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अंग 533

अंग
533
राग Dayv Gandhaaree
राग: Dayv Gandhaaree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
देवगंधारी महला 5 ॥
अपुने सतिगुर पहि बिनउ कहिआ ॥
भए क्रिपाल दइआल दुख भंजन मेरा सगल अंदेसरा गइआ ॥ रहाउ ॥
हम पापी पाखंडी लोभी हमरा गुनु अवगुनु सभु सहिआ ॥
करु मसतकि धारि साजि निवाजे मुए दुसट जो खइआ ॥1॥
परउपकारी सरब सधारी सफल दरसन सहजइआ ॥
कहु नानक निरगुण कउ दाता चरण कमल उर धरिआ ॥2॥24॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। देवगंधारी महला 5 ॥ हे भाई ! जब मैंने अपने गुरू के पास अरजोई करनी शुरू की। तो दुखों का नाश करने वाले प्यारे प्रभू जी मेरे पर दयावान हुए (प्रभू जी की कृपा से) मेरी सारी चिंता-फिक्र दूर हो गई।रहाउ। हे भाई ! हम जीव पापी हैं।पाखण्डी हैं।लोभी हैं (परमात्मा इतना दयावान है कि वह) हमारा हरेक गुण अवगुण सहता है। जीवों को पैदा करके उनके माथे पर हाथ रख के उनका जीवन सँवारता है (जिसकी बरकति से कामादिक) वैरी।जो आत्मिक जीवन का नाश करने वाले हैं।समाप्त हो जाते हैं। 1। हे भाई ! प्रभू जी परोपकारी हैं।सारे जीवों को आसरा देने वाले हैं।प्रभू का दीदार मानस जीवन के लिए फल-दायक है।आत्मिक अडोलता की दाति बख्शने वाला है। हे नानक ! कह, प्रभू गुण-हीन जीवों को भी दातें देने वाला है।मैंने उसके सुंदर कोमल चरण (गुरू की कृपा से अपने) हृदय में बसा लिए हैं। 2। 24।
देवगंधारी महला 5 ॥
अनाथ नाथ प्रभ हमारे ॥
सरनि आइओ राखनहारे ॥ रहाउ ॥
सरब पाख राखु मुरारे ॥
आगै पाछै अंती वारे ॥1॥
जब चितवउ तब तुहारे ॥
उन सम॑ारि मेरा मनु सधारे ॥2॥
सुनि गावउ गुर बचनारे ॥
बलि बलि जाउ साध दरसारे ॥3॥
मन महि राखउ एक असारे ॥
नानक प्रभ मेरे करनैहारे ॥4॥25॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: देवगंधारी महला 5 ॥ हे अनाथों के नाथ ! हे मेरे प्रभू हे राखनहार ! मैं आपकी शरण आया हूँ।रहाउ। हे मुरारी !हर जगह मेरी सहायता कर आखिरी समय में-परलोक में। इस लोक में। 1। हे प्रभू ! मैं जब भी याद करता हूँ आपके गुण ही याद करता हूँ। (आपके) उन (गुणों) को याद करके मेरे मन को धैर्य मिलता है। 2। गुरू के बचन सुन के ही (हे प्रभू !) मैं (आपकी सिफत-सालाह के गीत) गाता हूँ। हे प्रभू ! मैं गुरू के दीदार से कुर्बान जाता हूँ।सदके जाता हूँ।3। मैं अपने मन में सिर्फ आपकी ही सहायता की आस रखता हूँ। हे नानक ! (कह) हे प्रभू ! हे मेरे करतार ! 4। 25।
देवगंधारी महला 5 ॥
प्रभ इहै मनोरथु मेरा ॥
क्रिपा निधान दइआल मोहि दीजै करि संतन का चेरा ॥ रहाउ ॥
प्रातहकाल लागउ जन चरनी निस बासुर दरसु पावउ ॥
तनु मनु अरपि करउ जन सेवा रसना हरि गुन गावउ ॥1॥
सासि सासि सिमरउ प्रभु अपुना संतसंगि नित रहीऐ ॥
एकु अधारु नामु धनु मोरा अनदु नानक इहु लहीऐ ॥2॥26॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: देवगंधारी महला 5 ॥ हे प्रभू मेरे मन की यही तमन्ना है कि – हे कृपा के खजाने प्रभू ! हे दयालु ! मुझे ये दान दे कि मुझे अपने संतों का सेवक बनाए रख।रहाउ। हे प्रभू ! सवेरे (उठ के) मैं आपके संतजनों के चरण लगूँ।दिन-रात मैं आपके संत-जनों के दर्शन करता रहूँ। अपना शरीर अपना मन भेटा करके मैं (सदा) संत-जनों की सेवा करता रहूँ।और अपनी जीभ से मैं हरी गुण गाता रहूँ। 1। (हे भाई ! मेरी तमन्ना है कि) मैं हरेक श्वास के साथ अपने प्रभू का सिमरन करता रहूँ। हे भाई ! (कह, मेरी चाहत है कि) सिर्फ परमात्मा का नाम-धन ही मेरा जीवन-आसरा बना रहे।(हे भाई ! नाम-सिमरन का) ये आनंद (सदा) लेते रहना चाहिए। 2। 26।
रागु देवगंधारी महला 5 घरु 3
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मीता ऐसे हरि जीउ पाए ॥
छोडि न जाई सद ही संगे अनदिनु गुर मिलि गाए ॥1॥ रहाउ ॥
मिलिओ मनोहरु सरब सुखैना तिआगि न कतहू जाए ॥
अनिक अनिक भाति बहु पेखे प्रिअ रोम न समसरि लाए ॥1॥
मंदरि भागु सोभ दुआरै अनहत रुणु झुणु लाए ॥
कहु नानक सदा रंगु माणे ग्रिह प्रिअ थीते सद थाए ॥2॥1॥27॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: रागु देवगंधारी महला 5 घरु 3 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! मैंने ऐसे मित्र प्रभू जी पा लिए हैं। जो मुझे छोड़ के नहीं जाते।सदा मेरे साथ रहते हैं।गुरू को मिल के हर वक्त उनके गुण गाता रहता हूँ। 1।रहाउ। हे भाई ! मेरे मन को मोह लेने वाला।मुझे सारे सुख देने वाला प्रभू मिल गया है।मुझे छोड़ के वह और कहीं भी नहीं जाता। (सुखों के इकरार करने वाले) और बहुत सारे अन्य किस्मों के (व्यक्ति) देख लिए हैं।पर कोई भी प्यारे प्रभू के एक बाल जितनी भी बराबरी नहीं कर सकता। 1। हे नानक ! कह, जिस जीव के हृदय-घर में प्रभू जी सदा के लिए आ टिकते हैं।वह सदा आत्मिक आनंद पाता है। उसके हृदय-घर में भाग्य जाग पड़ते हैं।उसके हृदय में एक धीमा धीमा खुशी का गीत चलता रहता है।उसको प्रभू के दर से शोभा मिलती है। 2। 1। 27।
देवगंधारी 5 ॥
दरसन नाम कउ मनु आछै ॥
भ्रमि आइओ है सगल थान रे आहि परिओ संत पाछै ॥1॥ रहाउ ॥
किसु हउ सेवी किसु आराधी जो दिसटै सो गाछै ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: देवगंधारी 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा के दर्शन करने के लिए।परमात्मा का नाम जपने के लिए।मेरे मन में चाह है। मेरा ये मन भटक-भटक के सब जगह हो आया है।अब (इसी) चाहत (के कारण) संतों की चरणीं आ पड़ा हूँ। 1।रहाउ। (हे भाई ! संसार में) जो कुछ दिख रहा है वह नाशवंत है।(इस वास्ते) मैं किस की सेवा करुँ।मैं किस की आराधना करूँ।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।