अंग 32

अंग
32
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਹਉ ਹਉ ਕਰਤੀ ਜਗੁ ਫਿਰੀ ਨਾ ਧਨੁ ਸੰਪੈ ਨਾਲਿ ॥
ਅੰਧੀ ਨਾਮੁ ਨ ਚੇਤਈ ਸਭ ਬਾਧੀ ਜਮਕਾਲਿ ॥
ਸਤਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਧਨੁ ਪਾਇਆ ਹਰਿ ਨਾਮਾ ਰਿਦੈ ਸਮਾਲਿ ॥੩॥
ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਸੇ ਨਿਰਮਲੇ ਗੁਰ ਕੈ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਰਾਤਾ ਰੰਗ ਸਿਉ ਰਸਨਾ ਰਸਨ ਰਸਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਰੰਗੁ ਨ ਉਤਰੈ ਜੋ ਹਰਿ ਧੁਰਿ ਛੋਡਿਆ ਲਾਇ ॥੪॥੧੪॥੪੭॥
हउ हउ करती जगु फिरी ना धनु संपै नालि ॥
अंधी नामु न चेतई सभ बाधी जमकालि ॥
सतगुरि मिलिऐ धनु पाइआ हरि नामा रिदै समालि ॥३॥
नामि रते से निरमले गुर कै सहजि सुभाइ ॥
मनु तनु राता रंग सिउ रसना रसन रसाइ ॥
नानक रंगु न उतरै जो हरि धुरि छोडिआ लाइ ॥४॥१४॥४७॥

हिन्दी अर्थ: (संसार आम तौर पर) ममता-जाल में फंसा हुआ (माया की खातिर) ढूंढता फिरता है। पर (एकत्र किया गया) धन पदार्थ किसी के साथ नहीं जाता। (माया के मोह में) अंधा हुआ संसार परमात्मा का नाम नहीं सिमरता और (सिमरन हीन जगत को) आत्मिक मौत ने अपने बंधनों में बांधा हुआ है। अगर गुरू मिल जाए तो हरि नाम धन प्राप्त हो जाता है (गुरू की शरण पड़ के जीव) परमात्मा का नाम अपने हृदय में संभाल के रखता है।3। गुरू के शबद की बरकति से जो मनुष्य परमात्मा के नाम (-रंग) में रंगे जाते हैं वह पवित्र (जीवन वाले) हो जाते हैं। वह आत्मिक अडोलता में टिके रहते हैं~ वह प्रभु-प्रेम में जुड़े रहते हैं। उनका मन~ उनका शरीर प्रभु के प्रेम-रंग से रंगा जाता है। उनकी जीभ नाम रस में रसी रहती है। हे नानक! जिन्हें परमात्मा धुर से ही अपनी रजा से नाम-रंग चढ़ा देता है~ उनका वह रंग कभी उतरता नहीं।4।14।47।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇ ਭਗਤਿ ਕੀਜੈ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਭਗਤਿ ਨ ਹੋਈ ॥
ਆਪੈ ਆਪੁ ਮਿਲਾਏ ਬੂਝੈ ਤਾ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਵੈ ਸੋਈ ॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਸਾਚਾ ਸਾਚੀ ਬਾਣੀ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਵਾ ਹੋਈ ॥੧॥
ਭਾਈ ਰੇ ਭਗਤਿਹੀਣੁ ਕਾਹੇ ਜਗਿ ਆਇਆ ॥
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵ ਨ ਕੀਨੀ ਬਿਰਥਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਇਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਆਪੇ ਜਗਜੀਵਨੁ ਸੁਖਦਾਤਾ ਆਪੇ ਬਖਸਿ ਮਿਲਾਏ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਏ ਕਿਆ ਵੇਚਾਰੇ ਕਿਆ ਕੋ ਆਖਿ ਸੁਣਾਏ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਆਪੇ ਦੇਇ ਵਡਾਈ ਆਪੇ ਸੇਵ ਕਰਾਏ ॥੨॥
ਦੇਖਿ ਕੁਟੰਬੁ ਮੋਹਿ ਲੋਭਾਣਾ ਚਲਦਿਆ ਨਾਲਿ ਨ ਜਾਈ ॥
ਸਤਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਗੁਣ ਨਿਧਾਨੁ ਪਾਇਆ ਤਿਸ ਦੀ ਕੀਮ ਨ ਪਾਈ ॥
ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਸਖਾ ਮੀਤੁ ਪ੍ਰਭੁ ਮੇਰਾ ਅੰਤੇ ਹੋਇ ਸਖਾਈ ॥੩॥
ਆਪਣੈ ਮਨਿ ਚਿਤਿ ਕਹੈ ਕਹਾਏ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਆਪੁ ਨ ਜਾਈ ॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਦਾਤਾ ਭਗਤਿ ਵਛਲੁ ਹੈ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਮੰਨਿ ਵਸਾਈ ॥
ਨਾਨਕ ਸੋਭਾ ਸੁਰਤਿ ਦੇਇ ਪ੍ਰਭੁ ਆਪੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਦੇ ਵਡਿਆਈ ॥੪॥੧੫॥੪੮॥
सिरीरागु महला ३ ॥
गुरमुखि क्रिपा करे भगति कीजै बिनु गुर भगति न होई ॥
आपै आपु मिलाए बूझै ता निरमलु होवै सोई ॥
हरि जीउ साचा साची बाणी सबदि मिलावा होई ॥१॥
भाई रे भगतिहीणु काहे जगि आइआ ॥
पूरे गुर की सेव न कीनी बिरथा जनमु गवाइआ ॥१॥ रहाउ ॥
आपे जगजीवनु सुखदाता आपे बखसि मिलाए ॥
जीअ जंत ए किआ वेचारे किआ को आखि सुणाए ॥
गुरमुखि आपे देइ वडाई आपे सेव कराए ॥२॥
देखि कुटंबु मोहि लोभाणा चलदिआ नालि न जाई ॥
सतगुरु सेवि गुण निधानु पाइआ तिस दी कीम न पाई ॥
हरि प्रभु सखा मीतु प्रभु मेरा अंते होइ सखाई ॥३॥
आपणै मनि चिति कहै कहाए बिनु गुर आपु न जाई ॥
हरि जीउ दाता भगति वछलु है करि किरपा मंनि वसाई ॥
नानक सोभा सुरति देइ प्रभु आपे गुरमुखि दे वडिआई ॥४॥१५॥४८॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ३ ॥ अगर परमात्मा गुरू के द्वारा (जीव पर) कृपा करे तो (जीव द्वारा) भक्ति की जा सकती है। (गुरू की शरण पड़े) बगैर परमात्मा की भक्ति नहीं हो सकती। जो मनुष्य अपने आप को (गुरू के) अस्तित्व में जोड़ दे (इस भेद को) समझ ले~ तो वह पवित्र जीवन वाला हो जाता है। परमात्मा सदा स्थिर रहने वाला है~ (उसकी सिफत सलाह भी सदा स्थिर रहने वाली है) सिफत सलाह की बाणी के द्वारा ही उससे मिलाप हो सकता है।1। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा की भक्ति से वंचित रहा~ उसे जगत में आने का कोई लाभ नहीं हुआ। जिस मनुष्य ने पूरे गुरू की बताई सेवा ना की~ उसने मानुख जन्म व्यर्थ गवा लिया।1।रहाउ। परमात्मा स्वयं ही जगत के जीवों की जिन्दगी का सहारा है~ स्वयं ही (जीवों को) सुख देने वाला है~ स्वयं ही मेहर करके (जीवों को) अपने साथ जोड़ता है। (अगर वह खुद मेहर ना करे तो उसके चरणों में जुड़ने के वास्ते) विचारे जीव बिल्कुल अस्मर्थ है। (प्रभु की मेहर के बिना) ना कोई जीव (उसकी सिफत) कह सकता है ना ही सुना सकता है। परमात्मा स्वयं ही गुरू के द्वारा (अपने नाम की वडिआई) देता है~ और स्वयं अपनी सेवा भक्ति कराता है।2। जीव अपने परिवार को देख के इस के मोह में फंस जाता है। (पर~ परिवार का कोई साथी) जगत से चलने के वक्त जीव के साथ नहीं जाता। जिस मनुष्य ने गुरू की बताई सेवा करके गुणों के खजाने परमात्मा को ढूंढ लिया~ उस की (आत्मिक उच्चता की) कीमत नहीं पड़ सकती। परमात्मा उस मनुष्य का दोस्त बन जाता है मित्र बन जाता है~ अंत समय भी उसका साथी बनता है।3। अपने मन में अपने चित्त में जीव बेशक कहता रहे~ दूसरों से भी कहलवाता फिरे (कि मेरे अंदर अहंकार नहीं है) पर यह अहम् अहंकार गुरू की शरण पड़े बगैर दूर नहीं हो सकता। जो प्रभू सब जीवों को दातें देने वाला है तथा भक्ति से प्यार करता है वह कृपा करके खुद ही (अपनी भक्ती जीव के) हृदय में बसाता है। हे नानक ! प्रभु स्वयं ही (अपनी भक्ति की) सुरति बख्शता है व शोभा बख्शता है। स्वयं ही गुरू की शरण में डाल के (अपने दर पे उसे) आदर सत्कार देता है।4।15।48।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਧਨੁ ਜਨਨੀ ਜਿਨਿ ਜਾਇਆ ਧੰਨੁ ਪਿਤਾ ਪਰਧਾਨੁ ॥ ਸਤਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਵਿਚਹੁ ਗਇਆ ਗੁਮਾਨੁ ॥
ਦਰਿ ਸੇਵਨਿ ਸੰਤ ਜਨ ਖੜੇ ਪਾਇਨਿ ਗੁਣੀ ਨਿਧਾਨੁ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਮਨ ਗੁਰ ਮੁਖਿ ਧਿਆਇ ਹਰਿ ਸੋਇ ॥
ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਮਨਿ ਵਸੈ ਮਨੁ ਤਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਘਰਿ ਆਇਆ ਆਪੇ ਮਿਲਿਆ ਆਇ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਸਾਲਾਹੀਐ ਰੰਗੇ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥
ਸਚੈ ਸਚਿ ਸਮਾਇਆ ਮਿਲਿ ਰਹੈ ਨ ਵਿਛੁੜਿ ਜਾਇ ॥੨॥
ਜੋ ਕਿਛੁ ਕਰਣਾ ਸੁ ਕਰਿ ਰਹਿਆ ਅਵਰੁ ਨ ਕਰਣਾ ਜਾਇ ॥
ਚਿਰੀ ਵਿਛੁੰਨੇ ਮੇਲਿਅਨੁ ਸਤਗੁਰ ਪੰਨੈ ਪਾਇ ॥
ਆਪੇ ਕਾਰ ਕਰਾਇਸੀ ਅਵਰੁ ਨ ਕਰਣਾ ਜਾਇ ॥੩॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਰਤਾ ਰੰਗ ਸਿਉ ਹਉਮੈ ਤਜਿ ਵਿਕਾਰ ॥
ਅਹਿਨਿਸਿ ਹਿਰਦੈ ਰਵਿ ਰਹੈ ਨਿਰਭਉ ਨਾਮੁ ਨਿਰੰਕਾਰ ॥
ਨਾਨਕ ਆਪਿ ਮਿਲਾਇਅਨੁ ਪੂਰੈ ਸਬਦਿ ਅਪਾਰ ॥੪॥੧੬॥੪੯॥
सिरीरागु महला ३ ॥
धनु जननी जिनि जाइआ धंनु पिता परधानु ॥ सतगुरु सेवि सुखु पाइआ विचहु गइआ गुमानु ॥
दरि सेवनि संत जन खड़े पाइनि गुणी निधानु ॥१॥
मेरे मन गुर मुखि धिआइ हरि सोइ ॥
गुर का सबदु मनि वसै मनु तनु निरमलु होइ ॥१॥ रहाउ ॥
करि किरपा घरि आइआ आपे मिलिआ आइ ॥
गुर सबदी सालाहीऐ रंगे सहजि सुभाइ ॥
सचै सचि समाइआ मिलि रहै न विछुड़ि जाइ ॥२॥
जो किछु करणा सु करि रहिआ अवरु न करणा जाइ ॥
चिरी विछुंने मेलिअनु सतगुर पंनै पाइ ॥
आपे कार कराइसी अवरु न करणा जाइ ॥३॥
मनु तनु रता रंग सिउ हउमै तजि विकार ॥
अहिनिसि हिरदै रवि रहै निरभउ नामु निरंकार ॥
नानक आपि मिलाइअनु पूरै सबदि अपार ॥४॥१६॥४९॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ३ ॥ वह माँ भाग्यशाली है जिस ने (गुरू को) जन्म दिया। (गुरू का) पिता भी भाग्यवान है (और मनुष्य जाति में) श्रेष्ठ है। सतिगुरू की शरण लेने से आत्मिक आनन्द प्राप्त होता है (जो मनुष्य गुरू की शरण में आता है उसके) अंदर से अहंकार दूर हो जाता है। (जो) संतजन (गुरू के) दर पर सावधान हो के सेवा करते हैं~ वे गुणों के खजाने परमात्मा को मिल लेते हैं।1। हे मेरे मन! गुरू की शरण पड़ के उस परमात्मा को सिमर। (जिस मनुष्य के) मन में गुरू का शबद बस जाता है उस का मन पवित्र हो जाता है। उसका शरीर पवित्र हो जाता है। (अर्थात्~ ज्ञानेन्द्रियां विकारों से हट जाती हैं।)।1।रहाउ। (गुरू की शरण पड़ने से ही) परमात्मा (जीव के) हृदय घर में आकर प्रगट होता है~ स्वयं ही आ के मिलता है। गुरू के शबद द्वारा ही परमात्मा की सिफत सलाह की जा सकती है (जो मनुष्य सिफत सलाह करता है उसको प्रभु) आत्मिक अडोलता में व (अपने) प्रेम में रंग देता है। (गुरू की शरण पड़ के) मनुष्य सदा स्थिर प्रभु में ही लीन रहता है~ सदैव प्रभु चरणों में विलीन रहता है~ कभी विछुड़ता नहीं।2। (परमात्मा की रजा ही ऐसी है कि उसको मिलने के वास्ते जीव सत्गुरू की शरण पड़े~ इस रजा का उलंघन नहीं हो सकता) वह परमात्मा वही कुछ कर रहा है जो उसकी रजा है। (उस रजा के उलट) और कुछ किया ही नहीं जा सकता। सत्गुरू के साथ लग के परमात्मा ने चिरों से बिछुड़े जीवों को अपने चरणों में मिला लिया है। प्रभु स्वयं ही (गुरू की शरण पड़ने वाला) कर्म (जीवों से) करवाता है~ इसके उलट नहीं चला जा सकता।3। (गुरू की शरण पड़ के ही) अहम् का विकार दूर करके मनुष्य का मन और शरीर भी परमात्मा के प्रेम रंग से रंगा जाता है। (अगर जीव गुरू की शरण पड़े तो) आकार-रहित परमात्मा का निर्भैता देने वाला नाम दिन रात उसके हृदय में टिका रहता है। हे नानक ! बेअंत पूर्ण प्रभु ने गुरू के शबद के द्वारा स्वयं जीवों को (अपने चरणों में) मिलाया है।4।16।49।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਗੋਵਿਦੁ ਗੁਣੀ ਨਿਧਾਨੁ ਹੈ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਇਆ ਜਾਇ ॥
ਕਥਨੀ ਬਦਨੀ ਨ ਪਾਈਐ ਹਉਮੈ ਵਿਚਹੁ ਜਾਇ ॥
सिरीरागु महला ३ ॥
गोविदु गुणी निधानु है अंतु न पाइआ जाइ ॥
कथनी बदनी न पाईऐ हउमै विचहु जाइ ॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ३ ॥ परमात्मा सभ गुणों का खजाना है। (उसके गुणों का) आखिरी छोर ढूंढा नहीं जा सकता। सिर्फ यही कहने से कथन करने से (कि मैंने परमात्मा को ढूंढ लिया है) परमात्मा को प्राप्त नहीं किया जा सकता। (परमात्मा तभी मिलता है यदि) मनुष्य के अंदर से अहम् खत्म हो जाए।

संदर्भ: यह अंग 32 है, राग Siree Raag का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।

दिल्ली के winter-fog में सुबह 5 बजे driver को waiting करवाना।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 38 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 32” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Siree Raag राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 33 →, पीछे का: ← अंग 31

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।