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अंग 532

अंग
532
राग Dayv Gandhaaree
राग: Dayv Gandhaaree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
करहु अनुग्रहु सुआमी मेरे मन ते कबहु न डारउ ॥1॥ रहाउ ॥
साधू धूरि लाई मुखि मसतकि काम क्रोध बिखु जारउ ॥
सभ ते नीचु आतम करि मानउ मन महि इहु सुखु धारउ ॥1॥
गुन गावह ठाकुर अबिनासी कलमल सगले झारउ ॥
नाम निधानु नानक दानु पावउ कंठि लाइ उरि धारउ ॥2॥19॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: (और। अरदास करता रहता हूँ कि) हे मेरे मालिक ! (मेरे पर) मेहर कर।मैं (अपने) मन से (आपको) कभी भी ना विसारूँ। 1।रहाउ। (हे माँ ! मैं प्रभू के आगे अरदास करता रहता हूँ कि) मैं गुरू के पैरों की खाक अपने मुँह पर अपने माथे पर लगाता रहूँ।(और।अपने अंदर से आत्मिक जीवन को मार देने वाली) काम-क्रोध का जहर जलाता रहूँ। मैं अपने आप को सबसे नीचा समझता रहूँ।और अपने मन में (गरीबी स्वभाव वाला) ये सुख (सदा) टिकाए रखूँ। 1। हे भाई ! आएँ।मिल के ठाकुर-प्रभू के गुण गाएं।(गुण गाने की बरकति से) मैं अपने सारे (पिछले) पाप (मन से) झाड़ रहा हूँ। हे नानक ! (कह, हे प्रभू ! मैं आपके पास से ये) दान (माँगता हूँ कि) मैं आपका नाम खजाना हासिल कर लूँ।और इसको अपने गले से लगा के अपने हृदय में टिकाए रखूँ। 2। 19।
देवगंधारी महला 5 ॥
प्रभ जीउ पेखउ दरसु तुमारा ॥
सुंदर धिआनु धारु दिनु रैनी जीअ प्रान ते पिआरा ॥1॥ रहाउ ॥
सासत्र बेद पुरान अविलोके सिम्रिति ततु बीचारा ॥
दीना नाथ प्रानपति पूरन भवजल उधरनहारा ॥1॥
आदि जुगादि भगत जन सेवक ता की बिखै अधारा ॥
तिन जन की धूरि बाछै नित नानकु परमेसरु देवनहारा ॥2॥20॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: देवगंधारी महला 5 ॥ हे प्रभू जी ! (मेहर कर) मैं (सदा) आपके दर्शन करता रहूँ। दिन-रात मैं आपके सुंदर स्वरूप का ध्यान धरता रहूँ।आपके दर्शन मुझे अपने प्राणों से प्यारा लगे। 1।रहाउ। मैं शास्त्र वेद पुराण देख चुका हूँ।मैं स्मृतियों के तत्व भी विचार चुका हूँ। हे दीनों के नाथ ! हे मेरे प्राणों के मालिक ! हे सर्व-व्यापक !सिर्फ आप ही संसार समुंद्र से पार लंघाने की ताकत रखता है। 1। हे प्रभू जी ! आपके भक्तजन आपके सेवक आदि से और युगों के आरम्भ से विषौ-विकारों से बचने के लिए आपका ही आसरा ताकते आ रहे हैं। नानक उन भक्त जनों की पैरों की ख़ाक (आपसे) मांगता है।आप परमेश्वर (सबसे बड़ा मालिक) ही ये दाति देने की समर्था रखने वाला है। 2। 20।
देवगंधारी महला 5 ॥
तेरा जनु राम रसाइणि माता ॥
प्रेम रसा निधि जा कउ उपजी छोडि न कतहू जाता ॥1॥ रहाउ ॥
बैठत हरि हरि सोवत हरि हरि हरि रसु भोजनु खाता ॥
अठसठि तीरथ मजनु कीनो साधू धूरी नाता ॥1॥
सफलु जनमु हरि जन का उपजिआ जिनि कीनो सउतु बिधाता ॥
सगल समूह लै उधरे नानक पूरन ब्रहमु पछाता ॥2॥21॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: देवगंधारी महला 5 ॥ हे प्रभू ! आपके भक्त आपके नाम के रसायन में मस्त रहता है। जिस मनुष्य को आपके प्रेम रस का खजाना मिल जाए।वह उस खजाने को छोड़ के किसी और जगह नहीं जाता (भटकता)। 1।रहाउ। (हे भाई ! प्रभू के नाम-रसायन में मस्त मनुष्य) बैठे ही हरि-नाम उचारता है।सोए हुए भी हरि-नाम में सुरति रखता है।वह मनुष्य हरि-नाम-रस (को आत्मिक जीवन की) खुराक (बना के) खाता रहता है। वह मनुष्य संत-जनों की चरण-धूड़ में स्नान करता है (मानो) वह अड़सठ तीर्थों का स्नान कर रहा है। 1। हे भाई ! परमात्मा के भगत का जीवन कामयाब हो जाता है।उस भक्तजन ने (मानो) परमात्मा को पुत्रवान बना दिया। हे नानक ! वह मनुष्य सर्व-व्यापक प्रभू के साथ गहरी सांझ बना लेता है।वह अपने और सारे ही साथियों को भी संसार-समुंद्र से पार लंघा लेता है। 2। 21।
देवगंधारी महला 5 ॥
माई गुर बिनु गिआनु न पाईऐ ॥
अनिक प्रकार फिरत बिललाते मिलत नही गोसाईऐ ॥1॥ रहाउ ॥
मोह रोग सोग तनु बाधिओ बहु जोनी भरमाईऐ ॥
टिकनु न पावै बिनु सतसंगति किसु आगै जाइ रूआईऐ ॥1॥
करै अनुग्रहु सुआमी मेरा साध चरन चितु लाईऐ ॥
संकट घोर कटे खिन भीतरि नानक हरि दरसि समाईऐ ॥2॥22॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: देवगंधारी महला 5 ॥ हे (मेरी) माँ ! गुरू (की शरण पड़ने) के बिना परमात्मा के साथ गहरी सांझ नहीं पड़ सकती। और और ही (बेमतलब) अनेकों किस्मों के उद्यम करते हुए लोग भटकते फिरते हैं।पर (उन उद्यमों से) वे परमात्मा को नहीं मिल सकते। 1।रहाउ। (हे माँ ! गुरू की शरण के बिना मनुष्य का) शरीर (माया के) मोह (शारीरिक) रोगों और ग़मों से जकड़ा रहता है।अनेकों जूनियों में भटकता फिरता है। साध-संगति (की शरण) के बिना (जूनियों के चक्कर से) ठहराव नहीं हासिल किया जा सकता।(गुरू के बिना) किसी और के पास (इस दुख की निर्विक्ति के लिए) फरियाद भी नहीं की जा सकती। 1। हे माँ ! जब मेरा मालिक प्रभू मेहर करता है।तब ही गुरू के चरणों में चित्त जोड़ा जा सकता है। हे नानक ! (गुरू की कृपा से) भयानक दुख एक छिन में काटे जाते हैं।और।परमात्मा के दीदार में लीन हुआ जाता है। 2। 22।
देवगंधारी महला 5 ॥
ठाकुर होए आपि दइआल ॥
भई कलिआण अनंद रूप होई है उबरे बाल गुपाल ॥ रहाउ ॥
दुइ कर जोड़ि करी बेनंती पारब्रहमु मनि धिआइआ ॥
हाथु देइ राखे परमेसुरि सगला दुरतु मिटाइआ ॥1॥
वर नारी मिलि मंगलु गाइआ ठाकुर का जैकारु ॥
कहु नानक जन कउ बलि जाईऐ जो सभना करे उधारु ॥2॥23॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: देवगंधारी महला 5 ॥ हे भाई ! अपने जिस सेवक पर प्रभू जी दयावान होते हैं। उसके अंदर पूर्ण शांति पैदा हो जाती है।प्रभू की कृपा से आनंद भरपूर हो जाता है।सृष्टि के पालहार पिता का पल्ला पकड़ने वाले बच्चे (संसार समुंद्र में डूबने से) बच जाते हैं।रहाउ। हे भाई ! जिन भाग्यशालियों ने अपने दोनों हाथ जोड़ के परमात्मा के आगे अरजोई की।परमात्मा को अपने मन में अराधा। परमात्मा ने अपना हाथ दे के उनको (संसार समुंद्र में डूबने से) बचा लिया।(उनके किए पिछले) सारे पाप दूर कर दिए। 3। (हे भाई ! जिस सेवक पर प्रभू जी दयावान हुए।उसकी) ज्ञानेन्द्रियों ने प्रभू-पति को मिल के प्रभू की सिफत-सालाह के गीत गाने शुरू कर दिए। हे नानक ! कह, प्रभू के उस भक्त से कुर्बान होना चाहिए जो और सब जीवों का भी पार उतारा कर लेता है। 2। 23।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।