अंग
64
राग Siree Raag
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਭੁ ਜਗੁ ਕਾਜਲ ਕੋਠੜੀ ਤਨੁ ਮਨੁ ਦੇਹ ਸੁਆਹਿ ॥
ਗੁਰਿ ਰਾਖੇ ਸੇ ਨਿਰਮਲੇ ਸਬਦਿ ਨਿਵਾਰੀ ਭਾਹਿ ॥੭॥
ਨਾਨਕ ਤਰੀਐ ਸਚਿ ਨਾਮਿ ਸਿਰਿ ਸਾਹਾ ਪਾਤਿਸਾਹੁ ॥
ਮੈ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਨ ਵੀਸਰੈ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਰਤਨੁ ਵੇਸਾਹੁ ॥
ਮਨਮੁਖ ਭਉਜਲਿ ਪਚਿ ਮੁਏ ਗੁਰਮੁਖਿ ਤਰੇ ਅਥਾਹੁ ॥੮॥੧੬॥
ਗੁਰਿ ਰਾਖੇ ਸੇ ਨਿਰਮਲੇ ਸਬਦਿ ਨਿਵਾਰੀ ਭਾਹਿ ॥੭॥
ਨਾਨਕ ਤਰੀਐ ਸਚਿ ਨਾਮਿ ਸਿਰਿ ਸਾਹਾ ਪਾਤਿਸਾਹੁ ॥
ਮੈ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਨ ਵੀਸਰੈ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਰਤਨੁ ਵੇਸਾਹੁ ॥
ਮਨਮੁਖ ਭਉਜਲਿ ਪਚਿ ਮੁਏ ਗੁਰਮੁਖਿ ਤਰੇ ਅਥਾਹੁ ॥੮॥੧੬॥
सभु जगु काजल कोठड़ी तनु मनु देह सुआहि ॥
गुरि राखे से निरमले सबदि निवारी भाहि ॥७॥
नानक तरीऐ सचि नामि सिरि साहा पातिसाहु ॥
मै हरि नामु न वीसरै हरि नामु रतनु वेसाहु ॥
मनमुख भउजलि पचि मुए गुरमुखि तरे अथाहु ॥८॥१६॥
गुरि राखे से निरमले सबदि निवारी भाहि ॥७॥
नानक तरीऐ सचि नामि सिरि साहा पातिसाहु ॥
मै हरि नामु न वीसरै हरि नामु रतनु वेसाहु ॥
मनमुख भउजलि पचि मुए गुरमुखि तरे अथाहु ॥८॥१६॥
हिन्दी अर्थ: ये सारा जगत काजल की कोठरी (के समान) है (जो भी इसके मोह में फंसता है~ उसका) तन मन शरीर राख में मिल जाता है। गुरू ने अपने शबद के द्वारा~ जिनकी तृष्णा आग दूर कर दी~ वह (इस काजल कोठड़ी में) साफ-सुथरे ही रहे।7। जो परमात्मा सभी शाहों के ऊपर बादशाह है~ उसके सदा स्थिर नाम में जुड़ के (इस संसार समुंद्र में से) पार लंघते हैं। हे नानक ! (अरदास करके कह) मुझे परमात्मा का नाम कभी ना भूले। परमात्मा का नाम रतन नाम पूँजी (मेरे पास सदा स्थिर रहे)। अपने मन के पीछे चलने वाले लोग संसार समुंदर में खप खप के आत्मिक मौत मरते हैं~ और गुरू के सन्मुख रहने वाले इस बेअंत गहरे समुंदर को पार कर जाते हैं (वह विकारों की लहरों में नहीं डूबते)।8।16।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੧ ਘਰੁ ੨ ॥
ਮੁਕਾਮੁ ਕਰਿ ਘਰਿ ਬੈਸਣਾ ਨਿਤ ਚਲਣੈ ਕੀ ਧੋਖ ॥
ਮੁਕਾਮੁ ਤਾ ਪਰੁ ਜਾਣੀਐ ਜਾ ਰਹੈ ਨਿਹਚਲੁ ਲੋਕ ॥੧॥
ਦੁਨੀਆ ਕੈਸਿ ਮੁਕਾਮੇ ॥
ਕਰਿ ਸਿਦਕੁ ਕਰਣੀ ਖਰਚੁ ਬਾਧਹੁ ਲਾਗਿ ਰਹੁ ਨਾਮੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੋਗੀ ਤ ਆਸਣੁ ਕਰਿ ਬਹੈ ਮੁਲਾ ਬਹੈ ਮੁਕਾਮਿ ॥
ਪੰਡਿਤ ਵਖਾਣਹਿ ਪੋਥੀਆ ਸਿਧ ਬਹਹਿ ਦੇਵ ਸਥਾਨਿ ॥੨॥
ਸੁਰ ਸਿਧ ਗਣ ਗੰਧਰਬ ਮੁਨਿ ਜਨ ਸੇਖ ਪੀਰ ਸਲਾਰ ॥
ਦਰਿ ਕੂਚ ਕੂਚਾ ਕਰਿ ਗਏ ਅਵਰੇ ਭਿ ਚਲਣਹਾਰ ॥੩॥
ਸੁਲਤਾਨ ਖਾਨ ਮਲੂਕ ਉਮਰੇ ਗਏ ਕਰਿ ਕਰਿ ਕੂਚੁ ॥
ਘੜੀ ਮੁਹਤਿ ਕਿ ਚਲਣਾ ਦਿਲ ਸਮਝੁ ਤੂੰ ਭਿ ਪਹੂਚੁ ॥੪॥
ਸਬਦਾਹ ਮਾਹਿ ਵਖਾਣੀਐ ਵਿਰਲਾ ਤ ਬੂਝੈ ਕੋਇ ॥
ਨਾਨਕੁ ਵਖਾਣੈ ਬੇਨਤੀ ਜਲਿ ਥਲਿ ਮਹੀਅਲਿ ਸੋਇ ॥੫॥
ਅਲਾਹੁ ਅਲਖੁ ਅਗੰਮੁ ਕਾਦਰੁ ਕਰਣਹਾਰੁ ਕਰੀਮੁ ॥
ਸਭ ਦੁਨੀ ਆਵਣ ਜਾਵਣੀ ਮੁਕਾਮੁ ਏਕੁ ਰਹੀਮੁ ॥੬॥
ਮੁਕਾਮੁ ਤਿਸ ਨੋ ਆਖੀਐ ਜਿਸੁ ਸਿਸਿ ਨ ਹੋਵੀ ਲੇਖੁ ॥
ਅਸਮਾਨੁ ਧਰਤੀ ਚਲਸੀ ਮੁਕਾਮੁ ਓਹੀ ਏਕੁ ॥੭॥
ਦਿਨ ਰਵਿ ਚਲੈ ਨਿਸਿ ਸਸਿ ਚਲੈ ਤਾਰਿਕਾ ਲਖ ਪਲੋਇ ॥
ਮੁਕਾਮੁ ਓਹੀ ਏਕੁ ਹੈ ਨਾਨਕਾ ਸਚੁ ਬੁਗੋਇ ॥੮॥੧੭॥
ਮੁਕਾਮੁ ਕਰਿ ਘਰਿ ਬੈਸਣਾ ਨਿਤ ਚਲਣੈ ਕੀ ਧੋਖ ॥
ਮੁਕਾਮੁ ਤਾ ਪਰੁ ਜਾਣੀਐ ਜਾ ਰਹੈ ਨਿਹਚਲੁ ਲੋਕ ॥੧॥
ਦੁਨੀਆ ਕੈਸਿ ਮੁਕਾਮੇ ॥
ਕਰਿ ਸਿਦਕੁ ਕਰਣੀ ਖਰਚੁ ਬਾਧਹੁ ਲਾਗਿ ਰਹੁ ਨਾਮੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੋਗੀ ਤ ਆਸਣੁ ਕਰਿ ਬਹੈ ਮੁਲਾ ਬਹੈ ਮੁਕਾਮਿ ॥
ਪੰਡਿਤ ਵਖਾਣਹਿ ਪੋਥੀਆ ਸਿਧ ਬਹਹਿ ਦੇਵ ਸਥਾਨਿ ॥੨॥
ਸੁਰ ਸਿਧ ਗਣ ਗੰਧਰਬ ਮੁਨਿ ਜਨ ਸੇਖ ਪੀਰ ਸਲਾਰ ॥
ਦਰਿ ਕੂਚ ਕੂਚਾ ਕਰਿ ਗਏ ਅਵਰੇ ਭਿ ਚਲਣਹਾਰ ॥੩॥
ਸੁਲਤਾਨ ਖਾਨ ਮਲੂਕ ਉਮਰੇ ਗਏ ਕਰਿ ਕਰਿ ਕੂਚੁ ॥
ਘੜੀ ਮੁਹਤਿ ਕਿ ਚਲਣਾ ਦਿਲ ਸਮਝੁ ਤੂੰ ਭਿ ਪਹੂਚੁ ॥੪॥
ਸਬਦਾਹ ਮਾਹਿ ਵਖਾਣੀਐ ਵਿਰਲਾ ਤ ਬੂਝੈ ਕੋਇ ॥
ਨਾਨਕੁ ਵਖਾਣੈ ਬੇਨਤੀ ਜਲਿ ਥਲਿ ਮਹੀਅਲਿ ਸੋਇ ॥੫॥
ਅਲਾਹੁ ਅਲਖੁ ਅਗੰਮੁ ਕਾਦਰੁ ਕਰਣਹਾਰੁ ਕਰੀਮੁ ॥
ਸਭ ਦੁਨੀ ਆਵਣ ਜਾਵਣੀ ਮੁਕਾਮੁ ਏਕੁ ਰਹੀਮੁ ॥੬॥
ਮੁਕਾਮੁ ਤਿਸ ਨੋ ਆਖੀਐ ਜਿਸੁ ਸਿਸਿ ਨ ਹੋਵੀ ਲੇਖੁ ॥
ਅਸਮਾਨੁ ਧਰਤੀ ਚਲਸੀ ਮੁਕਾਮੁ ਓਹੀ ਏਕੁ ॥੭॥
ਦਿਨ ਰਵਿ ਚਲੈ ਨਿਸਿ ਸਸਿ ਚਲੈ ਤਾਰਿਕਾ ਲਖ ਪਲੋਇ ॥
ਮੁਕਾਮੁ ਓਹੀ ਏਕੁ ਹੈ ਨਾਨਕਾ ਸਚੁ ਬੁਗੋਇ ॥੮॥੧੭॥
सिरीरागु महला १ घरु २ ॥
मुकामु करि घरि बैसणा नित चलणै की धोख ॥
मुकामु ता परु जाणीऐ जा रहै निहचलु लोक ॥१॥
दुनीआ कैसि मुकामे ॥
करि सिदकु करणी खरचु बाधहु लागि रहु नामे ॥१॥ रहाउ ॥
जोगी त आसणु करि बहै मुला बहै मुकामि ॥
पंडित वखाणहि पोथीआ सिध बहहि देव सथानि ॥२॥
सुर सिध गण गंधरब मुनि जन सेख पीर सलार ॥
दरि कूच कूचा करि गए अवरे भि चलणहार ॥३॥
सुलतान खान मलूक उमरे गए करि करि कूचु ॥
घड़ी मुहति कि चलणा दिल समझु तूं भि पहूचु ॥४॥
सबदाह माहि वखाणीऐ विरला त बूझै कोइ ॥
नानकु वखाणै बेनती जलि थलि महीअलि सोइ ॥५॥
अलाहु अलखु अगंमु कादरु करणहारु करीमु ॥
सभ दुनी आवण जावणी मुकामु एकु रहीमु ॥६॥
मुकामु तिस नो आखीऐ जिसु सिसि न होवी लेखु ॥
असमानु धरती चलसी मुकामु ओही एकु ॥७॥
दिन रवि चलै निसि ससि चलै तारिका लख पलोइ ॥
मुकामु ओही एकु है नानका सचु बुगोइ ॥८॥१७॥
मुकामु करि घरि बैसणा नित चलणै की धोख ॥
मुकामु ता परु जाणीऐ जा रहै निहचलु लोक ॥१॥
दुनीआ कैसि मुकामे ॥
करि सिदकु करणी खरचु बाधहु लागि रहु नामे ॥१॥ रहाउ ॥
जोगी त आसणु करि बहै मुला बहै मुकामि ॥
पंडित वखाणहि पोथीआ सिध बहहि देव सथानि ॥२॥
सुर सिध गण गंधरब मुनि जन सेख पीर सलार ॥
दरि कूच कूचा करि गए अवरे भि चलणहार ॥३॥
सुलतान खान मलूक उमरे गए करि करि कूचु ॥
घड़ी मुहति कि चलणा दिल समझु तूं भि पहूचु ॥४॥
सबदाह माहि वखाणीऐ विरला त बूझै कोइ ॥
नानकु वखाणै बेनती जलि थलि महीअलि सोइ ॥५॥
अलाहु अलखु अगंमु कादरु करणहारु करीमु ॥
सभ दुनी आवण जावणी मुकामु एकु रहीमु ॥६॥
मुकामु तिस नो आखीऐ जिसु सिसि न होवी लेखु ॥
असमानु धरती चलसी मुकामु ओही एकु ॥७॥
दिन रवि चलै निसि ससि चलै तारिका लख पलोइ ॥
मुकामु ओही एकु है नानका सचु बुगोइ ॥८॥१७॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला १ घरु २ ॥ (दुनिया को अपने रहने के लिए) पक्का ठिकाना समझ के घर में बैठ जाना भी (मनुष्य को मौत से बे-फिक्र नहीं कर सकता~ क्यूँकि यहां से) चले जाने की चिंता तो सदा लगी रहती है। जगत में जीव का पक्का ठिकाना तो तभी समझना चाहिए~ यदि ये जगत भी सदा कायम रहने वाला हो (पर ये तो सब कुछ ही नाशवंत है)।1। (हे भाई !) यह जगत (जीवों के वास्ते) सदा रहने वाली जगह नहीं हो सकती। (इस वास्ते अपने दिल में) श्रद्धा धारण करके उच्च आत्मिक जीवन को (अपने जीवन सफर के लिए) खर्च (तैयार करके पल्ले) बांध। सदा परमात्मा के नाम में जुड़ा रह।1।रहाउ। जोगी आसन जमा के बैठता है। सांई फकीर तकिये में डेरा लगाते हैं~ पंडित (धर्म स्थलों में बैठ के) धर्म पोथिआं (औरों को) सुनाते है~ करामाती योगी शिव आदि के मंदिर में बैठते हैं (पर अपनी अपनी बारी सब जगत से कूच करते जा रहे हैं)।2। देवते~ योग साधना में लीन योगी~ (शिव के उपासक) गण~ देवतों के गवईए (गंधर्व)~ (समाधियों में मौन टिके रहने वाले) मुनि जन~ शेख~ पीर और सरदार (कहलाने वाले) अपनी अपनी बारी सभी जगत से कूच कर गए~ (जो इस वक्त यहां दिखाई दे रहे हैं) ये भी सारे यहां से चले जाने वाले हैं।3। बादशाह~ खान~ राजे~ अमीर~ वजीर अपना अपना डेरा कूच कर के चले गए। घड़ी दो घड़ी में हरेक ने यहां से चले जाना है। हे मन ! दिमाग से काम ले (मूर्ख ना बन~ गाफिल ना हो) तूने भी (परलोक) पहुँच जाना है।4। जबानी जबानी तो हर कोई कहता है~ पर कोई एक आध ही यकीन लाता है नानक बेनती करता है~ (कि हरेक ने यहां से चले जाना है और यहां सिर्फ) वही परमात्मा (अटॅल रहने वाला है जो) जल में~ धरती में~ आकाश में (हर जगह मौजूद है)।5। जो अल्लाह (कहलाता) है~ जो अलख है~ अपहुँच है~ जो सारी कुदरति का मालिक है~ जो सारे जगत का रचनहार है~ और~ जो सभ जीवों पे रहिम करने वाला है सारी दुनिया आने जाने वाली है (नाशवंत है)। सदा कायम रहने वाला सिर्फ एक वही है ।6। सदा कायम रहने वाला सिर्फ उस परमात्मा को ही कहा जा सकता है~ जिसके सिर पर मौत का लेख नहीं। ये आकाश ये धरती यब कुछ नाशवंत है~ पर वह परमात्मा सदा अटॅल है।7। दिन और सूर्य नाशवान हैं~ (ये दिखाई दे रहे) लाखों तारे भी नाश हो जाएंगे। हे नानक ! ये अटल वचन कह दे- सदा कायम रहने वाला सिर्फ एक परमात्मा ही है।8।17।
ਮਹਲੇ ਪਹਿਲੇ ਸਤਾਰਹ ਅਸਟਪਦੀਆ ॥
महले पहिले सतारह असटपदीआ ॥
हिन्दी अर्थ: प्रथम सतिगुरु नानक देव जी की सत्रह अष्टपदियाँ।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੩ ਘਰੁ ੧ ਅਸਟਪਦੀਆ
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇ ਭਗਤਿ ਕੀਜੈ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਭਗਤਿ ਨ ਹੋਇ ॥
ਆਪੈ ਆਪੁ ਮਿਲਾਏ ਬੂਝੈ ਤਾ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਵੈ ਕੋਇ ॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਸਚਾ ਸਚੀ ਬਾਣੀ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਵਾ ਹੋਇ ॥੧॥
ਭਾਈ ਰੇ ਭਗਤਿਹੀਣੁ ਕਾਹੇ ਜਗਿ ਆਇਆ ॥
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵ ਨ ਕੀਨੀ ਬਿਰਥਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਇਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਆਪੇ ਹਰਿ ਜਗਜੀਵਨੁ ਦਾਤਾ ਆਪੇ ਬਖਸਿ ਮਿਲਾਏ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਏ ਕਿਆ ਵੇਚਾਰੇ ਕਿਆ ਕੋ ਆਖਿ ਸੁਣਾਏ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਆਪੇ ਦੇ ਵਡਿਆਈ ਆਪੇ ਸੇਵ ਕਰਾਏ ॥੨॥
ਦੇਖਿ ਕੁਟੰਬੁ ਮੋਹਿ ਲੋਭਾਣਾ ਚਲਦਿਆ ਨਾਲਿ ਨ ਜਾਈ ॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇ ਭਗਤਿ ਕੀਜੈ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਭਗਤਿ ਨ ਹੋਇ ॥
ਆਪੈ ਆਪੁ ਮਿਲਾਏ ਬੂਝੈ ਤਾ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਵੈ ਕੋਇ ॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਸਚਾ ਸਚੀ ਬਾਣੀ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਵਾ ਹੋਇ ॥੧॥
ਭਾਈ ਰੇ ਭਗਤਿਹੀਣੁ ਕਾਹੇ ਜਗਿ ਆਇਆ ॥
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵ ਨ ਕੀਨੀ ਬਿਰਥਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਇਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਆਪੇ ਹਰਿ ਜਗਜੀਵਨੁ ਦਾਤਾ ਆਪੇ ਬਖਸਿ ਮਿਲਾਏ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਏ ਕਿਆ ਵੇਚਾਰੇ ਕਿਆ ਕੋ ਆਖਿ ਸੁਣਾਏ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਆਪੇ ਦੇ ਵਡਿਆਈ ਆਪੇ ਸੇਵ ਕਰਾਏ ॥੨॥
ਦੇਖਿ ਕੁਟੰਬੁ ਮੋਹਿ ਲੋਭਾਣਾ ਚਲਦਿਆ ਨਾਲਿ ਨ ਜਾਈ ॥
सिरीरागु महला ३ घरु १ असटपदीआ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुरमुखि क्रिपा करे भगति कीजै बिनु गुर भगति न होइ ॥
आपै आपु मिलाए बूझै ता निरमलु होवै कोइ ॥
हरि जीउ सचा सची बाणी सबदि मिलावा होइ ॥१॥
भाई रे भगतिहीणु काहे जगि आइआ ॥
पूरे गुर की सेव न कीनी बिरथा जनमु गवाइआ ॥१॥ रहाउ ॥
आपे हरि जगजीवनु दाता आपे बखसि मिलाए ॥
जीअ जंत ए किआ वेचारे किआ को आखि सुणाए ॥
गुरमुखि आपे दे वडिआई आपे सेव कराए ॥२॥
देखि कुटंबु मोहि लोभाणा चलदिआ नालि न जाई ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुरमुखि क्रिपा करे भगति कीजै बिनु गुर भगति न होइ ॥
आपै आपु मिलाए बूझै ता निरमलु होवै कोइ ॥
हरि जीउ सचा सची बाणी सबदि मिलावा होइ ॥१॥
भाई रे भगतिहीणु काहे जगि आइआ ॥
पूरे गुर की सेव न कीनी बिरथा जनमु गवाइआ ॥१॥ रहाउ ॥
आपे हरि जगजीवनु दाता आपे बखसि मिलाए ॥
जीअ जंत ए किआ वेचारे किआ को आखि सुणाए ॥
गुरमुखि आपे दे वडिआई आपे सेव कराए ॥२॥
देखि कुटंबु मोहि लोभाणा चलदिआ नालि न जाई ॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ३ घरु १ असटपदीआ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। गुरू की शरण पड़ने से (जब) परमात्मा मेहर करता है~ तो उसकी भक्ति की जाती है। गुरू (की शरण) के बिना (परमात्मा की) भक्ति नहीं हो सकती। जब कोई मनुष्य (गुरू के) स्वै में स्वयं को मिलाना सीख जाता है~ तो वह पवित्र (जीवन वाला) हो जाता है। जो परमातमा सदा स्थिर रहने वाला है जिसकी सिफत सलाह की बाणी सदा अटॅल है~ उससे गुरू के शबद में जुड़ने से मिलाप हो जाता है।1। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा की भक्ति से वंचित रहा~ उसका जगत में आना किस अर्थ का? जिसने (जगत में आ के) पूरे गुरू का पल्ला नहीं पकड़ा~ उसने अपना जन्म व्यर्थ गवा लिया।1।रहाउ। परमात्मा खुद ही जगत के सारे जीवों की जिंदगी का सहारा है वह खुद ही मेहर करके (जीवों को अपने साथ) मिलाता है। (नहीं तो) ये जीव जंतु बिचारे क्या करें? (भाव~ इनकी कोई बिसात नहीं कि ये अपने प्रयास से प्रभू चरणों से जुड़ सकें। अपने किसी ऐसे प्रयास के बाबत) कोई जीव क्या कह के (किसी को) सुना सकता है? प्रभू खुद ही गुरू के द्वारा (अपने नाम की) वडिआई महिमा देता है~ स्वयं ही अपनी सेवा भक्ति कराता है।2। (मनुष्य अपने) परिवार को देख के (उस के) मोह में फंस जाता है (कभी ये नहीं समझता कि जगत से) चलने के वक्त (किसी ने उसके) साथ नहीं जाना।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 64 है, राग Siree Raag का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
Janpath की सड़क-side चाय और बीच में एक quiet moment।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 36 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 64” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Siree Raag राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 65 →, पीछे का: ← अंग 63।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।