अंग 65

अंग
65
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਗੁਣ ਨਿਧਾਨੁ ਪਾਇਆ ਤਿਸ ਕੀ ਕੀਮ ਨ ਪਾਈ ॥
ਪ੍ਰਭੁ ਸਖਾ ਹਰਿ ਜੀਉ ਮੇਰਾ ਅੰਤੇ ਹੋਇ ਸਖਾਈ ॥੩॥
ਪੇਈਅੜੈ ਜਗਜੀਵਨੁ ਦਾਤਾ ਮਨਮੁਖਿ ਪਤਿ ਗਵਾਈ ॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਕੋ ਮਗੁ ਨ ਜਾਣੈ ਅੰਧੇ ਠਉਰ ਨ ਕਾਈ ॥
ਹਰਿ ਸੁਖਦਾਤਾ ਮਨਿ ਨਹੀ ਵਸਿਆ ਅੰਤਿ ਗਇਆ ਪਛੁਤਾਈ ॥੪॥
ਪੇਈਅੜੈ ਜਗਜੀਵਨੁ ਦਾਤਾ ਗੁਰਮਤਿ ਮੰਨਿ ਵਸਾਇਆ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਭਗਤਿ ਕਰਹਿ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਹਉਮੈ ਮੋਹੁ ਚੁਕਾਇਆ ॥
ਜਿਸੁ ਸਿਉ ਰਾਤਾ ਤੈਸੋ ਹੋਵੈ ਸਚੇ ਸਚਿ ਸਮਾਇਆ ॥੫॥
ਆਪੇ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਭਾਉ ਲਾਏ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਬੀਚਾਰਿ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿਐ ਸਹਜੁ ਊਪਜੈ ਹਉਮੈ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਮਾਰਿ ॥
ਹਰਿ ਗੁਣਦਾਤਾ ਸਦ ਮਨਿ ਵਸੈ ਸਚੁ ਰਖਿਆ ਉਰ ਧਾਰਿ ॥੬॥
ਪ੍ਰਭੁ ਮੇਰਾ ਸਦਾ ਨਿਰਮਲਾ ਮਨਿ ਨਿਰਮਲਿ ਪਾਇਆ ਜਾਇ ॥
ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਹਰਿ ਮਨਿ ਵਸੈ ਹਉਮੈ ਦੁਖੁ ਸਭੁ ਜਾਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਸਬਦੁ ਸੁਣਾਇਆ ਹਉ ਸਦ ਬਲਿਹਾਰੈ ਜਾਉ ॥੭॥
ਆਪਣੈ ਮਨਿ ਚਿਤਿ ਕਹੈ ਕਹਾਏ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਆਪੁ ਨ ਜਾਈ ॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਭਗਤਿ ਵਛਲੁ ਸੁਖਦਾਤਾ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਮੰਨਿ ਵਸਾਈ ॥
ਨਾਨਕ ਸੋਭਾ ਸੁਰਤਿ ਦੇਇ ਪ੍ਰਭੁ ਆਪੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਦੇ ਵਡਿਆਈ ॥੮॥੧॥੧੮॥
सतिगुरु सेवि गुण निधानु पाइआ तिस की कीम न पाई ॥
प्रभु सखा हरि जीउ मेरा अंते होइ सखाई ॥३॥
पेईअड़ै जगजीवनु दाता मनमुखि पति गवाई ॥
बिनु सतिगुर को मगु न जाणै अंधे ठउर न काई ॥
हरि सुखदाता मनि नही वसिआ अंति गइआ पछुताई ॥४॥
पेईअड़ै जगजीवनु दाता गुरमति मंनि वसाइआ ॥
अनदिनु भगति करहि दिनु राती हउमै मोहु चुकाइआ ॥
जिसु सिउ राता तैसो होवै सचे सचि समाइआ ॥५॥
आपे नदरि करे भाउ लाए गुर सबदी बीचारि ॥
सतिगुरु सेविऐ सहजु ऊपजै हउमै त्रिसना मारि ॥
हरि गुणदाता सद मनि वसै सचु रखिआ उर धारि ॥६॥
प्रभु मेरा सदा निरमला मनि निरमलि पाइआ जाइ ॥
नामु निधानु हरि मनि वसै हउमै दुखु सभु जाइ ॥
सतिगुरि सबदु सुणाइआ हउ सद बलिहारै जाउ ॥७॥
आपणै मनि चिति कहै कहाए बिनु गुर आपु न जाई ॥
हरि जीउ भगति वछलु सुखदाता करि किरपा मंनि वसाई ॥
नानक सोभा सुरति देइ प्रभु आपे गुरमुखि दे वडिआई ॥८॥१॥१८॥

हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य ने गुरू की शरण पड़ कर गुणों का खजाना परमात्मा से प्राप्त कर लिया है~ उस (की शोभा) का मुल्य नहीं पड़ सकता। प्यारा प्रभू जो (असल में) मित्र है अंत समय (जब अन्य सभी साक-संबंधी साथ छोड़ देते हैं उसका) साथी बनता है।3। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य ने (इस) पिता के घर में (इस लोक में) उस परमात्मा को (बिसार के) जो सभ दातें देने वाला है और जो जगत के सारे जीवों की जिंदगी का सहारा है~ अपनी इज्जत गवा ली है। मनुष्य (जीवन का सही) रास्ता नहीं समझ सकता~ (माया के मोह में) अंधे हुए मनुष्य को कहीं कोई सहारा नहीं मिलता। जिस मनुष्य के मन में सारे सुख देने वाला परमात्मा नहीं बसता~ वह अंत समय यहां से पछताता जाता है।4। जिन मनुष्यों ने इस जीवन में ही जगत जीवन दातार प्रभू को गुरू की मति ले के अपने मन में बसाया है~ वह दिन रात हर वक्त परमात्मा की भक्ति करते हैं~ वह (अपने अंदर से) अहम् और माया का मोह दूर कर लेते हैं। (ये एक कुदरती नियम है कि जो मनुष्य) जिसके प्रेम में रंगा जाता है वह उसी जैसा हो जाता है (सो~ सदा स्थिर प्रभू के प्रेम में रंगा हुआ मनुष्य) सदा स्थिर प्रभू में ही लीन रहता है।5। जिस मनुष्य पर प्रभू स्वयं ही मेहर की निगाह करता है~ उसके अंदर अपना प्यार पैदा करता है~ और वह मनुष्य गुरू के शबद के द्वारा (प्रभू के गुणों की) विचार करता है। सतिगुरू की शरण पड़ने से अहम् मार के और माया की तृष्णा खत्म करके आत्मिक अडोलता पैदा होती है। (जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है) सारे गुणों का दाता परमात्मा सदा उसके मन में बसता है। सदा स्थिर रहने वाले प्रभू को वह मनुष्य अपने हृदय में टिकाए रहता है।6। प्यारा परमात्मा सदा ही पवित्र स्वरूप रहता है (इस वास्ते) पवित्र मन से ही उससे मिला जा सकता है। परमात्मा का नाम (जो सारे गुणों का) खजाना (है) जिस मनुष्य के मन में बस जाता है~ उसके सारे का सारा अहंकार का दुख दूर हो जाता है। मैं (भाग्यशाली मनुष्य से) सदा कुर्बान जाता हूँ~ जिसे सतिगुरू ने सिफत सलाह का शबद सुना दिया है~ (भाव~ जिसकी सुरति गुरू ने सिफत सलाह में जोड़ दी है)।7। (बेशक कोई मनुष्य) अपने मन में अपने चिक्त मेंये कहे (कि मैंने अपने अंदर से स्वैभाव दूर कर लिया है~ औरों से भी यही) कहलवा ले (कि इसने स्वैभाव दूर कर लिया है~ पर) गुरू की शरण पड़े बिना स्वै भाव दूर नहीं होता। परमात्मा (अपनी) भक्ति से प्यार करने वाला है~ (जीवों को) सारे सुख देने वाला है। जिस मनुष्य पर वह कृपा करता है वह ही (उसको अपने) मन में बसाता है। हे नानक ! परमात्मा (जीव को) गुरू की शरण पड़ कर स्वयं ही (सिफत सलाह वाली) सुरति बख्शता है और फिर स्वयं ही उसे (लोक परलोक में) शोभा व उपमा देता है।8।1।18।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਹਉਮੈ ਕਰਮ ਕਮਾਵਦੇ ਜਮਡੰਡੁ ਲਗੈ ਤਿਨ ਆਇ ॥
ਜਿ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਨਿ ਸੇ ਉਬਰੇ ਹਰਿ ਸੇਤੀ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥੧॥
ਮਨ ਰੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇ ॥
ਧੁਰਿ ਪੂਰਬਿ ਕਰਤੈ ਲਿਖਿਆ ਤਿਨਾ ਗੁਰਮਤਿ ਨਾਮਿ ਸਮਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਵਿਣੁ ਸਤਿਗੁਰ ਪਰਤੀਤਿ ਨ ਆਵਈ ਨਾਮਿ ਨ ਲਾਗੋ ਭਾਉ ॥
ਸੁਪਨੈ ਸੁਖੁ ਨ ਪਾਵਈ ਦੁਖ ਮਹਿ ਸਵੈ ਸਮਾਇ ॥੨॥
ਜੇ ਹਰਿ ਹਰਿ ਕੀਚੈ ਬਹੁਤੁ ਲੋਚੀਐ ਕਿਰਤੁ ਨ ਮੇਟਿਆ ਜਾਇ ॥
ਹਰਿ ਕਾ ਭਾਣਾ ਭਗਤੀ ਮੰਨਿਆ ਸੇ ਭਗਤ ਪਏ ਦਰਿ ਥਾਇ ॥੩॥
ਗੁਰੁ ਸਬਦੁ ਦਿੜਾਵੈ ਰੰਗ ਸਿਉ ਬਿਨੁ ਕਿਰਪਾ ਲਇਆ ਨ ਜਾਇ ॥
ਜੇ ਸਉ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਨੀਰੀਐ ਭੀ ਬਿਖੁ ਫਲੁ ਲਾਗੈ ਧਾਇ ॥੪॥
ਸੇ ਜਨ ਸਚੇ ਨਿਰਮਲੇ ਜਿਨ ਸਤਿਗੁਰ ਨਾਲਿ ਪਿਆਰੁ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਕਾ ਭਾਣਾ ਕਮਾਵਦੇ ਬਿਖੁ ਹਉਮੈ ਤਜਿ ਵਿਕਾਰੁ ॥੫॥
ਮਨਹਠਿ ਕਿਤੈ ਉਪਾਇ ਨ ਛੂਟੀਐ ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ ਸਾਸਤ੍ਰ ਸੋਧਹੁ ਜਾਇ ॥
ਮਿਲਿ ਸੰਗਤਿ ਸਾਧੂ ਉਬਰੇ ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਕਮਾਇ ॥੬॥
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਹੈ ਜਿਸੁ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਰਾਵਾਰੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੇਈ ਸੋਹਦੇ ਜਿਨ ਕਿਰਪਾ ਕਰੇ ਕਰਤਾਰੁ ॥੭॥
ਨਾਨਕ ਦਾਤਾ ਏਕੁ ਹੈ ਦੂਜਾ ਅਉਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਪਾਈਐ ਕਰਮਿ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਇ ॥੮॥੨॥੧੯॥
सिरीरागु महला ३ ॥
हउमै करम कमावदे जमडंडु लगै तिन आइ ॥
जि सतिगुरु सेवनि से उबरे हरि सेती लिव लाइ ॥१॥
मन रे गुरमुखि नामु धिआइ ॥
धुरि पूरबि करतै लिखिआ तिना गुरमति नामि समाइ ॥१॥ रहाउ ॥
विणु सतिगुर परतीति न आवई नामि न लागो भाउ ॥
सुपनै सुखु न पावई दुख महि सवै समाइ ॥२॥
जे हरि हरि कीचै बहुतु लोचीऐ किरतु न मेटिआ जाइ ॥
हरि का भाणा भगती मंनिआ से भगत पए दरि थाइ ॥३॥
गुरु सबदु दिड़ावै रंग सिउ बिनु किरपा लइआ न जाइ ॥
जे सउ अंम्रितु नीरीऐ भी बिखु फलु लागै धाइ ॥४॥
से जन सचे निरमले जिन सतिगुर नालि पिआरु ॥
सतिगुर का भाणा कमावदे बिखु हउमै तजि विकारु ॥५॥
मनहठि कितै उपाइ न छूटीऐ सिम्रिति सासत्र सोधहु जाइ ॥
मिलि संगति साधू उबरे गुर का सबदु कमाइ ॥६॥
हरि का नामु निधानु है जिसु अंतु न पारावारु ॥
गुरमुखि सेई सोहदे जिन किरपा करे करतारु ॥७॥
नानक दाता एकु है दूजा अउरु न कोइ ॥
गुर परसादी पाईऐ करमि परापति होइ ॥८॥२॥१९॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ३ ॥ जो मनुष्य (कोई निहित धार्मिक) काम करते हैं (और यह) अहम् (भी) करते हैं (कि हम धार्मिक कर्म करते हैं)~ उनके (सिर) पे जम का डंडा आ बजता है। (पर) जो मनुष्य गुरू का आसरा लेते हैं~ वह प्रभू (चरणों) में सुरति जोड़ के (इस मार से) बच जाते हैं।1। हे (मेरे) मन ! गुरू की शरण पड़ के परमात्मा का नाम सिमर। (नाम बड़ी दुर्लभ दात है) गुरू की शिक्षा पे चल के उन लोगों की ही (प्रभू के) नाम में लीनता होती है~ जिनके माथे पे करतार ने धुर से ही उनके पहले जन्म की की हुई नेक कमाई अनुसार लेख लिख दिया है।1।रहाउ। गुरू (की शरण पड़ने) के बिना (मनुष्य के मन में परमात्मा के वास्ते) श्रद्धा पैदा नहीं होती~ ना परमात्मा के नाम में उसका प्यार बनता है (और नतीजा ये निकलता है कि उसको) सुपने में भी सुख नसीब नहीं होता। वह सदा दुखों में ही घिरा रहता है।2। (अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य के वास्ते) यदि यह बड़ी लालसा भी करें कि वह परमात्मा का सिमरन करे (तो भी इस चाहत और प्रेरणा में सफलता नहीं होती~ क्यों कि) पिछले जन्मों के किए कर्मों का प्रभाव मिटाया नही जा सकता। भगत जन ही परमात्मा की रजा को परवान करते हैं~ वह भगत ही परमात्मा के दर पे कबूल होते हैं।3। गुरू प्रेम से (अपना) शबद (शरण आए मनुष्य के दिल में) पक्का करता है। पर (गुरू भी परमात्मा की) कृपा के बिना नहीं मिलता। (गुरू से बे-मुख मनुष्य~ जैसे~ एक ऐसा वृक्ष है कि) यदि उसे सौ बार भी अमृत से सीचें तो भी उसका जहर का फल ही जल्दी लगता है।4। वही मनुष्य सदा के लिए पवित्र जीवन वाले रहते हैं जिनका गुरू के साथ प्यार (टिका रहता) है। वह मनुष्य अपने अंदर से अहम् का जहर~ अहम् का विकार दूर करके गुरू की रजा मुताबिक जीवन बिताते हैं।5। (हे भाई !) बे-शक तुम शास्त्रों-स्मृतियों (आदि धार्मिक पुस्तकों) को ध्यान से पढ़ के देख लो~ अपने मन के हठ से किए हुए किसी भी तरीके से (अहम् के जहर से) बच नहीं सकते। गुरू के शबद अनुसार जीवन बना के गुरू की संगति में मिल के ही (मनुष्य अहम् व विकारों से) बचते हैं।6। उसका नाम (सब पदार्थों के गुणों का) खजाना है। जिस परमात्मा के गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। जिस परमात्मा की हस्ती का इस पार का उस पार का छोर नहीं मिल सकता। गुरू की शरण पड़ के वही मनुष्य (ये खजाना हासिल करते हैं तथा) सुंदर जीवन वाले बनते हैं~ जिन पर परमात्मा खुद कृपा करता है।7। हे नानक ! (गुरू ही परमात्मा के नाम की) दात देने वाला है~ कोई और नही (जो यह दात दे सके। परमात्मा का नाम) गुरू की कृपा के साथ ही मिलता है। परमात्मा की बख्शिश से मिलता है।8।2।19।

संदर्भ: यह अंग 65 है, राग Siree Raag का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।

Pragati Maidan के पीछे यमुना के किनारे शाम का सूरज।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 36 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 65” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Siree Raag राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 66 →, पीछे का: ← अंग 64

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।