देवगंधारी महला 5 ॥
अपुने सतिगुर पहि बिनउ कहिआ ॥
भए क्रिपाल दइआल दुख भंजन मेरा सगल अंदेसरा गइआ ॥ रहाउ ॥
हम पापी पाखंडी लोभी हमरा गुनु अवगुनु सभु सहिआ ॥
करु मसतकि धारि साजि निवाजे मुए दुसट जो खइआ ॥1॥
परउपकारी सरब सधारी सफल दरसन सहजइआ ॥
कहु नानक निरगुण कउ दाता चरण कमल उर धरिआ ॥2॥24॥
अनाथ नाथ प्रभ हमारे ॥
सरनि आइओ राखनहारे ॥ रहाउ ॥
सरब पाख राखु मुरारे ॥
आगै पाछै अंती वारे ॥1॥
जब चितवउ तब तुहारे ॥
उन सम॑ारि मेरा मनु सधारे ॥2॥
सुनि गावउ गुर बचनारे ॥
बलि बलि जाउ साध दरसारे ॥3॥
मन महि राखउ एक असारे ॥
नानक प्रभ मेरे करनैहारे ॥4॥25॥
प्रभ इहै मनोरथु मेरा ॥
क्रिपा निधान दइआल मोहि दीजै करि संतन का चेरा ॥ रहाउ ॥
प्रातहकाल लागउ जन चरनी निस बासुर दरसु पावउ ॥
तनु मनु अरपि करउ जन सेवा रसना हरि गुन गावउ ॥1॥
सासि सासि सिमरउ प्रभु अपुना संतसंगि नित रहीऐ ॥
एकु अधारु नामु धनु मोरा अनदु नानक इहु लहीऐ ॥2॥26॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मीता ऐसे हरि जीउ पाए ॥
छोडि न जाई सद ही संगे अनदिनु गुर मिलि गाए ॥1॥ रहाउ ॥
मिलिओ मनोहरु सरब सुखैना तिआगि न कतहू जाए ॥
अनिक अनिक भाति बहु पेखे प्रिअ रोम न समसरि लाए ॥1॥
मंदरि भागु सोभ दुआरै अनहत रुणु झुणु लाए ॥
कहु नानक सदा रंगु माणे ग्रिह प्रिअ थीते सद थाए ॥2॥1॥27॥
दरसन नाम कउ मनु आछै ॥
भ्रमि आइओ है सगल थान रे आहि परिओ संत पाछै ॥1॥ रहाउ ॥
किसु हउ सेवी किसु आराधी जो दिसटै सो गाछै ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।