · kavīndrāḥ kalpante katham api viriñci-prabhṛtayaḥ · yad-āloka-autsukyād amara-lalanā yānti manasā · tapobhir duṣprāpām api giriśa-sāyujya-padavīm

शब्दार्थ: तुलयितुं · तौलने, तुलना करने में · कवीन्द्र · कवियों के राजा · आलोक-औत्सुक्य · देखने की उत्सुकता · सायुज्य · एक हो जाना।

अर्थ: हे हिमालय-कन्या, तेरे सौंदर्य की तुलना करने में ब्रह्मा जैसे कवि-शिरोमणि भी किसी तरह जुटे रहते हैं। और तुझे देखने की उत्सुकता में देवांगनाएँ मन ही मन शिव से एकात्म होने का वह पद चाह बैठती हैं, जो कठिन तप से भी मुश्किल से मिलता है।

भावार्थ: यहाँ कवि एक चतुर बात कहता है। देवांगनाएँ देवी की सुंदरता देखना चाहती हैं — पर देवी तो शिव की हैं, और शिव से एकात्म हुए बिना उन्हें पूरा देखा नहीं जा सकता। तो देखने की उत्सुकता में ही उनके मन में शिव-सायुज्य की चाह जाग उठती है — वही मोक्ष, जो कठिन तप से मिलता है।

यानी देवी की सुंदरता बस सुंदरता नहीं है। उसे चाहना ही, अनजाने, मुक्ति की ओर एक कदम है।

13

नरं वर्षीयांसं नयनविरसं नर्मसु जडं
तवापाङ्गालोके पतितमनुधावन्ति शतशः ।
गलद्वेणीबन्धाः कुचकलशविस्रस्तसिचया
हठात् त्रुट्यत्काञ्च्यो विगलितदुकूला युवतयः ॥ १३॥

naraṁ varṣīyāṁsaṁ nayana-virasaṁ narmasu jaḍaṁ · tavāpāṅgāloke patitam anudhāvanti śataśaḥ · galad-veṇī-bandhāḥ kuca-kalaśa-visrasta-sicayā · haṭhāt truṭyat-kāñcyo vigalita-dukūlā yuvatayaḥ

शब्दार्थ: वर्षीयांस · बूढ़ा · नयन-विरस · आँखों को न भाने वाला · नर्मसु जड़ · हँसी-मज़ाक़ में फूहड़ · अपाङ्ग-आलोक · कनखी की नज़र।

अर्थ: एक बूढ़ा आदमी, देखने में बेरस, हँसी-ठिठोली में बिल्कुल कोरा — अगर उस पर भी तेरी कनखी की एक नज़र पड़ जाए, तो सैकड़ों युवतियाँ अपनी वेणी खुलती, वस्त्र ढलकते, करधनी टूटती हालत में उसके पीछे दौड़ पड़ती हैं।

भावार्थ: यह श्लोक मज़ाक़िया है, और जान-बूझ कर अतिशयोक्ति है। बात यह है: आकर्षण किसी की अपनी ख़ूबी नहीं है। एक बूढ़े, नीरस आदमी पर भी अगर देवी की कृपा-दृष्टि पड़ जाए, तो वह सबसे आकर्षक बन जाता है।

श्लोक 6 ने यही बात कामदेव के बारे में कही थी। यहाँ वही बात एक आम इंसान पर। कृपा-दृष्टि — वह कनखी — ही असली जादू है।

14

क्षितौ षट्पञ्चाशद् द्विसमधिकपञ्चाशदुदके
हुताशे द्वाषष्टिश्चतुरधिकपञ्चाशदनिले ।
दिवि द्विष्षट्त्रिंशन्मनसि च चतुष्षष्टिरिति ये
मयूखास्तेषामप्युपरि तव पादाम्बुजयुगम् ॥ १४॥

kṣitau ṣaṭ-pañcāśad dvi-samadhika-pañcāśad udake · hutāśe dvā-ṣaṣṭiḥ catur-adhika-pañcāśad anile · divi dvi-ṣaṭ-triṁśat manasi ca catuḥ-ṣaṣṭir iti ye · mayūkhāḥ teṣām apy upari tava pādāmbuja-yugam

शब्दार्थ: क्षिति · पृथ्वी (मूलाधार) · उदक · जल (मणिपूर) · हुताश · अग्नि (स्वाधिष्ठान) · अनिल · वायु (अनाहत) · दिव · आकाश (विशुद्धि) · मनस् (आज्ञा) · मयूख · किरणें।

अर्थ: मूलाधार में छप्पन, मणिपूर में बावन, स्वाधिष्ठान में बासठ, अनाहत में चौवन, विशुद्धि में बहत्तर, और आज्ञा में चौंसठ — चक्रों की इन सब किरणों के भी ऊपर तेरे दोनों चरण-कमल हैं।

भावार्थ: हर चक्र की अपनी किरणें हैं, अपनी ऊर्जा — और श्लोक उन सबको गिनाता है। पर असली बात आख़िरी पंक्ति में है: इन सबके “ऊपर” देवी के चरण।

यानी जितनी भी भीतरी ऊर्जा है — हर चक्र की हर किरण — वह सब किसी एक चीज़ की ओर इशारा करती है, और वह चीज़ इन सबसे ऊपर है। चक्र सीढ़ियाँ हैं; देवी के चरण वह जगह जहाँ सीढ़ी पहुँचती है।

15

शरज्ज्योत्स्नाशुद्धां शशियुतजटाजूटमकुटां
वरत्रासत्राणस्फटिकघटिकापुस्तककराम् ।
सकृन्न त्वा नत्वा कथमिव सतां संन्निदधते
मधुक्षीरद्राक्षामधुरिमधुरीणाः भणितयः ॥ १५॥

śaraj-jyotsnā-śuddhāṁ śaśi-yuta-jaṭā-jūṭa-makuṭāṁ · vara-trāsa-trāṇa-sphaṭika-ghaṭikā-pustaka-karām · sakṛn na tvā natvā katham iva satāṁ saṁnidadhate · madhu-kṣīra-drākṣā-madhurima-dhurīṇāḥ bhaṇitayaḥ

शब्दार्थ: शरत्-ज्योत्स्ना · शरद की चाँदनी · वर · वरमुद्रा · त्रासत्राण · अभयमुद्रा · स्फटिक-घटिका · स्फटिक की माला · भणिति · वाणी, वचन।

अर्थ: शरद की चाँदनी जैसी उज्ज्वल, चंद्र-युक्त जटा-जूट के मुकुट वाली, हाथों में वर-मुद्रा, अभय-मुद्रा, स्फटिक की माला और पुस्तक धारण किए — ऐसी तुझ को जो एक बार भी नमन न करे, उसके पास शहद, दूध और अंगूर की मिठास वाली वाणी कैसे आए?

भावार्थ: यहाँ देवी एक और रूप में हैं — हाथ में पुस्तक और माला, यानी विद्या और वाणी की देवी, शारदा-रूप। और कवि कहता है: मीठी, असरदार वाणी उसी को मिलती है जो इस रूप को एक बार सच्चे मन से नमन कर ले।

यह कवि की अपनी प्रार्थना भी है। वह सौन्दर्य लहरी लिख रहा है — मीठी वाणी उसकी ज़रूरत है। और वह जानता है, वह मिठास उसकी अपनी नहीं, देवी की देन है।

16

कवीन्द्राणां चेतःकमलवनबालातपरुचिं
भजन्ते ये सन्तः कतिचिदरुणामेव भवतीम् ।
विरिञ्चिप्रेयस्यास्तरुणतरश‍ृङ्गारलहरी-
गभीराभिर्वाग्भिर्विदधति सतां रञ्जनममी ॥ १६॥

kavīndrāṇāṁ cetaḥ-kamala-vana-bālātapa-ruciṁ · bhajante ye santaḥ katicid aruṇām eva bhavatīm · viriñci-preyasyāḥ taruṇatara-śṛṅgāra-laharī-gabhīrābhiḥ · vāgbhiḥ vidadhati satāṁ rañjanam amī

शब्दार्थ: बालातप · सुबह की हल्की धूप · अरुणा · लाल रंग वाली, अरुणा-देवी · विरिञ्चि-प्रेयसी · ब्रह्मा की प्रिया, सरस्वती · रञ्जन · रिझाना।

अर्थ: जो कुछ संत तुझे “अरुणा” — सुबह की धूप जैसी लाल आभा वाली — के रूप में भजते हैं, उनके कवि-हृदय का कमल-वन खिल उठता है। और वे फिर सरस्वती की गहरी, शृंगार-भरी लहर जैसी वाणी से सज्जनों के मन रिझाते हैं।

भावार्थ: देवी का यहाँ रंग है — अरुण, सुबह की पहली धूप वाला लाल। और यह रंग कवि के मन में जा कर क्या करता है? उसके भीतर का “कमल-वन” खिला देता है — यानी रचना-शक्ति जाग उठती है।

श्लोक 15 की बात आगे: मीठी वाणी देवी से आती है। यहाँ वह और साफ़ — देवी के एक ख़ास रूप का ध्यान कवि को कवि बना देता है।

17

सवित्रीभिर्वाचां शशिमणिशिलाभङ्गरुचिभिः
वशिन्याद्याभिस्त्वां सह जननि संचिन्तयति यः ।
स कर्ता काव्यानां भवति महतां भङ्गिरुचिभिः
वचोभिर्वाग्देवीवदनकमलामोदमधुरैः ॥ १७॥

savitrībhir vācāṁ śaśi-maṇi-śilā-bhaṅga-rucibhiḥ · vaśiny-ādyābhiḥ tvāṁ saha janani saṁcintayati yaḥ · sa kartā kāvyānāṁ bhavati mahatāṁ bhaṅgi-rucibhiḥ · vacobhiḥ vāg-devī-vadana-kamalāmoda-madhuraiḥ

शब्दार्थ: सवित्री · जन्म देने वाली · वशिनी-आदि · वशिनी आदि आठ वाग्-देवियाँ · संचिन्तयति · ध्यान करता है · भङ्गि · शैली, अंदाज़।

अर्थ: चंद्रकांत मणि के टुकड़े जैसी आभा वाली, वाणी को जन्म देने वाली वशिनी आदि आठ देवियों के साथ जो तेरा ध्यान करता है, हे माँ, वह महान काव्यों का रचयिता बन जाता है — ऐसी वाणी से जो सरस्वती के मुख-कमल की सुगंध जैसी मीठी हो।

भावार्थ: श्री विद्या में आठ “वाग्-देवियाँ” हैं — वाणी को जन्म देने वाली शक्तियाँ — और उनके साथ देवी का ध्यान करने वाला महाकवि बन जाता है।

तीन श्लोक से एक ही धारा बह रही है: देवी और वाणी का गहरा रिश्ता। जो उन्हें भीतर बसा लेता है, उसकी ज़बान पर ख़ुद-ब-ख़ुद सुंदरता आ बैठती है। यह कवि का अपना अनुभव बोल रहा है।

18

तनुच्छायाभिस्ते तरुणतरणिश्रीसरणिभिः
दिवं सर्वामुर्वीमरुणिमनि मग्नां स्मरति यः ।
भवन्त्यस्य त्रस्यद्वनहरिणशालीननयनाः
सहोर्वश्या वश्याः कति कति न गीर्वाणगणिकाः ॥ १८॥

tanu-cchāyābhiḥ te taruṇa-taraṇi-śrī-saraṇibhiḥ · divaṁ sarvām urvīm aruṇimani magnāṁ smarati yaḥ · bhavanty asya trasyad-vana-hariṇa-śālīna-nayanāḥ · sahorvaśyā vaśyāḥ kati kati na gīrvāṇa-gaṇikāḥ

शब्दार्थ: तनु-च्छाया · शरीर की आभा · तरुण-तरणि · नया उगता सूरज · अरुणिमन् · लालिमा · गीर्वाण-गणिका · देवांगनाएँ।

अर्थ: जो तेरे शरीर की उस आभा का ध्यान करता है, जो नए उगते सूरज की लालिमा से पूरे आकाश और धरती को रँग देती है — उसके वश में, डरे हुए वन-हिरण जैसी आँखों वाली देवांगनाएँ, उर्वशी तक, हो जाती हैं।

भावार्थ: देवी की आभा फिर वही अरुण-लाल है, सुबह के सूरज की। और यह लालिमा पूरे आकाश-धरती को रँग देती है।

श्लोकों की यह लड़ी — 16, 17, 18 — देवी के अरुण-रूप के ध्यान के अलग-अलग फल गिना रही है: कविता, वाणी, आकर्षण। पर इन सबके नीचे एक ही बात है — एक ख़ास भीतरी छवि पर टिका ध्यान आपको भीतर से बदल देता है।

19

मुखं बिन्दुं कृत्वा कुचयुगमधस्तस्य तदधो
हरार्धं ध्यायेद्यो हरमहिषि ते मन्मथकलाम् ।
स सद्यः संक्षोभं नयति वनिता इत्यतिलघु
त्रिलोकीमप्याशु भ्रमयति रवीन्दुस्तनयुगाम् ॥ १९॥

mukhaṁ binduṁ kṛtvā kuca-yugam adhas tasya tad-adho · harārdhaṁ dhyāyed yo hara-mahiṣi te manmatha-kalām · sa sadyaḥ saṁkṣobhaṁ nayati vanitā ity ati-laghu · trilokīm apy āśu bhramayati ravīndu-stana-yugām

शब्दार्थ: बिन्दु · केंद्र-बिंदु · हर-अर्ध · शिव का आधा भाग · मन्मथ-कला · कामदेव वाला आकर्षक रूप · संक्षोभ · हलचल, खिंचाव।

अर्थ: हे शिव-रानी, जो तेरे मुख को बिंदु मान कर, उसके नीचे कुच-युगल, और उसके नीचे शिव का आधा भाग — इस रूप में तेरी मन्मथ-कला का ध्यान करता है, वह स्त्रियों को तो पल भर में मोह ले, यह तो बहुत छोटी बात है; वह सूरज-चाँद रूपी स्तनों वाली तीनों लोकों तक को घुमा देता है।

भावार्थ: यह एक ध्यान-यंत्र का वर्णन है — एक भीतरी छवि जिसका ध्यान किया जाता है। श्लोक की बात अतिशयोक्ति में है: ऐसा ध्यान करने वाला तीनों लोकों को मोह सकता है।

पर इसे शक्ति-दिखावे की तरह मत पढ़िए। असली इशारा यह है कि एक सही, एकाग्र भीतरी छवि का असर असीम होता है। कहाँ अपना ध्यान टिकाते हैं — यही तय करता है आप क्या बन जाते हैं।

20

किरन्तीमङ्गेभ्यः किरणनिकुरम्बामृतरसं
हृदि त्वामाधत्ते हिमकरशिलामूर्तिमिव यः ।
स सर्पाणां दर्पं शमयति शकुन्ताधिप इव
ज्वरप्लुष्टान् दृष्ट्या सुखयति सुधाधारसिरया ॥ २०॥

kirantīm aṅgebhyaḥ kiraṇa-nikurambāmṛta-rasaṁ · hṛdi tvām ādhatte hima-kara-śilā-mūrtim iva yaḥ · sa sarpāṇāṁ darpaṁ śamayati śakuntādhipa iva · jvara-pluṣṭān dṛṣṭyā sukhayati sudhā-dhāra-sirayā

शब्दार्थ: हिमकर-शिला · चंद्रकांत मणि · शकुन्ताधिप · पक्षियों का राजा गरुड़ · ज्वर-प्लुष्ट · बुख़ार से तपे हुए · सुधा-धार-सिरा · अमृत की धारा वाली नस।

अर्थ: जो तुझे अपने हृदय में चंद्रकांत मणि की मूर्ति की तरह बसाता है — तू जो अपने अंगों से अमृत-रस की किरणें बिखेरती है — वह गरुड़ की तरह साँपों का घमंड शांत कर देता है, और बुख़ार से तपे हुओं को अपनी अमृत-भरी नज़र से ठंडक दे देता है।

भावार्थ: देवी को यहाँ चंद्रकांत मणि की तरह देखा गया है — एक ठंडी, चाँद-जैसी मूर्ति जो अमृत बरसाती है। और जो इसे अपने हृदय में बसा ले, वह ख़ुद ठंडक का स्रोत बन जाता है।

एक प्यारी बात: ध्यान का असर सिर्फ़ ध्यान करने वाले तक नहीं रुकता। जिसके भीतर यह शीतल छवि बस गई, उसकी मौजूदगी ही दूसरों का “बुख़ार” — उनकी जलन, उनकी बेचैनी — शांत करने लगती है।

21

तटिल्लेखातन्वीं तपनशशिवैश्वानरमयीं
निषण्णां षण्णामप्युपरि कमलानां तव कलाम् ।
महापद्माटव्यां मृदितमलमायेन मनसा
महान्तः पश्यन्तो दधति परमाह्लादलहरीम् ॥ २१॥

taṭil-lekhā-tanvīṁ tapana-śaśi-vaiśvānara-mayīṁ · niṣaṇṇāṁ ṣaṇṇām apy upari kamalānāṁ tava kalām · mahā-padmāṭavyāṁ mṛdita-mala-māyena manasā · mahāntaḥ paśyanto dadhati paramāhlāda-laharīm

शब्दार्थ: तटिल्-लेखा · बिजली की रेखा · तपन-शशि-वैश्वानर · सूरज, चाँद, अग्नि · षण्णां कमलानां उपरि · छह चक्र-कमलों के ऊपर · मृदित-मल-माय · जिसका मैल और माया मसल दी गई हो।

अर्थ: बिजली की रेखा जैसी पतली, सूरज-चाँद-अग्नि से बनी, छहों चक्र-कमलों के ऊपर सहस्रार में विराजमान — तेरी उस सूक्ष्म कला को, जिनका मन मैल और माया से धुल चुका है, वे महापुरुष देखते हैं, और परम आनंद की लहर में डूब जाते हैं।

भावार्थ: यह आनन्द लहरी का असली शिखर है। श्लोक 9 में कुंडलिनी छहों चक्र भेद कर ऊपर उठी थी। यह श्लोक उस आख़िरी मंज़िल को दिखाता है — सहस्रार में, सब चक्रों के ऊपर, देवी एक “बिजली की रेखा जैसी पतली” ज्योति के रूप में।

और इसे कौन देख पाता है? सिर्फ़ वह मन जिसका “मैल और माया मसल दी गई हो।” शर्त सीधी है: पहले मन साफ़, फिर यह दर्शन। और उस दर्शन का फल एक ही शब्द में — “परम-आह्लाद-लहरी”, परम आनंद की लहर। किताब का नाम यहीं से है।

22

भवानि त्वं दासे मयि वितर दृष्टिं सकरुणा-
मिति स्तोतुं वाञ्छन् कथयति भवानि त्वमिति यः ।
तदैव त्वं तस्मै दिशसि निजसायुज्यपदवीं
मुकुन्दब्रह्मेन्द्रस्फुटमकुटनीराजितपदाम् ॥ २२॥

bhavāni tvaṁ dāse mayi vitara dṛṣṭiṁ sakaruṇāṁ · iti stotuṁ vāñchan kathayati bhavāni tvam iti yaḥ · tadaiva tvaṁ tasmai diśasi nija-sāyujya-padavīṁ · mukunda-brahmendra-sphuṭa-makuṭa-nīrājita-padām

शब्दार्थ: भवानि · हे भवानी (देवी का नाम), और साथ ही “मैं हो जाऊँ” (भव + आनि) · वितर · दे · सायुज्य · एकात्म होना · नीराजित · आरती किए गए।

अर्थ: “हे भवानी, मुझ दास पर करुणा-भरी दृष्टि डाल” — ऐसा स्तुति करना चाहते हुए जो भक्त सिर्फ़ “भवानि त्वम्” इतना ही कह पाता है, उसी पल तू उसे अपने सायुज्य का वह पद दे देती है, जिसके चरण विष्णु, ब्रह्मा और इंद्र के मुकुटों से आरती किए जाते हैं।

भावार्थ: सौन्दर्य लहरी का सबसे प्यारा श्लोक शायद यही है, और इसका कमाल संस्कृत के एक शब्द-खेल में है। “भवानि” देवी का नाम है। पर “भव + आनि” का मतलब भी होता है — “मैं हो जाऊँ।”

तो भक्त सिर्फ़ “भवानि त्वम्” कहना चाहता है — “हे भवानी, तुम।” पर देवी उसे दूसरे अर्थ में सुन लेती हैं: “मैं तुम हो जाऊँ।” और उसी पल वे उसे अपने साथ एकात्म कर देती हैं। पूरी प्रार्थना ख़त्म होने का इंतज़ार भी नहीं। यह कृपा की हड़बड़ी है — माँगने वाला अभी वाक्य भी पूरा नहीं कर पाया, और दे दिया गया।

23

त्वया हृत्वा वामं वपुरपरितृप्तेन मनसा
शरीरार्धं शम्भोरपरमपि शङ्के हृतमभूत् ।
यदेतत्त्वद्रूपं सकलमरुणाभं त्रिनयनं
कुचाभ्यामानम्रं कुटिलशशिचूडालमकुटम् ॥ २३॥

tvayā hṛtvā vāmaṁ vapur aparitṛptena manasā · śarīrārdhaṁ śambhor aparam api śaṅke hṛtam abhūt · yad etat tvad-rūpaṁ sakalam aruṇābhaṁ tri-nayanaṁ · kucābhyām ānamraṁ kuṭila-śaśi-cūḍāla-makuṭam

शब्दार्थ: वामं वपुः · बायाँ शरीर · अपरितृप्त · संतुष्ट न हुआ · शरीर-अर्ध · आधा शरीर · त्रि-नयन · तीन आँखों वाला।

अर्थ: शिव का बायाँ आधा शरीर तू ले चुकी थी (अर्धनारीश्वर रूप में), पर शायद मन न भरा — इसलिए मुझे लगता है तूने उनका दूसरा आधा भी ले लिया। तभी तो तेरा यह पूरा रूप अरुण आभा वाला, तीन आँखों वाला, कुचों से थोड़ा झुका, और टेढ़े चाँद के मुकुट वाला है।

भावार्थ: कवि एक मीठी, चंचल बात कह रहा है। अर्धनारीश्वर में देवी शिव का आधा हिस्सा हैं। पर देखो, कवि कहता है — देवी के अपने रूप में तीन आँखें हैं, चाँद का मुकुट है, अरुण आभा है — ये तो शिव की निशानियाँ हैं! तो ज़रूर देवी ने शिव का दूसरा आधा भी “चुरा” लिया।

हँसी-मज़ाक़ के नीचे एक गहरी बात है: शिव और शक्ति को आख़िर में अलग किया ही नहीं जा सकता। एक में दूसरा पूरा का पूरा समाया है।

24

जगत्सूते धाता हरिरवति रुद्रः क्षपयते
तिरस्कुर्वन्नेतत्स्वमपि वपुरीशस्तिरयति ।
सदापूर्वः सर्वं तदिदमनुगृह्णाति च शिव-
स्तवाज्ञामालम्ब्य क्षणचलितयोर्भ्रूलतिकयोः ॥ २४॥

jagat sūte dhātā harir avati rudraḥ kṣapayate · tiraskurvann etat svam api vapur īśas tirayati · sadā-pūrvaḥ sarvaṁ tad idam anugṛhṇāti ca śivaḥ · tavājñām ālambya kṣaṇa-calitayoḥ bhrū-latikayoḥ

शब्दार्थ: धाता · ब्रह्मा · अवति · पालता है · क्षपयते · संहार करता है · तिरयति · ओझल कर देता है · सदा-पूर्व · “सदाशिव” वाला · भ्रू-लतिका · भौंह की लता।

अर्थ: ब्रह्मा जगत रचते हैं, विष्णु पालते हैं, रुद्र संहार करते हैं। ईश्वर इस सबको समेट कर अपना शरीर तक ओझल कर देते हैं। और सदाशिव सबका अनुग्रह करते हैं — पर ये पाँचों काम वे तभी कर पाते हैं जब तेरी भौंह पल भर को हिलती है, यानी तेरी आज्ञा मिलती है।

भावार्थ: श्री विद्या में पाँच काम हैं — सृष्टि, पालन, संहार, ओझल करना, और अनुग्रह — और पाँच देवता उन्हें करते हैं। पर यह श्लोक कहता है: ये पाँचों तभी हिलते हैं जब देवी की भौंह ज़रा सी हिलती है।

श्लोक 1 की बात अपने पूरे ज़ोर पर है: सबसे ऊँचे देवता भी देवी की एक भौंह-इशारे के मोहताज हैं। पूरी सृष्टि की मशीन का स्विच उसी एक के हाथ में है।

25

त्रयाणां देवानां त्रिगुणजनितानां तव शिवे
भवेत् पूजा पूजा तव चरणयोर्या विरचिता ।
तथा हि त्वत्पादोद्वहनमणिपीठस्य निकटे
स्थिता ह्येते शश्वन्मुकुलितकरोत्तंसमकुटाः ॥ २५॥

trayāṇāṁ devānāṁ tri-guṇa-janitānāṁ tava śive · bhavet pūjā pūjā tava caraṇayoḥ yā viracitā · tathā hi tvat-pādodvahana-maṇi-pīṭhasya nikaṭe · sthitā hy ete śaśvan mukulita-karottaṁsa-makuṭāḥ

शब्दार्थ: त्रिगुण-जनित · तीन गुणों से उपजे · विरचिता · की गई · मणि-पीठ · रत्न-चौकी · मुकुलित-कर · हाथ जोड़े हुए।

अर्थ: हे शिवे, तीनों गुणों से उपजे तीनों देवताओं की पूजा अपने आप हो जाती है, अगर सिर्फ़ तेरे दोनों चरणों की पूजा कर दी जाए। क्योंकि तेरे चरण उठाए रखने वाली रत्न-चौकी के पास ही तो ये तीनों, हाथ जोड़े, मुकुट झुकाए, हमेशा खड़े रहते हैं।

भावार्थ: एक बहुत व्यावहारिक बात, और राहत भरी। आप अलग-अलग देवताओं की अलग-अलग पूजा करते रह सकते हैं — या आप बस देवी के चरणों की पूजा कर सकते हैं, और तीनों अपने आप पुज जाते हैं। क्यों? क्योंकि वे तीनों तो वहीं, चरणों के पास ही, हाथ जोड़े खड़े हैं।

यह अनन्य भक्ति का तर्क है: जड़ को सींच दो, सारा पेड़ सिंच गया। बिखराव की ज़रूरत नहीं।

26

विरिञ्चिः पञ्चत्वं व्रजति हरिराप्नोति विरतिं
विनाशं कीनाशो भजति धनदो याति निधनम् ।
वितन्द्री माहेन्द्री विततिरपि संमीलितदृशा
महासंहारेऽस्मिन् विहरति सति त्वत्पतिरसौ ॥ २६॥

viriñciḥ pañcatvaṁ vrajati harir āpnoti viratiṁ · vināśaṁ kīnāśo bhajati dhanado yāti nidhanam · vitandrī māhendrī vitatir api saṁmīlita-dṛśā · mahā-saṁhāre ‘smin viharati sati tvat-patir asau

शब्दार्थ: पञ्चत्वं व्रजति · मृत्यु को प्राप्त होता है · कीनाश · यमराज · धनद · कुबेर · माहेन्द्री वितति · इंद्र का समूह · संमीलित-दृश् · आँखें मूँदे।

अर्थ: हे सती, महाप्रलय के समय ब्रह्मा मृत्यु पाते हैं, विष्णु विश्राम में चले जाते हैं, यमराज का नाश हो जाता है, कुबेर मिट जाते हैं, इंद्र का सारा समूह आँखें मूँद लेता है — और इस सबके बीच तेरे पति शिव अकेले विहार करते रहते हैं।

भावार्थ: महाप्रलय की तस्वीर — सब कुछ ख़त्म हो रहा है, हर देवता मिट रहा है। और बीच में शिव “विहार” कर रहे हैं, मज़े से घूम रहे हैं।

क्यों शिव बचे रहते हैं? क्योंकि शिव शुद्ध चेतना हैं — और चेतना मिटती नहीं, बाक़ी सब उसमें आता-जाता है। पर ध्यान दीजिए, श्लोक देवी को “सति” कह कर पुकारता है, और शिव को “तेरे पति।” शिव बचे हैं, पर इस श्लोक का असली केंद्र वही है जिसकी वजह से शिव “हैं” — शक्ति।

27

जपो जल्पः शिल्पं सकलमपि मुद्राविरचना
गतिः प्रादक्षिण्यक्रमणमशनाद्याहुतिविधिः ।
प्रणामस्संवेशस्सुखमखिलमात्मार्पणदृशा
सपर्यापर्यायस्तव भवतु यन्मे विलसितम् ॥ २७॥

japo jalpaḥ śilpaṁ sakalam api mudrā-viracanā · gatiḥ prādakṣiṇya-kramaṇam aśanādyāhuti-vidhiḥ · praṇāmaḥ saṁveśaḥ sukham akhilam ātmārpaṇa-dṛśā · saparyā-paryāyaḥ tava bhavatu yan me vilasitam

शब्दार्थ: जल्प · आम बातचीत · शिल्प · हाथ का हर काम · प्रादक्षिण्य · परिक्रमा · संवेश · सोना · आत्म-अर्पण-दृशा · ख़ुद को सौंप देने के भाव से · सपर्या-पर्याय · पूजा का दूसरा रूप।

अर्थ: मेरी हर बातचीत तेरा जप बन जाए, हाथ का हर काम तेरी मुद्रा, मेरा चलना तेरी परिक्रमा, खाना-पीना तेरी आहुति, लेटना तेरा प्रणाम। ख़ुद को तुझे सौंप देने के भाव से, मेरा हर सुख, मेरा जो भी करना — सब तेरी पूजा का ही रूप बन जाए।

भावार्थ: यह श्लोक पूजा की पूरी परिभाषा बदल देता है। पूजा कोई अलग, ख़ास समय का काम नहीं रह जाता। बातचीत जप है, चलना परिक्रमा है, खाना आहुति है, सोना प्रणाम है।

शर्त सिर्फ़ एक है — “आत्म-अर्पण-दृशा”, ख़ुद को सौंप देने का भाव। वह भाव हो, तो ज़िंदगी का हर पल अपने आप पूजा बन जाता है। मंदिर और बाक़ी ज़िंदगी की दीवार गिर जाती है।

28

सुधामप्यास्वाद्य प्रतिभयजरामृत्युहरिणीं
विपद्यन्ते विश्वे विधिशतमखाद्या दिविषदः ।
करालं यत्क्ष्वेलं कबलितवतः कालकलना
न शम्भोस्तन्मूलं तव जननि ताटङ्कमहिमा ॥ २८॥

sudhām apy āsvādya prati-bhaya-jarā-mṛtyu-hariṇīṁ · vipadyante viśve vidhi-śata-makhādyā diviṣadaḥ · karālaṁ yat kṣvelaṁ kabalitavataḥ kāla-kalanā · na śambhoḥ tan-mūlaṁ tava janani tāṭaṅka-mahimā

शब्दार्थ: सुधा · अमृत · विपद्यन्ते · नष्ट हो जाते हैं · दिविषद् · देवता · क्ष्वेल · विष (हलाहल) · काल-कलना · मृत्यु की गणना · ताटङ्क · कान का आभूषण।

अर्थ: अमृत — जो बुढ़ापे और मृत्यु तक को हरने वाला है — उसे पी कर भी ब्रह्मा, इंद्र जैसे सारे देवता प्रलय में नष्ट हो जाते हैं। पर शिव, जिन्होंने भयानक हलाहल विष निगल लिया, उन्हें मृत्यु छू भी नहीं पाती। हे माँ, इसका मूल कारण अमृत नहीं — तेरे कानों के आभूषण (मंगल-सूचक) की महिमा है।

भावार्थ: कितनी सुंदर उलटबाँसी। देवताओं ने अमृत पिया, फिर भी मरे। शिव ने ज़हर पिया, फिर भी अमर। क्यों?

कवि का जवाब: अमृत नहीं बचाता, और ज़हर नहीं मारता। शिव अमर हैं क्योंकि देवी सुहागिन हैं — और उनके कानों का आभूषण उसी सुहाग का चिह्न है। यानी शिव का “होना” किसी चीज़ को पी लेने से नहीं, देवी से उनके रिश्ते से है। फिर वही बात: शिव शक्ति से हैं।

29

किरीटं वैरिञ्चं परिहर पुरः कैटभभिदः
कठोरे कोटीरे स्खलसि जहि जम्भारिमुकुटम् ।
प्रणम्रेष्वेतेषु प्रसभमुपयातस्य भवनं
भवस्याभ्युत्थाने तव परिजनोक्तिर्विजयते ॥ २९॥

kirīṭaṁ vairiñcaṁ parihara puraḥ kaiṭabha-bhidaḥ · kaṭhore koṭīre skhalasi jahi jambhāri-mukuṭam · praṇamreṣv eteṣu prasabham upayātasya bhavanaṁ · bhavasyābhyutthāne tava parijanoktiḥ vijayate

शब्दार्थ: वैरिञ्च किरीट · ब्रह्मा का मुकुट · कैटभभिद् · कैटभ को मारने वाला, विष्णु · कोटीर · मुकुट · जम्भारि · इंद्र · अभ्युत्थान · (आदर में) उठ खड़ा होना।

अर्थ: जब शिव अचानक तेरे भवन आ पहुँचते हैं, और तू आदर में उठ खड़ी होती है, तब तेरी सखियाँ कहती हैं — “ब्रह्मा का मुकुट सामने से हटा, विष्णु के कठोर मुकुट में पैर अटक जाएगा, इंद्र का मुकुट परे कर।” क्योंकि ये तीनों तो पहले से तेरे चरणों में झुके पड़े हैं।

भावार्थ: एक प्यारा, घरेलू दृश्य। शिव आ रहे हैं, देवी उठ कर उनका स्वागत करने जा रही हैं — और रास्ते में ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र के मुकुट बिखरे पड़े हैं, क्योंकि वे सब चरणों में लेटे हैं। सखियाँ चेताती हैं — “ध्यान से, पैर मत अटका लेना।”

तीनों बड़े देवता यहाँ बस फ़र्श पर बिछे मुकुट हैं, जिनसे देवी को बचना है। श्लोक 24-25 की बात अब एक हँसी-भरे दृश्य में।

30

स्वदेहोद्भूताभिर्घृणिभिरणिमाद्याभिरभितो
निषेव्ये नित्ये त्वामहमिति सदा भावयति यः ।
किमाश्चर्यं तस्य त्रिनयनसमृद्धिं तृणयतो
महासंवर्ताग्निर्विरचयति नीराजनविधिम् ॥ ३०॥

sva-dehodbhūtābhiḥ ghṛṇibhiḥ aṇimādyābhiḥ abhito · niṣevye nitye tvām aham iti sadā bhāvayati yaḥ · kim āścaryaṁ tasya tri-nayana-samṛddhiṁ tṛṇayato · mahā-saṁvartāgniḥ viracayati nīrājana-vidhim

शब्दार्थ: घृणि · किरणें · अणिमादि · अणिमा आदि आठ सिद्धियाँ · “त्वाम् अहम् इति” · “तू ही मैं हूँ” · तृणयतः · तिनके के बराबर समझने वाला · नीराजन · आरती।

अर्थ: हे नित्या, जो अपने ही शरीर से उठती अणिमा आदि सिद्धि-किरणों से घिरी तुझ का सदा “तू ही मैं हूँ” — इस भाव से ध्यान करता है, उसके लिए शिव की समृद्धि भी तिनके बराबर है। फिर इसमें क्या अचरज कि महाप्रलय की अग्नि भी उसकी आरती उतारती है।

भावार्थ: यहाँ ध्यान का सबसे ऊँचा रूप है — “त्वम् अहम्”, “तू ही मैं हूँ।” यह सिर्फ़ देवी को पूजना नहीं, ख़ुद को देवी के साथ एक देखना है।

और जो यह कर लेता है? उसके लिए सबसे बड़ी सिद्धियाँ, सबसे बड़ी समृद्धि — सब तिनके जैसी हो जाती हैं। यहाँ तक कि प्रलय की महा-अग्नि उसे जलाती नहीं, उसकी आरती उतारती है। जब “मैं” और देवी एक हो गए, तो डराने को बचा ही क्या?

31

चतुष्षष्ट्या तन्त्रैः सकलमतिसंधाय भुवनं
स्थितस्तत्तत्सिद्धिप्रसवपरतन्त्रैः पशुपतिः ।
पुनस्त्वन्निर्बन्धादखिलपुरुषार्थैकघटना-
स्वतन्त्रं ते तन्त्रं क्षितितलमवातीतरदिदम् ॥ ३१॥

catuḥ-ṣaṣṭyā tantraiḥ sakalam atisaṁdhāya bhuvanaṁ · sthitaḥ tat-tat-siddhi-prasava-paratantraiḥ paśupatiḥ · punaḥ tvan-nirbandhāt akhila-puruṣārthaika-ghaṭanā-svatantraṁ · te tantraṁ kṣiti-talam avātītarad idam

शब्दार्थ: चतुष्षष्टि तन्त्र · चौंसठ तंत्र · अतिसंधाय · बहला कर, उलझा कर · पशुपति · शिव · त्वत्-निर्बन्ध · तेरे आग्रह से · पुरुषार्थ · जीवन के चार लक्ष्य।

अर्थ: शिव ने पहले चौंसठ तंत्रों से सारे संसार को उलझाए रखा — हर तंत्र किसी एक सिद्धि भर का। फिर तेरे आग्रह पर उन्होंने इस धरती पर वह एक तंत्र उतारा — तेरा अपना तंत्र — जो अकेला ही जीवन के चारों लक्ष्य पूरे कर देता है।

भावार्थ: यह श्री विद्या की अपनी परम्परा की बात है। श्लोक कहता है — और भी बहुत सारे तंत्र हैं, चौंसठ, पर हर एक किसी एक छोटी सिद्धि भर का। और फिर देवी के आग्रह पर शिव ने एक तंत्र दिया जो “स्वतंत्र” है — अकेला, पूरा।

बात के नीचे की बात: बिखरे हुए छोटे-छोटे रास्तों के बीच एक पूरा रास्ता भी है, जो सब कुछ एक साथ देता है। और वह रास्ता देवी की देन है, उनके आग्रह से उतरा।

32

शिवः शक्तिः कामः क्षितिरथ रविः शीतकिरणः
स्मरो हंसः शक्रस्तदनु च परामारहरयः ।
अमी हृल्लेखाभिस्तिसृभिरवसानेषु घटिता
भजन्ते वर्णास्ते तव जननि नामावयवताम् ॥ ३२॥

śivaḥ śaktiḥ kāmaḥ kṣitiḥ atha raviḥ śīta-kiraṇaḥ · smaro haṁsaḥ śakraḥ tad-anu ca parā-māra-harayaḥ · amī hṛl-lekhābhiḥ tisṛbhiḥ avasāneṣu ghaṭitā · bhajante varṇāḥ te tava janani nāmāvayavatām

शब्दार्थ: हृल्लेखा · “हृीं” बीज · अवसान · अंत · वर्ण · अक्षर · नाम-अवयवता · नाम के अंग होना।

अर्थ: शिव, शक्ति, काम, क्षिति; फिर रवि, शीत-किरण (चंद्र), स्मर, हंस, शक्र; और फिर पर, मार, हरि — इन सबके सूचक बीज-अक्षर, तीन “हृीं” के साथ अंत में जुड़ कर, हे माँ, तेरे नाम-मंत्र के अंग बनते हैं।

भावार्थ: यह देवी के पन्द्रह-अक्षरी मंत्र (पञ्चदशी) की संकेत-भाषा में बात है। हर शब्द — शिव, शक्ति, काम — एक बीज-अक्षर का इशारा है, और तीन गुच्छों में, तीन “हृीं” के साथ, वह पूरा मंत्र बनता है।

विवरण में मत उलझिए — यह जान-बूझ कर ढका हुआ है, क्योंकि मंत्र गुरु से मिलता है। बस इतना देखिए: देवी का नाम अपने आप में एक रचना है, ब्रह्मांड के मूल तत्वों — चेतना, ऊर्जा, इच्छा, तत्व — से बुना हुआ। नाम और वह जो नाम है, अलग नहीं।

33

स्मरं योनिं लक्ष्मीं त्रितयमिदमादौ तव मनो-
र्निधायैके नित्ये निरवधिमहाभोगरसिकाः ।
भजन्ति त्वां चिन्तामणिगुननिबद्धाक्षवलयाः
शिवाग्नौ जुह्वन्तः सुरभिघृतधाराहुतिशतैः ॥ ३३॥

smaraṁ yoniṁ lakṣmīṁ tritayam idam ādau tava manoḥ · nidhāyaike nitye niravadhi-mahā-bhoga-rasikāḥ · bhajanti tvāṁ cintāmaṇi-guna-nibaddhākṣa-valayāḥ · śivāgnau juhvantaḥ surabhi-ghṛta-dhārāhuti-śataiḥ

शब्दार्थ: मनु · मंत्र · निरवधि · असीम · महा-भोग-रसिक · परम आनंद के रसिया · अक्ष-वलय · जप-माला · शिवाग्नि · शिव-अग्नि।

अर्थ: हे नित्या, कुछ साधक तेरे मंत्र के आरंभ में तीन बीज — स्मर, योनि, लक्ष्मी — रख कर तुझे भजते हैं। चिन्तामणि की मालाएँ लिए, शिव-अग्नि में सुगंधित घी की सैकड़ों आहुतियाँ देते हुए, वे असीम परम आनंद के रसिया बन जाते हैं।

भावार्थ: फिर मंत्र की बात, और फिर ढकी हुई। पर एक बात साफ़ है — इन साधकों को “महा-भोग-रसिक” कहा गया है, परम आनंद के रसिया।

यह श्री विद्या का एक ख़ास रंग है: यहाँ आनंद का त्याग नहीं, आनंद का सबसे शुद्ध रूप है। साधना नीरस तपस्या नहीं; वह असीम आनंद में डूबना है। किताब का नाम — आनन्द लहरी — यहाँ फिर सच होता दिखता है।

34

शरीरं त्वं शम्भोः शशिमिहिरवक्षोरुहयुगं
तवात्मानं मन्ये भगवति नवात्मानमनघम् ।
अतश्शेषश्शेषीत्ययमुभयसाधारणतया
स्थितः संबन्धो वां समरसपरानन्दपरयोः ॥ ३४॥

śarīraṁ tvaṁ śambhoḥ śaśi-mihira-vakṣoruha-yugaṁ · tavātmānaṁ manye bhagavati navātmānam anagham · ataḥ śeṣaḥ śeṣī ity ayam ubhaya-sādhāraṇatayā · sthitaḥ saṁbandho vāṁ samarasa-parānanda-parayoḥ

शब्दार्थ: शम्भोः शरीरं · शिव का शरीर · नवात्मा · नौ-रूप वाला (शिव का एक रूप) · अनघ · निष्पाप · शेष-शेषी · आधार और आधेय · समरस · एक रस वाले।

अर्थ: तू शिव का शरीर है, चाँद-सूरज जिसके दो वक्ष हैं। और मैं मानता हूँ, हे भगवती, तेरी आत्मा वह निष्पाप नवात्मा-शिव है। इसलिए “कौन आधार, कौन आधेय” — यह रिश्ता तुम दोनों में आपस में बराबरी का है, क्योंकि तुम दोनों एक रस हैं, परम आनंद में एक।

भावार्थ: यह श्लोक शिव और शक्ति के रिश्ते को सबसे साफ़ कह देता है। शिव का शरीर देवी हैं; देवी की आत्मा शिव हैं। तो आधार कौन और आधेय कौन?

जवाब: यह सवाल ही ग़लत है। दोनों एक-दूसरे का शरीर और आत्मा हैं, दोनों एक ही रस हैं। यह श्लोक 1 की पूरी मंज़िल है — शिव और शक्ति को अलग करने की कोशिश छोड़ दो; वे दो नहीं हैं, एक हैं, परम आनंद में।

35

मनस्त्वं व्योम त्वं मरुदसि मरुत्सारथिरसि
त्वमापस्त्वं भूमिस्त्वयि परिणतायां न हि परम् ।
त्वमेव स्वात्मानं परिणमयितुं विश्ववपुषा
चिदानन्दाकारं शिवयुवति भावेन बिभृषे ॥ ३५॥

manaḥ tvaṁ vyoma tvaṁ marud asi marut-sārathiḥ asi · tvam āpaḥ tvaṁ bhūmiḥ tvayi pariṇatāyāṁ na hi param · tvam eva svātmānaṁ pariṇamayituṁ viśva-vapuṣā · cid-ānandākāraṁ śiva-yuvati bhāvena bibhṛṣe

शब्दार्थ: व्योम · आकाश · मरुत् · वायु · मरुत्-सारथि · अग्नि · आपः · जल · परिणत · बदल कर बन जाना · विश्व-वपुस् · विश्व-रूप।

अर्थ: तू मन है, तू आकाश, तू वायु, तू अग्नि, तू जल, तू पृथ्वी — तेरे ही इन सब रूपों में बदल जाने के बाद कुछ और बचता ही नहीं। हे शिव-युवती, तू ही अपने आप को विश्व-रूप में बदल लेती है, और फिर भी भीतर अपना चिद्-आनंद-रूप बनाए रखती है।

भावार्थ: यह आनन्द लहरी का सबसे बड़ा दावा है। देवी कोई अलग, दूर बैठी हस्ती नहीं — वे ही मन हैं, वे ही पाँच तत्व हैं, वे ही सब कुछ हैं। “तेरे सब रूपों के बाद कुछ बचता ही नहीं।”

और एक कमाल की बात साथ में: देवी सब कुछ बन जाती हैं, फिर भी भीतर “चिद्-आनंद” — चेतना और आनंद — बनी रहती हैं। यानी यह सारा संसार किसी बेजान पदार्थ से नहीं बना; यह उसी एक आनंदमयी चेतना का बदला हुआ रूप है। आप जो भी छूते हैं, वह वही है।

36

तवाज्ञाचक्रस्थं तपनशशिकोटिद्युतिधरं
परं शम्भुं वन्दे परिमिलितपार्श्वं परचिता ।
यमाराध्यन् भक्त्या रविशशिशुचीनामविषये
निरालोकेऽलोके निवसति हि भालोकभुवने ॥ ३६॥

tavājñā-cakra-sthaṁ tapana-śaśi-koṭi-dyuti-dharaṁ · paraṁ śambhuṁ vande parimilita-pārśvaṁ para-citā · yam ārādhyan bhaktyā ravi-śaśi-śucīnām aviṣaye · nirāloke ‘loke nivasati hi bhāloka-bhuvane

शब्दार्थ: आज्ञा-चक्र · भौंहों के बीच का चक्र · तपन-शशि-कोटि · करोड़ों सूरज-चाँद · परचिता · परा-शक्ति · निरालोक · जहाँ बाहर की रोशनी नहीं पहुँचती।

अर्थ: तेरे आज्ञा-चक्र में स्थित, करोड़ों सूरज-चाँद की द्युति वाले, परा-शक्ति से जिनका पार्श्व मिला हुआ है — उन परम शम्भु को मैं प्रणाम करता हूँ। उन्हें भक्ति से भजने वाला उस लोक में बसता है जहाँ सूरज-चाँद-अग्नि की रोशनी नहीं पहुँचती, फिर भी जो अपनी ही ज्योति से जगमगाता है।

भावार्थ: यहाँ आज्ञा-चक्र की बात है — भौंहों के बीच वाला चक्र, श्लोक 9 की चढ़ाई का एक ऊँचा पड़ाव। वहाँ शिव और शक्ति साथ हैं, करोड़ों सूरज-चाँद की रोशनी लिए।

और जो वहाँ पहुँचता है, वह एक अजीब जगह में बसता है — “निरालोक”, जहाँ बाहर की कोई रोशनी नहीं, और फिर भी सब रोशन। यह भीतरी प्रकाश है — वह उजाला जो किसी सूरज का मोहताज नहीं। गहरे ध्यान में पहुँचा हुआ मन ठीक यही पाता है।

37

विशुद्धौ ते शुद्धस्फटिकविशदं व्योमजनकं
शिवं सेवे देवीमपि शिवसमानव्यवसिताम् ।
ययोः कान्त्या यान्त्याः शशिकिरणसारूप्यसरणे-
र्विधूतान्तर्ध्वान्ता विलसति चकोरीव जगती ॥ ३७॥

viśuddhau te śuddha-sphaṭika-viśadaṁ vyoma-janakaṁ · śivaṁ seve devīm api śiva-samāna-vyavasitām · yayoḥ kāntyā yāntyāḥ śaśi-kiraṇa-sārūpya-saraṇeḥ · vidhūtāntar-dhvāntā vilasati cakorīva jagatī

शब्दार्थ: विशुद्धि · गले का चक्र · व्योम-जनक · आकाश को जन्म देने वाला · शिव-समान-व्यवसिता · शिव के समान भाव वाली · विधूत-अन्तर्-ध्वान्त · जिसका भीतरी अँधेरा मिट गया · चकोरी · चकोर पक्षी (चाँदनी पीने वाला)।

अर्थ: तेरे विशुद्धि-चक्र में, शुद्ध स्फटिक जैसे निर्मल, आकाश को जन्म देने वाले शिव की मैं सेवा करता हूँ — और उन देवी की भी, जो भाव में शिव के बराबर हैं। इन दोनों की कांति से, जो चाँदनी जैसी बहती है, संसार का भीतरी अँधेरा धुल जाता है, और वह चकोरी की तरह खिल उठता है।

भावार्थ: चढ़ाई जारी है — अब विशुद्धि-चक्र, गले का चक्र। यहाँ शिव और शक्ति दोनों स्फटिक जैसे निर्मल हैं, और एक बात ख़ास है — देवी को “शिव के समान भाव वाली” कहा गया है। बराबर। कोई ऊँचा-नीचा नहीं।

और इन दोनों की मिली-जुली कांति चाँदनी की तरह बहती है, और संसार उसे चकोर पक्षी की तरह पीता है — चकोर, जो किंवदंती में सिर्फ़ चाँदनी पर जीता है। एक सुंदर तस्वीर: जब भीतर का यह चक्र खुलता है, तो पूरी दुनिया एक अलग, ठंडी रोशनी में नहाई दिखती है।

38

समुन्मीलत् संवित् कमलमकरन्दैकरसिकं
भजे हंसद्वन्द्वं किमपि महतां मानसचरम् ।
यदालापादष्टादशगुणितविद्यापरिणति-
र्यदादत्ते दोषाद् गुणमखिलमद्भ्यः पय इव ॥ ३८॥

samunmīlat saṁvit kamala-makarandaika-rasikaṁ · bhaje haṁsa-dvandvaṁ kim api mahatāṁ mānasa-caram · yad-ālāpāt aṣṭādaśa-guṇita-vidyā-pariṇatiḥ · yad ādatte doṣāt guṇam akhilam adbhyaḥ paya iva

शब्दार्थ: समुन्मीलत् संवित् · खिलती हुई चेतना · हंस-द्वन्द्व · हंस-युगल (शिव-शक्ति) · मानस-चर · मानस-सरोवर में / मन में विचरने वाला · अष्टादश-विद्या · अठारह विद्याएँ।

अर्थ: खिलती हुई चेतना रूपी कमल के मधु का अकेला रसिया, महापुरुषों के मानस में विचरने वाला — उस अनिर्वचनीय हंस-युगल को मैं भजता हूँ। उनकी बातचीत से ही अठारह विद्याओं की परिणति होती है, और वे दोष में से गुण ऐसे छाँट लेते हैं जैसे हंस पानी में से दूध।

भावार्थ: शिव और शक्ति यहाँ एक हंस-जोड़े के रूप में हैं, जो भक्तों के मन-सरोवर में तैरते हैं। और हंस की एक मशहूर ख़ूबी है — किंवदंती कहती है, वह पानी में मिले दूध को अलग कर लेता है।

तो यह जोड़ा क्या करता है? जिसके मन में यह बस जाता है, वह दोष में से गुण छाँटने लगता है — सही को ग़लत से अलग कर पाता है। यानी शिव-शक्ति का भीतरी मिलन एक व्यावहारिक वरदान देता है: विवेक, साफ़-साफ़ देख पाने की क्षमता।

39

तव स्वाधिष्ठाने हुतवहमधिष्ठाय निरतं
तमीडे संवर्तं जननि महतीं तां च समयाम् ।
यदालोके लोकान् दहति महति क्रोधकलिते
दयार्द्रा या दृष्टिः शिशिरमुपचारं रचयति ॥ ३९॥

tava svādhiṣṭhāne hutavaham adhiṣṭhāya nirataṁ · tam īḍe saṁvartaṁ janani mahatīṁ tāṁ ca samayām · yad-āloke lokān dahati mahati krodha-kalite · dayārdrā yā dṛṣṭiḥ śiśiram upacāraṁ racayati

शब्दार्थ: स्वाधिष्ठान · नाभि के नीचे का चक्र · हुतवह · अग्नि · संवर्त · प्रलय की अग्नि (रुद्र) · समया · उनके साथ की देवी · दया-आर्द्र · दया से भीगी।

अर्थ: तेरे स्वाधिष्ठान-चक्र में अग्नि पर सदा विराजमान उस प्रलय-अग्नि रूप रुद्र की मैं स्तुति करता हूँ, और उनके साथ की महान देवी “समया” की भी। जब रुद्र की वह क्रोध-भरी दृष्टि लोकों को जला रही होती है, तब देवी की दया से भीगी दृष्टि उस पर ठंडे उपचार की तरह काम करती है।

भावार्थ: यहाँ स्वाधिष्ठान-चक्र है, और उसमें अग्नि-रूप रुद्र, संहार की शक्ति। पर श्लोक की असली बात संतुलन है।

रुद्र की दृष्टि जलाती है, देवी की दृष्टि ठंडक देती है। दोनों साथ हैं। यह एक गहरी बात है — जहाँ भी कोई जलाने वाली, संहार करने वाली ऊर्जा है, वहीं साथ में एक दया से भीगी, शीतल करने वाली शक्ति भी है। आग और मरहम, एक ही जगह। प्रकृति कभी सिर्फ़ क्रूर नहीं होती; उसमें करुणा साथ-साथ बहती है।

40

तटित्त्वन्तं शक्त्या तिमिरपरिपन्थिस्फुरणया
स्फुरन्नानारत्नाभरणपरिणद्धेन्द्रधनुषम् ।
तव श्यामं मेघं कमपि मणिपूरैकशरणं
निषेवे वर्षन्तं हरमिहिरतप्तं त्रिभुवनम् ॥ ४०॥

taṭittvantaṁ śaktyā timira-paripanthi-sphuraṇayā · sphuran-nānā-ratnābharaṇa-pariṇaddhendra-dhanuṣam · tava śyāmaṁ meghaṁ kam api maṇipūraika-śaraṇaṁ · niṣeve varṣantaṁ hara-mihira-taptaṁ tri-bhuvanam

शब्दार्थ: तटित्त्वन्त · बिजली वाला · तिमिर-परिपन्थि · अँधेरे का दुश्मन · इन्द्रधनुष · इंद्रधनुष · मणिपूर · नाभि का चक्र · हर-मिहिर-तप्त · संहारक सूरज से तपा हुआ।

अर्थ: अँधेरे को मिटाने वाली शक्ति रूपी बिजली जिसमें चमकती है, जो भाँति-भाँति के रत्नों के आभूषण रूपी इंद्रधनुष से सजा है — तेरे उस श्यामल मेघ की मैं सेवा करता हूँ, जो मणिपूर-चक्र को अपना घर बनाए, संहारक सूरज से तपे तीनों लोकों पर बरसता है।

भावार्थ: आनन्द लहरी का आख़िरी श्लोक, और एक सुंदर तस्वीर पर ख़त्म होता है। मणिपूर-चक्र (नाभि के पास) में देवी एक बरसते हुए श्यामल बादल के रूप में हैं — बिजली उनकी शक्ति, इंद्रधनुष उनके गहने।

और यह बादल क्या करता है? “हर-मिहिर-तप्त” — संहार के सूरज से तपे हुए तीनों लोकों पर बरसता है। यानी जहाँ संसार जल रहा है, गरमी से तप रहा है, वहाँ देवी एक ठंडी, राहत भरी बारिश हैं। श्लोक 39 की बात — आग के साथ-साथ मरहम — एक आख़िरी, ठंडी छवि में बंद हो जाती है। और भाग 2 में देवी का रूप, सिर से पाँव तक, खुलने वाला है।

41

तवाधारे मूले सह समयया लास्यपरया
नवात्मानं मन्ये नवरसमहाताण्डवनटम् ।
उभाभ्यामेताभ्यामुदयविधिमुद्दिश्य दयया
सनाथाभ्यां जज्ञे जनकजननीमज्जगदिदम् ॥ ४१॥

tavādhāre mūle saha samayayā lāsya-parayā · navātmānaṁ manye nava-rasa-mahā-tāṇḍava-naṭam · ubhābhyām etābhyām udaya-vidhim uddiśya dayayā · sanāthābhyāṁ jajñe janaka-jananī-maj jagad idam

शब्दार्थ: आधार-मूल · मूलाधार-चक्र · समया · देवी · लास्य · कोमल नृत्य · ताण्डव · प्रचंड नृत्य · नट · नर्तक · जनक-जननीमत् · माता-पिता वाला।

अर्थ: तेरे मूलाधार-चक्र में, कोमल लास्य-नृत्य करती देवी “समया” के साथ, नौ रसों का प्रचंड ताण्डव करते नवात्मा-शिव को मैं देखता हूँ। दया से भरे, उदय के लिए तत्पर इन दोनों से ही — माता-पिता वाला यह सारा जगत जन्मा है।

भावार्थ: आनन्द लहरी का यह असली समापन है, और देखिए कितनी सुंदर तस्वीर पर। मूलाधार-चक्र में — रीढ़ के सबसे नीचे, सबसे ज़मीनी जगह — शिव और शक्ति नाच रहे हैं। शिव का ताण्डव, प्रचंड, नौ रसों भरा; देवी का लास्य, कोमल। दो नृत्य, साथ-साथ।

और उनके इस मिले-जुले नाच से ही “यह सारा जगत” जन्मा है। ध्यान दीजिए — श्लोक उन्हें “माता-पिता” कहता है, जगत की माँ और बाप। पूरी आनन्द लहरी जिस बात से शुरू हुई थी — शिव शक्ति के बिना हिल भी नहीं सकते — वह यहाँ अपने सबसे प्यारे रूप में आ ठहरती है: दो नाचते हुए, और उनके नाच से जन्मा यह पूरा संसार। अब भाग 2 में, उस माँ का रूप, मुकुट से चरणों तक, खुलने को है।

पढ़ कर आगे क्या

सीधा अगला पन्ना: भाग 2 · सौन्दर्य वर्णन — यहाँ देवी शुद्ध शक्ति थीं, चक्रों और बिजली की रेखाओं में। वहाँ वे एक चेहरा, एक रूप ले लेती हैं — मुकुट से चरणों तक, एक-एक अंग की सुंदरता। आनन्द लहरी नक्शा था; सौन्दर्य वर्णन उत्सव है।

और एक सवाल जेब में रखिए: श्लोक 27 कहता है, सही भाव हो तो हर काम पूजा बन जाता है — बातचीत जप, चलना परिक्रमा। आज एक छोटा सा काम चुनिए और उसे उसी भाव से कीजिए। फ़र्क महसूस होगा।

मूल पाठ: सौन्दर्य लहरी, परम्परा से आदि शंकराचार्य को मान्य। देवनागरी पाठ sanskritdocuments.org के मानक संस्करण से, verbatim।

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आख़िरी बार देखा गया: 2026-05-21