अंग
1407
राग Svaiyay Mehl 5
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗੁਰ ਅਰਜੁਨ ਗੁਣ ਸਹਜਿ ਬਿਚਾਰੰ ॥
ਗੁਰ ਰਾਮਦਾਸ ਘਰਿ ਕੀਅਉ ਪ੍ਰਗਾਸਾ ॥
ਸਗਲ ਮਨੋਰਥ ਪੂਰੀ ਆਸਾ ॥
ਤੈ ਜਨਮਤ ਗੁਰਮਤਿ ਬ੍ਰਹਮੁ ਪਛਾਣਿਓ ॥
ਕਲੵ ਜੋੜਿ ਕਰ ਸੁਜਸੁ ਵਖਾਣਿਓ ॥
ਭਗਤਿ ਜੋਗ ਕੌ ਜੈਤਵਾਰੁ ਹਰਿ ਜਨਕੁ ਉਪਾਯਉ ॥
ਸਬਦੁ ਗੁਰੂ ਪਰਕਾਸਿਓ ਹਰਿ ਰਸਨ ਬਸਾਯਉ ॥
ਗੁਰ ਨਾਨਕ ਅੰਗਦ ਅਮਰ ਲਾਗਿ ਉਤਮ ਪਦੁ ਪਾਯਉ ॥
ਗੁਰੁ ਅਰਜੁਨੁ ਘਰਿ ਗੁਰ ਰਾਮਦਾਸ ਭਗਤ ਉਤਰਿ ਆਯਉ ॥੧॥
ਗੁਰ ਰਾਮਦਾਸ ਘਰਿ ਕੀਅਉ ਪ੍ਰਗਾਸਾ ॥
ਸਗਲ ਮਨੋਰਥ ਪੂਰੀ ਆਸਾ ॥
ਤੈ ਜਨਮਤ ਗੁਰਮਤਿ ਬ੍ਰਹਮੁ ਪਛਾਣਿਓ ॥
ਕਲੵ ਜੋੜਿ ਕਰ ਸੁਜਸੁ ਵਖਾਣਿਓ ॥
ਭਗਤਿ ਜੋਗ ਕੌ ਜੈਤਵਾਰੁ ਹਰਿ ਜਨਕੁ ਉਪਾਯਉ ॥
ਸਬਦੁ ਗੁਰੂ ਪਰਕਾਸਿਓ ਹਰਿ ਰਸਨ ਬਸਾਯਉ ॥
ਗੁਰ ਨਾਨਕ ਅੰਗਦ ਅਮਰ ਲਾਗਿ ਉਤਮ ਪਦੁ ਪਾਯਉ ॥
ਗੁਰੁ ਅਰਜੁਨੁ ਘਰਿ ਗੁਰ ਰਾਮਦਾਸ ਭਗਤ ਉਤਰਿ ਆਯਉ ॥੧॥
गुर अरजुन गुण सहजि बिचारं ॥
गुर रामदास घरि कीअउ प्रगासा ॥
सगल मनोरथ पूरी आसा ॥
तै जनमत गुरमति ब्रहमु पछाणिओ ॥
कलॵ जोड़ि कर सुजसु वखाणिओ ॥
भगति जोग कौ जैतवारु हरि जनकु उपायउ ॥
सबदु गुरू परकासिओ हरि रसन बसायउ ॥
गुर नानक अंगद अमर लागि उतम पदु पायउ ॥
गुरु अरजुनु घरि गुर रामदास भगत उतरि आयउ ॥१॥
गुर रामदास घरि कीअउ प्रगासा ॥
सगल मनोरथ पूरी आसा ॥
तै जनमत गुरमति ब्रहमु पछाणिओ ॥
कलॵ जोड़ि कर सुजसु वखाणिओ ॥
भगति जोग कौ जैतवारु हरि जनकु उपायउ ॥
सबदु गुरू परकासिओ हरि रसन बसायउ ॥
गुर नानक अंगद अमर लागि उतम पदु पायउ ॥
गुरु अरजुनु घरि गुर रामदास भगत उतरि आयउ ॥१॥
हिन्दी अर्थ: और प्रेम से गुरू अरजन देव जी के गुण विचारता हूँ। (आप ने) गुरू रामदास (जी) के घर में जनम लिया। (उनके) सारे मनोरथ और आशाएं पूरी हुई। जनम से ही आप ने गुरू की मति के द्वारा ब्रहम को पहचाना है (परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाली हुई है)। (हे गुरू अरजुन !) कॅल् कवि हाथ जोड़ के (आपकी) सिफत उचारता है। आप ने भगती के जोग को जीत लिया है (भाव। आपने भगती का मिलाप पा लिया है)। हरी ने (आप को) ‘जनक’ पैदा किया है। (आप ने) गुरू शबद को प्रकट किया है। और हरी को (आप ने) जीभ पर बसाया है। गुरू नानक देव। गुरू अंगद साहिब और गुरू अमरदास जी के चरणों में लग के। (गुरू अरजन साहिब जी ने) उक्तम पदवी पाई है ; गुरू रामदास (जी) के घर में गुरू अरजुन भगत पैदा हो गया है। 1।
ਬਡਭਾਗੀ ਉਨਮਾਨਿਅਉ ਰਿਦਿ ਸਬਦੁ ਬਸਾਯਉ ॥
ਮਨੁ ਮਾਣਕੁ ਸੰਤੋਖਿਅਉ ਗੁਰਿ ਨਾਮੁ ਦ੍ਰਿੜੑਾਯਉ ॥
ਅਗਮੁ ਅਗੋਚਰੁ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਸਤਿਗੁਰਿ ਦਰਸਾਯਉ ॥
ਗੁਰੁ ਅਰਜੁਨੁ ਘਰਿ ਗੁਰ ਰਾਮਦਾਸ ਅਨਭਉ ਠਹਰਾਯਉ ॥੨॥
ਮਨੁ ਮਾਣਕੁ ਸੰਤੋਖਿਅਉ ਗੁਰਿ ਨਾਮੁ ਦ੍ਰਿੜੑਾਯਉ ॥
ਅਗਮੁ ਅਗੋਚਰੁ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਸਤਿਗੁਰਿ ਦਰਸਾਯਉ ॥
ਗੁਰੁ ਅਰਜੁਨੁ ਘਰਿ ਗੁਰ ਰਾਮਦਾਸ ਅਨਭਉ ਠਹਰਾਯਉ ॥੨॥
बडभागी उनमानिअउ रिदि सबदु बसायउ ॥
मनु माणकु संतोखिअउ गुरि नामु द्रिड़॑ायउ ॥
अगमु अगोचरु पारब्रहमु सतिगुरि दरसायउ ॥
गुरु अरजुनु घरि गुर रामदास अनभउ ठहरायउ ॥२॥
मनु माणकु संतोखिअउ गुरि नामु द्रिड़॑ायउ ॥
अगमु अगोचरु पारब्रहमु सतिगुरि दरसायउ ॥
गुरु अरजुनु घरि गुर रामदास अनभउ ठहरायउ ॥२॥
हिन्दी अर्थ: (गुरू अरजन) बहुत भाग्यशाली है। पूर्ण खिलाव में है। (आपने) हृदय में शबद बसाया है; (आपने अपने) माणक-रूप मन को संतोख में टिकाया है; गुरू (रामदास जी) ने (आप को) नाम दृढ़ कराया है। सतिगुरू (रामदास जी) ने (आप को) अगम अगोचर पारब्रहम दिखा दिया है। गुरू रामदास (जी) के घर में अकाल-पुरख ने गुरू अरजुन (जी) को ज्ञान-रूप स्थापित किया है। 2।
ਜਨਕ ਰਾਜੁ ਬਰਤਾਇਆ ਸਤਜੁਗੁ ਆਲੀਣਾ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੇ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ਅਪਤੀਜੁ ਪਤੀਣਾ ॥
ਗੁਰੁ ਨਾਨਕੁ ਸਚੁ ਨੀਵ ਸਾਜਿ ਸਤਿਗੁਰ ਸੰਗਿ ਲੀਣਾ ॥
ਗੁਰੁ ਅਰਜੁਨੁ ਘਰਿ ਗੁਰ ਰਾਮਦਾਸ ਅਪਰੰਪਰੁ ਬੀਣਾ ॥੩॥
ਗੁਰ ਸਬਦੇ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ਅਪਤੀਜੁ ਪਤੀਣਾ ॥
ਗੁਰੁ ਨਾਨਕੁ ਸਚੁ ਨੀਵ ਸਾਜਿ ਸਤਿਗੁਰ ਸੰਗਿ ਲੀਣਾ ॥
ਗੁਰੁ ਅਰਜੁਨੁ ਘਰਿ ਗੁਰ ਰਾਮਦਾਸ ਅਪਰੰਪਰੁ ਬੀਣਾ ॥੩॥
जनक राजु बरताइआ सतजुगु आलीणा ॥
गुर सबदे मनु मानिआ अपतीजु पतीणा ॥
गुरु नानकु सचु नीव साजि सतिगुर संगि लीणा ॥
गुरु अरजुनु घरि गुर रामदास अपरंपरु बीणा ॥३॥
गुर सबदे मनु मानिआ अपतीजु पतीणा ॥
गुरु नानकु सचु नीव साजि सतिगुर संगि लीणा ॥
गुरु अरजुनु घरि गुर रामदास अपरंपरु बीणा ॥३॥
हिन्दी अर्थ: (गुरू अरजन साहिब ने) ज्ञान का राज बरता दिया है। (अब तो) सतिगुरू बरत रहा है। (आप का) मन गुरू के शबद में माना हुआ है। और यह ना पतीजने वाला मन पतीज गया है। गुरू नानक देव स्वयं ‘सचु’-रूप नींव उसार के गुरू (अरजन देव जी) में लीन हो गया है। गुरू रामदास (जी) के घर में गुरू अरजुन देव अपरंपर-रूप बना हुआ है। 3।
ਖੇਲੁ ਗੂੜੑਉ ਕੀਅਉ ਹਰਿ ਰਾਇ ਸੰਤੋਖਿ ਸਮਾਚਰੵਿਓ ਬਿਮਲ ਬੁਧਿ ਸਤਿਗੁਰਿ ਸਮਾਣਉ ॥
ਆਜੋਨੀ ਸੰਭਵਿਅਉ ਸੁਜਸੁ ਕਲੵ ਕਵੀਅਣਿ ਬਖਾਣਿਅਉ ॥
ਗੁਰਿ ਨਾਨਕਿ ਅੰਗਦੁ ਵਰੵਉ ਗੁਰਿ ਅੰਗਦਿ ਅਮਰ ਨਿਧਾਨੁ ॥
ਗੁਰਿ ਰਾਮਦਾਸ ਅਰਜੁਨੁ ਵਰੵਉ ਪਾਰਸੁ ਪਰਸੁ ਪ੍ਰਮਾਣੁ ॥੪॥
ਆਜੋਨੀ ਸੰਭਵਿਅਉ ਸੁਜਸੁ ਕਲੵ ਕਵੀਅਣਿ ਬਖਾਣਿਅਉ ॥
ਗੁਰਿ ਨਾਨਕਿ ਅੰਗਦੁ ਵਰੵਉ ਗੁਰਿ ਅੰਗਦਿ ਅਮਰ ਨਿਧਾਨੁ ॥
ਗੁਰਿ ਰਾਮਦਾਸ ਅਰਜੁਨੁ ਵਰੵਉ ਪਾਰਸੁ ਪਰਸੁ ਪ੍ਰਮਾਣੁ ॥੪॥
खेलु गूड़॑उ कीअउ हरि राइ संतोखि समाचरॵिओ बिमल बुधि सतिगुरि समाणउ ॥
आजोनी संभविअउ सुजसु कलॵ कवीअणि बखाणिअउ ॥
गुरि नानकि अंगदु वरॵउ गुरि अंगदि अमर निधानु ॥
गुरि रामदास अरजुनु वरॵउ पारसु परसु प्रमाणु ॥४॥
आजोनी संभविअउ सुजसु कलॵ कवीअणि बखाणिअउ ॥
गुरि नानकि अंगदु वरॵउ गुरि अंगदि अमर निधानु ॥
गुरि रामदास अरजुनु वरॵउ पारसु परसु प्रमाणु ॥४॥
हिन्दी अर्थ: अकाल पुरख ने (यह) आश्चर्य (भरी) खेल रची है। (गुरू अरजुन) संतोख में विचर रहा है। निर्मल बुद्धि गुरू (अरजुन) में समाई हुई है। आप जूनियों से रहित और स्वयंभु हरी का रूप हैं। कल् आदि कवियों ने (आप का) सुंदर यश उचारा है। गुरू नानक (देव जी) ने गुरू अंगद को वर बख्शा; गुरू अंगद (देव जी) ने (सब पदार्थों के) खजाना (गुरू) अमरदास (जी) को दिया। गुरू रामदास जी ने (गुरू) अरजुन (साहिब जी) को वर दिया; और उन (के चरणों) को छूना पारस की छोह जैसा हो गया। 4।
ਸਦ ਜੀਵਣੁ ਅਰਜੁਨੁ ਅਮੋਲੁ ਆਜੋਨੀ ਸੰਭਉ ॥
ਭਯ ਭੰਜਨੁ ਪਰ ਦੁਖ ਨਿਵਾਰੁ ਅਪਾਰੁ ਅਨੰਭਉ ॥
ਅਗਹ ਗਹਣੁ ਭ੍ਰਮੁ ਭ੍ਰਾਂਤਿ ਦਹਣੁ ਸੀਤਲੁ ਸੁਖ ਦਾਤਉ ॥
ਆਸੰਭਉ ਉਦਵਿਅਉ ਪੁਰਖੁ ਪੂਰਨ ਬਿਧਾਤਉ ॥
ਨਾਨਕ ਆਦਿ ਅੰਗਦ ਅਮਰ ਸਤਿਗੁਰ ਸਬਦਿ ਸਮਾਇਅਉ ॥
ਧਨੁ ਧੰਨੁ ਗੁਰੂ ਰਾਮਦਾਸ ਗੁਰੁ ਜਿਨਿ ਪਾਰਸੁ ਪਰਸਿ ਮਿਲਾਇਅਉ ॥੫॥
ਭਯ ਭੰਜਨੁ ਪਰ ਦੁਖ ਨਿਵਾਰੁ ਅਪਾਰੁ ਅਨੰਭਉ ॥
ਅਗਹ ਗਹਣੁ ਭ੍ਰਮੁ ਭ੍ਰਾਂਤਿ ਦਹਣੁ ਸੀਤਲੁ ਸੁਖ ਦਾਤਉ ॥
ਆਸੰਭਉ ਉਦਵਿਅਉ ਪੁਰਖੁ ਪੂਰਨ ਬਿਧਾਤਉ ॥
ਨਾਨਕ ਆਦਿ ਅੰਗਦ ਅਮਰ ਸਤਿਗੁਰ ਸਬਦਿ ਸਮਾਇਅਉ ॥
ਧਨੁ ਧੰਨੁ ਗੁਰੂ ਰਾਮਦਾਸ ਗੁਰੁ ਜਿਨਿ ਪਾਰਸੁ ਪਰਸਿ ਮਿਲਾਇਅਉ ॥੫॥
सद जीवणु अरजुनु अमोलु आजोनी संभउ ॥
भय भंजनु पर दुख निवारु अपारु अनंभउ ॥
अगह गहणु भ्रमु भ्रांति दहणु सीतलु सुख दातउ ॥
आसंभउ उदविअउ पुरखु पूरन बिधातउ ॥
नानक आदि अंगद अमर सतिगुर सबदि समाइअउ ॥
धनु धंनु गुरू रामदास गुरु जिनि पारसु परसि मिलाइअउ ॥५॥
भय भंजनु पर दुख निवारु अपारु अनंभउ ॥
अगह गहणु भ्रमु भ्रांति दहणु सीतलु सुख दातउ ॥
आसंभउ उदविअउ पुरखु पूरन बिधातउ ॥
नानक आदि अंगद अमर सतिगुर सबदि समाइअउ ॥
धनु धंनु गुरू रामदास गुरु जिनि पारसु परसि मिलाइअउ ॥५॥
हिन्दी अर्थ: (गुरू) अरजन (साहिब) सद-जीवी हैं। (आपका) मूल्य नहीं आँका जा सकता। (आप) जूनियों से रहत और स्वयंभू हरी का रूप है; (गुरू अरजन) भय दूर करने वाले। पराए दुख हरने वाले। बेअंत और ज्ञान-स्वरूप है। (गुरू अरजन साहिब जी की) उस हरी तक पहुँच है जो (जीवों की) पहुँच से परे है। (गुरू अरजन) भरम और भटकना को दूर करने वाला है। सीतल है और सुखों को देने वाला है; (मानो) अजन्मा। पूरन पुरख सृजनहार प्रकट हो गया है। गुरू नानक। गुरू अंगद और गुरू अमरदास जी की बरकति से। (गुरू अरजन देव) सतिगुरू के शबद में लीन है। गुरू रामदास जी धन्य हैं। जिसने गुरू (अरजन जी को) परस के पारस बना के अपने जैसा कर लिया है। 5।
ਜੈ ਜੈ ਕਾਰੁ ਜਾਸੁ ਜਗ ਅੰਦਰਿ ਮੰਦਰਿ ਭਾਗੁ ਜੁਗਤਿ ਸਿਵ ਰਹਤਾ ॥
ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਪਾਯਉ ਬਡ ਭਾਗੀ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ਮੇਦਨਿ ਭਰੁ ਸਹਤਾ ॥
ਭਯ ਭੰਜਨੁ ਪਰ ਪੀਰ ਨਿਵਾਰਨੁ ਕਲੵ ਸਹਾਰੁ ਤੋਹਿ ਜਸੁ ਬਕਤਾ ॥
ਕੁਲਿ ਸੋਢੀ ਗੁਰ ਰਾਮਦਾਸ ਤਨੁ ਧਰਮ ਧੁਜਾ ਅਰਜੁਨੁ ਹਰਿ ਭਗਤਾ ॥੬॥
ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਪਾਯਉ ਬਡ ਭਾਗੀ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ਮੇਦਨਿ ਭਰੁ ਸਹਤਾ ॥
ਭਯ ਭੰਜਨੁ ਪਰ ਪੀਰ ਨਿਵਾਰਨੁ ਕਲੵ ਸਹਾਰੁ ਤੋਹਿ ਜਸੁ ਬਕਤਾ ॥
ਕੁਲਿ ਸੋਢੀ ਗੁਰ ਰਾਮਦਾਸ ਤਨੁ ਧਰਮ ਧੁਜਾ ਅਰਜੁਨੁ ਹਰਿ ਭਗਤਾ ॥੬॥
जै जै कारु जासु जग अंदरि मंदरि भागु जुगति सिव रहता ॥
गुरु पूरा पायउ बड भागी लिव लागी मेदनि भरु सहता ॥
भय भंजनु पर पीर निवारनु कलॵ सहारु तोहि जसु बकता ॥
कुलि सोढी गुर रामदास तनु धरम धुजा अरजुनु हरि भगता ॥६॥
गुरु पूरा पायउ बड भागी लिव लागी मेदनि भरु सहता ॥
भय भंजनु पर पीर निवारनु कलॵ सहारु तोहि जसु बकता ॥
कुलि सोढी गुर रामदास तनु धरम धुजा अरजुनु हरि भगता ॥६॥
हिन्दी अर्थ: जिस गुरू की महिमा जगत में हो रही है। जिसके हृदय के भाग्य जाग उठे हैं। जो हरी से जुड़ा रहता है। (जिसने) बड़े भाग्यों से पूरा गुरू पा लिया है। (जिसकी) बिरती (हरी में) जुड़ी रहती है। और जो धरती का भार सह रहा है; (हे गुरू अरजुन जी !) तू भय दूर करने वाला। पराई पीड़ा हरने वाला है। कवि कलसहार तेरा यश कहता है। गुरू अरजुन साहिब गुरू रामदास जी का पुत्र। सोढी कुल में धर्म के झण्डे वाला। हरी का भगत है। 6।
ਧ੍ਰੰਮ ਧੀਰੁ ਗੁਰਮਤਿ ਗਭੀਰੁ ਪਰ ਦੁਖ ਬਿਸਾਰਣੁ ॥
ਸਬਦ ਸਾਰੁ ਹਰਿ ਸਮ ਉਦਾਰੁ ਅਹੰਮੇਵ ਨਿਵਾਰਣੁ ॥
ਮਹਾ ਦਾਨਿ ਸਤਿਗੁਰ ਗਿਆਨਿ ਮਨਿ ਚਾਉ ਨ ਹੁਟੈ ॥
ਸਤਿਵੰਤੁ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਮੰਤ੍ਰੁ ਨਵ ਨਿਧਿ ਨ ਨਿਖੁਟੈ ॥
ਗੁਰ ਰਾਮਦਾਸ ਤਨੁ ਸਰਬ ਮੈ ਸਹਜਿ ਚੰਦੋਆ ਤਾਣਿਅਉ ॥
ਗੁਰ ਅਰਜੁਨ ਕਲੵੁਚਰੈ ਤੈ ਰਾਜ ਜੋਗ ਰਸੁ ਜਾਣਿਅਉ ॥੭॥
ਸਬਦ ਸਾਰੁ ਹਰਿ ਸਮ ਉਦਾਰੁ ਅਹੰਮੇਵ ਨਿਵਾਰਣੁ ॥
ਮਹਾ ਦਾਨਿ ਸਤਿਗੁਰ ਗਿਆਨਿ ਮਨਿ ਚਾਉ ਨ ਹੁਟੈ ॥
ਸਤਿਵੰਤੁ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਮੰਤ੍ਰੁ ਨਵ ਨਿਧਿ ਨ ਨਿਖੁਟੈ ॥
ਗੁਰ ਰਾਮਦਾਸ ਤਨੁ ਸਰਬ ਮੈ ਸਹਜਿ ਚੰਦੋਆ ਤਾਣਿਅਉ ॥
ਗੁਰ ਅਰਜੁਨ ਕਲੵੁਚਰੈ ਤੈ ਰਾਜ ਜੋਗ ਰਸੁ ਜਾਣਿਅਉ ॥੭॥
ध्रंम धीरु गुरमति गभीरु पर दुख बिसारणु ॥
सबद सारु हरि सम उदारु अहंमेव निवारणु ॥
महा दानि सतिगुर गिआनि मनि चाउ न हुटै ॥
सतिवंतु हरि नामु मंत्रु नव निधि न निखुटै ॥
गुर रामदास तनु सरब मै सहजि चंदोआ ताणिअउ ॥
गुर अरजुन कलॵुचरै तै राज जोग रसु जाणिअउ ॥७॥
सबद सारु हरि सम उदारु अहंमेव निवारणु ॥
महा दानि सतिगुर गिआनि मनि चाउ न हुटै ॥
सतिवंतु हरि नामु मंत्रु नव निधि न निखुटै ॥
गुर रामदास तनु सरब मै सहजि चंदोआ ताणिअउ ॥
गुर अरजुन कलॵुचरै तै राज जोग रसु जाणिअउ ॥७॥
हिन्दी अर्थ: (गुरू अरजन देव जी ने) धैर्य को अपना धर्म बनाया हुआ है। (गुरू अरजन) गुरमति में गहरा है। पराए दुख दूर करने वाला है। श्रेष्ठ शबद वाला है। हरी जैसा उदार-चिक्त है। और अहंकार को दूर करता है। (आप) बड़े दानी हैं। गुरू के ज्ञान वाले हैं। (आप के) मन में उत्साह कभी कम नहीं होता। (आप) सतिवंत हैं। हरी का नाम-रूप मंत्र (जो। मानो) नौ-निधियां (हैं। जो आप के खजाने में से) कभी खत्म नहीं होती। गुरू रामदास जी का सपुत्र (गुरू अरजन जी) सर्व-व्यापक (का रूप) है; (आपने) आत्मिक अडोलता में (अपना) चँदोआ ताना हुआ है (भाव। आप सहज रूप में आनंद ले रहे हैं)। कल् कवि कहता है। “हे गुरू अरजुन देव ! तूने राज और जोग का आनंद समझ लिया है” (भोग रहा है)। 7।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1407 है, राग Svaiyay Mehl 5 का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Bhatt Kal।
भट्ट सवैये, formal-praise, मगर substance पूरा devotional।
Old Delhi के Karim’s में दोपहर का खाना, और बीच में मौन-सा एक pause।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 37 पंक्तियों का है, 7 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1407” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Svaiyay Mehl 5 राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1408 →, पीछे का: ← अंग 1406।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।