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सौन्दर्य लहरी · भाग 1 · आनन्द लहरी

सौन्दर्य लहरी · सौंदर्य की लहरें

भाग 1 · आनन्द लहरी · श्लोक 1-41

पहले ही श्लोक में एक साहसी वचन रख दिया गया है: शिव शक्ति के बिना स्पन्दित तक नहीं हो सकते। बाक़ी चालीस श्लोक उसी एक वचन की परतें खोलते चलते हैं, चक्रों में, बिजली की रेखाओं में, नृत्य में।

41 श्लोक · पढ़ने का समय लगभग 50 मिनट · पहले से कुछ आवश्यक नहीं · आगे-पीछे: सौन्दर्य लहरी मुख्य पृष्ठ

अगर एक पंक्ति याद रखनी हो, तो वह यह है।

भवानि त्वं दासे मयि वितर दृष्टिं सकरुणाम् ॥

भवानी, मुझ दास पर अपनी करुणा-भरी दृष्टि डालो।

सौन्दर्य लहरी, श्लोक 22 (आनन्द लहरी)

पहले एक बात

आनन्द लहरी का अर्थ है आनंद की लहरें। यह आरम्भिक भाग देवी को कोई रूप, कोई मुख देने से पहले उन्हें शुद्ध शक्ति के रूप में देखता है। वही ऊर्जा जो सृष्टि को गतिमान रखती है, जो रीढ़ के मूल में सुप्त पड़ी है, और जो प्रत्येक देवता के पीछे का असली बल है।

यह भाग कुछ गूढ़ है, कुंडलिनी, चक्र, श्री चक्र, मंत्र। पर हर गूढ़ संकेत के नीचे एक सीधा भाव बैठा है, और वही भाव यहाँ उभर कर आता है। यह एक भीतरी नक्शा है, कोई तंत्र-मंत्र की पोथी नहीं।

इसे कैसे पढ़ें

क्रम से, ठहर कर। प्रत्येक श्लोक एक छोटा रत्न है। मुख्य स्तम्भ: श्लोक 1 (शिव-शक्ति), 8-10 (श्री चक्र और कुंडलिनी), 21 और 35 (देवी ही सर्वस्व हैं)। हर श्लोक अपनी जगह एक पड़ाव है।

पूरी सौन्दर्य लहरी का मूल वचन पहली ही पंक्ति में रख दिया गया है, और यह एक साहसी वचन है। शिव, जो परम चेतना हैं, शक्ति से जुड़े हों तभी सृजन कर सकते हैं; अगर ऐसा न हो तो यह देव हिल तक नहीं सकते। जानना एक बल है, वह शिव है; पर जब तक भीतर एक प्रेरणा, एक ऊर्जा न उठे, अंग गतिमान नहीं होते, वह शक्ति है। तब हरि, हर और ब्रह्मा तक जिनकी आराधना करते हैं, उन देवी को प्रणाम या स्तुति करने की सामर्थ्य बिना पुण्य के किसी में आए भी कैसे? अगले श्लोक में वही वचन एक हल्की चपलता के साथ आगे बढ़ता है: देवी के चरण-कमल की एक नन्ही धूल को बटोर कर ब्रह्मा सारे लोक रच डालते हैं, उसी धूल को विष्णु अपने हज़ार सिरों पर बड़ी मुश्किल से सँभालते हैं, और शिव उसे पीस कर भस्म की तरह अपने शरीर पर मल लेते हैं। जिन्हें परम ऊँचा माना जाता है, वे तीनों भी उस मूल शक्ति के एक कण पर टिके हैं।

1-2

शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं
न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि ।
अतस्त्वामाराध्यां हरिहरविरिञ्चादिभिरपि
प्रणन्तुं स्तोतुं वा कथमकृतपुण्यः प्रभवति ॥ 1॥

तनीयांसं पांसुं तव चरणपङ्केरुहभवं
विरिञ्चिस्सञ्चिन्वन् विरचयति लोकानविकलम् ।
वहत्येनं शौरिः कथमपि सहस्रेण शिरसां
हरस्संक्षुद्यैनं भजति भसितोद्धूलनविधिम् ॥ 2॥

अब वही एक स्रोत हर अभाव का उत्तर बन जाता है। जो अज्ञान में हैं, उनके भीतर के अँधेरे के लिए देवी सूरज-जैसे द्वीप की नगरी हैं; जो जड़-बुद्धि हैं, उनके लिए चेतना के फूल से झरता मधु; दरिद्रों के लिए चिन्तामणि की माला; और जन्मों के समुद्र में डूबे हुओं के लिए वही दाँत जिस पर वराह-रूपी विष्णु ने धरती उठा ली थी। साधक जिस भी दशा में हो, देवी उसी दशा का उत्तर बन कर आती हैं। फिर एक कोमल भेद: बाक़ी सब देवता हाथों से अभय और वरद की मुद्राएँ दिखाते हैं, पर देवी को वह इशारा करने की ज़रूरत ही नहीं, क्योंकि उनके चरण ख़ुद डर से बचाने और माँगे से ज़्यादा देने में निपुण हैं। जो स्वयं अभय हो, उसे अभय का आश्वासन देती मुद्रा क्यों रचनी पड़े।

3-4

अविद्यानामन्तस्तिमिरमिहिरद्वीपनगरी
जडानां चैतन्यस्तबकमकरन्दस्रुतिझरी ।
दरिद्राणां चिन्तामणिगुणनिका जन्मजलधौ
निमग्नानां दंष्ट्रा मुररिपुवराहस्य भवति ॥ 3॥

त्वदन्यः पाणिभ्यामभयवरदो दैवतगणः
त्वमेका नैवासि प्रकटितवराभीत्यभिनया ।
भयात् त्रातुं दातुं फलमपि च वाञ्छासमधिकं
शरण्ये लोकानां तव हि चरणावेव निपुणौ ॥ 4॥

सौंदर्य और आकर्षण भी एक शक्ति हैं, और उनका भी एक मूल है। विष्णु ने देवी की आराधना की, फिर मोहिनी-रूप धर कर शिव तक को विचलित कर दिया; और कामदेव ने भी देवी को प्रणाम करके ऐसा रूप पाया कि बड़े-बड़े मुनियों के मन तक डोल जाते हैं। जो आकर्षण-शक्ति विष्णु में या कामदेव में दिखती है, वह उधार की है, इसी एक स्रोत से माँगी हुई। और वह कामदेव कितना दुर्बल है, धनुष फूलों का, प्रत्यंचा भौंरों की, बाण सिर्फ़ पाँच, सेनापति वसंत, रथ बस मलय-पवन; फिर भी वह अकेला, बिना शरीर वाला, देवी की एक कनखी की कृपा पा कर पूरे जगत को जीत लेता है। असली बल उस कृपा में है जो पीछे से आती है, साधन के आकार में नहीं।

5-6

हरिस्त्वामाराध्य प्रणतजनसौभाग्यजननीं
पुरा नारी भूत्वा पुररिपुमपि क्षोभमनयत् ।
स्मरोऽपि त्वां नत्वा रतिनयनलेह्येन वपुषा
मुनीनामप्यन्तः प्रभवति हि मोहाय महताम् ॥ 5॥

धनुः पौष्पं मौर्वी मधुकरमयी पञ्च विशिखाः
वसन्तः सामन्तो मलयमरुदायोधनरथः ।
तथाप्येकः सर्वं हिमगिरिसुते कामपि कृपाम्
अपाङ्गात्ते लब्ध्वा जगदिदमनङ्गो विजयते ॥ 6॥

अब पहली बार कवि देवी को एक रूप देता है, और वह रूप दो भावों को साथ रखता है। छनछनाती करधनी पहने, हाथी के बच्चे के मस्तक जैसे वक्ष के भार से थोड़ी झुकी, कमर से पतली, पूर्ण शरद-चंद्र जैसे मुख वाली, और हाथों में धनुष, बाण, पाश और अंकुश थामे। एक ओर कोमलता, दूसरी ओर चार आयुध, और हर हथियार का एक भीतरी अर्थ है: धनुष-बाण मन और इन्द्रियाँ, पाश वह डोर जो जोड़ती है, अंकुश वह जो रोकता है। देवी सुंदर हैं और साथ ही सँभालने वाली भी। फिर रूप से आगे, उनका दिव्य निवास। अमृत के समुद्र के बीच, कल्पवृक्षों के बाग़ से घिरे, रत्नों के द्वीप पर, चिन्तामणि के घर में, शिव-आकार के मंच पर, परम शिव की शय्या पर विराजमान, चेतना-आनंद की लहर रूपी देवी को कुछ धन्य लोग ही भजते हैं। यह कोई बाहरी भूगोल नहीं, एक भीतरी स्थान का नक्शा है, हर परत एक भाव: अमृत का समुद्र असीम, कल्पवृक्ष हर इच्छा का पूर्ण होना, रत्न-द्वीप अनमोलता, और बीच में चिद्-आनन्द-लहरी।

7-8

क्वणत्काञ्चीदामा करिकलभकुम्भस्तननता
परिक्षीणा मध्ये परिणतशरच्चन्द्रवदना ।
धनुर्बाणान् पाशं सृणिमपि दधाना करतलैः
पुरस्तादास्तां नः पुरमथितुराहोपुरुषिका ॥ 7॥

सुधासिन्धोर्मध्ये सुरविटपिवाटीपरिवृते
मणिद्वीपे नीपोपवनवति चिन्तामणिगृहे ।
शिवाकारे मञ्चे परमशिवपर्यङ्कनिलयां
भजन्ति त्वां धन्याः कतिचन चिदानन्दलहरीम् ॥ 8॥

अब कुंडलिनी का पूरा सफ़र, दो श्लोकों में एक ऊपर की साँस और एक नीचे की। देवी वह ऊर्जा हैं जो रीढ़ के मूल में सोई पड़ी हैं; जब जागती हैं तो मूलाधार में पृथ्वी, मणिपूर में जल, स्वाधिष्ठान में अग्नि, हृदय में वायु, उससे ऊपर आकाश, और भ्रू-मध्य में मन, इन सब चक्रों का मार्ग भेदती हुई सहस्रार-कमल में अपने पति के साथ एकांत में विहार करती हैं। यह सबसे स्थूल स्तर से उठ कर सबसे सूक्ष्म तक पहुँचना है, योग का चरम, भक्ति की भाषा में कहा हुआ। फिर वे लौटती हैं: सहस्रार के मिलन से अमृत की धारा अपने चरण-युगल से बहाती हुई, उससे पूरे संसार को सींचती हुई, और फिर साढ़े तीन कुंडली वाले साँप का रूप ले कर, अपने को समेट कर, मूलाधार के गहरे गड्ढे में सो जाती हैं। ऊपर का रस ही नीचे के समस्त जीवन को सींचता रहता है।

9-10

महीं मूलाधारे कमपि मणिपूरे हुतवहं
स्थितं स्वाधिष्ठाने हृदि मरुतमाकाशमुपरि ।
मनोऽपि भ्रूमध्ये सकलमपि भित्वा कुलपथं
सहस्रारे पद्मे सह रहसि पत्या विहरसे ॥ 9॥

सुधाधारासारैश्चरणयुगलान्तर्विगलितैः
प्रपञ्चं सिञ्चन्ती पुनरपि रसाम्नायमहसः ।
अवाप्य स्वां भूमिं भुजगनिभमध्युष्टवलयं
स्वमात्मानं कृत्वा स्वपिषि कुलकुण्डे कुहरिणि ॥ 10॥

अब श्री चक्र, श्री विद्या का सबसे पवित्र यंत्र, और देवी के सौंदर्य की अतुलनीयता। शिव के चार त्रिकोण और शक्ति के पाँच त्रिकोण, कुल नौ मूल त्रिकोण, आठ और सोलह पंखुड़ियों के कमलों, तीन वलयों और तीन रेखाओं के साथ मिल कर चवालीस कोणों में खुलते हैं। संख्याओं के नीचे का भाव यह है: ऊपर की ओर वाले त्रिकोण शिव हैं, चेतना; नीचे की ओर वाले शक्ति, ऊर्जा; और वे इस तरह गुँथे हैं कि अलग किए ही नहीं जा सकते, श्लोक 1 के वचन की मूर्ति। फिर वह सौंदर्य, जिसकी तुलना करने में ब्रह्मा जैसे कवि-शिरोमणि भी किसी तरह जुटे रहते हैं, और जिसे देखने की उत्सुकता में देवांगनाएँ मन ही मन शिव से एकात्म होने का वह पद चाह बैठती हैं, जो कठिन तप से भी मुश्किल से मिलता है। देखने की चाह ही, अनजाने में, मुक्ति की ओर एक पग बन जाती है।

11-12

चतुर्भिः श्रीकण्ठैः शिवयुवतिभिः पञ्चभिरपि
प्रभिन्नाभिः शम्भोर्नवभिरपि मूलप्रकृतिभिः ।
चतुश्चत्वारिंशद्वसुदलकलाश्रत्रिवलय-
त्रिरेखाभिः सार्धं तव शरणकोणाः परिणताः ॥ 11॥

त्वदीयं सौन्दर्यं तुहिनगिरिकन्ये तुलयितुं
कवीन्द्राः कल्पन्ते कथमपि विरिञ्चिप्रभृतयः ।
यदालोकौत्सुक्यादमरललना यान्ति मनसा
तपोभिर्दुष्प्रापामपि गिरिशसायुज्यपदवीम् ॥ 12॥

अब वही कृपा-दृष्टि, वह कनखी, जो हर आकर्षण की जड़ है, एक विनोद-भरी अतिशयोक्ति में। एक बूढ़ा आदमी, देखने में बेरस, हँसी-ठिठोली में बिल्कुल कोरा, अगर उस पर भी देवी की एक कनखी पड़ जाए, तो सैकड़ों युवतियाँ अपनी वेणी खुलती, वस्त्र ढलकते, करधनी टूटती हालत में उसके पीछे दौड़ पड़ती हैं। आकर्षण किसी का अपना गुण नहीं, वह कनखी ही असली जादू है। और देवी के चरण इन सबसे ऊपर हैं। हर चक्र की अपनी किरणें हैं, मूलाधार में छप्पन, मणिपूर में बावन, स्वाधिष्ठान में बासठ, अनाहत में चौवन, विशुद्धि में बहत्तर, आज्ञा में चौंसठ; पर इन सब किरणों के भी ऊपर देवी के दोनों चरण-कमल हैं। जितनी भी भीतरी ऊर्जा है, वह सब एक ही चीज़ की ओर इशारा करती है, और वह चीज़ इन सबसे ऊपर है। चक्र सीढ़ियाँ हैं; देवी के चरण वह जगह जहाँ सीढ़ी पहुँचती है।

13-14

नरं वर्षीयांसं नयनविरसं नर्मसु जडं
तवापाङ्गालोके पतितमनुधावन्ति शतशः ।
गलद्वेणीबन्धाः कुचकलशविस्रस्तसिचया
हठात् त्रुट्यत्काञ्च्यो विगलितदुकूला युवतयः ॥ 13॥

क्षितौ षट्पञ्चाशद् द्विसमधिकपञ्चाशदुदके
हुताशे द्वाषष्टिश्चतुरधिकपञ्चाशदनिले ।
दिवि द्विष्षट्त्रिंशन्मनसि च चतुष्षष्टिरिति ये
मयूखास्तेषामप्युपरि तव पादाम्बुजयुगम् ॥ 14॥

अब तीन श्लोकों से एक ही धारा बहती है, देवी और वाणी का गहरा संबंध, और यह कवि का अपना अनुभव बोलता है। शरद की चाँदनी जैसी उज्ज्वल, चंद्र-युक्त जटा-जूट के मुकुट वाली, हाथों में वर-मुद्रा, अभय-मुद्रा, स्फटिक की माला और पुस्तक धारण किए, यह विद्या और वाणी का शारदा-रूप है; जो इसे एक बार भी सच्चे मन से नमन न करे, उसके पास शहद, दूध और अंगूर की मिठास वाली वाणी आए भी कैसे? फिर देवी का वर्ण अरुण है, प्रभात की पहली धूप वाला लाल; जो संत उन्हें इस रूप में भजते हैं, उनके कवि-हृदय का कमल-वन खिल उठता है, और वे सरस्वती की गहरी, शृंगार-भरी लहर जैसी वाणी से सज्जनों के मन रिझाते हैं। और जो चंद्रकांत मणि जैसी आभा वाली, वाणी को जन्म देने वाली वशिनी आदि आठ देवियों के साथ देवी का ध्यान करता है, वह महान काव्यों का रचयिता बन जाता है। जो देवी को भीतर बसा लेता है, उसकी जिह्वा पर स्वयं ही सुंदरता आ बैठती है।

15-17

शरज्ज्योत्स्नाशुद्धां शशियुतजटाजूटमकुटां
वरत्रासत्राणस्फटिकघटिकापुस्तककराम् ।
सकृन्न त्वा नत्वा कथमिव सतां संन्निदधते
मधुक्षीरद्राक्षामधुरिमधुरीणाः भणितयः ॥ 15॥

कवीन्द्राणां चेतःकमलवनबालातपरुचिं
भजन्ते ये सन्तः कतिचिदरुणामेव भवतीम् ।
विरिञ्चिप्रेयस्यास्तरुणतरश‍ृङ्गारलहरी-
गभीराभिर्वाग्भिर्विदधति सतां रञ्जनममी ॥ 16॥

सवित्रीभिर्वाचां शशिमणिशिलाभङ्गरुचिभिः
वशिन्याद्याभिस्त्वां सह जननि संचिन्तयति यः ।
स कर्ता काव्यानां भवति महतां भङ्गिरुचिभिः
वचोभिर्वाग्देवीवदनकमलामोदमधुरैः ॥ 17॥

देवी के अरुण-रूप के ध्यान के अलग-अलग फल अब और खुलते हैं, और तीनों के नीचे एक ही भाव है: किसी एक भीतरी छवि पर टिका ध्यान साधक को भीतर से बदल देता है। जो देवी के शरीर की उस आभा का ध्यान करता है, जो नए उगते सूरज की लालिमा से पूरे आकाश और धरती को रँग देती है, उसके वश में उर्वशी तक देवांगनाएँ हो जाती हैं। जो उनके मुख को बिंदु मान कर, उसके नीचे कुच-युगल, और उसके नीचे शिव का आधा भाग, इस मन्मथ-कला का ध्यान करता है, वह तीनों लोकों तक को घुमा देता है; और इसका संकेत किसी शक्ति-प्रदर्शन में नहीं, एक सही, एकाग्र भीतरी छवि का प्रभाव असीम होता है। और जो देवी को चंद्रकांत मणि की मूर्ति की तरह हृदय में बसा ले, वह जो अपने अंगों से अमृत-रस की किरणें बिखेरती हैं, वह गरुड़ की तरह साँपों का घमंड शांत कर देता है, और बुख़ार से तपे हुओं को अपनी अमृत-भरी नज़र से ठंडक दे देता है। ध्यान का प्रभाव केवल ध्यान करने वाले तक सीमित नहीं रहता; जिसके भीतर यह शीतल छवि बस गई, उसकी उपस्थिति ही दूसरों का ज्वर शांत करने लगती है।

18-20

तनुच्छायाभिस्ते तरुणतरणिश्रीसरणिभिः
दिवं सर्वामुर्वीमरुणिमनि मग्नां स्मरति यः ।
भवन्त्यस्य त्रस्यद्वनहरिणशालीननयनाः
सहोर्वश्या वश्याः कति कति न गीर्वाणगणिकाः ॥ 18॥

मुखं बिन्दुं कृत्वा कुचयुगमधस्तस्य तदधो
हरार्धं ध्यायेद्यो हरमहिषि ते मन्मथकलाम् ।
स सद्यः संक्षोभं नयति वनिता इत्यतिलघु
त्रिलोकीमप्याशु भ्रमयति रवीन्दुस्तनयुगाम् ॥ 19॥

किरन्तीमङ्गेभ्यः किरणनिकुरम्बामृतरसं
हृदि त्वामाधत्ते हिमकरशिलामूर्तिमिव यः ।
स सर्पाणां दर्पं शमयति शकुन्ताधिप इव
ज्वरप्लुष्टान् दृष्ट्या सुखयति सुधाधारसिरया ॥ 20॥

अब आनन्द लहरी का असली शिखर, और उसके ठीक बाद इसका सबसे कोमल श्लोक। बिजली की रेखा जैसी पतली, सूरज-चाँद-अग्नि से बनी, छहों चक्र-कमलों के ऊपर सहस्रार में विराजमान देवी की उस सूक्ष्म कला को, वही महापुरुष देख पाते हैं जिनका मन मैल और माया से धुल चुका है, और वे परम आनंद की लहर में डूब जाते हैं; ग्रंथ का नाम यहीं से उठता है। और फिर वह आतुर कृपा: “हे भवानी, मुझ दास पर करुणा-भरी दृष्टि डाल”, ऐसी स्तुति करना चाहते हुए जो भक्त सिर्फ़ “भवानि त्वम्” इतना ही कह पाता है, उसी पल देवी उसे अपने सायुज्य का वह पद दे देती हैं, जिसके चरण विष्णु, ब्रह्मा और इंद्र के मुकुटों से आरती किए जाते हैं। मर्म एक शब्द-खेल में बैठा है: भव और आनि का अर्थ यह भी है, मैं हो जाऊँ। भक्त कहना चाहता है आप, और देवी सुन लेती हैं मैं आप ही हो जाऊँ, और उसी क्षण एकात्म कर देती हैं, याचक अभी वाक्य भी पूरा नहीं कर पाया, और दान हो गया।

21-22

तटिल्लेखातन्वीं तपनशशिवैश्वानरमयीं
निषण्णां षण्णामप्युपरि कमलानां तव कलाम् ।
महापद्माटव्यां मृदितमलमायेन मनसा
महान्तः पश्यन्तो दधति परमाह्लादलहरीम् ॥ 21॥

भवानि त्वं दासे मयि वितर दृष्टिं सकरुणा-
मिति स्तोतुं वाञ्छन् कथयति भवानि त्वमिति यः ।
तदैव त्वं तस्मै दिशसि निजसायुज्यपदवीं
मुकुन्दब्रह्मेन्द्रस्फुटमकुटनीराजितपदाम् ॥ 22॥

अब वही गहरा वचन कि शिव और शक्ति अलग किए ही नहीं जा सकते, पहले एक चपलता में, फिर पूरी सृष्टि के पैमाने पर। अर्धनारीश्वर में देवी शिव का बायाँ आधा अंग ले चुकी थीं, पर शायद मन न भरा, इसलिए जान पड़ता है उन्होंने दूसरा आधा भी ले लिया; तभी तो उनका यह पूरा रूप अरुण आभा वाला, तीन आँखों वाला, कुचों से थोड़ा झुका, और टेढ़े चाँद के मुकुट वाला है, ये सब तो शिव की निशानियाँ हैं। एक में दूसरा पूरा का पूरा समाया है। और फिर वही डोर पूरी सृष्टि की: ब्रह्मा जगत रचते हैं, विष्णु पालते हैं, रुद्र संहार करते हैं, ईश्वर सबको समेट कर अपना शरीर तक ओझल कर देते हैं, और सदाशिव सबका अनुग्रह करते हैं; पर ये पाँचों काम वे तभी कर पाते हैं जब देवी की भौंह पल भर को हिलती है, यानी उनकी आज्ञा मिलती है। सबसे ऊँचे देवता भी देवी की एक भौंह के संकेत पर निर्भर हैं।

23-24

त्वया हृत्वा वामं वपुरपरितृप्तेन मनसा
शरीरार्धं शम्भोरपरमपि शङ्के हृतमभूत् ।
यदेतत्त्वद्रूपं सकलमरुणाभं त्रिनयनं
कुचाभ्यामानम्रं कुटिलशशिचूडालमकुटम् ॥ 23॥

जगत्सूते धाता हरिरवति रुद्रः क्षपयते
तिरस्कुर्वन्नेतत्स्वमपि वपुरीशस्तिरयति ।
सदापूर्वः सर्वं तदिदमनुगृह्णाति च शिव-
स्तवाज्ञामालम्ब्य क्षणचलितयोर्भ्रूलतिकयोः ॥ 24॥

अब अनन्य भक्ति का मर्म, फिर महाप्रलय में अकेले बचे शिव की तस्वीर। तीनों गुणों से उपजे तीनों देवताओं की पूजा अपने आप हो जाती है, अगर सिर्फ़ देवी के दोनों चरणों की पूजा कर दी जाए, क्योंकि वे तीनों तो चरणों की रत्न-चौकी के पास ही, हाथ जोड़े, मुकुट झुकाए, हमेशा खड़े रहते हैं; मूल को सींच दो, सारा वृक्ष सिंच गया, बिखराव की आवश्यकता नहीं। और महाप्रलय के समय ब्रह्मा मृत्यु पाते हैं, विष्णु विश्राम में चले जाते हैं, यमराज का नाश हो जाता है, कुबेर मिट जाते हैं, इंद्र का सारा समूह आँखें मूँद लेता है, और इस सबके बीच देवी के पति शिव अकेले विहार करते रहते हैं। शिव बचे रहते हैं क्योंकि वे शुद्ध चेतना हैं; पर श्लोक देवी को सती कह कर पुकारता है और शिव को आपके पति, असली केंद्र वही है जिसके कारण शिव हैं, शक्ति।

25-26

त्रयाणां देवानां त्रिगुणजनितानां तव शिवे
भवेत् पूजा पूजा तव चरणयोर्या विरचिता ।
तथा हि त्वत्पादोद्वहनमणिपीठस्य निकटे
स्थिता ह्येते शश्वन्मुकुलितकरोत्तंसमकुटाः ॥ 25॥

विरिञ्चिः पञ्चत्वं व्रजति हरिराप्नोति विरतिं
विनाशं कीनाशो भजति धनदो याति निधनम् ।
वितन्द्री माहेन्द्री विततिरपि संमीलितदृशा
महासंहारेऽस्मिन् विहरति सति त्वत्पतिरसौ ॥ 26॥

अब पूजा की पूरी परिभाषा बदलती है, और फिर तीनों बड़े देवता एक घरेलू दृश्य में उतर आते हैं। मेरी हर बातचीत आपका जप बन जाए, हाथ का हर काम आपकी मुद्रा, मेरा चलना आपकी परिक्रमा, खाना-पीना आपकी आहुति, लेटना आपका प्रणाम; स्वयं को सौंप देने के भाव से मेरा हर सुख आपकी पूजा का ही रूप बन जाए। शर्त केवल एक है, आत्म-अर्पण का भाव; वह हो तो जीवन का हर क्षण अपने आप पूजा बन जाता है, मंदिर और शेष जीवन के बीच की दीवार गिर जाती है। और वही तीनों देवता: जब शिव अचानक देवी के भवन आ पहुँचते हैं और देवी आदर में उठ खड़ी होती हैं, तब उनकी सखियाँ चेताती हैं, “ब्रह्मा का मुकुट सामने से हटा, विष्णु के कठोर मुकुट में पैर अटक जाएगा, इंद्र का मुकुट परे कर”, क्योंकि ये तीनों तो पहले से देवी के चरणों में झुके पड़े हैं, बस भूमि पर बिछे मुकुट हैं जिनसे बच कर निकलना है।

27-29

जपो जल्पः शिल्पं सकलमपि मुद्राविरचना
गतिः प्रादक्षिण्यक्रमणमशनाद्याहुतिविधिः ।
प्रणामस्संवेशस्सुखमखिलमात्मार्पणदृशा
सपर्यापर्यायस्तव भवतु यन्मे विलसितम् ॥ 27॥

सुधामप्यास्वाद्य प्रतिभयजरामृत्युहरिणीं
विपद्यन्ते विश्वे विधिशतमखाद्या दिविषदः ।
करालं यत्क्ष्वेलं कबलितवतः कालकलना
न शम्भोस्तन्मूलं तव जननि ताटङ्कमहिमा ॥ 28॥

किरीटं वैरिञ्चं परिहर पुरः कैटभभिदः
कठोरे कोटीरे स्खलसि जहि जम्भारिमुकुटम् ।
प्रणम्रेष्वेतेषु प्रसभमुपयातस्य भवनं
भवस्याभ्युत्थाने तव परिजनोक्तिर्विजयते ॥ 29॥

एक उलटबाँसी पहले श्लोक 28 में बीत गई है: देवताओं ने अमृत पिया, फिर भी प्रलय में मिट गए; शिव ने हलाहल विष पिया, फिर भी अमर रहे, क्योंकि देवी सुहागिन हैं और उनके कानों का आभूषण उसी सुहाग का चिह्न है, शिव का होना किसी अमृत या विष में नहीं, देवी से उनके संबंध में बैठा है। अब ध्यान का सबसे ऊँचा रूप, और श्री विद्या की अपनी परम्परा। जो अपने ही शरीर से उठती अणिमा आदि सिद्धि-किरणों से घिरी देवी का सदा “आप ही मैं हूँ” इस भाव से ध्यान करता है, उसके लिए शिव की समृद्धि भी तिनके बराबर है, और महाप्रलय की अग्नि तक उसे जलाने के बजाय उसकी आरती उतारती है; जब मैं और देवी अभिन्न हो गए, तो भय का कोई आधार ही नहीं बचता। और शिव ने पहले चौंसठ तंत्रों से सारे संसार को उलझाए रखा, हर तंत्र किसी एक सिद्धि भर का; फिर देवी के आग्रह पर उन्होंने इस धरती पर वह एक तंत्र उतारा, आपका अपना तंत्र, जो अकेला ही जीवन के चारों लक्ष्य पूरे कर देता है, बिखरे मार्गों के बीच एक पूर्ण मार्ग, देवी का प्रसाद।

30-31

स्वदेहोद्भूताभिर्घृणिभिरणिमाद्याभिरभितो
निषेव्ये नित्ये त्वामहमिति सदा भावयति यः ।
किमाश्चर्यं तस्य त्रिनयनसमृद्धिं तृणयतो
महासंवर्ताग्निर्विरचयति नीराजनविधिम् ॥ 30॥

चतुष्षष्ट्या तन्त्रैः सकलमतिसंधाय भुवनं
स्थितस्तत्तत्सिद्धिप्रसवपरतन्त्रैः पशुपतिः ।
पुनस्त्वन्निर्बन्धादखिलपुरुषार्थैकघटना-
स्वतन्त्रं ते तन्त्रं क्षितितलमवातीतरदिदम् ॥ 31॥

अब देवी का नाम और रूप कोई दो चीज़ें नहीं रह जातीं। शिव, शक्ति, काम, क्षिति; फिर रवि, चंद्र, स्मर, हंस, शक्र; और फिर पर, मार, हरि, इन सबके सूचक बीज-अक्षर, तीन “हृीं” के साथ अंत में जुड़ कर, देवी के नाम-मंत्र के अंग बनते हैं। यह पन्द्रह-अक्षरी मंत्र की संकेत-भाषा है, विवरण जान-बूझ कर ढका हुआ, क्योंकि मंत्र गुरु से मिलता है; इतना स्पष्ट है कि देवी का नाम अपने आप में एक रचना है, ब्रह्मांड के मूल तत्वों से बुना हुआ, नाम और वह जो नाम है, अलग नहीं। और कुछ साधक देवी के मंत्र के आरंभ में तीन बीज, स्मर, योनि, लक्ष्मी रख कर, चिन्तामणि की मालाएँ लिए, शिव-अग्नि में सुगंधित घी की सैकड़ों आहुतियाँ देते हुए, असीम परम आनंद के रसिया बन जाते हैं। यह श्री विद्या का एक विशेष रंग है, यहाँ आनंद का सबसे शुद्ध रूप मिलता है, कोई शुष्क तपस्या नहीं, और आनन्द लहरी नाम यहाँ फिर सच होता दिखता है।

32-33

शिवः शक्तिः कामः क्षितिरथ रविः शीतकिरणः
स्मरो हंसः शक्रस्तदनु च परामारहरयः ।
अमी हृल्लेखाभिस्तिसृभिरवसानेषु घटिता
भजन्ते वर्णास्ते तव जननि नामावयवताम् ॥ 32॥

स्मरं योनिं लक्ष्मीं त्रितयमिदमादौ तव मनो-
र्निधायैके नित्ये निरवधिमहाभोगरसिकाः ।
भजन्ति त्वां चिन्तामणिगुननिबद्धाक्षवलयाः
शिवाग्नौ जुह्वन्तः सुरभिघृतधाराहुतिशतैः ॥ 33॥

अब आनन्द लहरी के दो सबसे बड़े वचन, जो शिव और शक्ति के रिश्ते को सबसे साफ़ कह देते हैं। देवी शिव का शरीर हैं, चाँद-सूरज जिसके दो वक्ष हैं; और शिव देवी की आत्मा, वह निष्पाप नवात्मा-शिव। तो कौन आधार और कौन आधेय, यह प्रश्न ही व्यर्थ है, दोनों एक-दूसरे का शरीर और आत्मा हैं, दोनों एक ही रस हैं, परम आनंद में एक; शिव और शक्ति को अलग करने का प्रयास ही छूट जाता है। और फिर सबसे बड़ा वचन: देवी ही मन हैं, वे ही आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी; उनके इन सब रूपों में बदल जाने के बाद कुछ और बचता ही नहीं। वे ही अपने आप को विश्व-रूप में बदल लेती हैं, और फिर भी भीतर अपना चिद्-आनंद-रूप बनाए रखती हैं। यह सारा संसार किसी जड़ पदार्थ से नहीं बना; यह उसी एक आनंदमयी चेतना का परिणत रूप है, जो भी दृष्टि में आता है, वह वही है।

34-35

शरीरं त्वं शम्भोः शशिमिहिरवक्षोरुहयुगं
तवात्मानं मन्ये भगवति नवात्मानमनघम् ।
अतश्शेषश्शेषीत्ययमुभयसाधारणतया
स्थितः संबन्धो वां समरसपरानन्दपरयोः ॥ 34॥

मनस्त्वं व्योम त्वं मरुदसि मरुत्सारथिरसि
त्वमापस्त्वं भूमिस्त्वयि परिणतायां न हि परम् ।
त्वमेव स्वात्मानं परिणमयितुं विश्ववपुषा
चिदानन्दाकारं शिवयुवति भावेन बिभृषे ॥ 35॥

अब चढ़ाई फिर ऊपर के चक्रों की ओर मुड़ती है, हर एक में शिव और शक्ति साथ, और हर एक में एक भीतरी प्रकाश। आज्ञा-चक्र में, भौंहों के बीच, करोड़ों सूरज-चाँद की द्युति वाले, परा-शक्ति से जिनका पार्श्व मिला हुआ है, उन परम शम्भु को कवि प्रणाम करता है; जो उन्हें भक्ति से भजता है, वह उस लोक में बसता है जहाँ सूरज-चाँद-अग्नि की रोशनी नहीं पहुँचती, फिर भी जो अपनी ही ज्योति से जगमगाता है, यह भीतरी प्रकाश है, किसी सूर्य पर निर्भर नहीं। फिर विशुद्धि-चक्र, कंठ का चक्र, जहाँ शिव और शक्ति दोनों स्फटिक जैसे निर्मल हैं, और देवी को शिव के समान भाव वाली कहा गया है, कोई ऊँच-नीच नहीं; इन दोनों की मिली-जुली कांति चाँदनी की तरह बहती है, और संसार उसे चकोर पक्षी की तरह पीता है, उसका भीतरी अँधेरा धुल जाता है। और एक हंस-युगल, खिलती चेतना रूपी कमल के मधु का रसिया, महापुरुषों के मन-सरोवर में तैरता; जिसके मन में यह बस जाता है, वह दोष में से गुण ऐसे छाँट लेता है जैसे हंस पानी में से दूध, शिव-शक्ति का भीतरी मिलन विवेक का वरदान देता है।

36-38

तवाज्ञाचक्रस्थं तपनशशिकोटिद्युतिधरं
परं शम्भुं वन्दे परिमिलितपार्श्वं परचिता ।
यमाराध्यन् भक्त्या रविशशिशुचीनामविषये
निरालोकेऽलोके निवसति हि भालोकभुवने ॥ 36॥

विशुद्धौ ते शुद्धस्फटिकविशदं व्योमजनकं
शिवं सेवे देवीमपि शिवसमानव्यवसिताम् ।
ययोः कान्त्या यान्त्याः शशिकिरणसारूप्यसरणे-
र्विधूतान्तर्ध्वान्ता विलसति चकोरीव जगती ॥ 37॥

समुन्मीलत् संवित् कमलमकरन्दैकरसिकं
भजे हंसद्वन्द्वं किमपि महतां मानसचरम् ।
यदालापादष्टादशगुणितविद्यापरिणति-
र्यदादत्ते दोषाद् गुणमखिलमद्भ्यः पय इव ॥ 38॥

अब चढ़ाई नीचे के दो चक्रों पर लौटती है, और आनन्द लहरी अपनी सबसे शीतल छवि पर बँध जाती है, अग्नि के साथ-साथ मरहम। स्वाधिष्ठान-चक्र में अग्नि पर सदा विराजमान प्रलय-अग्नि रूप रुद्र, और उनके साथ की महान देवी समया; जब रुद्र की क्रोध-भरी दृष्टि लोकों को जला रही होती है, तब देवी की दया से भीगी दृष्टि उस पर ठंडे उपचार की तरह काम करती है, जहाँ भी जलाने वाली ऊर्जा है वहीं साथ में एक शीतल करने वाली शक्ति भी है। फिर मणिपूर-चक्र में देवी एक बरसते श्यामल बादल के रूप में, बिजली उनकी शक्ति, इंद्रधनुष उनके गहने; और यह बादल संहार के सूर्य से तपे तीनों लोकों पर बरसता है, जहाँ संसार झुलस रहा है वहाँ एक सुकून-भरी वर्षा। अंत में मूलाधार-चक्र, रीढ़ के सबसे नीचे, जहाँ कोमल लास्य-नृत्य करती देवी समया के साथ नौ रसों का प्रचंड ताण्डव करते नवात्मा-शिव हैं; दो नृत्य साथ-साथ, और उनके इस मिले-जुले नृत्य से ही माता-पिता वाला यह सारा जगत जन्मा है। जिस वचन से आनन्द लहरी आरम्भ हुई थी, वह यहाँ अपने सबसे कोमल रूप में आ ठहरता है, दो नर्तक, और उनके नृत्य से जन्मा यह पूरा संसार। अब भाग 2 में उस माँ का रूप, मुकुट से चरण तक, खुलने को है।

39-41

तव स्वाधिष्ठाने हुतवहमधिष्ठाय निरतं
तमीडे संवर्तं जननि महतीं तां च समयाम् ।
यदालोके लोकान् दहति महति क्रोधकलिते
दयार्द्रा या दृष्टिः शिशिरमुपचारं रचयति ॥ 39॥

तटित्त्वन्तं शक्त्या तिमिरपरिपन्थिस्फुरणया
स्फुरन्नानारत्नाभरणपरिणद्धेन्द्रधनुषम् ।
तव श्यामं मेघं कमपि मणिपूरैकशरणं
निषेवे वर्षन्तं हरमिहिरतप्तं त्रिभुवनम् ॥ 40॥

तवाधारे मूले सह समयया लास्यपरया
नवात्मानं मन्ये नवरसमहाताण्डवनटम् ।
उभाभ्यामेताभ्यामुदयविधिमुद्दिश्य दयया
सनाथाभ्यां जज्ञे जनकजननीमज्जगदिदम् ॥ 41॥

आगे का पन्ना

सीधा अगला भाग: भाग 2 · सौन्दर्य वर्णन। इस भाग में देवी शुद्ध शक्ति थीं, चक्रों और बिजली की रेखाओं में। वहाँ वे एक मुख, एक रूप ले लेती हैं, मुकुट से चरण तक, एक-एक अंग की सुंदरता। आनन्द लहरी एक भीतरी नक्शा है; सौन्दर्य वर्णन उसी देवी के साकार रूप का दर्शन।

श्लोक 27 का भाव साथ रहे: सही भाव हो तो हर कर्म पूजा बन जाता है, बातचीत जप, चलना परिक्रमा। दिन के किसी एक छोटे कर्म को उसी आत्म-अर्पण के भाव से करने पर वही अंतर अपने आप अनुभव में आता है।

मूल पाठ: सौन्दर्य लहरी, परम्परा से आदि शंकराचार्य को मान्य, सौ श्लोक (1-41 आनन्द लहरी, 42-100 सौन्दर्य लहरी)। देवनागरी पाठ sanskritdocuments.org के मानक संस्करण से, अक्षरशः।

स्थायी पता: /saundarya-lahari/ananda-lahari/

आख़िरी बार देखा गया: 2026-05-21