अंग
69
राग Siree Raag
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਫੇਰੁ ਨ ਪਵੈ ਜਨਮ ਮਰਣ ਦੁਖੁ ਜਾਇ ॥
ਪੂਰੈ ਸਬਦਿ ਸਭ ਸੋਝੀ ਹੋਈ ਹਰਿ ਨਾਮੈ ਰਹੈ ਸਮਾਇ ॥੧॥
ਮਨ ਮੇਰੇ ਸਤਿਗੁਰ ਸਿਉ ਚਿਤੁ ਲਾਇ ॥
ਨਿਰਮਲੁ ਨਾਮੁ ਸਦ ਨਵਤਨੋ ਆਪਿ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਰਾਖਹੁ ਅਪੁਨੀ ਸਰਣਾਈ ਜਿਉ ਰਾਖਹਿ ਤਿਉ ਰਹਣਾ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਜੀਵਤੁ ਮਰੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਭਵਜਲੁ ਤਰਣਾ ॥੨॥
ਵਡੈ ਭਾਗਿ ਨਾਉ ਪਾਈਐ ਗੁਰਮਤਿ ਸਬਦਿ ਸੁਹਾਈ ॥
ਆਪੇ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਪ੍ਰਭੁ ਕਰਤਾ ਸਹਜੇ ਰਹਿਆ ਸਮਾਈ ॥੩॥
ਇਕਨਾ ਮਨਮੁਖਿ ਸਬਦੁ ਨ ਭਾਵੈ ਬੰਧਨਿ ਬੰਧਿ ਭਵਾਇਆ ॥
ਲਖ ਚਉਰਾਸੀਹ ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਆਵੈ ਬਿਰਥਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਇਆ ॥੪॥
ਭਗਤਾ ਮਨਿ ਆਨੰਦੁ ਹੈ ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਰੰਗਿ ਰਾਤੇ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਗੁਣ ਗਾਵਹਿ ਸਦ ਨਿਰਮਲ ਸਹਜੇ ਨਾਮਿ ਸਮਾਤੇ ॥੫॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਾਣੀ ਬੋਲਹਿ ਸਭ ਆਤਮ ਰਾਮੁ ਪਛਾਣੀ ॥
ਏਕੋ ਸੇਵਨਿ ਏਕੁ ਅਰਾਧਹਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਅਕਥ ਕਹਾਣੀ ॥੬॥
ਸਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਸੇਵੀਐ ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥
ਸਦਾ ਰੰਗਿ ਰਾਤੇ ਸਚ ਸਿਉ ਅਪੁਨੀ ਕਿਰਪਾ ਕਰੇ ਮਿਲਾਇ ॥੭॥
ਆਪੇ ਕਰੇ ਕਰਾਏ ਆਪੇ ਇਕਨਾ ਸੁਤਿਆ ਦੇਇ ਜਗਾਇ ॥
ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਇਦਾ ਨਾਨਕ ਸਬਦਿ ਸਮਾਇ ॥੮॥੭॥੨੪॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਫੇਰੁ ਨ ਪਵੈ ਜਨਮ ਮਰਣ ਦੁਖੁ ਜਾਇ ॥
ਪੂਰੈ ਸਬਦਿ ਸਭ ਸੋਝੀ ਹੋਈ ਹਰਿ ਨਾਮੈ ਰਹੈ ਸਮਾਇ ॥੧॥
ਮਨ ਮੇਰੇ ਸਤਿਗੁਰ ਸਿਉ ਚਿਤੁ ਲਾਇ ॥
ਨਿਰਮਲੁ ਨਾਮੁ ਸਦ ਨਵਤਨੋ ਆਪਿ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਰਾਖਹੁ ਅਪੁਨੀ ਸਰਣਾਈ ਜਿਉ ਰਾਖਹਿ ਤਿਉ ਰਹਣਾ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਜੀਵਤੁ ਮਰੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਭਵਜਲੁ ਤਰਣਾ ॥੨॥
ਵਡੈ ਭਾਗਿ ਨਾਉ ਪਾਈਐ ਗੁਰਮਤਿ ਸਬਦਿ ਸੁਹਾਈ ॥
ਆਪੇ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਪ੍ਰਭੁ ਕਰਤਾ ਸਹਜੇ ਰਹਿਆ ਸਮਾਈ ॥੩॥
ਇਕਨਾ ਮਨਮੁਖਿ ਸਬਦੁ ਨ ਭਾਵੈ ਬੰਧਨਿ ਬੰਧਿ ਭਵਾਇਆ ॥
ਲਖ ਚਉਰਾਸੀਹ ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਆਵੈ ਬਿਰਥਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਇਆ ॥੪॥
ਭਗਤਾ ਮਨਿ ਆਨੰਦੁ ਹੈ ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਰੰਗਿ ਰਾਤੇ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਗੁਣ ਗਾਵਹਿ ਸਦ ਨਿਰਮਲ ਸਹਜੇ ਨਾਮਿ ਸਮਾਤੇ ॥੫॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਾਣੀ ਬੋਲਹਿ ਸਭ ਆਤਮ ਰਾਮੁ ਪਛਾਣੀ ॥
ਏਕੋ ਸੇਵਨਿ ਏਕੁ ਅਰਾਧਹਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਅਕਥ ਕਹਾਣੀ ॥੬॥
ਸਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਸੇਵੀਐ ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥
ਸਦਾ ਰੰਗਿ ਰਾਤੇ ਸਚ ਸਿਉ ਅਪੁਨੀ ਕਿਰਪਾ ਕਰੇ ਮਿਲਾਇ ॥੭॥
ਆਪੇ ਕਰੇ ਕਰਾਏ ਆਪੇ ਇਕਨਾ ਸੁਤਿਆ ਦੇਇ ਜਗਾਇ ॥
ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਇਦਾ ਨਾਨਕ ਸਬਦਿ ਸਮਾਇ ॥੮॥੭॥੨੪॥
सिरीरागु महला ३ ॥
सतिगुरि मिलिऐ फेरु न पवै जनम मरण दुखु जाइ ॥
पूरै सबदि सभ सोझी होई हरि नामै रहै समाइ ॥१॥
मन मेरे सतिगुर सिउ चितु लाइ ॥
निरमलु नामु सद नवतनो आपि वसै मनि आइ ॥१॥ रहाउ ॥
हरि जीउ राखहु अपुनी सरणाई जिउ राखहि तिउ रहणा ॥
गुर कै सबदि जीवतु मरै गुरमुखि भवजलु तरणा ॥२॥
वडै भागि नाउ पाईऐ गुरमति सबदि सुहाई ॥
आपे मनि वसिआ प्रभु करता सहजे रहिआ समाई ॥३॥
इकना मनमुखि सबदु न भावै बंधनि बंधि भवाइआ ॥
लख चउरासीह फिरि फिरि आवै बिरथा जनमु गवाइआ ॥४॥
भगता मनि आनंदु है सचै सबदि रंगि राते ॥
अनदिनु गुण गावहि सद निरमल सहजे नामि समाते ॥५॥
गुरमुखि अंम्रित बाणी बोलहि सभ आतम रामु पछाणी ॥
एको सेवनि एकु अराधहि गुरमुखि अकथ कहाणी ॥६॥
सचा साहिबु सेवीऐ गुरमुखि वसै मनि आइ ॥
सदा रंगि राते सच सिउ अपुनी किरपा करे मिलाइ ॥७॥
आपे करे कराए आपे इकना सुतिआ देइ जगाइ ॥
आपे मेलि मिलाइदा नानक सबदि समाइ ॥८॥७॥२४॥
सतिगुरि मिलिऐ फेरु न पवै जनम मरण दुखु जाइ ॥
पूरै सबदि सभ सोझी होई हरि नामै रहै समाइ ॥१॥
मन मेरे सतिगुर सिउ चितु लाइ ॥
निरमलु नामु सद नवतनो आपि वसै मनि आइ ॥१॥ रहाउ ॥
हरि जीउ राखहु अपुनी सरणाई जिउ राखहि तिउ रहणा ॥
गुर कै सबदि जीवतु मरै गुरमुखि भवजलु तरणा ॥२॥
वडै भागि नाउ पाईऐ गुरमति सबदि सुहाई ॥
आपे मनि वसिआ प्रभु करता सहजे रहिआ समाई ॥३॥
इकना मनमुखि सबदु न भावै बंधनि बंधि भवाइआ ॥
लख चउरासीह फिरि फिरि आवै बिरथा जनमु गवाइआ ॥४॥
भगता मनि आनंदु है सचै सबदि रंगि राते ॥
अनदिनु गुण गावहि सद निरमल सहजे नामि समाते ॥५॥
गुरमुखि अंम्रित बाणी बोलहि सभ आतम रामु पछाणी ॥
एको सेवनि एकु अराधहि गुरमुखि अकथ कहाणी ॥६॥
सचा साहिबु सेवीऐ गुरमुखि वसै मनि आइ ॥
सदा रंगि राते सच सिउ अपुनी किरपा करे मिलाइ ॥७॥
आपे करे कराए आपे इकना सुतिआ देइ जगाइ ॥
आपे मेलि मिलाइदा नानक सबदि समाइ ॥८॥७॥२४॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ३ ॥ यदि गुरू मिल जाए तो (चौरासी लाख योनियों वाला) फेरा नहीं पड़ता~ जनम मरन में पड़ने वाला दुख दूर हो जाता है। पूरे (अभुल) गुरू के शबद में जुड़ने से (सही जीवन की) समझ आ जाती है। (गुरू की शरण पड़ने वाला मनुष्य) परमात्मा के नाम में लीन टिका रहता है।1। हे मेरे मन ! गुरू से चिक्त जोड़। (गुरू की शरण पड़ने से) परमात्मा का पवित्र नाम सदा नए आनंद वाला लगता है~ और परमात्मा स्वयं मन में आ बसता है।1।रहाउ। हे प्रभू जी ! तू (जीवों को) अपनी शरण में रख। जिस आत्मिक अवस्था में तू (जीवों को) रखता है उसी में वह रहते हैं। गुरू के शबद में जुड़ के मनुष्य दुनिया में विचरते हुए ही विकारों से बचा रहता है। गुरू की शरण पड़ कर ही संसार समुंद्र से पार लांघ जाते हैं।2। (हे भाई !) परमात्मा का नाम बड़ी किस्मत से मिलता है। गुरू की मति पर चलने से~ गुरू के शबद में जुड़ने से जिंदगी सुंदर बन जाती है। करतार प्रभू स्वयं ही मन में आ बसता है। (गुरू के शबद से मनुष्य) सदा आत्मिक अडोलता में टिका रहता है।3। कई ऐसे हैं जो अपने मन के पीछे चलते हैं~ उन्हें गुरू का शबद प्यारा नहीं लगता। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (माया के) बंधन में बंध के (जनम मरण के चक्कर में) भटकाया जाता है। वह चौरासी लाख जूनियों में मुड़ मुड़ पैदा होता है~ और अपना (मानस) जनम व्यर्थ गवा लेता है।4। परमात्मा की भक्ति करने वाले बंदों के मन में आनंद बना रहता है। वह सदा सिथर प्रभू की सिफत सलाह के शबद में प्रभू के प्रेम रंग में रंगे रहते हैं। वे सदैव हर वक्त परमात्मा के पवित्र गुण गाते रहते हैं। (जिसकी बरकति से वे) आत्मिक अडोलता में व प्रभू नाम में लीन रहते हैं।5। गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य सारी सृष्टि में परमात्मा को बसा हुआ पहचान के आत्मिक जीवन देने वाली प्रभू की सिफत सलाह की बाणी उच्चारित करते हैं। गुरू की शरण पड़ कर वह मनुष्य सदा एक परमात्मा का ही सिमरन करते हैं। परमात्मा की ही आराधना करते हैं। और उस परमात्मा की ही कथा वार्ता करते हैं जिसके सारे गुण बखान नहीं हो सकते।6। (हे भाई !) सदा स्थिर रहने वाले मालिक प्रभू को सिमरना चाहिए। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर सिमरते हैं उनके मन में प्रभू आ बसता है। (वह भाग्यशाली मनुष्य) सदैव प्रभू के प्रेम रंग में रंगे रहते हैं। सदा स्थिर प्रभू के साथ जुड़े रहते हैं। प्रभू अपनी कृपा करके उनको अपने साथ मिला लेता है।7। (पर ये सारी खोज परमात्मा के अपने ही हाथ में है) प्रभू स्वयं ही (सभ जीवों का प्रेरक हो के सब कुछ) करता है। स्वयं ही (जीवों से) कराता है। माया की नींद में सोये हुए कई जीवों को भी प्रभू खुद ही जगा देता है। हे नानक ! गुरू के शबद में जोड़ के प्रभू स्वयं ही (उनको) अपने चरणों में मिला लेता है।8।7।24।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਸੇਵਿਐ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲਾ ਭਏ ਪਵਿਤੁ ਸਰੀਰ ॥
ਮਨਿ ਆਨੰਦੁ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਭੇਟਿਆ ਗਹਿਰ ਗੰਭੀਰੁ ॥
ਸਚੀ ਸੰਗਤਿ ਬੈਸਣਾ ਸਚਿ ਨਾਮਿ ਮਨੁ ਧੀਰ ॥੧॥
ਮਨ ਰੇ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਨਿਸੰਗੁ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿਐ ਹਰਿ ਮਨਿ ਵਸੈ ਲਗੈ ਨ ਮੈਲੁ ਪਤੰਗੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਪਤਿ ਊਪਜੈ ਸਚੇ ਸਚਾ ਨਾਉ ॥
ਜਿਨੀ ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ਪਛਾਣਿਆ ਹਉ ਤਿਨ ਬਲਿਹਾਰੈ ਜਾਉ ॥
ਮਨਮੁਖ ਸਚੁ ਨ ਜਾਣਨੀ ਤਿਨ ਠਉਰ ਨ ਕਤਹੂ ਥਾਉ ॥੨॥
ਸਚੁ ਖਾਣਾ ਸਚੁ ਪੈਨਣਾ ਸਚੇ ਹੀ ਵਿਚਿ ਵਾਸੁ ॥
ਸਦਾ ਸਚਾ ਸਾਲਾਹਣਾ ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਨਿਵਾਸੁ ॥
ਸਭੁ ਆਤਮ ਰਾਮੁ ਪਛਾਣਿਆ ਗੁਰਮਤੀ ਨਿਜ ਘਰਿ ਵਾਸੁ ॥੩॥
ਸਚੁ ਵੇਖਣੁ ਸਚੁ ਬੋਲਣਾ ਤਨੁ ਮਨੁ ਸਚਾ ਹੋਇ ॥
ਸਚੀ ਸਾਖੀ ਉਪਦੇਸੁ ਸਚੁ ਸਚੇ ਸਚੀ ਸੋਇ ॥
ਜਿੰਨੀ ਸਚੁ ਵਿਸਾਰਿਆ ਸੇ ਦੁਖੀਏ ਚਲੇ ਰੋਇ ॥੪॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਜਿਨੀ ਨ ਸੇਵਿਓ ਸੇ ਕਿਤੁ ਆਏ ਸੰਸਾਰਿ ॥
ਜਮ ਦਰਿ ਬਧੇ ਮਾਰੀਅਹਿ ਕੂਕ ਨ ਸੁਣੈ ਪੂਕਾਰ ॥
ਬਿਰਥਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਇਆ ਮਰਿ ਜੰਮਹਿ ਵਾਰੋ ਵਾਰ ॥੫॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਸੇਵਿਐ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲਾ ਭਏ ਪਵਿਤੁ ਸਰੀਰ ॥
ਮਨਿ ਆਨੰਦੁ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਭੇਟਿਆ ਗਹਿਰ ਗੰਭੀਰੁ ॥
ਸਚੀ ਸੰਗਤਿ ਬੈਸਣਾ ਸਚਿ ਨਾਮਿ ਮਨੁ ਧੀਰ ॥੧॥
ਮਨ ਰੇ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਨਿਸੰਗੁ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿਐ ਹਰਿ ਮਨਿ ਵਸੈ ਲਗੈ ਨ ਮੈਲੁ ਪਤੰਗੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਪਤਿ ਊਪਜੈ ਸਚੇ ਸਚਾ ਨਾਉ ॥
ਜਿਨੀ ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ਪਛਾਣਿਆ ਹਉ ਤਿਨ ਬਲਿਹਾਰੈ ਜਾਉ ॥
ਮਨਮੁਖ ਸਚੁ ਨ ਜਾਣਨੀ ਤਿਨ ਠਉਰ ਨ ਕਤਹੂ ਥਾਉ ॥੨॥
ਸਚੁ ਖਾਣਾ ਸਚੁ ਪੈਨਣਾ ਸਚੇ ਹੀ ਵਿਚਿ ਵਾਸੁ ॥
ਸਦਾ ਸਚਾ ਸਾਲਾਹਣਾ ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਨਿਵਾਸੁ ॥
ਸਭੁ ਆਤਮ ਰਾਮੁ ਪਛਾਣਿਆ ਗੁਰਮਤੀ ਨਿਜ ਘਰਿ ਵਾਸੁ ॥੩॥
ਸਚੁ ਵੇਖਣੁ ਸਚੁ ਬੋਲਣਾ ਤਨੁ ਮਨੁ ਸਚਾ ਹੋਇ ॥
ਸਚੀ ਸਾਖੀ ਉਪਦੇਸੁ ਸਚੁ ਸਚੇ ਸਚੀ ਸੋਇ ॥
ਜਿੰਨੀ ਸਚੁ ਵਿਸਾਰਿਆ ਸੇ ਦੁਖੀਏ ਚਲੇ ਰੋਇ ॥੪॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਜਿਨੀ ਨ ਸੇਵਿਓ ਸੇ ਕਿਤੁ ਆਏ ਸੰਸਾਰਿ ॥
ਜਮ ਦਰਿ ਬਧੇ ਮਾਰੀਅਹਿ ਕੂਕ ਨ ਸੁਣੈ ਪੂਕਾਰ ॥
ਬਿਰਥਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਇਆ ਮਰਿ ਜੰਮਹਿ ਵਾਰੋ ਵਾਰ ॥੫॥
सिरीरागु महला ३ ॥
सतिगुरि सेविऐ मनु निरमला भए पवितु सरीर ॥
मनि आनंदु सदा सुखु पाइआ भेटिआ गहिर गंभीरु ॥
सची संगति बैसणा सचि नामि मनु धीर ॥१॥
मन रे सतिगुरु सेवि निसंगु ॥
सतिगुरु सेविऐ हरि मनि वसै लगै न मैलु पतंगु ॥१॥ रहाउ ॥
सचै सबदि पति ऊपजै सचे सचा नाउ ॥
जिनी हउमै मारि पछाणिआ हउ तिन बलिहारै जाउ ॥
मनमुख सचु न जाणनी तिन ठउर न कतहू थाउ ॥२॥
सचु खाणा सचु पैनणा सचे ही विचि वासु ॥
सदा सचा सालाहणा सचै सबदि निवासु ॥
सभु आतम रामु पछाणिआ गुरमती निज घरि वासु ॥३॥
सचु वेखणु सचु बोलणा तनु मनु सचा होइ ॥
सची साखी उपदेसु सचु सचे सची सोइ ॥
जिंनी सचु विसारिआ से दुखीए चले रोइ ॥४॥
सतिगुरु जिनी न सेविओ से कितु आए संसारि ॥
जम दरि बधे मारीअहि कूक न सुणै पूकार ॥
बिरथा जनमु गवाइआ मरि जंमहि वारो वार ॥५॥
सतिगुरि सेविऐ मनु निरमला भए पवितु सरीर ॥
मनि आनंदु सदा सुखु पाइआ भेटिआ गहिर गंभीरु ॥
सची संगति बैसणा सचि नामि मनु धीर ॥१॥
मन रे सतिगुरु सेवि निसंगु ॥
सतिगुरु सेविऐ हरि मनि वसै लगै न मैलु पतंगु ॥१॥ रहाउ ॥
सचै सबदि पति ऊपजै सचे सचा नाउ ॥
जिनी हउमै मारि पछाणिआ हउ तिन बलिहारै जाउ ॥
मनमुख सचु न जाणनी तिन ठउर न कतहू थाउ ॥२॥
सचु खाणा सचु पैनणा सचे ही विचि वासु ॥
सदा सचा सालाहणा सचै सबदि निवासु ॥
सभु आतम रामु पछाणिआ गुरमती निज घरि वासु ॥३॥
सचु वेखणु सचु बोलणा तनु मनु सचा होइ ॥
सची साखी उपदेसु सचु सचे सची सोइ ॥
जिंनी सचु विसारिआ से दुखीए चले रोइ ॥४॥
सतिगुरु जिनी न सेविओ से कितु आए संसारि ॥
जम दरि बधे मारीअहि कूक न सुणै पूकार ॥
बिरथा जनमु गवाइआ मरि जंमहि वारो वार ॥५॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ३ ॥ यदि गुरू का पल्ला पकड़े रखें~ तो मन पवित्र हो जाता है (भाव~ ज्ञानेंद्रियां विकारों से हटी रहतीं हैं)। (जो मनुष्य गुरू के दर पे आ जाता है उस के) मन में आनंद पैदा होता है~ वह सदा के लिए आत्मिक सुख भोगता है। उसको गहरा और बड़े जिगरे वाला परमात्मा मिल जाता है। सदा स्थिर प्रभू की संगति में टिके रहने से मन सदा स्थिर रहने वाले प्रभू के नाम में टिकाव हासिल कर लेता है।1। हे मेरे मन ! शर्म छोड़ के गुरू की शरण पड़। (हे भाई !) गुरू की शरण पड़ने से परमात्मा मन में आ बसता है~ और (मन को विकारों की) रक्ती भर भी मैल नहीं लगती।1।रहाउ। स्दा स्थिर प्रभू की सिफत सलाह के शबद में जुड़ने से (लोक परलोक में) इज्जत मिलती है। सदा स्थिर रहने वाले प्रभू का सदा स्थिर नाम मिल जाता है। मैं उन लोगों के सदके जाता हूँ जिन्होंने (अपने अंदर से) अहंकार को दूर करके परमात्मा के साथ गहरी सांझ बनायी है। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य सदा स्थिर प्रभू के साथ जान पहिचान नहीं बना सकते (इस वास्ते आत्मिक शांति के वास्ते) उन्हें और कोई जगह नहीं मिलती।2। सदा स्थिर प्रभू का नाम जिन मनुष्यों की आत्मिक खुराक बन गया है~ प्रभू का नाम ही जिन की पोशाक है (आदर सत्कार हासिल करने की तरीका है)~ जिन की सुरति सदा स्थिर प्रभू में जुड़ी रहती है~ जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभू की सदा सिफति सलाह करते रहते हैं ~ सदा कायम रहने वाले परमात्मा के शबद में जिनका मन टिका रहता है~ उन्होंने हर जगह सर्व-व्यापक परमात्मा को बसता पहिचान लिया है ~ गुरू की मति पे चल के उनकी सुरति अंतरात्मे टिकी रहती है।3। जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभू को हर जगह देखता है। सदा स्थिर प्रभू ही जिसको हर जगह बोलता दिखता है। उसका शरीर (माया के हमलों से) अडोल रहता है उसका मन (विकारों के हमलों से) अडोल हो जाता है। सदा स्थिर प्रभू के सिमरन की ही वह शिक्षा व उपदेश ग्रहण करता है। सदा स्थिर प्रभू का रूप हो चुके उस (भाग्यशाली मनुष्य) की शोभा अटल हो जाती है। पर जिन मनुष्यों ने सदा स्थिर प्रभू को (यहां) भुलाए रखा~ वह यहां भी दुखी रहे~ और यहां से चले भी तो दुखी हो हो के।4। जिन लोगों ने सतिगुरू का पल्ला ना पकड़ा उनका संसार में आना व्यर्थ गया। उन्हें यम के दरवाजे पे बांध कर मारा कूटा जाता है~ कोई उनकी चीख पुकार की ओर ध्यान नहीं देता। उन्होंने मानस जन्म व्यर्थ गवा दिया और फिर बार बार पैदा होते मरते रहते हैं।5।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 69 है, राग Siree Raag का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
Rajiv Chowk metro station की platform पर 9 PM की भीड़।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 37 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 69” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Siree Raag राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 70 →, पीछे का: ← अंग 68।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।