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अंग 531

अंग
531
राग Dayv Gandhaaree
राग: Dayv Gandhaaree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
देवगंधारी 5 ॥
माई जो प्रभ के गुन गावै ॥ सफल आइआ जीवन फलु ता को पारब्रहम लिव लावै ॥1॥ रहाउ ॥
सुंदरु सुघड़ु सूरु सो बेता जो साधू संगु पावै ॥
नामु उचारु करे हरि रसना बहुड़ि न जोनी धावै ॥1॥
पूरन ब्रहमु रविआ मन तन महि आन न द्रिसटी आवै ॥
नरक रोग नही होवत जन संगि नानक जिसु लड़ि लावै ॥2॥14॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: देवगंधारी 5 ॥ हे माँ ! जो मनुष्य परमात्मा के गुण गाता रहता है। परमात्मा के चरणों में प्रेम बनाए रखता है।उसका जगत में आना कामयाब हो जाता है। 1।रहाउ। हे माँ ! जो मनुष्य गुरू का साथ प्राप्त कर लेता है।वह मनुष्य सुजीवन वाला।सुघड़।शूरवीर बन जाता है। वह अपनी जीभ से परमात्मा का नाम उच्चारता रहता है।और मुड़-मुड़ के जूनियों में नहीं भटकता। 1। हे नानक ! (कह) जिस मनुष्य को परमात्मा संत जनों के पल्ले से लगा देता है।उसे संत जनों की संगति में नर्क व रोग नहीं व्याप्तते।
देवगंधारी 5 ॥
चंचलु सुपनै ही उरझाइओ ॥
इतनी न बूझै कबहू चलना बिकल भइओ संगि माइओ ॥1॥ रहाउ ॥
कुसम रंग संग रसि रचिआ बिखिआ एक उपाइओ ॥
लोभ सुनै मनि सुखु करि मानै बेगि तहा उठि धाइओ ॥1॥
फिरत फिरत बहुतु स्रमु पाइओ संत दुआरै आइओ ॥
करी क्रिपा पारब्रहमि सुआमी नानक लीओ समाइओ ॥2॥15॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सर्व-व्यापक प्रभू हर समय उसके मन में उसके हृदय में बसा रहता है।प्रभू के बिना उसको (कहीं भी) कोई और नहीं दिखता। 2। 14। देवगंधारी 5 ॥ हे भाई ! कहीं भी कभी ना टिकने वाला मानस मन (चंचल मन) सपने (में दिखने जैसे पदार्थों) में फसा रहता है। कभी इतनी बात भी नहीं समझता कि यहाँ से आखिर चले जाना है।माया के मोह में बुद्धू बना रहता है। 1।रहाउ। हे भाई ! मनुष्य फूलों (जैसे क्षण-भंगुर पदार्थों) के रंग व साथ के स्वाद में मस्त रहता है।सदा एक माया (एकत्र करने) का ही उपाय करता फिरता है। जब यह लोभ (की बात) सुनता है तो मन में खुशी मनाता है (जहाँ से कुछ प्राप्त होने की आशा होती है) उधर तुरंत उठ दौड़ता है। 1। हे नानक ! (कह) भटकता-भटकता जब मनुष्य बहुत थक गया और गुरू के दर पर आया।
देवगंधारी 5 ॥
सरब सुखा गुर चरना ॥
कलिमल डारन मनहि सधारन इह आसर मोहि तरना ॥1॥ रहाउ ॥
पूजा अरचा सेवा बंदन इहै टहल मोहि करना ॥
बिगसै मनु होवै परगासा बहुरि न गरभै परना ॥1॥
सफल मूरति परसउ संतन की इहै धिआना धरना ॥
भइओ क्रिपालु ठाकुरु नानक कउ परिओ साध की सरना ॥2॥16॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: तब मालिक परमात्मा ने इस पर मेहर की।और।अपने चरणों में मिला लिया। 2। 15। देवगंधारी 5 ॥ हे भाई ! गुरू के चरणों में पड़ने से सारे सुख मिल जाते हैं। (गुरू के चरन सारे) पाप दूर कर देते हैं।मन को सहारा देते हैं।मैं गुरू के चरणों का सहारा ले के ही (संसार-समुंद्र से) पार लांघ रहा हूँ। 1।रहाउ। हे भाई ! मैं गुरू के चरणों की ही टहल सेवा करता हूँ- यही मेरे वास्ते देव-पूजा है।यही देव-मूर्ति के आगे चंदन आदि की भेट है।यही देवते की सेवा है।यही देव-मूर्ति के आगे नमस्कार है। (हे भाई ! गुरू के चरणों में पड़ने से) मन खिल उठता है।आत्मिक जीवन की समझ पड़ जाती है।और।बार-बार जूनियों के चक्कर में नहीं पड़ते। 1। हे भाई ! मैं संत-जनों के चरण परसता हूँ।यही मेरे वास्ते फल देने वाली मूर्ति है।यही मेरे लिए मूर्ति का ध्यान धरना है।
देवगंधारी महला 5 ॥
अपुने हरि पहि बिनती कहीऐ ॥
चारि पदारथ अनद मंगल निधि सूख सहज सिधि लहीऐ ॥1॥ रहाउ ॥
मानु तिआगि हरि चरनी लागउ तिसु प्रभ अंचलु गहीऐ ॥
आंच न लागै अगनि सागर ते सरनि सुआमी की अहीऐ ॥1॥
कोटि पराध महा अक्रितघन बहुरि बहुरि प्रभ सहीऐ ॥
करुणा मै पूरन परमेसुर नानक तिसु सरनहीऐ ॥2॥17॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जब का मालिक प्रभू मुझ नानक पर दयावान हुआ है।मैं गुरू की शरण पड़ा हुआ हूँ। 2। 16। देवगंधारी 5 ॥ हे भाई ! अपने परमात्मा के पास ही अरजोई करनी चाहिए। (धर्म। काम।मोक्ष) ये चारों पदार्थ।आनंद खुशियों के खजाने।आत्मिक अडोलता के सुख।करामाती ताकतें- हरेक चीज परमात्मा से मिल जाती हैं। 1।रहाउ। हे भाई ! मैं तो अहंकार त्याग के परमात्मा के चरणों में ही पड़ा रहता हूँ।भाई ! उस प्रभू का ही पल्ला पकड़ना चाहिए। (इस तरह विकारों की) आग के समुंद्र से सेक नहीं लगता।मालिक प्रभू की शरण ही मांगनी चाहिए। 1। हे भाई ! बड़े-बड़े अकृतज्ञों के करोड़ों पाप परमात्मा बार बार सह लेता है।
देवगंधारी 5 ॥
गुर के चरन रिदै परवेसा ॥
रोग सोग सभि दूख बिनासे उतरे सगल कलेसा ॥1॥ रहाउ ॥
जनम जनम के किलबिख नासहि कोटि मजन इसनाना ॥
नामु निधानु गावत गुण गोबिंद लागो सहजि धिआना ॥1॥
करि किरपा अपुना दासु कीनो बंधन तोरि निरारे ॥
जपि जपि नामु जीवा तेरी बाणी नानक दास बलिहारे ॥2॥18॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! परमात्मा पूर्ण तौर पर करुणामय है उसी की ही शरण पड़ना चाहिए। 2। 17। देवगंधारी 5 ॥ (हे भाई ! जिस मनुष्य के) हृदय में गुरू के चरन टिक जाते हैं। उस मनुष्य के सारे रोग।सारे गम।सारे दुख नाश हो जाते हैं। 1।रहाउ। (हे भाई ! गुरू के चरनों की बरकति से) जन्मों-जन्मांतरों के (किए) पाप नाश हो जाते हैं।(गुरू के चरण हृदय में बसाना ही) करोड़ों तीर्थों का स्नान है।करोड़ों तीर्थों के जल में चॅुभी है। (गुरू के चरणों की बरकति से) गोबिंद के गुण गाते-गाते नाम-खजाना मिल जाता है।आत्मिक अडोलता में सुरति जुड़ी रहती है। 1। हे भाई ! परमात्मा मेहर करके जिस मनुष्य को अपना दास बना लेता है।उसके माया के बंधन तोड़ के उसको माया के मोह से निर्लिप कर लेता है।
छके 3 ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे दास नानक ! (कह, हे प्रभू !) मैं आपसे कुर्बान जाता हूँ।आपकी सिफत-सालाह की बाणी उचार के आपकानाम जप-जप के मैं आत्मिक जीवन प्राप्त कर रहा हूँ। 2। 18।छके 3।
देवगंधारी महला 5 ॥
माई प्रभ के चरन निहारउ ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: देवगंधारी महला 5 ॥ हे (मेरी) माँ ! मैं (सदा) परमात्मा के (सुंदर) चरणों की ओर देखता रहता हूँ

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “देवगंधारी 5 ॥ हे माँ ! जो मनुष्य परमात्मा के गुण गाता रहता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।