सलोक भगत कबीर जी, अंग 1375

SGGS, Ang
1375
सलोक भगत कबीर जी
राग: सलोक खण्ड · रचयिता: भगत कबीर जी
पढ़ने का समय: लगभग 5 मिनट
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सलोक 141 ॥ कबीर बेड़ा जरजरा फूटे छेक हजार ॥ हरूए हरूए तरि गए डूबे जिन सिर भार ॥141॥

कबीर एक powerful metaphor। “बेड़ा जरजरा।” “बेड़ा” (नाव) “जर्जर” (जीर्ण-शीर्ण, टूटा-फूटा)। “फूटे छेक हजार।” हज़ार “छेक” (छेद) फूटे हैं।

यानी नाव पुरानी, टूटी, हज़ार छेद वाली। यह नाव हम सब का “शरीर” है, जो उम्र के साथ टूटता जाता है।

“हरूए हरूए तरि गए।” “हलके-हलके” तर गए (पार लग गए)। “डूबे जिन सिर भार।” डूब गए जिन के “सिर” पर “भार” था।

कबीर का insight: यही टूटी नाव, हलके लोग (light, बिना bojh) तर जाते हैं। और बोझ वाले डूब जाते हैं।

“भार” क्या? कर्म, अहंकार, attachments, desires। यह सब “सिर पर भार” है।

दिल्ली में हम सब बहुत “भार” carry करते हैं। career का, family का, status का, अपेक्षाओं का। कबीर कह रहे हैं: हलके हो जाओ। नाव वैसे ही टूटी है। तर जाओगे अगर भार कम है।

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सलोक 142 ॥ कबीर हाड जरे जिउ लाकरी केस जरे जिउ घास ॥ इहु जगु जरता देखि कै भइओ कबीरु उदासु ॥142॥

कबीर एक श्मशान-दृश्य। “हाड जरे जिउ लाकरी।” हड्डियाँ “जरे” (जलें), जैसे “लाकरी” (लकड़ी)। “केस जरे जिउ घास।” बाल जलें, जैसे घास।

यह श्मशान का सीधा observation। दिल्ली के निगमबोध घाट जा कर देखो। यही दृश्य।

“इहु जगु जरता देखि कै।” यह जग “जलता” देख कर। “भइओ कबीरु उदासु।” कबीर “उदास” हो गया।

कबीर सबसे honest “विरक्ति” express कर रहे हैं। श्मशान देखा, और जग का “जलना” साफ़ हुआ। मन उदास हो गया।

यह “उदास” passive नहीं, sad-depressed नहीं। यह deep recognition है: यहाँ कुछ permanent नहीं। यह दृश्य देख कर, मन भीतर मुड़ जाता है।

बुद्ध की कथा भी यही है। राजकुमार सिद्धार्थ ने मरते आदमी को देखा, और जीवन-दर्शन बदल गया।

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सलोक 143 ॥ कबीर गरबु न कीजीऐ चाम लपेटे हाड ॥ हैवर ऊपरि छत्र तरतर ते फुनि धरनी गाड ॥143॥

कबीर ने अहंकार पर strike। “गरबु न कीजीऐ।” “गर्व” मत करो। “चाम लपेटे हाड।” चमड़े में लिपटी हड्डियाँ।

कबीर का unflinching reminder: यह शरीर सिर्फ़ चमड़े में लिपटी हड्डियाँ हैं। कुछ ख़ास नहीं।

“हैवर ऊपरि छत्र।” “हैवर” (हाथी), “ऊपर छत्र” (छाते के साथ)। “तरतर ते फुनि धरनी गाड।” “तर-तर” (नीचे-नीचे), “फुनि” (फिर), धरती में “गाड” (दफ़न)।

कबीर एक poignant arc draw कर रहे हैं: हाथी पर बैठा, छाता ऊपर। यह राजा है, यह status है। मगर अंत में, धरती में दफ़न।

दिल्ली के powerful लोगों के लिए relevant। PM से ले कर business tycoon तक, सब अंत में “धरती में गाड” जाते हैं। बीच का “हाथी पर छाता” बस एक brief act है।

फिर भी हम इस brief act को अपनी पूरी identity बना लेते हैं। कबीर का message: यह temporary है। असली identity हरि से है।

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सलोक 144 ॥ कबीर गरबु न कीजीऐ ऊचा देखि अवासु ॥ आजु कालिथ भुइ लेटणा ऊपरि जामै घासु ॥144॥

कबीर continue critique on garb। “ऊचा देखि अवासु।” ऊँचा “आवास” (घर) देख कर “गरब” (गर्व)। “आजु कालिथ भुइ लेटणा।” आज-कल भूमि पर “लेटना” है।

यानी ऊँचा घर देख कर गर्व मत कर, क्योंकि आज-कल तू भूमि पर लेटा होगा (मर कर)।

“ऊपरि जामै घासु।” ऊपर “घास” जमेगी।

कबीर का सबसे sober image: कब्र पर घास। जैसे हम सबने देखी है, गाँव में, या किसी पुराने graveyard में।

दिल्ली के developers और property-owners को relevant। बड़े-बड़े flats, मगर अंत में सबकी same destination। यह सोचने की बात है।

यह वो स्वर है जो शेक्सपीयर के “Yorick” स्वर से मिलता है। “Alas, poor Yorick!” कबीर भी same बात कह रहे हैं, मगर भोजपुरी में।

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सलोक 145 ॥ कबीर गरबु न कीजीऐ रंकु न हसीऐ कोइ ॥ अजहु सु नाव समुंद महि किआ जाणउ किआ होइ ॥145॥

कबीर का गर्व-त्रिकोण complete। “रंकु न हसीऐ कोइ।” “रंक” (ग़रीब) पर हँसो मत।

यह कबीर का universal humility। तीन सलोक continue, एक ही message।

“अजहु सु नाव समुंद महि।” अभी “नाव” “समुद्र” में है। “किआ जाणउ किआ होइ।” क्या जाने क्या हो।

कबीर का most uncertain admission: अभी हम सब समुद्र में हैं। कौन तर पाएगा, कौन डूबेगा, यह कौन जानता है?

इसलिए ग़रीब पर मत हँसो। कौन जाने वो तर जाए, और तू डूबे। कौन जाने उसके पास “भार” कम है (अहंकार के), और तेरे पास ज़्यादा।

यह दिल्ली में बहुत relevant है। हम सब class-conscious हैं। मगर कबीर कह रहे हैं, अंतिम परिणाम पता ही नहीं। तब class को इतना important क्यों बनाना?

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सलोक 146 ॥ कबीर गरबु न कीजीऐ देही देखि सुरंग ॥ आजु कालिथ तजि जाहु गे जिउ कांचुरी भुयंग ॥146॥

कबीर का सबसे precise image। “देही देखि सुरंग।” “देही” (देह, शरीर) “सुरंग” (सुन्दर रंग, beautiful) देख कर। “गरबु न कीजीऐ।” “गर्व” मत करो।

सुन्दर शरीर देख कर अहंकार मत करो।

“आजु कालिथ तजि जाहु गे।” आज-कल “तज” (छोड़) कर जाओगे। “जिउ कांचुरी भुयंग।” जैसे “कांचुरी” (केंचुली) “भुयंग” (साँप) की।

कबीर का devastating image: साँप अपनी केंचुली छोड़ देता है। तू भी एक दिन अपना शरीर ऐसे ही छोड़ देगा। यह तेरा नहीं। यह तेरी अस्थायी skin है।

दिल्ली में हम सब skin पर बहुत invest करते हैं। gym, derma, makeup, fashion। कबीर कह रहे हैं, यह सब “कांचुरी” है। एक दिन छूट जाएगी।

यह spiritual perspective है। शरीर “वस्त्र” है, “केंचुली” है, “मिट्टी” है। आत्मा अलग। शरीर पर इतना नहीं, आत्मा पर invest करो।

देखें: गीता 2.22, “वासांसि जीर्णानि यथा विहाय”
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सलोक 147 ॥ कबीर लूटना है त लूटि लै राम नाम है लूटि ॥ फिर पाछै पछुताहुगे प्रान जाहिंगे छूटि ॥147॥

कबीर का famous सलोक। “लूटना है त लूटि लै।” लूटना है तो लूट लो। “राम नाम है लूटि।” राम-नाम लूट।

कबीर commercial-language में spiritual instruction दे रहे हैं। दिल्ली के व्यापारियों को बहुत clearly समझ आएगी।

राम-नाम free है, सबको available है। यह “लूटने” का chance है, जो कोई भी हाथ-पैर मार कर ले सकता है।

“फिर पाछै पछुताहुगे।” फिर बाद में पछताओगे। “प्रान जाहिंगे छूटि।” प्राण छूटेंगे (मर जाओगे)।

कबीर का sharp reminder: जब प्राण निकल जाएँगे, फिर “लूटने” का chance नहीं रहेगा। अभी time है, अभी लूटो।

यह सबसे memorable Kabir सलोक है। कुछ लोग इसे tattoo भी कराते हैं। यह urgency और opportunity का perfect combination है।

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सलोक 148 ॥ कबीर ऐसा कोई न जनमिओ अपनै घरि लावै आगि ॥ पांचउ लरिका जारि कै रहै राम लिव लागि ॥148॥

पहले देखे सलोक (1365-42, 1372-120) का echo। “अपने घर में आग लगाओ, पाँचों बच्चों को जला कर, राम-लिव में रहो।”

कबीर इस सलोक को कई जगह दोहराते हैं। यह उनका core message है। यह repetition intentional है।

मध्ययुगीन कथा-शैली में, important बातें बार-बार आती हैं, ताकि याद रह जाएँ। कबीर भी यही करते हैं।

जो भी इस ग्रंथ को पढ़ता है, उसको यह बात कम-से-कम तीन बार मिलेगी। और तीन बार के बाद, यह subconscious में बस जाती है।

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सलोक 149 ॥ कबीर ऐसा कोई न जनमिओ जा का होवै वंदु ॥ भीतरि गिरांउ बंधि कै नवै सिर देवै कंतु ॥149॥

कबीर एक esoteric statement। “ऐसा कोई न जनमिओ।” ऐसा कोई पैदा नहीं हुआ। “जा का होवै वंदु।” जो “वंदु” (वंदित, worshipped) हो।

यानी सच्चा “वंदु” बहुत rare है।

“भीतरि गिरांउ बंधि कै।” “भीतर” “गिरांउ” (नगर) बाँध कर। “नवै सिर देवै कंतु।” “नवै” (नौ), “सिर” (शीर्ष), “देवै” (दे), “कंतु” (कान्त, हरि)।

कबीर का mystical instruction: अपने भीतर एक नगर बसाओ। नौ शीर्षों को (नौ द्वार, इन्द्रियाँ) हरि को दे दो।

नौ द्वार के बारे में: 2 आँखें, 2 कान, 2 नथुने, मुँह, और 2 निचले। यह सब हरि के लिए हों।

यह “इन्द्रिय-संयम” को positive तरीक़े से बताया गया है। संयम का मतलब बंद करना नहीं, redirect करना है, हरि की तरफ़।

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सलोक 150 ॥ कबीर ऐसा कोइ न जनमिओ जिनि घरि लीआ निरबाणु ॥ निरबाण रहै लिव लाइ कै ता भेटै भगवानु ॥150॥

कबीर का continuation। “ऐसा कोइ न जनमिओ।” ऐसा कोई नहीं पैदा हुआ। “जिनि घरि लीआ निरबाणु।” जिसने “घर” (शरीर/मन) में “निर्वाण” लिया।

“निरबाण रहै लिव लाइ कै।” “निर्वाण” में “लिव” (link, attention) लगा कर रहे। “ता भेटै भगवानु।” तब भगवान मिलते हैं।

कबीर का definition: निर्वाण और हरि-स्मरण मिल कर भगवान का दर्शन। एक के बिना दूसरा नहीं।

बौद्ध परंपरा “निर्वाण” पर focus करती है (सब desire शांत)। भक्ति परंपरा “हरि-स्मरण” पर। कबीर दोनों synthesize कर रहे हैं।

दिल्ली में आजकल mindfulness और meditation बहुत popular हैं, mostly without भक्ति element। कबीर का message: सिर्फ़ शांति काफ़ी नहीं। शांति में हरि-स्मरण भी हो। दोनों मिल कर भगवान।