अंग 68

अंग
68
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਮਨੁ ਤਨੁ ਅਰਪੀ ਆਪੁ ਗਵਾਈ ਚਲਾ ਸਤਿਗੁਰ ਭਾਏ ॥
ਸਦ ਬਲਿਹਾਰੀ ਗੁਰ ਅਪੁਨੇ ਵਿਟਹੁ ਜਿ ਹਰਿ ਸੇਤੀ ਚਿਤੁ ਲਾਏ ॥੭॥
ਸੋ ਬ੍ਰਾਹਮਣੁ ਬ੍ਰਹਮੁ ਜੋ ਬਿੰਦੇ ਹਰਿ ਸੇਤੀ ਰੰਗਿ ਰਾਤਾ ॥
ਪ੍ਰਭੁ ਨਿਕਟਿ ਵਸੈ ਸਭਨਾ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਿਰਲੈ ਜਾਤਾ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਮਿਲੈ ਵਡਿਆਈ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਪਛਾਤਾ ॥੮॥੫॥੨੨॥
मनु तनु अरपी आपु गवाई चला सतिगुर भाए ॥
सद बलिहारी गुर अपुने विटहु जि हरि सेती चितु लाए ॥७॥
सो ब्राहमणु ब्रहमु जो बिंदे हरि सेती रंगि राता ॥
प्रभु निकटि वसै सभना घट अंतरि गुरमुखि विरलै जाता ॥
नानक नामु मिलै वडिआई गुर कै सबदि पछाता ॥८॥५॥२२॥

हिन्दी अर्थ: (मेरी यही अरदास है कि) मैं अपना मन अपना तन (गुरू के) हवाले कर दूँ। मैं (गुरू के आगे) अपना स्वै भाव गवा दूँ~ और मैं गुरू के प्रेम में जीवन गुजारूँ। जो गुरू परमात्मा के साथ मेरा चिक्त जोड़ देता है मैं अपने उस गुरू से सदा सदके जाता हूँ।7। (ऊूंची जाति का गुमान व्यर्थ है) वही ब्राहमण है~ जो ब्रह्म (प्रभू) को पहचानता है। जो प्रभू के प्रेम में प्रभू के साथ रंगा रहता है। (जातियों का कोई भिन्न-भेद नहीं) प्रभू सभ शरीरों में सभी जीवों के नजदीक बसता है। पर यह बात कोई विरला ही समझता है~ जो गुरू की शरण पड़े। हे नानक ! गुरू के शबद में जुड़ने से प्रभू के साथ जान पहिचान बनती है~ प्रभू का नाम मिलता है और (लोक परलोक में) आदर मिलता है।8।5।22।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਸਹਜੈ ਨੋ ਸਭ ਲੋਚਦੀ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਪਾਇਆ ਨ ਜਾਇ ॥
ਪੜਿ ਪੜਿ ਪੰਡਿਤ ਜੋਤਕੀ ਥਕੇ ਭੇਖੀ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਇ ॥
ਗੁਰ ਭੇਟੇ ਸਹਜੁ ਪਾਇਆ ਆਪਣੀ ਕਿਰਪਾ ਕਰੇ ਰਜਾਇ ॥੧॥
ਭਾਈ ਰੇ ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਸਹਜੁ ਨ ਹੋਇ ॥
ਸਬਦੈ ਹੀ ਤੇ ਸਹਜੁ ਊਪਜੈ ਹਰਿ ਪਾਇਆ ਸਚੁ ਸੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਹਜੇ ਗਾਵਿਆ ਥਾਇ ਪਵੈ ਬਿਨੁ ਸਹਜੈ ਕਥਨੀ ਬਾਦਿ ॥
ਸਹਜੇ ਹੀ ਭਗਤਿ ਊਪਜੈ ਸਹਜਿ ਪਿਆਰਿ ਬੈਰਾਗਿ ॥
ਸਹਜੈ ਹੀ ਤੇ ਸੁਖ ਸਾਤਿ ਹੋਇ ਬਿਨੁ ਸਹਜੈ ਜੀਵਣੁ ਬਾਦਿ ॥੨॥
ਸਹਜਿ ਸਾਲਾਹੀ ਸਦਾ ਸਦਾ ਸਹਜਿ ਸਮਾਧਿ ਲਗਾਇ ॥
ਸਹਜੇ ਹੀ ਗੁਣ ਊਚਰੈ ਭਗਤਿ ਕਰੇ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਸਬਦੇ ਹੀ ਹਰਿ ਮਨਿ ਵਸੈ ਰਸਨਾ ਹਰਿ ਰਸੁ ਖਾਇ ॥੩॥
ਸਹਜੇ ਕਾਲੁ ਵਿਡਾਰਿਆ ਸਚ ਸਰਣਾਈ ਪਾਇ ॥
ਸਹਜੇ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਸਚੀ ਕਾਰ ਕਮਾਇ ॥
ਸੇ ਵਡਭਾਗੀ ਜਿਨੀ ਪਾਇਆ ਸਹਜੇ ਰਹੇ ਸਮਾਇ ॥੪॥
ਮਾਇਆ ਵਿਚਿ ਸਹਜੁ ਨ ਊਪਜੈ ਮਾਇਆ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ॥
ਮਨਮੁਖ ਕਰਮ ਕਮਾਵਣੇ ਹਉਮੈ ਜਲੈ ਜਲਾਇ ॥
ਜੰਮਣੁ ਮਰਣੁ ਨ ਚੂਕਈ ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਆਵੈ ਜਾਇ ॥੫॥
ਤ੍ਰਿਹੁ ਗੁਣਾ ਵਿਚਿ ਸਹਜੁ ਨ ਪਾਈਐ ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਇ ॥
ਪੜੀਐ ਗੁਣੀਐ ਕਿਆ ਕਥੀਐ ਜਾ ਮੁੰਢਹੁ ਘੁਥਾ ਜਾਇ ॥
ਚਉਥੇ ਪਦ ਮਹਿ ਸਹਜੁ ਹੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਲੈ ਪਾਇ ॥੬॥
ਨਿਰਗੁਣ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਹੈ ਸਹਜੇ ਸੋਝੀ ਹੋਇ ॥
ਗੁਣਵੰਤੀ ਸਾਲਾਹਿਆ ਸਚੇ ਸਚੀ ਸੋਇ ॥
ਭੁਲਿਆ ਸਹਜਿ ਮਿਲਾਇਸੀ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਵਾ ਹੋਇ ॥੭॥
ਬਿਨੁ ਸਹਜੈ ਸਭੁ ਅੰਧੁ ਹੈ ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਗੁਬਾਰੁ ॥
ਸਹਜੇ ਹੀ ਸੋਝੀ ਪਈ ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਅਪਾਰਿ ॥
ਆਪੇ ਬਖਸਿ ਮਿਲਾਇਅਨੁ ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਕਰਤਾਰਿ ॥੮॥
ਸਹਜੇ ਅਦਿਸਟੁ ਪਛਾਣੀਐ ਨਿਰਭਉ ਜੋਤਿ ਨਿਰੰਕਾਰੁ ॥
ਸਭਨਾ ਜੀਆ ਕਾ ਇਕੁ ਦਾਤਾ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਮਿਲਾਵਣਹਾਰੁ ॥
ਪੂਰੈ ਸਬਦਿ ਸਲਾਹੀਐ ਜਿਸ ਦਾ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਰਾਵਾਰੁ ॥੯॥
ਗਿਆਨੀਆ ਕਾ ਧਨੁ ਨਾਮੁ ਹੈ ਸਹਜਿ ਕਰਹਿ ਵਾਪਾਰੁ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਲਾਹਾ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਲੈਨਿ ਅਖੁਟ ਭਰੇ ਭੰਡਾਰ ॥
ਨਾਨਕ ਤੋਟਿ ਨ ਆਵਈ ਦੀਏ ਦੇਵਣਹਾਰਿ ॥੧੦॥੬॥੨੩॥
सिरीरागु महला ३ ॥
सहजै नो सभ लोचदी बिनु गुर पाइआ न जाइ ॥
पड़ि पड़ि पंडित जोतकी थके भेखी भरमि भुलाइ ॥
गुर भेटे सहजु पाइआ आपणी किरपा करे रजाइ ॥१॥
भाई रे गुर बिनु सहजु न होइ ॥
सबदै ही ते सहजु ऊपजै हरि पाइआ सचु सोइ ॥१॥ रहाउ ॥
सहजे गाविआ थाइ पवै बिनु सहजै कथनी बादि ॥
सहजे ही भगति ऊपजै सहजि पिआरि बैरागि ॥
सहजै ही ते सुख साति होइ बिनु सहजै जीवणु बादि ॥२॥
सहजि सालाही सदा सदा सहजि समाधि लगाइ ॥
सहजे ही गुण ऊचरै भगति करे लिव लाइ ॥
सबदे ही हरि मनि वसै रसना हरि रसु खाइ ॥३॥
सहजे कालु विडारिआ सच सरणाई पाइ ॥
सहजे हरि नामु मनि वसिआ सची कार कमाइ ॥
से वडभागी जिनी पाइआ सहजे रहे समाइ ॥४॥
माइआ विचि सहजु न ऊपजै माइआ दूजै भाइ ॥
मनमुख करम कमावणे हउमै जलै जलाइ ॥
जंमणु मरणु न चूकई फिरि फिरि आवै जाइ ॥५॥
त्रिहु गुणा विचि सहजु न पाईऐ त्रै गुण भरमि भुलाइ ॥
पड़ीऐ गुणीऐ किआ कथीऐ जा मुंढहु घुथा जाइ ॥
चउथे पद महि सहजु है गुरमुखि पलै पाइ ॥६॥
निरगुण नामु निधानु है सहजे सोझी होइ ॥
गुणवंती सालाहिआ सचे सची सोइ ॥
भुलिआ सहजि मिलाइसी सबदि मिलावा होइ ॥७॥
बिनु सहजै सभु अंधु है माइआ मोहु गुबारु ॥
सहजे ही सोझी पई सचै सबदि अपारि ॥
आपे बखसि मिलाइअनु पूरे गुर करतारि ॥८॥
सहजे अदिसटु पछाणीऐ निरभउ जोति निरंकारु ॥
सभना जीआ का इकु दाता जोती जोति मिलावणहारु ॥
पूरै सबदि सलाहीऐ जिस दा अंतु न पारावारु ॥९॥
गिआनीआ का धनु नामु है सहजि करहि वापारु ॥
अनदिनु लाहा हरि नामु लैनि अखुट भरे भंडार ॥
नानक तोटि न आवई दीए देवणहारि ॥१०॥६॥२३॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ३ ॥ सारी सृष्टि मन की शांति के लिए तरसती है। पर गुरू की शरण के बिना यह सहज अवस्था नहीं मिलती। पंडित और ज्योतिषी (शास्त्र आदि धार्मिक पुस्तकें) पड़ पड़ के थक गए (पर सहज अवस्था प्राप्त ना कर सके)~ छह भेषों के साधू भी भटक भटक के कुमार्ग पर ही पड़े रहे (वे भी सहज अवस्था ना पा सके)। जिन पर परमात्मा अपनी रजा मुताबिक कृपा करता है~ वे गुरू को मिल के सहज अवस्था प्राप्त करते हैं।1। हे भाई ! गुरू की शरण के बिना (मनुष्य के अंदर) आत्मिक अडोलता पैदा नहीं होती। गुरू के शबद में जुड़ने से ही आत्मिक अडोलता (मन की शांति) पैदा होती है~ और वह सदा स्थिर रहने वाला प्रभू मिलता है।1।रहाउ। परमात्मा के गुणों का कीर्तन करना भी तभी प्रवान होता है~ जब आत्मिक अडोलता में टिक के किया जाए। आत्मिक अडोलता के बिनां धार्मिक बातें कहना व्यर्थ जाता है। आत्मिक अडोलता में टिकने पर ही (मनुष्य के अंदर परमात्मा की) भक्ति (का जज्बा) पैदा होता है। आत्मिक अडोलता से ही मनुष्य प्रभू के प्यार में टिकता है। (दुनिया से) वैराग में रहता है। आत्मिक अडोलता से आत्मिक आनंद व शान्ति पैदा होती है। आत्मिक अडोलत के बगैर (मनुष्य की सारी) जिंदगी व्यर्थ जाती है।2। (हे भाई!) तू आत्मिक अडोलता में टिक के आत्मिक अडोलता में समाधि लगा के सदा परमात्मा की सिफत सलाह करते रहना। जो मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिक के परमात्मा के गुण गाता है~ प्रभू चरणों में सुरति जोड़ के भगती करता है~ गुरू के शबद की बरकति से ही उसके मन में परमात्मा आ बसता है~ उसकी जीभ परमात्मा के नाम का स्वाद चखती रहती है।3। सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा की शरण पड़ के आत्मिक अडोलता में टिक के जिन्होंने आत्मिक मौत को मार लिया। ये सदा साथ निभने वाली कार करने के कारण उनके अंदर परमात्मा का नाम आ बसता है। और~ जिन्होंने परमात्मा का नाम प्राप्त कर लिया~ वह लोग बड़े भाग्यशाली हो गए~ वे सदा आत्मिक अडोलता में लीन रहते हैं।4। माया (के मोह) में टिके रहने से आत्मिक अडोलता पैदा नहीं होती। माया तो (प्रभू के बिना किसी) और प्यार में (फंसाती है)। ऐसे मानवीय कर्म करने से मनुष्य अहंकार में ही जलता है। (अपने आप को) जलाता है। उसका जनम मरन का चक्कर कभी खत्म नहीं होता~ वह मुड़ मुड़ पैदा होता रहता है।5। माया (के मोह) में टिके रहने से आत्मिक अडोलता पैदा नहीं होती। माया के तीन गुणों के कारण जीव भटकन में फंस कर गलत राह पे पड़ा रहता है। (इस हालात में) धार्मिक पुस्तकों को पढ़ने का विचारने का व औरों को सुनाने का कोई लाभ नहीं होता। क्योंकि~ जीव अपने मूल प्रभू से विछुड़ के (गलत जीवन राह पे) चलता है। (माया के तीन गुणों को लांघ के) चौथी आत्मिक अवस्था में पहुँचने से ही मन की शांति पैदा होती है और यह आत्मिक अवस्था गुरू की शरण पड़ के ही प्राप्त होती है।6। तीनों गुणों से निर्लिप परमात्मा का नाम (सभ पदार्थों का) खजाना है~ आत्मिक अडोलता में पहुँचने पर ये समझ पड़ती है। गुणवान जीव ही उस प्रभू की सिफत सलाह करते हैं। (जो मनुष्य सिफत सलाह करता है वह) सदा स्थिर प्रभू का रूप हो जाता है~ उसकी शोभा भी अटॅल हो जाती है। (वह परमात्मा इतना दयालु है कि वह शरण आए) गलत राह पर पड़े लोगों को भी आत्मिक अडोलता में जोड़ देता है। गुरू के शबद की बरकति से उस (वडभागी परमात्मा से) मिलाप हो जाता है।7। मन की शान्ति के बिनां सारा जगत (माया के मोह में) अंधा हुआ रहता है। (जगत पर) माया के मोह का घोर अंधकार छाया रहता है। सदा स्थिर प्रभू की सिफत सलाह के शबद से जिस मनुष्य को आत्मिक अडोलता में जुड़ के (परमात्मा के गुणों की) सूझ पड़ जाती है~ वह उस अपार प्रभू में (सुरति जोड़ के रखता है)। (ऐसे भाग्यशाली लोगों को) पूरे गुरू ने करतार ने स्वयं ही मेहर करके (अपने चरणों में) मिला लिया होता है।8। आत्मिक अडोलता में पहुँच कर उस परमात्मा के साथ सांझ बन जाती है~ जो इन आँखों से नही दिखता~ जिसको किसी का डर नही~ जो केवल प्रकाश ही प्रकाश है~ और जिसका कोई खास स्वरूप (बताया) नहीं (जा सकता)। वही परमात्मा सब जीवों को सारी दातें देने वाला है~ और सभ की ज्योति (सुरति) को अपनी ज्योति में मिलाने के स्मर्थ है। (हे भाई!) पूरे गुरू के शबद से उस परमात्मा की सिफत सलाह करनी चाहिए~ जिसके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता~ जिसके बड़प्पन का उरला व परला छोर नहीं मिल सकता।9। जो मनुष्य परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल लेते हैं~ परमात्मा का नाम ही उनका (असल) धन बन जाता है। वे आत्मिक अडोलता में टिक के इस नाम धन का ही व्यापार करते हैं। वे हर वक्त (परमात्मा का नाम सिमर के) परमात्मा का नाम-लाभ ही कमाते हैं। नाम धन से भरे हुए उनके खजाने कभी खत्म नही होते। हे नानक ! ये खजाने दाता दातार ने स्वयं उन्हें दिये हुए हैं~ इन खजानों में कभी भी तोट नहीं आती।10।6।23।

संदर्भ: यह अंग 68 है, राग Siree Raag का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।

Nizamuddin dargah के बाहर qawwali सुनते-सुनते।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 38 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 68” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Siree Raag राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 69 →, पीछे का: ← अंग 67

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।