अंग 66

अंग
66
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਪੰਖੀ ਬਿਰਖਿ ਸੁਹਾਵੜਾ ਸਚੁ ਚੁਗੈ ਗੁਰ ਭਾਇ ॥
ਹਰਿ ਰਸੁ ਪੀਵੈ ਸਹਜਿ ਰਹੈ ਉਡੈ ਨ ਆਵੈ ਜਾਇ ॥
ਨਿਜ ਘਰਿ ਵਾਸਾ ਪਾਇਆ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਸਮਾਇ ॥੧॥
ਮਨ ਰੇ ਗੁਰ ਕੀ ਕਾਰ ਕਮਾਇ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਭਾਣੈ ਜੇ ਚਲਹਿ ਤਾ ਅਨਦਿਨੁ ਰਾਚਹਿ ਹਰਿ ਨਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪੰਖੀ ਬਿਰਖ ਸੁਹਾਵੜੇ ਊਡਹਿ ਚਹੁ ਦਿਸਿ ਜਾਹਿ ॥
ਜੇਤਾ ਊਡਹਿ ਦੁਖ ਘਣੇ ਨਿਤ ਦਾਝਹਿ ਤੈ ਬਿਲਲਾਹਿ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਮਹਲੁ ਨ ਜਾਪਈ ਨਾ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਫਲ ਪਾਹਿ ॥੨॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਬ੍ਰਹਮੁ ਹਰੀਆਵਲਾ ਸਾਚੈ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥
ਸਾਖਾ ਤੀਨਿ ਨਿਵਾਰੀਆ ਏਕ ਸਬਦਿ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਫਲੁ ਹਰਿ ਏਕੁ ਹੈ ਆਪੇ ਦੇਇ ਖਵਾਇ ॥੩॥
ਮਨਮੁਖ ਊਭੇ ਸੁਕਿ ਗਏ ਨਾ ਫਲੁ ਤਿੰਨਾ ਛਾਉ ॥
ਤਿੰਨਾ ਪਾਸਿ ਨ ਬੈਸੀਐ ਓਨਾ ਘਰੁ ਨ ਗਿਰਾਉ ॥
ਕਟੀਅਹਿ ਤੈ ਨਿਤ ਜਾਲੀਅਹਿ ਓਨਾ ਸਬਦੁ ਨ ਨਾਉ ॥੪॥
ਹੁਕਮੇ ਕਰਮ ਕਮਾਵਣੇ ਪਇਐ ਕਿਰਤਿ ਫਿਰਾਉ ॥
ਹੁਕਮੇ ਦਰਸਨੁ ਦੇਖਣਾ ਜਹ ਭੇਜਹਿ ਤਹ ਜਾਉ ॥
ਹੁਕਮੇ ਹਰਿ ਹਰਿ ਮਨਿ ਵਸੈ ਹੁਕਮੇ ਸਚਿ ਸਮਾਉ ॥੫॥
ਹੁਕਮੁ ਨ ਜਾਣਹਿ ਬਪੁੜੇ ਭੂਲੇ ਫਿਰਹਿ ਗਵਾਰ ॥
ਮਨਹਠਿ ਕਰਮ ਕਮਾਵਦੇ ਨਿਤ ਨਿਤ ਹੋਹਿ ਖੁਆਰੁ ॥
ਅੰਤਰਿ ਸਾਂਤਿ ਨ ਆਵਈ ਨਾ ਸਚਿ ਲਗੈ ਪਿਆਰੁ ॥੬॥
ਗੁਰਮੁਖੀਆ ਮੁਹ ਸੋਹਣੇ ਗੁਰ ਕੈ ਹੇਤਿ ਪਿਆਰਿ ॥
ਸਚੀ ਭਗਤੀ ਸਚਿ ਰਤੇ ਦਰਿ ਸਚੈ ਸਚਿਆਰ ॥
ਆਏ ਸੇ ਪਰਵਾਣੁ ਹੈ ਸਭ ਕੁਲ ਕਾ ਕਰਹਿ ਉਧਾਰੁ ॥੭॥
ਸਭ ਨਦਰੀ ਕਰਮ ਕਮਾਵਦੇ ਨਦਰੀ ਬਾਹਰਿ ਨ ਕੋਇ ॥
ਜੈਸੀ ਨਦਰਿ ਕਰਿ ਦੇਖੈ ਸਚਾ ਤੈਸਾ ਹੀ ਕੋ ਹੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਵਡਾਈਆ ਕਰਮਿ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਇ ॥੮॥੩॥੨੦॥
सिरीरागु महला ३ ॥
पंखी बिरखि सुहावड़ा सचु चुगै गुर भाइ ॥
हरि रसु पीवै सहजि रहै उडै न आवै जाइ ॥
निज घरि वासा पाइआ हरि हरि नामि समाइ ॥१॥
मन रे गुर की कार कमाइ ॥
गुर कै भाणै जे चलहि ता अनदिनु राचहि हरि नाइ ॥१॥ रहाउ ॥
पंखी बिरख सुहावड़े ऊडहि चहु दिसि जाहि ॥
जेता ऊडहि दुख घणे नित दाझहि तै बिललाहि ॥
बिनु गुर महलु न जापई ना अंम्रित फल पाहि ॥२॥
गुरमुखि ब्रहमु हरीआवला साचै सहजि सुभाइ ॥
साखा तीनि निवारीआ एक सबदि लिव लाइ ॥
अंम्रित फलु हरि एकु है आपे देइ खवाइ ॥३॥
मनमुख ऊभे सुकि गए ना फलु तिंना छाउ ॥
तिंना पासि न बैसीऐ ओना घरु न गिराउ ॥
कटीअहि तै नित जालीअहि ओना सबदु न नाउ ॥४॥
हुकमे करम कमावणे पइऐ किरति फिराउ ॥
हुकमे दरसनु देखणा जह भेजहि तह जाउ ॥
हुकमे हरि हरि मनि वसै हुकमे सचि समाउ ॥५॥
हुकमु न जाणहि बपुड़े भूले फिरहि गवार ॥
मनहठि करम कमावदे नित नित होहि खुआरु ॥
अंतरि सांति न आवई ना सचि लगै पिआरु ॥६॥
गुरमुखीआ मुह सोहणे गुर कै हेति पिआरि ॥
सची भगती सचि रते दरि सचै सचिआर ॥
आए से परवाणु है सभ कुल का करहि उधारु ॥७॥
सभ नदरी करम कमावदे नदरी बाहरि न कोइ ॥
जैसी नदरि करि देखै सचा तैसा ही को होइ ॥
नानक नामि वडाईआ करमि परापति होइ ॥८॥३॥२०॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ३ ॥ जो जीव-पंछी इस शरीर वृक्ष पर बैठा हुआ गुरू के प्रेम में रह के सदा स्थिर प्रभू के नाम का चोगा चुगता है~ वह खूबसूरत जीवन वाला हो जाता है। वह परमात्मा के नाम का रस पीता है। आत्मक अडोलता में टिका रहता है। (माया पदार्थों के चोगे की तरफ) भटकता नहीं फिरता~ (इस वास्ते) जनम मरण के चक्कर से बचा रहता है। उसको अपने (असल) घर में (प्रभू चरणों में) निवास मिला रहता है। वह सदा प्रभू के नाम में लीन रहता है।1। हे मेरे मन ! गुरू की बताई कार कर। अगर तू गुरू के हुकम में चलेगा~ तो तू हर समय परमात्मा के नाम में जुड़ा रहेगा।1।रहाउ। जो जीव-पंछी (अपने अपने) शरीर वृक्षों पर (बैठे देखने में तो) सुंदर लगते हैं (पर माया के पदार्थों के चोगे के पीछे) उड़ते फिरते हैं~ चारों तरफ भटकते हैं। वे जितना भी (चोगे के पीछे) उड़ते हैं~ उतना ही ज्यादा दुख पाते हैं। सदा खिझते हैं और बिलकते हैं। गुरू की शरण के बगैर उन्हें (परमात्मा का) ठिकाना नहीं दिखता~ और ना ही वह आत्मिक जीवन देने वाला नाम फल प्राप्त कर सकते हैं।2। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य परमात्मा का रूप हो जाता है। वह जैसे एक हरा-भरा पेड़ है। (वह भाग्यशाली मनुष्य) सदा स्थिर प्रभू में जुड़ा रहता है।~ आत्मिक अडोलता में टिका रहता है~ प्रभू के प्रेम में मगन रहता है। परमात्मा के सिफत सलाह के शबद में सुरति जोड़ के (माया के तीन रूप) तीन टहनियां उसने दूर कर ली हैं। उसको आत्मिक जीवन देने वाला सिर्फ एक नाम फल लगता है। (प्रभू मेहर करके) खुद ही (उसको यह फल) चखा देता है।3। (पर) अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य~ जैसे~ वह वृक्ष हैं जो खड़े खड़े ही सूख गए हैं। उनको ना ही फल लगता है~ ना ही उनकी छाया होती है~ (भाव~ ना ही उनके पास प्रभू का नाम है~ और ना ही वे किसी की सेवा करते हैं)। उनके पास बैठना ही नहीं चाहिए~ उनका कोई घर घाट नहीं। (उनको कोई आत्मिक सहारा नहीं मिलता)। वह (मनमुख वृक्ष) सदा काटे जाते हैं और जलाए जाते हैं (भाव~ माया के मोह के कारण वे नित्य दुखी रहते हैं)। उनके पास ना प्रभू की सिफत सलाह है~ ना ही प्रभू का नाम है।4। (पर~ हे प्रभू ! जीवों के भी क्या बस? तेरे) हुकम में ही (जीव) कर्म कमाते हैं। (तेरे हुकम में ही) पिछले किये कर्मों के संस्कारों के अनुसार उनको जनम मरण का फेरा पड़ा रहता है। तेरे हुकम अनुसार ही कई जीवों को तेरा दर्शन प्राप्त होता है। जिधर तू भेजता है~ उधर जाना पड़ता है। तेरे हुकम अनुसार ही कई जीवों के मन में तेरा हरि नाम बसता है। तेरे हुकम में ही तेरे सदा स्थिर स्वरूप में उनकी लीनता बनी रहती है।5। कई ऐसे बिचारे मनुष्य हैं जो परमात्मा का हुकम नहीं समझते~ वह (माया के मोह के कारण) गलत रास्ते पर पड़के भटकते फिरते हैं। वह (गुरू का आसरा छोड़ के अपने) मन के हठ से (कई किस्म के निहित धार्मिक) कर्म करते है~ (पर विकारों में फंसे हुए) सदा खुआर रहते हैं। उनके मन में शांति नहीं आती~ ना ही उनका सदा स्थिर प्रभू में प्यार बनता है।6। गुरू के सन्मुख रहने वाले लोगों के मुंह (नाम की लाली से) सुंदर लगते हैं~ क्योंकि वह गुरू के प्रेम में गुरू के प्यार में टिके रहते हैं। वह प्रभू की सदा स्थिर रहने वाली भक्ति करते हैं। वह सदा स्थिर प्रभू (के प्रेम रंग) में रंगे रहते हैं। (इस वास्ते वह) सदा स्थिर प्रभू के दर पे सुर्खरू रहते हैं। उन लोगों का ही जगत में आना कबूल है~ वह अपने सारे कुल का भी पार उतारा कर लेते हैं।7। (पर~ जीवों के भी बस की भी बात नहीं) सारे जीव परमात्मा की निगाह मुताबक ही करम करते हैं। उसकी निगाह से बाहर कोई जीव नहीं~ (भाव~ कोई जीव परमात्मा से आकी हो के कुछ नहीं कर सकता)। सदा स्थिर रहने वाला प्रभू जैसी निगाह करके किसी जीव की ओर देखता है~ वह जीव वैसा ही बन जाता है। हे नानक ! (उस की मेहर की नजर से जो मनुष्य उसके नाम में जुड़ता है)~ उसको आदर सम्मान मिलता है। पर उसका नाम उसकी बख्शिश से ही मिलता है।8।3।20।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈਐ ਮਨਮੁਖਿ ਬੂਝ ਨ ਪਾਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਦਾ ਮੁਖ ਊਜਲੇ ਹਰਿ ਵਸਿਆ ਮਨਿ ਆਇ ॥
ਸਹਜੇ ਹੀ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ਸਹਜੇ ਰਹੈ ਸਮਾਇ ॥੧॥
ਭਾਈ ਰੇ ਦਾਸਨਿ ਦਾਸਾ ਹੋਇ ॥
ਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ਗੁਰ ਭਗਤਿ ਹੈ ਵਿਰਲਾ ਪਾਏ ਕੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਦਾ ਸੁਹਾਗੁ ਸੁਹਾਗਣੀ ਜੇ ਚਲਹਿ ਸਤਿਗੁਰ ਭਾਇ ॥
ਸਦਾ ਪਿਰੁ ਨਿਹਚਲੁ ਪਾਈਐ ਨਾ ਓਹੁ ਮਰੈ ਨ ਜਾਇ ॥
ਸਬਦਿ ਮਿਲੀ ਨਾ ਵੀਛੁੜੈ ਪਿਰ ਕੈ ਅੰਕਿ ਸਮਾਇ ॥੨॥
ਹਰਿ ਨਿਰਮਲੁ ਅਤਿ ਊਜਲਾ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਪਾਇਆ ਨ ਜਾਇ ॥
ਪਾਠੁ ਪੜੈ ਨਾ ਬੂਝਈ ਭੇਖੀ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਇ ॥
ਗੁਰਮਤੀ ਹਰਿ ਸਦਾ ਪਾਇਆ ਰਸਨਾ ਹਰਿ ਰਸੁ ਸਮਾਇ ॥੩॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਚੁਕਾਇਆ ਗੁਰਮਤੀ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥
सिरीरागु महला ३ ॥
गुरमुखि नामु धिआईऐ मनमुखि बूझ न पाइ ॥
गुरमुखि सदा मुख ऊजले हरि वसिआ मनि आइ ॥
सहजे ही सुखु पाईऐ सहजे रहै समाइ ॥१॥
भाई रे दासनि दासा होइ ॥
गुर की सेवा गुर भगति है विरला पाए कोइ ॥१॥ रहाउ ॥
सदा सुहागु सुहागणी जे चलहि सतिगुर भाइ ॥
सदा पिरु निहचलु पाईऐ ना ओहु मरै न जाइ ॥
सबदि मिली ना वीछुड़ै पिर कै अंकि समाइ ॥२॥
हरि निरमलु अति ऊजला बिनु गुर पाइआ न जाइ ॥
पाठु पड़ै ना बूझई भेखी भरमि भुलाइ ॥
गुरमती हरि सदा पाइआ रसना हरि रसु समाइ ॥३॥
माइआ मोहु चुकाइआ गुरमती सहजि सुभाइ ॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ३ ॥ गुरू के शरण पड़ने से (ही) परमात्मा का नाम सिमरा जा सकता है। अपने मन के पीछे चलने से (सिमरन की) सूझ नहीं पड़ती। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ते हैं~ वह (लोक परलोक में) सदा सुर्खरू रहते हैं~ उनके मन में परमात्मा आ बसता है (और उनके अंदर आत्मिक अडोलता बन जाती है)। आत्मिक अडोलता से ही आत्मिक आनंद मिलता है। (गुरू की शरण पड़ने से मनुष्य सदा) आत्मिक अडोलता में लीन रहता है।1। हे भाई ! परमात्मा के सेवकों का सेवक बन- यही है गुरू की बताई सेवा~ यह है गुरू की (बताई) भक्ति। (ये दात) किसी विरले (भाग्यशाली) को मिलती है।1।रहाउ। जो जीव-सि्त्रयां गुरू के प्रेम में (टिक के जीवन राह पर) चलती हैं~ वे परमात्मा पति की प्रसन्नता के सौभाग्य वाली बन जाती हैं। उनका यह सौभाग्य सदा कायम रहता है। (गुरू की शरण पड़ने से) वह पति प्रभू मिल जाता है जो सदा अटल है~ जो ना मरता है~ ना कभी पैदा होता है। जो जीव-स्त्री गुरू के शबद द्वारा उस प्रभू में मिलती है~ वह पुनः उससे कभी बिछुड़ती नहीं। वह सदा प्रभू पति की गोद में समाई रहती है।2। परमात्मा पवित्र स्वरूप है~ बहुत ही पवित्र स्वरूप है। गुरू की शरण के बिना उससे मिलाप नहीं हो सकता। (जो मनुष्य धार्मिक पुस्तकों का) निरा पाठ (ही) पढ़ता है~ (वह इस भेद को) नहीं समझता~ (निरे) धार्मिक भेखों से (बल्कि) भटकन में पड़ कर गलत राह पर पड़ जाते हैं। गुरू की मति पर चल कर ही सदा परमात्मा मिलता है~ और (मनुष्य की) जीभ में परमात्मा के नाम का स्वाद टिका रहता है।3। (जो मनुष्य) गुरू की मति के अनुसार (चलता है वह अपने अंदर से) माया का मोह मार लेता है (वह) आत्मिक अडोलता में (टिक जाता है~ वह प्रभू के) प्रेम में (लीन रहता है)।

संदर्भ: यह अंग 66 है, राग Siree Raag का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।

Karol Bagh की shopping street की भीड़, और घर लौटते वक़्त की थकान।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 40 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 66” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Siree Raag राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 67 →, पीछे का: ← अंग 65

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।