अंग
67
राग Siree Raag
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਜਗੁ ਦੁਖੀਆ ਫਿਰੈ ਮਨਮੁਖਾ ਨੋ ਗਈ ਖਾਇ ॥
ਸਬਦੇ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈਐ ਸਬਦੇ ਸਚਿ ਸਮਾਇ ॥੪॥
ਮਾਇਆ ਭੂਲੇ ਸਿਧ ਫਿਰਹਿ ਸਮਾਧਿ ਨ ਲਗੈ ਸੁਭਾਇ ॥
ਤੀਨੇ ਲੋਅ ਵਿਆਪਤ ਹੈ ਅਧਿਕ ਰਹੀ ਲਪਟਾਇ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਮੁਕਤਿ ਨ ਪਾਈਐ ਨਾ ਦੁਬਿਧਾ ਮਾਇਆ ਜਾਇ ॥੫॥
ਮਾਇਆ ਕਿਸ ਨੋ ਆਖੀਐ ਕਿਆ ਮਾਇਆ ਕਰਮ ਕਮਾਇ ॥
ਦੁਖਿ ਸੁਖਿ ਏਹੁ ਜੀਉ ਬਧੁ ਹੈ ਹਉਮੈ ਕਰਮ ਕਮਾਇ ॥
ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਭਰਮੁ ਨ ਚੂਕਈ ਨਾ ਵਿਚਹੁ ਹਉਮੈ ਜਾਇ ॥੬॥
ਬਿਨੁ ਪ੍ਰੀਤੀ ਭਗਤਿ ਨ ਹੋਵਈ ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਥਾਇ ਨ ਪਾਇ ॥
ਸਬਦੇ ਹਉਮੈ ਮਾਰੀਐ ਮਾਇਆ ਕਾ ਭ੍ਰਮੁ ਜਾਇ ॥
ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਪਾਈਐ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥੭॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਗੁਣ ਨ ਜਾਪਨੀ ਬਿਨੁ ਗੁਣ ਭਗਤਿ ਨ ਹੋਇ ॥
ਭਗਤਿ ਵਛਲੁ ਹਰਿ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਸਹਜਿ ਮਿਲਿਆ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਸਬਦੇ ਹਰਿ ਸਾਲਾਹੀਐ ਕਰਮਿ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਇ ॥੮॥੪॥੨੧॥
ਸਬਦੇ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈਐ ਸਬਦੇ ਸਚਿ ਸਮਾਇ ॥੪॥
ਮਾਇਆ ਭੂਲੇ ਸਿਧ ਫਿਰਹਿ ਸਮਾਧਿ ਨ ਲਗੈ ਸੁਭਾਇ ॥
ਤੀਨੇ ਲੋਅ ਵਿਆਪਤ ਹੈ ਅਧਿਕ ਰਹੀ ਲਪਟਾਇ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਮੁਕਤਿ ਨ ਪਾਈਐ ਨਾ ਦੁਬਿਧਾ ਮਾਇਆ ਜਾਇ ॥੫॥
ਮਾਇਆ ਕਿਸ ਨੋ ਆਖੀਐ ਕਿਆ ਮਾਇਆ ਕਰਮ ਕਮਾਇ ॥
ਦੁਖਿ ਸੁਖਿ ਏਹੁ ਜੀਉ ਬਧੁ ਹੈ ਹਉਮੈ ਕਰਮ ਕਮਾਇ ॥
ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਭਰਮੁ ਨ ਚੂਕਈ ਨਾ ਵਿਚਹੁ ਹਉਮੈ ਜਾਇ ॥੬॥
ਬਿਨੁ ਪ੍ਰੀਤੀ ਭਗਤਿ ਨ ਹੋਵਈ ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਥਾਇ ਨ ਪਾਇ ॥
ਸਬਦੇ ਹਉਮੈ ਮਾਰੀਐ ਮਾਇਆ ਕਾ ਭ੍ਰਮੁ ਜਾਇ ॥
ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਪਾਈਐ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥੭॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਗੁਣ ਨ ਜਾਪਨੀ ਬਿਨੁ ਗੁਣ ਭਗਤਿ ਨ ਹੋਇ ॥
ਭਗਤਿ ਵਛਲੁ ਹਰਿ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਸਹਜਿ ਮਿਲਿਆ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਸਬਦੇ ਹਰਿ ਸਾਲਾਹੀਐ ਕਰਮਿ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਇ ॥੮॥੪॥੨੧॥
बिनु सबदै जगु दुखीआ फिरै मनमुखा नो गई खाइ ॥
सबदे नामु धिआईऐ सबदे सचि समाइ ॥४॥
माइआ भूले सिध फिरहि समाधि न लगै सुभाइ ॥
तीने लोअ विआपत है अधिक रही लपटाइ ॥
बिनु गुर मुकति न पाईऐ ना दुबिधा माइआ जाइ ॥५॥
माइआ किस नो आखीऐ किआ माइआ करम कमाइ ॥
दुखि सुखि एहु जीउ बधु है हउमै करम कमाइ ॥
बिनु सबदै भरमु न चूकई ना विचहु हउमै जाइ ॥६॥
बिनु प्रीती भगति न होवई बिनु सबदै थाइ न पाइ ॥
सबदे हउमै मारीऐ माइआ का भ्रमु जाइ ॥
नामु पदारथु पाईऐ गुरमुखि सहजि सुभाइ ॥७॥
बिनु गुर गुण न जापनी बिनु गुण भगति न होइ ॥
भगति वछलु हरि मनि वसिआ सहजि मिलिआ प्रभु सोइ ॥
नानक सबदे हरि सालाहीऐ करमि परापति होइ ॥८॥४॥२१॥
सबदे नामु धिआईऐ सबदे सचि समाइ ॥४॥
माइआ भूले सिध फिरहि समाधि न लगै सुभाइ ॥
तीने लोअ विआपत है अधिक रही लपटाइ ॥
बिनु गुर मुकति न पाईऐ ना दुबिधा माइआ जाइ ॥५॥
माइआ किस नो आखीऐ किआ माइआ करम कमाइ ॥
दुखि सुखि एहु जीउ बधु है हउमै करम कमाइ ॥
बिनु सबदै भरमु न चूकई ना विचहु हउमै जाइ ॥६॥
बिनु प्रीती भगति न होवई बिनु सबदै थाइ न पाइ ॥
सबदे हउमै मारीऐ माइआ का भ्रमु जाइ ॥
नामु पदारथु पाईऐ गुरमुखि सहजि सुभाइ ॥७॥
बिनु गुर गुण न जापनी बिनु गुण भगति न होइ ॥
भगति वछलु हरि मनि वसिआ सहजि मिलिआ प्रभु सोइ ॥
नानक सबदे हरि सालाहीऐ करमि परापति होइ ॥८॥४॥२१॥
हिन्दी अर्थ: गुरू के शबद के बिना जगत (माया के मोह के कारण) दुखी रहता है। अपने मन के पीछे चलने वाले लोगों को माया ग्रसे रखती है। (हे भाई !) गुरू के शबद से ही प्रभू का नाम सिमरा जा सकता है। गुरू के शबद से ही सदा स्थिर प्रभू में लीन रहा जा सकता है।4। (साधारण लोगों की तो क्या बात~ योग साधना में) माहिर योगी भी माया के प्रभाव में आ के गलत रास्ते पे भटकते फिरते हैं। प्रभू प्रेम में उनकी सुरति नहीं जुड़ती। ये माया तीनों भवनों में अपना प्रभाव डाल रही है। (सभी जीवों को ही) बुरी तरह से चिपकी हुई है। (हे भाई !) गुरू की शरण के बिना (माया से) खलासी नहीं मिल सकती। माया के प्रभाव के कारण पैदा हुई तेर-मेर (द्वैत) भी दूर नहीं होती।5। (अगर पूछें कि) माया किस चीज का नाम है? (माया का स्वरूप क्या है? जीवों पे प्रभाव डाल के फिर उनसे ही) माया कौन से काम करवाती है? (तो उक्तर ये है कि माया के प्रभाव में) ये जीव दुख (की निर्वती) में ही सुख (की लालसा) में बंधा रहता है। और~ “मैं बड़ा हूँ~ मैं बड़ा बन जाऊँ” की प्रेरणा में सारे काम करता है। गुरू के शबद के बिना जीव की यह भटकना खत्म नहीं होती। ना ही इसके अंदर से “मैं मेरी” की प्रेरणा दूर होती है।6। गुरू के शबद के बिना (मनुष्य के अंदर प्रभू चरणों की प्रीति पैदा नहीं होती~ और) प्रीति के बिना (जीव से) परमात्मा की भक्ति नहीं हो सकती~ (परमात्मा के दर पे) जीव कबूल नहीं होता। गुरू के शबद द्वारा ही अहम् (मन में से) मारी जा सकती है। गुरू के शबद द्वारा ही माया की प्रेरणा से पैदा हुठ्र भटकना दूर होती है। गुरू की शरण पड़ने से परमात्मा का नाम (कीमती पदार्थ मिलता है~ आत्मिक अडोलता में व प्रभू प्रेम से लीनता होती है)।7। गुरू की शरण के बिना उच्च आत्मिक जीवन के गुणों की कद्र नहीं पड़ती और~ आत्मिक जीवन वाले गुणों के बिना परमात्मा की भक्ति नहीं हो सकती। (गुरू के शबद द्वारा ही) भगती के साथ प्यार करने वाला परमात्मा (मनुष्य के) मन में बसता है (आत्मक अडोलता प्राप्त होती है) आत्मिक अडोलता में टिका वह प्रभू को प्राप्त कर लेता है। हे नानक ! गुरू के शबद से ही परमात्मा की सिफत सलाह की जा सकती है। (पर यह दाति) उस की मेहर से ही मिलती है।8।4।21।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਮੇਰੈ ਪ੍ਰਭਿ ਕੀਨਾ ਆਪੇ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਏ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਕਰਮ ਕਰਹਿ ਨਹੀ ਬੂਝਹਿ ਬਿਰਥਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਏ ॥
ਗੁਰਬਾਣੀ ਇਸੁ ਜਗ ਮਹਿ ਚਾਨਣੁ ਕਰਮਿ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਏ ॥੧॥
ਮਨ ਰੇ ਨਾਮੁ ਜਪਹੁ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥
ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਸਾਲਾਹੀਐ ਸਹਜਿ ਮਿਲੈ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਭਰਮੁ ਗਇਆ ਭਉ ਭਾਗਿਆ ਹਰਿ ਚਰਣੀ ਚਿਤੁ ਲਾਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਬਦੁ ਕਮਾਈਐ ਹਰਿ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥
ਘਰਿ ਮਹਲਿ ਸਚਿ ਸਮਾਈਐ ਜਮਕਾਲੁ ਨ ਸਕੈ ਖਾਇ ॥੨॥
ਨਾਮਾ ਛੀਬਾ ਕਬੀਰੁ ਜੋੁਲਾਹਾ ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਤੇ ਗਤਿ ਪਾਈ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਕੇ ਬੇਤੇ ਸਬਦੁ ਪਛਾਣਹਿ ਹਉਮੈ ਜਾਤਿ ਗਵਾਈ ॥
ਸੁਰਿ ਨਰ ਤਿਨ ਕੀ ਬਾਣੀ ਗਾਵਹਿ ਕੋਇ ਨ ਮੇਟੈ ਭਾਈ ॥੩॥
ਦੈਤ ਪੁਤੁ ਕਰਮ ਧਰਮ ਕਿਛੁ ਸੰਜਮ ਨ ਪੜੈ ਦੂਜਾ ਭਾਉ ਨ ਜਾਣੈ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਭੇਟਿਐ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਆ ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮੁ ਵਖਾਣੈ ॥
ਏਕੋ ਪੜੈ ਏਕੋ ਨਾਉ ਬੂਝੈ ਦੂਜਾ ਅਵਰੁ ਨ ਜਾਣੈ ॥੪॥
ਖਟੁ ਦਰਸਨ ਜੋਗੀ ਸੰਨਿਆਸੀ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਏ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਹਿ ਤਾ ਗਤਿ ਮਿਤਿ ਪਾਵਹਿ ਹਰਿ ਜੀਉ ਮੰਨਿ ਵਸਾਏ ॥
ਸਚੀ ਬਾਣੀ ਸਿਉ ਚਿਤੁ ਲਾਗੈ ਆਵਣੁ ਜਾਣੁ ਰਹਾਏ ॥੫॥
ਪੰਡਿਤ ਪੜਿ ਪੜਿ ਵਾਦੁ ਵਖਾਣਹਿ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਏ ॥
ਲਖ ਚਉਰਾਸੀਹ ਫੇਰੁ ਪਇਆ ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਮੁਕਤਿ ਨ ਪਾਏ ॥
ਜਾ ਨਾਉ ਚੇਤੈ ਤਾ ਗਤਿ ਪਾਏ ਜਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਏ ॥੬॥
ਸਤਸੰਗਤਿ ਮਹਿ ਨਾਮੁ ਹਰਿ ਉਪਜੈ ਜਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਸੁਭਾਏ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਮੇਰੈ ਪ੍ਰਭਿ ਕੀਨਾ ਆਪੇ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਏ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਕਰਮ ਕਰਹਿ ਨਹੀ ਬੂਝਹਿ ਬਿਰਥਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਏ ॥
ਗੁਰਬਾਣੀ ਇਸੁ ਜਗ ਮਹਿ ਚਾਨਣੁ ਕਰਮਿ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਏ ॥੧॥
ਮਨ ਰੇ ਨਾਮੁ ਜਪਹੁ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥
ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਸਾਲਾਹੀਐ ਸਹਜਿ ਮਿਲੈ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਭਰਮੁ ਗਇਆ ਭਉ ਭਾਗਿਆ ਹਰਿ ਚਰਣੀ ਚਿਤੁ ਲਾਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਬਦੁ ਕਮਾਈਐ ਹਰਿ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥
ਘਰਿ ਮਹਲਿ ਸਚਿ ਸਮਾਈਐ ਜਮਕਾਲੁ ਨ ਸਕੈ ਖਾਇ ॥੨॥
ਨਾਮਾ ਛੀਬਾ ਕਬੀਰੁ ਜੋੁਲਾਹਾ ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਤੇ ਗਤਿ ਪਾਈ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਕੇ ਬੇਤੇ ਸਬਦੁ ਪਛਾਣਹਿ ਹਉਮੈ ਜਾਤਿ ਗਵਾਈ ॥
ਸੁਰਿ ਨਰ ਤਿਨ ਕੀ ਬਾਣੀ ਗਾਵਹਿ ਕੋਇ ਨ ਮੇਟੈ ਭਾਈ ॥੩॥
ਦੈਤ ਪੁਤੁ ਕਰਮ ਧਰਮ ਕਿਛੁ ਸੰਜਮ ਨ ਪੜੈ ਦੂਜਾ ਭਾਉ ਨ ਜਾਣੈ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਭੇਟਿਐ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਆ ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮੁ ਵਖਾਣੈ ॥
ਏਕੋ ਪੜੈ ਏਕੋ ਨਾਉ ਬੂਝੈ ਦੂਜਾ ਅਵਰੁ ਨ ਜਾਣੈ ॥੪॥
ਖਟੁ ਦਰਸਨ ਜੋਗੀ ਸੰਨਿਆਸੀ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਏ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਹਿ ਤਾ ਗਤਿ ਮਿਤਿ ਪਾਵਹਿ ਹਰਿ ਜੀਉ ਮੰਨਿ ਵਸਾਏ ॥
ਸਚੀ ਬਾਣੀ ਸਿਉ ਚਿਤੁ ਲਾਗੈ ਆਵਣੁ ਜਾਣੁ ਰਹਾਏ ॥੫॥
ਪੰਡਿਤ ਪੜਿ ਪੜਿ ਵਾਦੁ ਵਖਾਣਹਿ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਏ ॥
ਲਖ ਚਉਰਾਸੀਹ ਫੇਰੁ ਪਇਆ ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਮੁਕਤਿ ਨ ਪਾਏ ॥
ਜਾ ਨਾਉ ਚੇਤੈ ਤਾ ਗਤਿ ਪਾਏ ਜਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਏ ॥੬॥
ਸਤਸੰਗਤਿ ਮਹਿ ਨਾਮੁ ਹਰਿ ਉਪਜੈ ਜਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਸੁਭਾਏ ॥
सिरीरागु महला ३ ॥
माइआ मोहु मेरै प्रभि कीना आपे भरमि भुलाए ॥
मनमुखि करम करहि नही बूझहि बिरथा जनमु गवाए ॥
गुरबाणी इसु जग महि चानणु करमि वसै मनि आए ॥१॥
मन रे नामु जपहु सुखु होइ ॥
गुरु पूरा सालाहीऐ सहजि मिलै प्रभु सोइ ॥१॥ रहाउ ॥
भरमु गइआ भउ भागिआ हरि चरणी चितु लाइ ॥
गुरमुखि सबदु कमाईऐ हरि वसै मनि आइ ॥
घरि महलि सचि समाईऐ जमकालु न सकै खाइ ॥२॥
नामा छीबा कबीरु जोुलाहा पूरे गुर ते गति पाई ॥
ब्रहम के बेते सबदु पछाणहि हउमै जाति गवाई ॥
सुरि नर तिन की बाणी गावहि कोइ न मेटै भाई ॥३॥
दैत पुतु करम धरम किछु संजम न पड़ै दूजा भाउ न जाणै ॥
सतिगुरु भेटिऐ निरमलु होआ अनदिनु नामु वखाणै ॥
एको पड़ै एको नाउ बूझै दूजा अवरु न जाणै ॥४॥
खटु दरसन जोगी संनिआसी बिनु गुर भरमि भुलाए ॥
सतिगुरु सेवहि ता गति मिति पावहि हरि जीउ मंनि वसाए ॥
सची बाणी सिउ चितु लागै आवणु जाणु रहाए ॥५॥
पंडित पड़ि पड़ि वादु वखाणहि बिनु गुर भरमि भुलाए ॥
लख चउरासीह फेरु पइआ बिनु सबदै मुकति न पाए ॥
जा नाउ चेतै ता गति पाए जा सतिगुरु मेलि मिलाए ॥६॥
सतसंगति महि नामु हरि उपजै जा सतिगुरु मिलै सुभाए ॥
माइआ मोहु मेरै प्रभि कीना आपे भरमि भुलाए ॥
मनमुखि करम करहि नही बूझहि बिरथा जनमु गवाए ॥
गुरबाणी इसु जग महि चानणु करमि वसै मनि आए ॥१॥
मन रे नामु जपहु सुखु होइ ॥
गुरु पूरा सालाहीऐ सहजि मिलै प्रभु सोइ ॥१॥ रहाउ ॥
भरमु गइआ भउ भागिआ हरि चरणी चितु लाइ ॥
गुरमुखि सबदु कमाईऐ हरि वसै मनि आइ ॥
घरि महलि सचि समाईऐ जमकालु न सकै खाइ ॥२॥
नामा छीबा कबीरु जोुलाहा पूरे गुर ते गति पाई ॥
ब्रहम के बेते सबदु पछाणहि हउमै जाति गवाई ॥
सुरि नर तिन की बाणी गावहि कोइ न मेटै भाई ॥३॥
दैत पुतु करम धरम किछु संजम न पड़ै दूजा भाउ न जाणै ॥
सतिगुरु भेटिऐ निरमलु होआ अनदिनु नामु वखाणै ॥
एको पड़ै एको नाउ बूझै दूजा अवरु न जाणै ॥४॥
खटु दरसन जोगी संनिआसी बिनु गुर भरमि भुलाए ॥
सतिगुरु सेवहि ता गति मिति पावहि हरि जीउ मंनि वसाए ॥
सची बाणी सिउ चितु लागै आवणु जाणु रहाए ॥५॥
पंडित पड़ि पड़ि वादु वखाणहि बिनु गुर भरमि भुलाए ॥
लख चउरासीह फेरु पइआ बिनु सबदै मुकति न पाए ॥
जा नाउ चेतै ता गति पाए जा सतिगुरु मेलि मिलाए ॥६॥
सतसंगति महि नामु हरि उपजै जा सतिगुरु मिलै सुभाए ॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ३ ॥ मेरे प्रभू ने (खुद ही) माया का मोह पैदा किया है~ वह खुद ही (जीवों को माया की) भटकना में डाल के गलत रास्ते पर डाल देता है। (उस भटकन में पड़े हुए) अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य (निहित धार्मिक) कर्म करते है।~ और (यह) नहीं समझते (कि हम गलत राह पर हैं)। (जो भी मनुष्य अपने मन के पीछे चल के माया के मोह में फंसा रहता है~ वह अपना) जनम व्यर्थ गवाता है। सतिगुरू की बाणी इस जगत में (जीवन पथ पर) प्र्रकाश (करती) है। यह बाणी (परमात्मा की) मेहर से (ही) मनुष्य के मन में आ बसती है।1। हे मेरे मन ! परमात्मा का नाम जप। (नाम जपने से ही) आत्मिक आनंद मिलता है। (सिमरन की दाति गुरू से मिलती है~ इस वास्ते) पूरे गुरू को घन्य धन्य कहना चाहिए। गुरू की शरण पड़ने से मनुष्य आत्मिक अडोलता में (टिकता है~ और मनुष्य को) वह परमात्मा मिल जाता है।1।रहाउ। (गुरू के द्वारा) परमात्मा के चरणों में चिक्त जोड़ के (मन की) भटकना दूर हो जाती है। (हरेक किस्म का डर) भाग जाता है। गुरू की शरण पड़ के गुरू का शबद कमाना चाहिए (भाव~ शबद मुताबिक जीवन व्यतीत करना चाहिए। (इस तरह) परमात्मा मन में आ बसता है~ अंतरात्मा में ठहराव आ जाता है। प्रभू चरणों में सदा स्थिर प्रभू में लीन रह सकते हैं। और आत्मिक मौत (सदाचारी जीवन को) खा नहीं सकती।2। (देखो) नामदेव (जाति का) छींबा (धोबी) था। कबीर जुलाहा था। (उन्होंने) पूरे गुरू से उच्च आत्मिक अवस्था प्राप्त की। वे परमात्मा के साथ सांझ पाने वाले बन गए। उन्होंने प्रभू की सिफत सलाह के साथ गहरी सांझ पा ली। (और~ इस तरह उन्होंने अपने अंदर से) अहम् का बीज नाश कर दिया। हे भाई ! (अब) देवते और मनुष्य उनकी (उच्चारण की हुई) बाणी को गाते हैं। कोई भी (उनको मिले हुए इस सत्कार को) मिटा नहीं सकता।3। (हरणाकश्यप) दैंत का पुत्र (भक्त प्रहलाद~ निहित) धार्मिक कर्मों व इंद्रियों को वश करने की युक्तियां बताने वाली कोई पुस्तक नहीं था पढ़ता~ वह प्रभू के बिना किसी और (देवताओं आदि) के साथ प्यार (करना) नहीं था जानता। पूरा गुरू मिलने (की बरकति) से वह पवित्र (जीवन वाला हो गया)~ हर समय परमात्मा का नाम जपने लग पड़ा। वह एक (परमात्मा) की सिफत सलाह पढ़ता था~ एक परमात्मा का नाम ही समझता था। प्रभू के बिना किसी और को (प्रभू के जैसा) नहीं था जानता।4। जोगी (हों)~ संन्यासी (हों~ ये सारे ही) छह भेषों के साध~ गुरू की शरण के बिना माया की भटकना में पड़ कर कुमार्ग में पड़े रहते हैं। जब (यह) गुरू की शरण पड़ते हैं~ तब परमात्मा का नाम अपने मन में बसा के उच्च आत्मिक अवस्था व (सही) जीवन युक्ति प्राप्त करते हैं। जिस मनुष्य का चिक्त सदा स्थिर प्रभू की बाणी के साथ तरंगित होता है वह अपना जनम मरन का चक्कर खत्म कर लेता है।5। पंडित (लोक शास्त्र आदि) पढ़ पढ़ के (निरी) चर्चा (ही) करते सुनते हैं~ (वह भी) गुरू की शरण के बिना माया की भटकना में पड़ के कुमार्ग पर पड़े रहते हैं। (कोई भी मनुष्य) गुरू के शबद के बिना (माया के मोह से) निजात हासिल नहीं कर सकता। (गुरू की शरण के बिना) चौरासी लाख योनियों का चक्कर बना रहता है। जब गुरू (मनुष्य को) प्रभू के चरणों में जोड़ता है~ जब वह प्रभू का नाम सिमरता है~ तब वह उच्च आत्मिक अवस्था हासिल कर लेता है।6। जब (मनुष्य को) प्यार से गुरू मिलता है (गुरू की कृपा से) सत्संग में रह कर मनुष्य के अंदर परमात्मा का नाम प्रगट होता है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 67 है, राग Siree Raag का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
India Gate के लॉन में Sunday शाम की family-picnic।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 36 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 67” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Siree Raag राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 68 →, पीछे का: ← अंग 66।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।