अंग
30
राग Siree Raag
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਹਰਿ ਜੀਉ ਸਦਾ ਧਿਆਇ ਤੂ ਗੁਰਮੁਖਿ ਏਕੰਕਾਰੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਰਮੁਖਾ ਕੇ ਮੁਖ ਉਜਲੇ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਬੀਚਾਰਿ ॥
ਹਲਤਿ ਪਲਤਿ ਸੁਖੁ ਪਾਇਦੇ ਜਪਿ ਜਪਿ ਰਿਦੈ ਮੁਰਾਰਿ ॥
ਘਰ ਹੀ ਵਿਚਿ ਮਹਲੁ ਪਾਇਆ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਵੀਚਾਰਿ ॥੨॥
ਸਤਗੁਰ ਤੇ ਜੋ ਮੁਹ ਫੇਰਹਿ ਮਥੇ ਤਿਨ ਕਾਲੇ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਦੁਖ ਕਮਾਵਦੇ ਨਿਤ ਜੋਹੇ ਜਮ ਜਾਲੇ ॥
ਸੁਪਨੈ ਸੁਖੁ ਨ ਦੇਖਨੀ ਬਹੁ ਚਿੰਤਾ ਪਰਜਾਲੇ ॥੩॥
ਸਭਨਾ ਕਾ ਦਾਤਾ ਏਕੁ ਹੈ ਆਪੇ ਬਖਸ ਕਰੇਇ ॥
ਕਹਣਾ ਕਿਛੂ ਨ ਜਾਵਈ ਜਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਿਸੁ ਦੇਇ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਈਐ ਆਪੇ ਜਾਣੈ ਸੋਇ ॥੪॥੯॥੪੨॥
ਗੁਰਮੁਖਾ ਕੇ ਮੁਖ ਉਜਲੇ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਬੀਚਾਰਿ ॥
ਹਲਤਿ ਪਲਤਿ ਸੁਖੁ ਪਾਇਦੇ ਜਪਿ ਜਪਿ ਰਿਦੈ ਮੁਰਾਰਿ ॥
ਘਰ ਹੀ ਵਿਚਿ ਮਹਲੁ ਪਾਇਆ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਵੀਚਾਰਿ ॥੨॥
ਸਤਗੁਰ ਤੇ ਜੋ ਮੁਹ ਫੇਰਹਿ ਮਥੇ ਤਿਨ ਕਾਲੇ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਦੁਖ ਕਮਾਵਦੇ ਨਿਤ ਜੋਹੇ ਜਮ ਜਾਲੇ ॥
ਸੁਪਨੈ ਸੁਖੁ ਨ ਦੇਖਨੀ ਬਹੁ ਚਿੰਤਾ ਪਰਜਾਲੇ ॥੩॥
ਸਭਨਾ ਕਾ ਦਾਤਾ ਏਕੁ ਹੈ ਆਪੇ ਬਖਸ ਕਰੇਇ ॥
ਕਹਣਾ ਕਿਛੂ ਨ ਜਾਵਈ ਜਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਿਸੁ ਦੇਇ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਈਐ ਆਪੇ ਜਾਣੈ ਸੋਇ ॥੪॥੯॥੪੨॥
हरि जीउ सदा धिआइ तू गुरमुखि एकंकारु ॥१॥ रहाउ ॥
गुरमुखा के मुख उजले गुर सबदी बीचारि ॥
हलति पलति सुखु पाइदे जपि जपि रिदै मुरारि ॥
घर ही विचि महलु पाइआ गुर सबदी वीचारि ॥२॥
सतगुर ते जो मुह फेरहि मथे तिन काले ॥
अनदिनु दुख कमावदे नित जोहे जम जाले ॥
सुपनै सुखु न देखनी बहु चिंता परजाले ॥३॥
सभना का दाता एकु है आपे बखस करेइ ॥
कहणा किछू न जावई जिसु भावै तिसु देइ ॥
नानक गुरमुखि पाईऐ आपे जाणै सोइ ॥४॥९॥४२॥
गुरमुखा के मुख उजले गुर सबदी बीचारि ॥
हलति पलति सुखु पाइदे जपि जपि रिदै मुरारि ॥
घर ही विचि महलु पाइआ गुर सबदी वीचारि ॥२॥
सतगुर ते जो मुह फेरहि मथे तिन काले ॥
अनदिनु दुख कमावदे नित जोहे जम जाले ॥
सुपनै सुखु न देखनी बहु चिंता परजाले ॥३॥
सभना का दाता एकु है आपे बखस करेइ ॥
कहणा किछू न जावई जिसु भावै तिसु देइ ॥
नानक गुरमुखि पाईऐ आपे जाणै सोइ ॥४॥९॥४२॥
हिन्दी अर्थ: गुरू की शरण पड़ कर तू सर्व-व्यापक परमात्मा को सिमरता रह।1।रहाउ। जो लोग गुरू के सन्मुख रहते हैं गुरू के शबद के द्वारा (परमात्मा के गुणों को) विचार के (वह) सदा सुर्खरू रहते हैं। वह अपने हृदय में परमात्मा का नाम सिमर सिमर के लोक परलोक में सुख भोगते हैं। गुरू के शबद की बरकति से परमात्मा के नाम को याद करके उन्होंने अपने हृदय में परमात्मा का निवास स्थान ढूंढ लिया होता है।2। जो मनुष्य गुरू से बेमुख होते हैं उनके माथे भ्रष्ट हो जाते हैं। (उन्हें अपने अंदर से फिटकार ही पड़ती रहती है)। वह सदा वही करतूतें करते हैं जिनका फल दुख होता है। वह सदा जम के जाल में जम की ताक में रहते हैं। कभी सपने में भी उन्हें सुख नहीं मिलता। बहुत सारी चिंताएं उन्हें जलाती रहती हैं।3। वह परमात्मा सभ जीवों को दातें देने वाला है~ वह स्वयं ही बख्शिश करता है। पर कुछ कहा नहीं जा सकता (कि मनमुख क्यूँ नाम चेते नहीं करता और गुरमुख क्यूँ सिमरता है?) जिस पर वह प्रसंन्न होता है उसको नाम की दात देता है। वह स्वयं ही (हरेक जीव के दिल की) जानता है। हे नानक! (उसकी मेहर से) गुरू की शरण पड़ने से उससे मिलाप होता है।4।9।42।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਸਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਸੇਵੀਐ ਸਚੁ ਵਡਿਆਈ ਦੇਇ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਮਨਿ ਵਸੈ ਹਉਮੈ ਦੂਰਿ ਕਰੇਇ ॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਧਾਵਤੁ ਤਾ ਰਹੈ ਜਾ ਆਪੇ ਨਦਰਿ ਕਰੇਇ ॥੧॥
ਭਾਈ ਰੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇ ॥
ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਸਦ ਮਨਿ ਵਸੈ ਮਹਲੀ ਪਾਵੈ ਥਾਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਨਮੁਖ ਮਨੁ ਤਨੁ ਅੰਧੁ ਹੈ ਤਿਸ ਨਉ ਠਉਰ ਨ ਠਾਉ ॥
ਬਹੁ ਜੋਨੀ ਭਉਦਾ ਫਿਰੈ ਜਿਉ ਸੁੰਞੈਂ ਘਰਿ ਕਾਉ ॥
ਗੁਰਮਤੀ ਘਟਿ ਚਾਨਣਾ ਸਬਦਿ ਮਿਲੈ ਹਰਿ ਨਾਉ ॥੨॥
ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਬਿਖਿਆ ਅੰਧੁ ਹੈ ਮਾਇਆ ਮੋਹ ਗੁਬਾਰ ॥
ਲੋਭੀ ਅਨ ਕਉ ਸੇਵਦੇ ਪੜਿ ਵੇਦਾ ਕਰੈ ਪੂਕਾਰ ॥
ਬਿਖਿਆ ਅੰਦਰਿ ਪਚਿ ਮੁਏ ਨਾ ਉਰਵਾਰੁ ਨ ਪਾਰੁ ॥੩॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਵਿਸਾਰਿਆ ਜਗਤ ਪਿਤਾ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਿ ॥
ਬਾਝਹੁ ਗੁਰੂ ਅਚੇਤੁ ਹੈ ਸਭ ਬਧੀ ਜਮਕਾਲਿ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮਤਿ ਉਬਰੇ ਸਚਾ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਿ ॥੪॥੧੦॥੪੩॥
ਸਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਸੇਵੀਐ ਸਚੁ ਵਡਿਆਈ ਦੇਇ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਮਨਿ ਵਸੈ ਹਉਮੈ ਦੂਰਿ ਕਰੇਇ ॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਧਾਵਤੁ ਤਾ ਰਹੈ ਜਾ ਆਪੇ ਨਦਰਿ ਕਰੇਇ ॥੧॥
ਭਾਈ ਰੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇ ॥
ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਸਦ ਮਨਿ ਵਸੈ ਮਹਲੀ ਪਾਵੈ ਥਾਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਨਮੁਖ ਮਨੁ ਤਨੁ ਅੰਧੁ ਹੈ ਤਿਸ ਨਉ ਠਉਰ ਨ ਠਾਉ ॥
ਬਹੁ ਜੋਨੀ ਭਉਦਾ ਫਿਰੈ ਜਿਉ ਸੁੰਞੈਂ ਘਰਿ ਕਾਉ ॥
ਗੁਰਮਤੀ ਘਟਿ ਚਾਨਣਾ ਸਬਦਿ ਮਿਲੈ ਹਰਿ ਨਾਉ ॥੨॥
ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਬਿਖਿਆ ਅੰਧੁ ਹੈ ਮਾਇਆ ਮੋਹ ਗੁਬਾਰ ॥
ਲੋਭੀ ਅਨ ਕਉ ਸੇਵਦੇ ਪੜਿ ਵੇਦਾ ਕਰੈ ਪੂਕਾਰ ॥
ਬਿਖਿਆ ਅੰਦਰਿ ਪਚਿ ਮੁਏ ਨਾ ਉਰਵਾਰੁ ਨ ਪਾਰੁ ॥੩॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਵਿਸਾਰਿਆ ਜਗਤ ਪਿਤਾ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਿ ॥
ਬਾਝਹੁ ਗੁਰੂ ਅਚੇਤੁ ਹੈ ਸਭ ਬਧੀ ਜਮਕਾਲਿ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮਤਿ ਉਬਰੇ ਸਚਾ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਿ ॥੪॥੧੦॥੪੩॥
सिरीरागु महला ३ ॥
सचा साहिबु सेवीऐ सचु वडिआई देइ ॥
गुर परसादी मनि वसै हउमै दूरि करेइ ॥
इहु मनु धावतु ता रहै जा आपे नदरि करेइ ॥१॥
भाई रे गुरमुखि हरि नामु धिआइ ॥
नामु निधानु सद मनि वसै महली पावै थाउ ॥१॥ रहाउ ॥
मनमुख मनु तनु अंधु है तिस नउ ठउर न ठाउ ॥
बहु जोनी भउदा फिरै जिउ सुंञैं घरि काउ ॥
गुरमती घटि चानणा सबदि मिलै हरि नाउ ॥२॥
त्रै गुण बिखिआ अंधु है माइआ मोह गुबार ॥
लोभी अन कउ सेवदे पड़ि वेदा करै पूकार ॥
बिखिआ अंदरि पचि मुए ना उरवारु न पारु ॥३॥
माइआ मोहि विसारिआ जगत पिता प्रतिपालि ॥
बाझहु गुरू अचेतु है सभ बधी जमकालि ॥
नानक गुरमति उबरे सचा नामु समालि ॥४॥१०॥४३॥
सचा साहिबु सेवीऐ सचु वडिआई देइ ॥
गुर परसादी मनि वसै हउमै दूरि करेइ ॥
इहु मनु धावतु ता रहै जा आपे नदरि करेइ ॥१॥
भाई रे गुरमुखि हरि नामु धिआइ ॥
नामु निधानु सद मनि वसै महली पावै थाउ ॥१॥ रहाउ ॥
मनमुख मनु तनु अंधु है तिस नउ ठउर न ठाउ ॥
बहु जोनी भउदा फिरै जिउ सुंञैं घरि काउ ॥
गुरमती घटि चानणा सबदि मिलै हरि नाउ ॥२॥
त्रै गुण बिखिआ अंधु है माइआ मोह गुबार ॥
लोभी अन कउ सेवदे पड़ि वेदा करै पूकार ॥
बिखिआ अंदरि पचि मुए ना उरवारु न पारु ॥३॥
माइआ मोहि विसारिआ जगत पिता प्रतिपालि ॥
बाझहु गुरू अचेतु है सभ बधी जमकालि ॥
नानक गुरमति उबरे सचा नामु समालि ॥४॥१०॥४३॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ३ ॥ (हे भाई!) सदा स्थिर रहने वाले मालिक प्रभू को सिमरना चाहिए (जो सिमरता है उसे) सदा स्थिर प्रभू आदर देता है। गुरू की मेहर से जिसके मन में प्रभू बसता है वह अपने अंदर अहंकार दूर कर लेता है। (पर किसी के बस की बात नहीं। माया बड़ी मोहनी है) जब प्रभू खुद ही मेहर की निगाह करता है तभी ये मन (माया के पीछे) दौड़ने से हटता है।1। हे भाई ! गुरू की शरण में पड़ कर परमात्मा का नाम सिमर। जिस मनुष्य के मन में नाम खजाना सदा बसता है वह परमात्मा के चरणों में ठिकाना ढूंढ लेता है।1।रहाउ। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य का मन (माया के मोह में) अंधा हो जाता है। शरीर भी (भाव~ हरेक ज्ञानेन्द्रियां भी) अंधा हो जाता है। उसे (आत्मिक शान्ति के लिए) कोई जगह नहीं मिलती। (माया के मोह में फंस के) वह अनेकों जोनियों में भटकता है (कहीं भी उसे आत्मिक शांति नहीं मिलती) जैसे किसी खाली घर में कौआ जाता है (तो वहां उसे मिलता कुछ नहीं)। गुरू की मति पर चलने से हृदय में प्रकाश (हो जाता है) (भाव~ सही जीवन की समझ आ जाती है)~ गुरू शबद में जुड़ने से परमात्मा का नाम प्राप्त हो जाता है।2। त्रैगुणी माया के प्रभाव में जगत अंधा हो रहा है~ माया के मोह का अंधेरा (चारों ओर पसरा हुआ है)। लोभ ग्रसे जीव (वैसे तो) वेदों को पढ़ के (उनके उपदेशों का) ढंढोरा देते हैं~ (पर अंदर से प्रभू को विसार के) औरों की (भाव~ माया की) सेवा करते हैं। माया के मोह में खुआर हो हो के आत्मिक मौत मर जाते हैं। ( माया के मोह के घोर अंधकार में उनको) ना इस पार का कुछ दिखता है ना ही अगले पार का ।3। माया के मोह में फंस के जीवों ने जगत पिता पालणहार प्रभू को बिसार दिया है। गुरू (की शरण) के बगैर जीव गाफिल हो रहा है। (परमात्मा से बिछुड़ी हुई) सारी ख़लकत को आत्मिक मौत ने (अपने बंधनों में) जकड़ा हुआ है। हे नानक! गुरू की शिक्षा की बरकति से सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा का नाम हृदय में बसा के ही जीव (आत्मिक मौत के बंधनों से) बच सकते हैं।4।10।43।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਹੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਚਉਥਾ ਪਦੁ ਪਾਇ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਮੇਲਾਇਅਨੁ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਵਸਿਆ ਮਨਿ ਆਇ ॥
ਪੋਤੈ ਜਿਨ ਕੈ ਪੁੰਨੁ ਹੈ ਤਿਨ ਸਤਸੰਗਤਿ ਮੇਲਾਇ ॥੧॥
ਭਾਈ ਰੇ ਗੁਰਮਤਿ ਸਾਚਿ ਰਹਾਉ ॥
ਸਾਚੋ ਸਾਚੁ ਕਮਾਵਣਾ ਸਾਚੈ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਿਨੀ ਨਾਮੁ ਪਛਾਣਿਆ ਤਿਨ ਵਿਟਹੁ ਬਲਿ ਜਾਉ ॥
ਆਪੁ ਛੋਡਿ ਚਰਣੀ ਲਗਾ ਚਲਾ ਤਿਨ ਕੈ ਭਾਇ ॥
ਲਾਹਾ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਮਿਲੈ ਸਹਜੇ ਨਾਮਿ ਸਮਾਇ ॥੨॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਮਹਲੁ ਨ ਪਾਈਐ ਨਾਮੁ ਨ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਇ ॥
ਐਸਾ ਸਤਗੁਰੁ ਲੋੜਿ ਲਹੁ ਜਿਦੂ ਪਾਈਐ ਸਚੁ ਸੋਇ ॥
ਅਸੁਰ ਸੰਘਾਰੈ ਸੁਖਿ ਵਸੈ ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਸੁ ਹੋਇ ॥੩॥
ਜੇਹਾ ਸਤਗੁਰੁ ਕਰਿ ਜਾਣਿਆ ਤੇਹੋ ਜੇਹਾ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥
ਏਹੁ ਸਹਸਾ ਮੂਲੇ ਨਾਹੀ ਭਾਉ ਲਾਏ ਜਨੁ ਕੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਏਕ ਜੋਤਿ ਦੁਇ ਮੂਰਤੀ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਵਾ ਹੋਇ ॥੪॥੧੧॥੪੪॥
ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਹੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਚਉਥਾ ਪਦੁ ਪਾਇ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਮੇਲਾਇਅਨੁ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਵਸਿਆ ਮਨਿ ਆਇ ॥
ਪੋਤੈ ਜਿਨ ਕੈ ਪੁੰਨੁ ਹੈ ਤਿਨ ਸਤਸੰਗਤਿ ਮੇਲਾਇ ॥੧॥
ਭਾਈ ਰੇ ਗੁਰਮਤਿ ਸਾਚਿ ਰਹਾਉ ॥
ਸਾਚੋ ਸਾਚੁ ਕਮਾਵਣਾ ਸਾਚੈ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਿਨੀ ਨਾਮੁ ਪਛਾਣਿਆ ਤਿਨ ਵਿਟਹੁ ਬਲਿ ਜਾਉ ॥
ਆਪੁ ਛੋਡਿ ਚਰਣੀ ਲਗਾ ਚਲਾ ਤਿਨ ਕੈ ਭਾਇ ॥
ਲਾਹਾ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਮਿਲੈ ਸਹਜੇ ਨਾਮਿ ਸਮਾਇ ॥੨॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਮਹਲੁ ਨ ਪਾਈਐ ਨਾਮੁ ਨ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਇ ॥
ਐਸਾ ਸਤਗੁਰੁ ਲੋੜਿ ਲਹੁ ਜਿਦੂ ਪਾਈਐ ਸਚੁ ਸੋਇ ॥
ਅਸੁਰ ਸੰਘਾਰੈ ਸੁਖਿ ਵਸੈ ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਸੁ ਹੋਇ ॥੩॥
ਜੇਹਾ ਸਤਗੁਰੁ ਕਰਿ ਜਾਣਿਆ ਤੇਹੋ ਜੇਹਾ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥
ਏਹੁ ਸਹਸਾ ਮੂਲੇ ਨਾਹੀ ਭਾਉ ਲਾਏ ਜਨੁ ਕੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਏਕ ਜੋਤਿ ਦੁਇ ਮੂਰਤੀ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਵਾ ਹੋਇ ॥੪॥੧੧॥੪੪॥
सिरीरागु महला ३ ॥
त्रै गुण माइआ मोहु है गुरमुखि चउथा पदु पाइ ॥
करि किरपा मेलाइअनु हरि नामु वसिआ मनि आइ ॥
पोतै जिन कै पुंनु है तिन सतसंगति मेलाइ ॥१॥
भाई रे गुरमति साचि रहाउ ॥
साचो साचु कमावणा साचै सबदि मिलाउ ॥१॥ रहाउ ॥
जिनी नामु पछाणिआ तिन विटहु बलि जाउ ॥
आपु छोडि चरणी लगा चला तिन कै भाइ ॥
लाहा हरि हरि नामु मिलै सहजे नामि समाइ ॥२॥
बिनु गुर महलु न पाईऐ नामु न परापति होइ ॥
ऐसा सतगुरु लोड़ि लहु जिदू पाईऐ सचु सोइ ॥
असुर संघारै सुखि वसै जो तिसु भावै सु होइ ॥३॥
जेहा सतगुरु करि जाणिआ तेहो जेहा सुखु होइ ॥
एहु सहसा मूले नाही भाउ लाए जनु कोइ ॥
नानक एक जोति दुइ मूरती सबदि मिलावा होइ ॥४॥११॥४४॥
त्रै गुण माइआ मोहु है गुरमुखि चउथा पदु पाइ ॥
करि किरपा मेलाइअनु हरि नामु वसिआ मनि आइ ॥
पोतै जिन कै पुंनु है तिन सतसंगति मेलाइ ॥१॥
भाई रे गुरमति साचि रहाउ ॥
साचो साचु कमावणा साचै सबदि मिलाउ ॥१॥ रहाउ ॥
जिनी नामु पछाणिआ तिन विटहु बलि जाउ ॥
आपु छोडि चरणी लगा चला तिन कै भाइ ॥
लाहा हरि हरि नामु मिलै सहजे नामि समाइ ॥२॥
बिनु गुर महलु न पाईऐ नामु न परापति होइ ॥
ऐसा सतगुरु लोड़ि लहु जिदू पाईऐ सचु सोइ ॥
असुर संघारै सुखि वसै जो तिसु भावै सु होइ ॥३॥
जेहा सतगुरु करि जाणिआ तेहो जेहा सुखु होइ ॥
एहु सहसा मूले नाही भाउ लाए जनु कोइ ॥
नानक एक जोति दुइ मूरती सबदि मिलावा होइ ॥४॥११॥४४॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ३ ॥ (जगत में) त्रिगुणी माया का मोह (पसर रहा) है जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है वह उस आत्मिक दर्जे को हासिल कर लेता है जहां माया के तीनों गुणों का जोर नहीं पड़ सकता। परमात्मा ने मेहर करके जिन मनुष्यों को अपने चरणों में मिलाया है उनके मन में परमात्मा का नाम आ बसता है। जिनके भाग्य में नेकी है~ परमात्मा उनको साध-संगति में मिलता है।1। हे भाई ! गुरू की मति ले के सदा स्थिर प्रभू में टिके रहो। सदा स्थिर प्रभू के सिमरन की ही कमाई करो~ सदा स्थिर प्रभू की सिफत सलाह में जुड़े रहो ।1।रहाउ। मैं उन गुरमुखों के सदके जाता हूँ~ जिन्होंने परमात्मा के नाम की कद्र समझी है। स्वै-भाव त्याग के मैं उनके चरणों में नत्मस्तक हूँ~ मैं उनके अनुसार हो के चलता हूँ। (जो मनुष्य नाम जपने वालों की शरण लेता है वह) आत्मिक अडोलता से परमात्मा के नाम में लीन हो जाता है~ उसको प्रभू का नाम रूपी लाभ हासिल हो जाता है।2। गुरू की शरण के बिना परमात्मा का दर नहीं मिलता~ प्रभू का नाम नहीं मिलता (हे भाई! तू भी) ऐसा गुरू ढूंढ ले~ जिससे वह सदा स्थिर रहने वाला परमात्मा मिल जाए। (जो मनुष्य गुरू के द्वारा परमात्मा को ढूंढ लेता है) वह कामादिक दैंतों को मार लेता है। वह आत्मिक आनन्द में टिका रहता है। (उसको निष्चय हो जाता है कि) जो कुछ परमात्मा को अच्छा लगता है वही होता है।3। कोई भी मनुष्य (गुरू चरणों में) श्रद्धा बना के देख ले~ सत्गुरू को जैसा भी जिस किसी ने समझा है उसे वैसा आत्मिक आनन्द प्राप्त हुआ है। इस में रत्ती भर भी शक नहीं है (क्योंकि जिस सिख का गुरू के) शबद द्वारा मिलाप हो जाता है~ हे नानक! (उस सिख और गुरू की) ज्योति एक हो जाती है~ शरीर चाहे दो होते हैं।4।11।44।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 30 है, राग Siree Raag का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
New Friends Colony के पाँच-मंज़िला flat की terrace पर रात की हवा।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 40 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 30” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Siree Raag राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 31 →, पीछे का: ← अंग 29।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।