जुगति न जाना गुनु नही कोई महा दुतरु माइ आछै ॥
आइ पइओ नानक गुर चरनी तउ उतरी सगल दुराछै ॥2॥2॥28॥
अंम्रिता प्रिअ बचन तुहारे ॥
अति सुंदर मनमोहन पिआरे सभहू मधि निरारे ॥1॥ रहाउ ॥
राजु न चाहउ मुकति न चाहउ मनि प्रीति चरन कमलारे ॥
ब्रहम महेस सिध मुनि इंद्रा मोहि ठाकुर ही दरसारे ॥1॥
दीनु दुआरै आइओ ठाकुर सरनि परिओ संत हारे ॥
कहु नानक प्रभ मिले मनोहर मनु सीतल बिगसारे ॥2॥3॥29॥
हरि जपि सेवकु पारि उतारिओ ॥
दीन दइआल भए प्रभ अपने बहुड़ि जनमि नही मारिओ ॥1॥ रहाउ ॥
साधसंगमि गुण गावह हरि के रतन जनमु नही हारिओ ॥
प्रभ गुन गाइ बिखै बनु तरिआ कुलह समूह उधारिओ ॥1॥
चरन कमल बसिआ रिद भीतरि सासि गिरासि उचारिओ ॥
नानक ओट गही जगदीसुर पुनह पुनह बलिहारिओ ॥2॥4॥30॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
करत फिरे बन भेख मोहन रहत निरार ॥1॥ रहाउ ॥
कथन सुनावन गीत नीके गावन मन महि धरते गार ॥1॥
अति सुंदर बहु चतुर सिआने बिदिआ रसना चार ॥2॥
मान मोह मेर तेर बिबरजित एहु मारगु खंडे धार ॥3॥
कहु नानक तिनि भवजलु तरीअले प्रभ किरपा संत संगार ॥4॥1॥31॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मै पेखिओ री ऊचा मोहनु सभ ते ऊचा ॥
आन न समसरि कोऊ लागै ढूढि रहे हम मूचा ॥1॥ रहाउ ॥
बहु बेअंतु अति बडो गाहरो थाह नही अगहूचा ॥
तोलि न तुलीऐ मोलि न मुलीऐ कत पाईऐ मन रूचा ॥1॥
खोज असंखा अनिक तपंथा बिनु गुर नही पहूचा ॥
कहु नानक किरपा करी ठाकुर मिलि साधू रस भूंचा ॥2॥1॥32॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! साध-संगत की शरण पड़ना चाहिए।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।