अंग
63
राग Siree Raag
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਮਨਮੁਖੁ ਜਾਣੈ ਆਪਣੇ ਧੀਆ ਪੂਤ ਸੰਜੋਗੁ ॥
ਨਾਰੀ ਦੇਖਿ ਵਿਗਾਸੀਅਹਿ ਨਾਲੇ ਹਰਖੁ ਸੁ ਸੋਗੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਬਦਿ ਰੰਗਾਵਲੇ ਅਹਿਨਿਸਿ ਹਰਿ ਰਸੁ ਭੋਗੁ ॥੩॥
ਚਿਤੁ ਚਲੈ ਵਿਤੁ ਜਾਵਣੋ ਸਾਕਤ ਡੋਲਿ ਡੋਲਾਇ ॥
ਬਾਹਰਿ ਢੂੰਢਿ ਵਿਗੁਚੀਐ ਘਰ ਮਹਿ ਵਸਤੁ ਸੁਥਾਇ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਹਉਮੈ ਕਰਿ ਮੁਸੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਲੈ ਪਾਇ ॥੪॥
ਸਾਕਤ ਨਿਰਗੁਣਿਆਰਿਆ ਆਪਣਾ ਮੂਲੁ ਪਛਾਣੁ ॥
ਰਕਤੁ ਬਿੰਦੁ ਕਾ ਇਹੁ ਤਨੋ ਅਗਨੀ ਪਾਸਿ ਪਿਰਾਣੁ ॥
ਪਵਣੈ ਕੈ ਵਸਿ ਦੇਹੁਰੀ ਮਸਤਕਿ ਸਚੁ ਨੀਸਾਣੁ ॥੫॥
ਬਹੁਤਾ ਜੀਵਣੁ ਮੰਗੀਐ ਮੁਆ ਨ ਲੋੜੈ ਕੋਇ ॥
ਸੁਖ ਜੀਵਣੁ ਤਿਸੁ ਆਖੀਐ ਜਿਸੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਸਿਆ ਸੋਇ ॥
ਨਾਮ ਵਿਹੂਣੇ ਕਿਆ ਗਣੀ ਜਿਸੁ ਹਰਿ ਗੁਰ ਦਰਸੁ ਨ ਹੋਇ ॥੬॥
ਜਿਉ ਸੁਪਨੈ ਨਿਸਿ ਭੁਲੀਐ ਜਬ ਲਗਿ ਨਿਦ੍ਰਾ ਹੋਇ ॥
ਇਉ ਸਰਪਨਿ ਕੈ ਵਸਿ ਜੀਅੜਾ ਅੰਤਰਿ ਹਉਮੈ ਦੋਇ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਹੋਇ ਵੀਚਾਰੀਐ ਸੁਪਨਾ ਇਹੁ ਜਗੁ ਲੋਇ ॥੭॥
ਅਗਨਿ ਮਰੈ ਜਲੁ ਪਾਈਐ ਜਿਉ ਬਾਰਿਕ ਦੂਧੈ ਮਾਇ ॥
ਬਿਨੁ ਜਲ ਕਮਲ ਸੁ ਨਾ ਥੀਐ ਬਿਨੁ ਜਲ ਮੀਨੁ ਮਰਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਰਸਿ ਮਿਲੈ ਜੀਵਾ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਇ ॥੮॥੧੫॥
ਨਾਰੀ ਦੇਖਿ ਵਿਗਾਸੀਅਹਿ ਨਾਲੇ ਹਰਖੁ ਸੁ ਸੋਗੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਬਦਿ ਰੰਗਾਵਲੇ ਅਹਿਨਿਸਿ ਹਰਿ ਰਸੁ ਭੋਗੁ ॥੩॥
ਚਿਤੁ ਚਲੈ ਵਿਤੁ ਜਾਵਣੋ ਸਾਕਤ ਡੋਲਿ ਡੋਲਾਇ ॥
ਬਾਹਰਿ ਢੂੰਢਿ ਵਿਗੁਚੀਐ ਘਰ ਮਹਿ ਵਸਤੁ ਸੁਥਾਇ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਹਉਮੈ ਕਰਿ ਮੁਸੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਲੈ ਪਾਇ ॥੪॥
ਸਾਕਤ ਨਿਰਗੁਣਿਆਰਿਆ ਆਪਣਾ ਮੂਲੁ ਪਛਾਣੁ ॥
ਰਕਤੁ ਬਿੰਦੁ ਕਾ ਇਹੁ ਤਨੋ ਅਗਨੀ ਪਾਸਿ ਪਿਰਾਣੁ ॥
ਪਵਣੈ ਕੈ ਵਸਿ ਦੇਹੁਰੀ ਮਸਤਕਿ ਸਚੁ ਨੀਸਾਣੁ ॥੫॥
ਬਹੁਤਾ ਜੀਵਣੁ ਮੰਗੀਐ ਮੁਆ ਨ ਲੋੜੈ ਕੋਇ ॥
ਸੁਖ ਜੀਵਣੁ ਤਿਸੁ ਆਖੀਐ ਜਿਸੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਸਿਆ ਸੋਇ ॥
ਨਾਮ ਵਿਹੂਣੇ ਕਿਆ ਗਣੀ ਜਿਸੁ ਹਰਿ ਗੁਰ ਦਰਸੁ ਨ ਹੋਇ ॥੬॥
ਜਿਉ ਸੁਪਨੈ ਨਿਸਿ ਭੁਲੀਐ ਜਬ ਲਗਿ ਨਿਦ੍ਰਾ ਹੋਇ ॥
ਇਉ ਸਰਪਨਿ ਕੈ ਵਸਿ ਜੀਅੜਾ ਅੰਤਰਿ ਹਉਮੈ ਦੋਇ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਹੋਇ ਵੀਚਾਰੀਐ ਸੁਪਨਾ ਇਹੁ ਜਗੁ ਲੋਇ ॥੭॥
ਅਗਨਿ ਮਰੈ ਜਲੁ ਪਾਈਐ ਜਿਉ ਬਾਰਿਕ ਦੂਧੈ ਮਾਇ ॥
ਬਿਨੁ ਜਲ ਕਮਲ ਸੁ ਨਾ ਥੀਐ ਬਿਨੁ ਜਲ ਮੀਨੁ ਮਰਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਰਸਿ ਮਿਲੈ ਜੀਵਾ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਇ ॥੮॥੧੫॥
मनमुखु जाणै आपणे धीआ पूत संजोगु ॥
नारी देखि विगासीअहि नाले हरखु सु सोगु ॥
गुरमुखि सबदि रंगावले अहिनिसि हरि रसु भोगु ॥३॥
चितु चलै वितु जावणो साकत डोलि डोलाइ ॥
बाहरि ढूंढि विगुचीऐ घर महि वसतु सुथाइ ॥
मनमुखि हउमै करि मुसी गुरमुखि पलै पाइ ॥४॥
साकत निरगुणिआरिआ आपणा मूलु पछाणु ॥
रकतु बिंदु का इहु तनो अगनी पासि पिराणु ॥
पवणै कै वसि देहुरी मसतकि सचु नीसाणु ॥५॥
बहुता जीवणु मंगीऐ मुआ न लोड़ै कोइ ॥
सुख जीवणु तिसु आखीऐ जिसु गुरमुखि वसिआ सोइ ॥
नाम विहूणे किआ गणी जिसु हरि गुर दरसु न होइ ॥६॥
जिउ सुपनै निसि भुलीऐ जब लगि निद्रा होइ ॥
इउ सरपनि कै वसि जीअड़ा अंतरि हउमै दोइ ॥
गुरमति होइ वीचारीऐ सुपना इहु जगु लोइ ॥७॥
अगनि मरै जलु पाईऐ जिउ बारिक दूधै माइ ॥
बिनु जल कमल सु ना थीऐ बिनु जल मीनु मराइ ॥
नानक गुरमुखि हरि रसि मिलै जीवा हरि गुण गाइ ॥८॥१५॥
नारी देखि विगासीअहि नाले हरखु सु सोगु ॥
गुरमुखि सबदि रंगावले अहिनिसि हरि रसु भोगु ॥३॥
चितु चलै वितु जावणो साकत डोलि डोलाइ ॥
बाहरि ढूंढि विगुचीऐ घर महि वसतु सुथाइ ॥
मनमुखि हउमै करि मुसी गुरमुखि पलै पाइ ॥४॥
साकत निरगुणिआरिआ आपणा मूलु पछाणु ॥
रकतु बिंदु का इहु तनो अगनी पासि पिराणु ॥
पवणै कै वसि देहुरी मसतकि सचु नीसाणु ॥५॥
बहुता जीवणु मंगीऐ मुआ न लोड़ै कोइ ॥
सुख जीवणु तिसु आखीऐ जिसु गुरमुखि वसिआ सोइ ॥
नाम विहूणे किआ गणी जिसु हरि गुर दरसु न होइ ॥६॥
जिउ सुपनै निसि भुलीऐ जब लगि निद्रा होइ ॥
इउ सरपनि कै वसि जीअड़ा अंतरि हउमै दोइ ॥
गुरमति होइ वीचारीऐ सुपना इहु जगु लोइ ॥७॥
अगनि मरै जलु पाईऐ जिउ बारिक दूधै माइ ॥
बिनु जल कमल सु ना थीऐ बिनु जल मीनु मराइ ॥
नानक गुरमुखि हरि रसि मिलै जीवा हरि गुण गाइ ॥८॥१५॥
हिन्दी अर्थ: (प्रभू की रजा मुताबिक जगत में) बेटी बेटों का मेल (आ बनता है)~ पर अपने मन के पीछे चलने वाला आदमी इनको अपने समझ लेता है। (मनमुख लोग अपनी अपनी) स्त्री को देख के खुश होते हैं~ (देख के) खुशी भी होती है सहम भी होता है (कि कहीं ये बच्चे स्त्री मर ना जाएं)। गुरू के बताए रास्ते पर चलने वाले लोग गुरू के शबद के द्वारा आत्मिक सुख पाते हैं। परमात्मा का नाम रस दिन रात उनकी आत्मिक खुराक होता है।3। (मनुष्य धन को सुख का मूल समझता है~ जब) धन जाने लगता है तो साकत का मन डोलता है। (सुख को) बाहर से ढूंढने से खुआर ही होते हैं। (साकत मनुष्य यह नहीं समझता कि सुख का मूल) परमात्मा का नाम धन घर में ही~ हृदय में ही है। अपने मन के पीछे चलने वाली जीव स्त्री “मैं मैं” कर के ही लुटी जाती है (अंदर से नाम धन लुटा बैठती है)। (जबकि) गुरू के मार्ग पर चलने वाली ये धन हासिल कर लेती है।4। हे गुणहीन साकत मनुष्य ! (तू गुमान करता है अपने शरीर का) अपना असल तो पहचान। ये शरीर माँ के लहू और पिता के वीर्य से बना है। याद रख~ (आखिर इसने) आग में (जल जाना है)। हरेक जीव के माथे पे यह अटॅल हुकम है कि यह शरीर स्वासों के अधीन है (हरेक के गिने चुने श्वास हैं)।5। लम्बी लम्बी उम्र मांगी जाती है। कोई भी जल्दी मरना नहीं चाहता। पर उसी मनुष्य का जीवन सुखी कह सकते हैं~ जिसके मन में~ गुरू की शरण पड़ कर~ परमात्मा आ बसता है। जिस मनुष्य को कभी गुरू के दर्शन नहीं हुए~ कभी परमात्मा के दीदार नहीं हुए~ उस प्रभू नाम से वंचित मनुष्य को मैं (जीवित) क्या समझूँ? ।6। जैसे रात को (सोते हुए को) सुपने में (कई चीजें देख के) भुलेखा पड़ जाता है (कि जो कुछ देख रहे हैं यह सचमुच ठीक है~ और यह भुलेखा तब तक टिका रहता है) जब तक नींद टिकी रहती है। इसी तरह कमजोर जीव माया नागिन के बस में (जब तक) है (तब तक) इसके अंदर अहम् और मेर तेर बनी रहती है। (और इस अहम् और मेर तेर को यह जीवन सही जीवन समझता है)। जब गुरू की मति प्राप्त हो तो यह समझ पड़ती है कि ये जगत (का मोह) यह दुनिया (वाली मेर तेर) निरा स्वपन ही है।7। जैसे बालक की आग (पेट की आग~ भूख) माँ का दूध पीने से शांत होती है~ वैसे ही ये तृष्णा की आग तभी बुझती है जब प्रभू के नाम का जल इस ऊपर डालते हैं। पानी के बिनां कमल काफूल नहीं रह सकता। पानी के बिना मछुली मर जाती है। वैसे ही गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य (प्रभू नाम के बिना जी नहीं सकता। उसका आत्मिक जीवन तभी प्रफुल्लित होता है जब) वह परमात्मा के नाम रस में लीन होता है। हे नानक ! (प्रभू दर पे अरदास कर और कह, हे प्रभू ! मेहर कर)~ मैं तेरे गुण गा के (आत्मिक जीवन) जीऊँ।8।15।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਡੂੰਗਰੁ ਦੇਖਿ ਡਰਾਵਣੋ ਪੇਈਅੜੈ ਡਰੀਆਸੁ ॥
ਊਚਉ ਪਰਬਤੁ ਗਾਖੜੋ ਨਾ ਪਉੜੀ ਤਿਤੁ ਤਾਸੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਅੰਤਰਿ ਜਾਣਿਆ ਗੁਰਿ ਮੇਲੀ ਤਰੀਆਸੁ ॥੧॥
ਭਾਈ ਰੇ ਭਵਜਲੁ ਬਿਖਮੁ ਡਰਾਂਉ ॥
ਪੂਰਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਰਸਿ ਮਿਲੈ ਗੁਰੁ ਤਾਰੇ ਹਰਿ ਨਾਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਚਲਾ ਚਲਾ ਜੇ ਕਰੀ ਜਾਣਾ ਚਲਣਹਾਰੁ ॥
ਜੋ ਆਇਆ ਸੋ ਚਲਸੀ ਅਮਰੁ ਸੁ ਗੁਰੁ ਕਰਤਾਰੁ ॥
ਭੀ ਸਚਾ ਸਾਲਾਹਣਾ ਸਚੈ ਥਾਨਿ ਪਿਆਰੁ ॥੨॥
ਦਰ ਘਰ ਮਹਲਾ ਸੋਹਣੇ ਪਕੇ ਕੋਟ ਹਜਾਰ ॥
ਹਸਤੀ ਘੋੜੇ ਪਾਖਰੇ ਲਸਕਰ ਲਖ ਅਪਾਰ ॥
ਕਿਸ ਹੀ ਨਾਲਿ ਨ ਚਲਿਆ ਖਪਿ ਖਪਿ ਮੁਏ ਅਸਾਰ ॥੩॥
ਸੁਇਨਾ ਰੁਪਾ ਸੰਚੀਐ ਮਾਲੁ ਜਾਲੁ ਜੰਜਾਲੁ ॥
ਸਭ ਜਗ ਮਹਿ ਦੋਹੀ ਫੇਰੀਐ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਸਿਰਿ ਕਾਲੁ ॥
ਪਿੰਡੁ ਪੜੈ ਜੀਉ ਖੇਲਸੀ ਬਦਫੈਲੀ ਕਿਆ ਹਾਲੁ ॥੪॥
ਪੁਤਾ ਦੇਖਿ ਵਿਗਸੀਐ ਨਾਰੀ ਸੇਜ ਭਤਾਰ ॥
ਚੋਆ ਚੰਦਨੁ ਲਾਈਐ ਕਾਪੜੁ ਰੂਪੁ ਸੀਗਾਰੁ ॥
ਖੇਹੂ ਖੇਹ ਰਲਾਈਐ ਛੋਡਿ ਚਲੈ ਘਰ ਬਾਰੁ ॥੫॥
ਮਹਰ ਮਲੂਕ ਕਹਾਈਐ ਰਾਜਾ ਰਾਉ ਕਿ ਖਾਨੁ ॥
ਚਉਧਰੀ ਰਾਉ ਸਦਾਈਐ ਜਲਿ ਬਲੀਐ ਅਭਿਮਾਨ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਿਆ ਜਿਉ ਡਵਿ ਦਧਾ ਕਾਨੁ ॥੬॥
ਹਉਮੈ ਕਰਿ ਕਰਿ ਜਾਇਸੀ ਜੋ ਆਇਆ ਜਗ ਮਾਹਿ ॥
ਡੂੰਗਰੁ ਦੇਖਿ ਡਰਾਵਣੋ ਪੇਈਅੜੈ ਡਰੀਆਸੁ ॥
ਊਚਉ ਪਰਬਤੁ ਗਾਖੜੋ ਨਾ ਪਉੜੀ ਤਿਤੁ ਤਾਸੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਅੰਤਰਿ ਜਾਣਿਆ ਗੁਰਿ ਮੇਲੀ ਤਰੀਆਸੁ ॥੧॥
ਭਾਈ ਰੇ ਭਵਜਲੁ ਬਿਖਮੁ ਡਰਾਂਉ ॥
ਪੂਰਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਰਸਿ ਮਿਲੈ ਗੁਰੁ ਤਾਰੇ ਹਰਿ ਨਾਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਚਲਾ ਚਲਾ ਜੇ ਕਰੀ ਜਾਣਾ ਚਲਣਹਾਰੁ ॥
ਜੋ ਆਇਆ ਸੋ ਚਲਸੀ ਅਮਰੁ ਸੁ ਗੁਰੁ ਕਰਤਾਰੁ ॥
ਭੀ ਸਚਾ ਸਾਲਾਹਣਾ ਸਚੈ ਥਾਨਿ ਪਿਆਰੁ ॥੨॥
ਦਰ ਘਰ ਮਹਲਾ ਸੋਹਣੇ ਪਕੇ ਕੋਟ ਹਜਾਰ ॥
ਹਸਤੀ ਘੋੜੇ ਪਾਖਰੇ ਲਸਕਰ ਲਖ ਅਪਾਰ ॥
ਕਿਸ ਹੀ ਨਾਲਿ ਨ ਚਲਿਆ ਖਪਿ ਖਪਿ ਮੁਏ ਅਸਾਰ ॥੩॥
ਸੁਇਨਾ ਰੁਪਾ ਸੰਚੀਐ ਮਾਲੁ ਜਾਲੁ ਜੰਜਾਲੁ ॥
ਸਭ ਜਗ ਮਹਿ ਦੋਹੀ ਫੇਰੀਐ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਸਿਰਿ ਕਾਲੁ ॥
ਪਿੰਡੁ ਪੜੈ ਜੀਉ ਖੇਲਸੀ ਬਦਫੈਲੀ ਕਿਆ ਹਾਲੁ ॥੪॥
ਪੁਤਾ ਦੇਖਿ ਵਿਗਸੀਐ ਨਾਰੀ ਸੇਜ ਭਤਾਰ ॥
ਚੋਆ ਚੰਦਨੁ ਲਾਈਐ ਕਾਪੜੁ ਰੂਪੁ ਸੀਗਾਰੁ ॥
ਖੇਹੂ ਖੇਹ ਰਲਾਈਐ ਛੋਡਿ ਚਲੈ ਘਰ ਬਾਰੁ ॥੫॥
ਮਹਰ ਮਲੂਕ ਕਹਾਈਐ ਰਾਜਾ ਰਾਉ ਕਿ ਖਾਨੁ ॥
ਚਉਧਰੀ ਰਾਉ ਸਦਾਈਐ ਜਲਿ ਬਲੀਐ ਅਭਿਮਾਨ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਿਆ ਜਿਉ ਡਵਿ ਦਧਾ ਕਾਨੁ ॥੬॥
ਹਉਮੈ ਕਰਿ ਕਰਿ ਜਾਇਸੀ ਜੋ ਆਇਆ ਜਗ ਮਾਹਿ ॥
सिरीरागु महला १ ॥
डूंगरु देखि डरावणो पेईअड़ै डरीआसु ॥
ऊचउ परबतु गाखड़ो ना पउड़ी तितु तासु ॥
गुरमुखि अंतरि जाणिआ गुरि मेली तरीआसु ॥१॥
भाई रे भवजलु बिखमु डरांउ ॥
पूरा सतिगुरु रसि मिलै गुरु तारे हरि नाउ ॥१॥ रहाउ ॥
चला चला जे करी जाणा चलणहारु ॥
जो आइआ सो चलसी अमरु सु गुरु करतारु ॥
भी सचा सालाहणा सचै थानि पिआरु ॥२॥
दर घर महला सोहणे पके कोट हजार ॥
हसती घोड़े पाखरे लसकर लख अपार ॥
किस ही नालि न चलिआ खपि खपि मुए असार ॥३॥
सुइना रुपा संचीऐ मालु जालु जंजालु ॥
सभ जग महि दोही फेरीऐ बिनु नावै सिरि कालु ॥
पिंडु पड़ै जीउ खेलसी बदफैली किआ हालु ॥४॥
पुता देखि विगसीऐ नारी सेज भतार ॥
चोआ चंदनु लाईऐ कापड़ु रूपु सीगारु ॥
खेहू खेह रलाईऐ छोडि चलै घर बारु ॥५॥
महर मलूक कहाईऐ राजा राउ कि खानु ॥
चउधरी राउ सदाईऐ जलि बलीऐ अभिमान ॥
मनमुखि नामु विसारिआ जिउ डवि दधा कानु ॥६॥
हउमै करि करि जाइसी जो आइआ जग माहि ॥
डूंगरु देखि डरावणो पेईअड़ै डरीआसु ॥
ऊचउ परबतु गाखड़ो ना पउड़ी तितु तासु ॥
गुरमुखि अंतरि जाणिआ गुरि मेली तरीआसु ॥१॥
भाई रे भवजलु बिखमु डरांउ ॥
पूरा सतिगुरु रसि मिलै गुरु तारे हरि नाउ ॥१॥ रहाउ ॥
चला चला जे करी जाणा चलणहारु ॥
जो आइआ सो चलसी अमरु सु गुरु करतारु ॥
भी सचा सालाहणा सचै थानि पिआरु ॥२॥
दर घर महला सोहणे पके कोट हजार ॥
हसती घोड़े पाखरे लसकर लख अपार ॥
किस ही नालि न चलिआ खपि खपि मुए असार ॥३॥
सुइना रुपा संचीऐ मालु जालु जंजालु ॥
सभ जग महि दोही फेरीऐ बिनु नावै सिरि कालु ॥
पिंडु पड़ै जीउ खेलसी बदफैली किआ हालु ॥४॥
पुता देखि विगसीऐ नारी सेज भतार ॥
चोआ चंदनु लाईऐ कापड़ु रूपु सीगारु ॥
खेहू खेह रलाईऐ छोडि चलै घर बारु ॥५॥
महर मलूक कहाईऐ राजा राउ कि खानु ॥
चउधरी राउ सदाईऐ जलि बलीऐ अभिमान ॥
मनमुखि नामु विसारिआ जिउ डवि दधा कानु ॥६॥
हउमै करि करि जाइसी जो आइआ जग माहि ॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला १ ॥ (एक तरफ संसार समुंदर है~ दूसरी तरफ~ इस में से पार लांघने के लिए गुरमुखों वाला रास्ता है। पर आत्मिक जीवन वाला वह रास्ता पहाड़ी रास्ता है। आत्मिक जीवन के शिखर पर पहुँचना~ मानो एक बड़े ऊँचे डरावने पहाड़ पर चढ़ने के समान है। उस) डरावने पहाड़ को देख के पेके घर में (माँ-बाप भाई बहन आदि के मोह में ग्रसित जीव स्त्री) डर गई (कि इस पहाड़ पर चढ़ा नहीं जा सकता~ जगत का मोह दूर नहीं किया जा सकता~ स्वै को न्यौछावर नहीं किया जा सकता)। (आत्मिक जीवन के शिखर पे पहुँचना~ मानों) बहुत ऊंचा और मुश्किल पर्वत है; उस पर्वत पर चढ़ने के लिए उस (जीव स्त्री) के पास कोई सीढ़ी भी नहीं। गुरू के सन्मुख रहने वाली जिस जीव स्त्री को गुरू ने (प्रभू चरणों में) मिला लिया~ उसने अपने अंदर ही बसते प्रभू को पहिचान लिया। और~ वह इस संसार समुंद्र से पार लांघ गई।1। हे भाई ! ये संसार समुंदर बड़ा डरावणा है और (तैरना) मुश्किल है। जिस मनुष्य को पूरा गुरू प्रेम से मिलता है उसको वह गुरू परमात्मा का नाम दे के (इस समुंदर में से) पार लंघा लेता है।1।रहाउ। अगर मैं सदा याद रखूं कि मैंने जगत में से जरूर चले जाना है। यदि मैं समझ लूं कि सारा जगत ही चले जाने वाला है। जगत में जो भी आया है~ वह आखिर चला जाएगा। मौत-रहित एक गुरू परमात्मा ही है~ तो फिर सत्संग में (प्रभू चरणों के साथ) प्यार डाल के सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा की सिफत सलाह करनी चाहिए (बस ! यही है संसार समुंदर के विकारों भारी लहरों से बचने का तरीका)।2। सुंदर दरवाजों वाले सुंदर घर व महल~ हजारों पक्के किले~ हाथी घोड़े~ काठियां~ लाखों तथा बेअंत लशकर- इनमें कोई भी किसी के साथ नहीं गए। बेसमझ ऐसे ही खप खप के आत्मिक मौत मरते रहे (इनकी खातिर आत्मिक जीवन गवा गए)।3। अगर सोना-चाँदी इकट्ठा करते जाएं~ तो यह माल धन (जीवात्मा को मोह में फंसाने के लिए) जाल बनता है~ फांसी बनता है। यदि अपनी ताकत की दुहाई सारे जगत में फिरा सकें~ तो भी परमात्मा का नाम सिमरन के बिनां सिर पर मौत का डर (कायम रहता) है। जब जीवात्मा जिंदगी की खेल खेल जाती है और शरीर (मिट्टी हो के) गिर पड़ता है~ तब (धन पदार्थ की खातिर) गंदे काम करने वालों का बुरा हाल होता है।4। पिता (अपने) पुत्रों को देख के खुश होता है। पति (अपनी) सेज पर स्त्री को देख कर प्रसन्न होता है। (इस शरीर को) इत्र व चंदन लगाते हैं। सुंदर कपड़ा~ रूप~ गहना आदि (देख के मन खुश होता है)। पर आखिर में शरीर मिट्टी हो के मिट्टी में मिल जाता है~ और गुमान करने वाला जीव घर बार छोड़ के (संसार से) चला जाता है।5। सरदार~ बादशाह~ राजा~ राव औा खान कहलवाते हैं। (अपने आप को) चौधरी~ राय (साहिब आदि) बुलवाते हैं। (इस बड़प्पन के) अहंकार में जल मरते हैं (यदि कोई पूरा मान आदर ना करे)। (पर इतना कुछ होते हुए भी) अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य ने परमात्मा का नाम भुला दिया~ और (और ऐसे बताया) जैसे जंगल की आग में जला हुआ तिनका है (बाहर से चमकदार~ अंदर से काला स्याह)।6। जगत में जो भी आया है~ “मैं बड़ा मैं बड़ा” कह कह के आखिर यहां से चला जाएगा।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 63 है, राग Siree Raag का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
Hauz Khas Village के lake के पास बैठ कर पानी देखना।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 40 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 63” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Siree Raag राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 64 →, पीछे का: ← अंग 62।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।