माई जो प्रभ के गुन गावै ॥ सफल आइआ जीवन फलु ता को पारब्रहम लिव लावै ॥1॥ रहाउ ॥
सुंदरु सुघड़ु सूरु सो बेता जो साधू संगु पावै ॥
नामु उचारु करे हरि रसना बहुड़ि न जोनी धावै ॥1॥
पूरन ब्रहमु रविआ मन तन महि आन न द्रिसटी आवै ॥
नरक रोग नही होवत जन संगि नानक जिसु लड़ि लावै ॥2॥14॥
चंचलु सुपनै ही उरझाइओ ॥
इतनी न बूझै कबहू चलना बिकल भइओ संगि माइओ ॥1॥ रहाउ ॥
कुसम रंग संग रसि रचिआ बिखिआ एक उपाइओ ॥
लोभ सुनै मनि सुखु करि मानै बेगि तहा उठि धाइओ ॥1॥
फिरत फिरत बहुतु स्रमु पाइओ संत दुआरै आइओ ॥
करी क्रिपा पारब्रहमि सुआमी नानक लीओ समाइओ ॥2॥15॥
सरब सुखा गुर चरना ॥
कलिमल डारन मनहि सधारन इह आसर मोहि तरना ॥1॥ रहाउ ॥
पूजा अरचा सेवा बंदन इहै टहल मोहि करना ॥
बिगसै मनु होवै परगासा बहुरि न गरभै परना ॥1॥
सफल मूरति परसउ संतन की इहै धिआना धरना ॥
भइओ क्रिपालु ठाकुरु नानक कउ परिओ साध की सरना ॥2॥16॥
अपुने हरि पहि बिनती कहीऐ ॥
चारि पदारथ अनद मंगल निधि सूख सहज सिधि लहीऐ ॥1॥ रहाउ ॥
मानु तिआगि हरि चरनी लागउ तिसु प्रभ अंचलु गहीऐ ॥
आंच न लागै अगनि सागर ते सरनि सुआमी की अहीऐ ॥1॥
कोटि पराध महा अक्रितघन बहुरि बहुरि प्रभ सहीऐ ॥
करुणा मै पूरन परमेसुर नानक तिसु सरनहीऐ ॥2॥17॥
गुर के चरन रिदै परवेसा ॥
रोग सोग सभि दूख बिनासे उतरे सगल कलेसा ॥1॥ रहाउ ॥
जनम जनम के किलबिख नासहि कोटि मजन इसनाना ॥
नामु निधानु गावत गुण गोबिंद लागो सहजि धिआना ॥1॥
करि किरपा अपुना दासु कीनो बंधन तोरि निरारे ॥
जपि जपि नामु जीवा तेरी बाणी नानक दास बलिहारे ॥2॥18॥
माई प्रभ के चरन निहारउ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “देवगंधारी 5 ॥ हे माँ ! जो मनुष्य परमात्मा के गुण गाता रहता है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।