सलोक भगत कबीर जी, अंग 1373

SGGS, Ang
1373
सलोक भगत कबीर जी
राग: सलोक खण्ड · रचयिता: भगत कबीर जी
पढ़ने का समय: लगभग 5 मिनट
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सलोक 121 ॥ कबीर सुपनै हू बरड़ाइ कै जिह मुखि निकसै राम ॥ ता के पग की पानहि मेरै तन को चाम ॥121॥

कबीर एक beautiful image। “सुपनै हू बरड़ाइ कै।” सपने में भी “बरड़ाइ” (बड़बड़ाते हुए)। “जिह मुखि निकसै राम।” जिसके मुँह से राम निकले।

यानी जो सोते-सोते भी, सपने में, राम-राम बोले।

“ता के पग की पानहि।” उसके पैरों की “पानहि” (जूती)। “मेरै तन को चाम।” मेरे शरीर का चमड़ा।

कबीर कह रहे हैं: जो ऐसा राम-भक्त है, उसकी जूती बनाने में मेरा चमड़ा काम आए, यह मेरा सौभाग्य।

यह कबीर की सबसे humble line है। कबीर ख़ुद weaver थे, उनके पास skill थी। मगर एक genuine भक्त के सामने, अपना सारा कौशल “जूती बनाने” के काम आ जाए।

दिल्ली में हम “respect” बहुत बाँटते हैं, मगर genuine भक्तों के लिए अक्सर कम। कबीर का message: असली respect वहीं देनी चाहिए।

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सलोक 122 ॥ कबीर मुकता सच केरै नालि होइ ॥ नहीं त बंध्या कलि कै रोइ ॥122॥

कबीर का binary। “मुकता सच केरै नालि होइ।” “सच” (truth) के साथ है, तो “मुकता” (free)।

“नहीं त बंध्या कलि कै रोइ।” नहीं तो “कलि” (कलियुग) के बँधन में रोता रहेगा।

कबीर का सबसे सीधा choice: सच के साथ हो जाओ, freedom। या कलि के बँधन में, रोते रहो।

यह बहुत stark है। कोई middle path नहीं। “थोड़ा सच, थोड़ा झूठ” काम नहीं करता। कलि-युग में, जिसने भी सच का साथ नहीं छोड़ा, वो free है।

“सच” कौनसा? कबीर का सच एक specific definition है, राम-नाम, हरि-स्मरण, satsang, सेवा। यह concrete है, abstract philosophy नहीं।

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सलोक 123 ॥ कबीर निरबैरै नाली कीआ रहै बैर पर मारि ॥ नालै बंध्या भनसा बाझु जब लगु राम न जापि ॥123॥

कबीर एक paradox। “निरबैरै नाली कीआ।” जो “निर्वैर” (बिना दुश्मनी का) है, उसके साथ। “रहै बैर पर मारि।” फिर भी “वैर” पर “मारि” (मार पड़ती है)।

यानी आदमी ख़ुद को “निर्वैर” समझता है, मगर अंदर “वैर” है। और इस वैर का “मार” उसी पर पड़ती है।

“नालै बंध्या।” “नालै” (साथ) बँधा हुआ। “भनसा बाझु।” “भनसा” (भोजन-स्थान, या भणसा, समय) “बाझु” (बिना)।

यानी आदमी समय और स्थान से बँधा है। “जब लगु राम न जापि।” जब तक राम नहीं जपता।

कबीर कह रहे हैं: सब “बंधन” (time, space, ego, vair) तब तक है, जब तक राम-नाम नहीं जपा।

modern psychology कहती है: हम सब इस illusion में जीते हैं कि हम “neutral” हैं, “objective” हैं। मगर देखें अपने reaction patterns, और साफ़ है, हर कोई कितने सारे “वैर” carry करता है। कबीर का solution: राम-नाम, जो इन pattern को dissolve करता है।

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सलोक 124 ॥ कबीर ऐसो जरिओ अनराग जिआनी ॥ प्रब बीराह सिउ निसि बैनी ॥124॥

कबीर एक mystical experience describe कर रहे हैं। “ऐसो जरिओ अनराग।” ऐसा “जरिओ” (जला), “अनुराग” (प्रेम)। “जिआनी।” “जिआनी” (समझदार) हो गया।

यानी एक ऐसी प्रेम-अग्नि जली, कि समझ आ गई।

“प्रब बीराह सिउ।” प्रभु के “बीराह” (विरह, separation) से। “निसि बैनी।” “निसि” (रात) “बैनी” (बैठा, या बेन, बाँसुरी)।

कबीर कह रहे हैं: प्रभु से विरह (separation) में, मैं रात “बैन” (कराहता, या बाँसुरी की तरह बजता) बैठा।

यह सूफ़ी experience है। प्रभु से अलग होने का दर्द, इतना तीव्र कि उससे ज्ञान पैदा होता है। यह “विरह-योग” है।

दिल्ली के किसी भी प्रेमी से पूछो, जब beloved दूर है, तब का दर्द उतना ही intense है। कबीर कह रहे हैं, यही intensity अगर हरि-विरह में बदल जाए, तो परम-ज्ञान।

देखें: अष्टावक्र गीता, “विरह” का तत्त्वज्ञान
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सलोक 125 ॥ कबीर मनु जानै सभ बात जानत ही अउगनु करै ॥ काहे की कुसलात हाथि दीपकु कूऐ परै ॥125॥

कबीर एक sharp diagnosis। “मनु जानै सभ बात।” मन सब बात जानता है। “जानत ही अउगनु करै।” फिर भी जानते हुए, अवगुण करता है।

यह सबसे honest observation है। हम सब जानते हैं क्या ग़लत है, फिर भी करते हैं।

“काहे की कुसलात।” कैसी “कुसलात” (कुशलता, चालाकी)। “हाथि दीपकु कूऐ परै।” हाथ में दीपक है, फिर भी कुएँ में गिर गया।

कबीर का सबसे sharp image: हाथ में दीपक है। यानी ज्ञान है, light है। फिर भी कुएँ में (अज्ञान, अधर्म में) गिर गया।

यह self-sabotage का universal pattern है। जो लोग सब समझते हैं (about health, about finance, about relationships), वो ही most often उन्हीं traps में फँसते हैं।

कबीर judgment नहीं कर रहे, mystery point out कर रहे हैं। यह मानवीय problem है: ज्ञान और कर्म के बीच का gap।

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सलोक 126 ॥ कबीर लागी प्रीति सुजान सिउ बरजै लोग अजान ॥ ता सिउ टूटी किउ बनै जा के जीअ परान ॥126॥

कबीर love-philosophy। “लागी प्रीति सुजान सिउ।” “सुजान” (समझदार, हरि) से प्रीति लगी। “बरजै लोग अजान।” मगर “अजान” (अज्ञानी) लोग रोकते हैं।

यानी हरि से प्रेम हुआ, मगर बाकी लोग (जो उसे नहीं समझते) रोकते हैं, कि “क्या कर रहे हो, यह करना छोड़ो।”

“ता सिउ टूटी किउ बनै।” तो उससे “टूटी” (टूटना) कैसे “बनै”? “जा के जीअ परान।” जिसमें “जीअ” (जीव) और “परान” (प्राण) हैं।

कबीर कह रहे हैं: जो प्राण-स्वरूप है, उससे कैसे टूटूँ? कैसे अलग होऊँ?

यह बहुत relevant है दिल्ली में। जब कोई genuine spiritual path पर चलने लगता है, family, friends, society सब रोकते हैं, “ज़्यादा हो रहा है, normal रहो।” कबीर का जवाब: “मेरा जो प्राण है, उससे कैसे अलग रहूँ?”

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सलोक 127 ॥ कबीर कोठे मंडप हेठाला बनिज करि बैठो भार ॥ सारिआ चीआं नेसरै नांगा बिन सिंगार ॥127॥

कबीर का चित्र। “कोठे मंडप हेठाला।” कोठे (घर) और “मंडप” (canopy) “हेठाला” (नीचे)। “बनिज करि बैठो भार।” व्यापारी बना है, “भार” (बोझ) लिए बैठा।

यानी एक व्यापारी अपने कोठे के नीचे बैठा है, सामान का बोझ लिए।

“सारिआ चीआं नेसरै।” सारे “चीआं” (काम) “नेसरै” (निकल गए)। “नांगा बिन सिंगार।” “नांगा” (नंगा), “बिन सिंगार” (बिना श्रृंगार)।

कबीर कह रहे हैं: व्यापारी का सब काम निकल गया, मगर वो ख़ुद “नंगा” है, “श्रृंगार” बिना।

यह सबसे painful image है। ज़िंदगी भर business में busy, “deals” चलती रहीं। मगर ख़ुद का असली श्रृंगार (राम-नाम) miss हो गया। अंत में आदमी “नंगा” है।

दिल्ली में businessmen को relevant: कितने deals, कितने profit। मगर सोचो, अंदर का “शृंगार” क्या है? वो ही असली है।

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सलोक 128 ॥ कबीर थोरै जलि माछुली झीवरि मेली पाइ ॥ इह टोघनै न छूटसहि फिरि करि समुंदु समाहि ॥128॥

कबीर मछली का drama। “थोरै जलि माछुली।” थोड़े पानी में मछली। “झीवरि मेली पाइ।” “झीवर” (मछुआरा) ने जाल डाला।

“इह टोघनै न छूटसहि।” इस “टोघनै” (कुंडे, या trap) से नहीं छूटेगी। “फिरि करि समुंदु समाहि।” फिर समुद्र में नहीं मिलेगी।

कबीर कह रहे हैं: छोटे पानी में मछली पकड़ी गई, अब समुद्र में वापस नहीं जाएगी।

यह metaphor आत्मा का है। आत्मा “समुद्र” (पारब्रह्म) से आई, मगर “थोड़े जल” (शरीर, संसार) में आ कर “जाल” (कर्म-बंधन) में फँस गई। अब वापस “समुद्र” तक कैसे जाए?

कबीर का urgency: अभी जब possible है, “छूट” जाओ। नहीं तो जाल मज़बूत होता जाएगा। यह scary है, मगर realistic है।

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सलोक 129 ॥ कबीर समुंदु न छोडीऐ जउ अति खारो होइ ॥ पोखरि पोखरि ढूढते भलो न कहिहै कोइ ॥129॥

कबीर का wisdom। “समुंदु न छोडीऐ।” समुद्र मत छोड़ो। “जउ अति खारो होइ।” चाहे “अत्यंत खारा” हो।

यानी समुद्र खारा है, फिर भी मत छोड़ो।

“पोखरि पोखरि ढूढते।” “पोखर” (छोटा तालाब) – तालाब ढूँढ़ते हुए। “भलो न कहिहै कोइ।” कोई “भलो” (अच्छा) नहीं कहेगा।

कबीर कह रहे हैं: समुद्र (असली path, हरि) कठिन है, खारा है। मगर मत छोड़ो। छोटे तालाब (substitutes, alternative paths) ढूँढ़ने में लगे, तो कोई respect नहीं देगा।

modern world में: spiritual seeking में लोग “spiritual shopping” करते हैं, एक guru, फिर दूसरा, फिर तीसरा। कबीर कह रहे हैं, चाहे रास्ता कठिन हो, एक पर रहो।

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सलोक 130 ॥ कबीर निगुसांऐ बहि गए थांघी नाही कोइ ॥ दीन गरीबी आपुनी करते होइ सु होइ ॥130॥

कबीर का full surrender। “निगुसांऐ बहि गए।” “निगुसांऐ” (बिना मालिक के) “बहि” (बहते) गए। “थांघी नाही कोइ।” “थांघी” (सहारा) कोई नहीं।

यानी हम सब बिना मालिक के बह रहे हैं, कोई असली सहारा नहीं।

“दीन गरीबी आपुनी।” “दीन” (modest), “गरीबी” (poverty, humility), अपनी। “करते होइ सु होइ।” करते (हरि) जो करें, सो हो।

कबीर का सबसे surrendered statement: हम छोटे हैं, गरीब हैं (अंदर से)। मगर हरि जो करेंगे, वो हो।

यह न passive है, न defeatist। यह deeply trusting है। “मेरी क्या औक़ात? मैं तो दीन हूँ। मगर तू है, और तेरी मर्ज़ी ही चलेगी।”

यह वही अर्जुन की position है गीता 18.66 में, “सर्व-धर्मान् परित्यज्य।” फ़र्क़ बस इतना: कबीर भोजपुरी में कह रहे हैं।

देखें: गीता 18.66, “सर्व-धर्मान् परित्यज्य”