सलोक भगत कबीर जी, अंग 1370

SGGS, Ang
1370
सलोक भगत कबीर जी
राग: सलोक खण्ड · रचयिता: भगत कबीर जी
पढ़ने का समय: लगभग 6 मिनट
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सलोक 87 ॥ कबीरा संगति साधू की हरि भगति न लाइ ॥ जे को आन कुसंगति लागि उठै जाइ ॥87॥

कबीर की चेतावनी। साधू-संगति में हो जाओ, मगर हरि-भक्ति में मन न लगाओ, तो क्या? “कुसंगति” फिर पकड़ लेगी।

यह subtle है। कबीर कह रहे हैं, सिर्फ़ साधू के पास बैठना काफ़ी नहीं। साथ ही भीतर हरि से connect होना है। नहीं तो वहाँ से उठते ही पुरानी company में लौट जाओगे।

दिल्ली में बहुत लोग weekend retreats करते हैं, satsang attend करते हैं, फिर सोमवार को वही office gossip, वही उसी पुरानी बहस। कबीर पूछ रहे हैं, retreat का असली काम क्या हुआ?

असली बात: साधू-संगति में जाओ, मगर inner work भी करो। ज़मीन तैयार करो, फिर बीज बोओ।

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सलोक 88 ॥ कबीर खूब खाणा खींचरी जा महि अंमृतु लोनु ॥ हेरा रोटी कारने गलि कटावै कोनु ॥88॥

कबीर का सबसे famous food-imagery। “खूब खाणा खींचरी।” खिचड़ी सबसे अच्छा खाना है। “जा महि अंमृतु लोनु।” जिसमें नमक अमृत बन जाता है।

यह simplicity का celebration है। खिचड़ी, सबसे basic खाना, सबसे satisfying। एक चुटकी नमक, अमृत।

“हेरा रोटी कारने गलि कटावै कोनु।” गाय-भैंस का माँस (हेरा) रोटी के साथ खाने के लिए “गल कटवाए” (अपनी जान दे) कौन?

कबीर का stand: vegetarianism, सादगी। माँस खाने के लिए violence है। उसकी ज़रूरत क्या?

मॉडर्न angle: यह सलोक vegan/vegetarian movement का foundational verse है। कबीर 600 साल पहले यही कह गए। और आज भी question relevant है: माँस के पीछे “गल कटवाने” (violence) की क़ीमत क्या?

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सलोक 89 ॥ कबीर गुरु लागा तब जानीऐ मिटै मोहु तन ताप ॥ हरख सोग दाझै नहीं तब हरि आपहि आप ॥89॥

कबीर का गुरु-test। “गुरु लागा तब जानीऐ।” गुरु लगा (मिल गया) तब समझो। “मिटै मोहु तन ताप।” जब मोह और शरीर का ताप मिट जाए।

यानी सच्चा गुरु मिला है इसकी पहचान क्या? तेरा मोह कम होता है, body का stress कम होता है।

“हरख सोग दाझै नहीं।” हर्ष और शोक नहीं जलाते। “तब हरि आपहि आप।” तब हरि ख़ुद-ब-ख़ुद।

यह practical test है। गुरु के साथ रहने का सबसे बड़ा benefit: emotional regulation। हर्ष-शोक स्थिर। अब आदमी पागल नहीं हो जाता हर little thing पर।

दिल्ली में हर महीना नया “guru” आता है, courses, retreats, programs। टेस्ट: क्या आपका हर्ष-शोक स्थिर हुआ है? अगर हाँ, गुरु काम कर रहा है। अगर नहीं, पैसा फिर से check करो।

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सलोक 90 ॥ कबीर रामु न छोडीऐ तनु धनु जाइ तं जाउ ॥ चरन कमल चितु बेधिआ रामहि नामि समाउ ॥90॥

कबीर का stake-in-the-ground statement। “रामु न छोडीऐ।” राम को मत छोड़ो। “तनु धनु जाइ तं जाउ।” शरीर और धन जाए, जाने दो।

यह extreme commitment है। शरीर-धन भी सबसे रिश्तेदार चीज़ें। मगर इनको भी lose करना ठीक है, राम को नहीं।

“चरन कमल चितु बेधिआ।” राम के चरण-कमलों में चित्त “बेध” (पिरो) दिया। “रामहि नामि समाउ।” राम के नाम में समा गया।

कबीर का ज़ोर: अगर तू एक बार राम के चरण-कमलों में चित्त बेध ले, फिर तू कहीं नहीं जाता। तू उसी में समा जाता है।

यह point-of-no-return है। एक बार genuine attachment हुआ हरि से, तो ज़िंदगी की losses minor हो जाती हैं। तू ने एक greater anchor पा लिया।

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सलोक 91 ॥ कबीर जो हम जारा रामु जोति राम जोति महि जो हम जारे ॥ मरि मरि जीवते हम बारंबार बिनसि न जिवत हमारे ॥91॥

कबीर का sub-paradoxical statement। “जो हम जारा रामु जोति।” जिसने हमें “जारा” (जलाया) वो “राम जोति” थी। “राम जोति महि जो हम जारे।” राम-ज्योति में हमने ख़ुद को जलाया।

यानी: राम-ज्योति ने हमें जलाया। और हमने ख़ुद को उसी राम-ज्योति में जलाया। दोनों एक ही action।

“मरि मरि जीवते हम बारंबार।” बार-बार मर-मर कर जीते रहे। “बिनसि न जिवत हमारे।” पर हमारी “जीवन्ती” बिनसी नहीं।

यह कमाल का statement है। कबीर बार-बार “मरे” (अहंकार-मृत्यु), मगर “जीवन्ती” (असली जीवन) कभी नहीं बिनसी।

यह संत का असली अनुभव है। हर ego-attack के साथ एक छोटी मौत। और हर मौत के बाद, स्थिति और बेहतर। यह spiritual immortality है, physical नहीं।

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सलोक 92 ॥ कबीर हमरा को नही हम काहू के नाहि ॥ पारब्रहम सिउ नेहु लाइ कबीर नाहीं नाहीं ॥92॥

अंग 1367 के सलोक 53 की repetition। “मेरा कोई नहीं, मैं किसी का नहीं।”

और अब new line: “पारब्रहम सिउ नेहु लाइ।” पारब्रह्म से नेह लगाओ। “कबीर नाहीं नाहीं।” कबीर कहते हैं, और कुछ नहीं।

फ़र्क़ देखिए: पहले सिर्फ़ “मेरा कोई नहीं।” अब add: “मगर पारब्रह्म से नेह है।” यानी सब रिश्तों का खाली होना, parब्रह्म से रिश्ते की fullness लाता है।

यह spiritual maturation है। पहले detach (कोई नहीं), फिर properly attach (parब्रह्म से)। दोनों step ज़रूरी।

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सलोक 93 ॥ कबीर नैनू नींदै निकालि कै लूणु कै नाहि बेहाइ ॥ लगा रहु जिउ चउहडै घरि घरि लूणु बिकाइ ॥93॥

कबीर salt-merchant की analogy। “नैनू नींदै निकालि कै।” आँख से नींद निकाल। “लूणु कै नाहि बेहाइ।” “लूण” (नमक) “नाहि बेहाइ” (नहीं बहता)।

मतलब? “लगा रहु जिउ चउहडै।” जैसे एक नमक-बेचने वाला “चउहड़ा” (नमक-बेचने वाला) “घरि घरि लूणु बिकाइ” (घर-घर जाकर नमक बेचता है)।

कबीर कह रहे हैं, ऐसे लगे रहो। नींद से उठ कर, चलते रहो। हर “घर” (हृदय) में नाम की “नमक” बेचते रहो।

यह metaphor कमाल का है। कबीर ख़ुद को salt-vendor compare कर रहे हैं। नाम बेचने वाला। हर रोज़, बिना थके, गली-गली।

और यह “नींद से उठना” instruction physical नहीं। यह “बेहोशी” से उठना है। ज़िंदगी की sleep walking से जागना।

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सलोक 94 ॥ कबीर रसरी पाउं पगु बंधन कै कै लागइ ॥ थोरै रंगि लाइ कै तोही न पाइ अनंत राउ ॥94॥

कबीर fragments use कर रहे हैं। “रसरी पाउं पगु बंधन।” रस्सी (निम्न attachment) में पैर बँधे। “कै कै लागइ।” किस-किस पर लगते हैं।

यानी जो आदमी छोटे-छोटे attachments से बँधा है, वो अनेक चीज़ों में फँसा रहता है।

“थोरै रंगि लाइ कै।” थोड़े रंग में लगकर। “तोही न पाइ अनंत राउ।” तू “अनंत राउ” (अनंत राजा, हरि) को नहीं पाता।

कबीर का sharp critique: तू “थोड़े रंग” (छोटे-छोटे attractions) में रंगा रहता है, इसलिए अनंत नहीं मिलता। एक रंग में पूरी तरह डूब जा, फिर अनंत मिलेगा।

दिल्ली के life में, हम सब “थोड़े रंग” में हैं। थोड़ी spirituality, थोड़ी career, थोड़ी fitness, थोड़ी family। कुछ भी पूरा नहीं। कबीर कह रहे हैं, यह “थोड़ा-थोड़ा” approach अनंत को मिटा देता है।

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सलोक 95 ॥ कबीर साथी मिले बहुतु आदमी जिनि पाछै फसले ॥ जितु छिनि साथी छिटकाणीआ तिते छिनि लेइ बने ॥95॥

कबीर friendship-truth बता रहे हैं। “साथी मिले बहुतु आदमी।” बहुत लोग साथी मिलते हैं। “जिनि पाछै फसले।” मगर ये पाछे (बाद में) फँस जाते हैं।

“जितु छिनि साथी छिटकाणीआ।” जिस क्षण साथी छूट जाएँ। “तिते छिनि लेइ बने।” उसी क्षण नया “बनना” (बनना, become) करो।

कबीर एक brutal truth share कर रहे हैं: साथी इकट्ठा होते हैं, फिर वो “फँस” जाते हैं अपनी ज़िंदगी में, और तुम भी फँस जाओगे। जब वो छूट जाएँ, तुम “नया बन” जाओ।

यानी रिश्तों पर depend मत बनो। साथी आते हैं, साथी जाते हैं। तुम्हारी identity ख़ुद की होनी चाहिए।

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सलोक 96 ॥ कबीर कोठरी कोठरी फिरि कै हीरा होइ न दीठ ॥ मंदर महि न उघड़ै ता कउ निमख न रहु अंगि बीठ ॥96॥

कबीर एक tragic image। “कोठरी कोठरी फिरि कै।” एक-एक कमरे में फिरते हो। “हीरा होइ न दीठ।” हीरा (हरि) नहीं दिखाई देता।

यानी पूरे मन्दिर के कमरों में फिरते रहे, मगर हीरा नहीं मिला।

“मंदर महि न उघड़ै ता कउ।” अगर “मंदर” में नहीं खुला, उसको। “निमख न रहु अंगि बीठ।” एक “निमख” (क्षण) भी अंग में मत बैठो।

कबीर कह रहे हैं: अगर मन्दिर तेरा हृदय भी “हीरा” reveal नहीं करता, तो वहाँ क्षण भर भी मत बैठो। बेकार है।

यह harsh है, मगर सही। हम मन्दिर में बैठते हैं घंटों, मगर अन्दर कुछ shift नहीं होता। कबीर कह रहे हैं, बैठने का मतलब नहीं। शिफ्ट नहीं हो रहा, तो उठ कर निकल जा।

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सलोक 97 ॥ कबीर ऐसो जो दीठा बिनु कर बार कीनो हड़ ॥ त्रिऔणी का करनहारा सति न होइ निरंभउ अड़ ॥97॥

कबीर एक mystical observation। “ऐसो जो दीठा।” ऐसा देखा। “बिनु कर बार कीनो हड़।” बिना हाथ के “बार” (समय) में “हड़” (हाड़, हड्डी) बनायी।

यानी एक ऐसा देखने वाला है, जिसने बिना हाथ के, इस संसार की “हड्डियाँ” (structure) बनायी।

“त्रिऔणी का करनहारा।” त्रिगुणी (तीन गुणों वाला) का करने वाला। “सति न होइ निरंभउ अड़।” “निर्भय” “अड़” (बिना अड़चन) है, सत्य।

कबीर एक creator-deity describe कर रहे हैं। बिना हाथ-पैर के, पूरी सृष्टि बनायी। तीनों गुणों का कर्ता। और हर तरह से निर्भय।

यह उपनिषदों का “अदृश्य द्रष्टा” है। जो दिखाई नहीं देता, मगर सब बनाता है। कबीर भोजपुरी में वो ही philosophy कह रहे हैं।

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सलोक 98 ॥ कबीर ससा सूरा है नहीं हाथी बहुत बलाह ॥ हाथीनां जब डोरि लागै तब बाटि लागै ससाह ॥98॥

कबीर एक interesting comparison। “ससा सूरा है नहीं।” “ससा” (खरगोश) “सूरा” (शूरवीर) नहीं। “हाथी बहुत बलाह।” हाथी बहुत बलवान है।

मगर twist: “हाथीनां जब डोरि लागै।” हाथी जब “डोर” (रस्सी, train) से बँधा। “तब बाटि लागै ससाह।” तब “बाट” (रास्ता) “ससा” लग जाता है (छोटा सा खरगोश)।

यानी हाथी कितना भी बड़ा हो, अगर बँधा है, तो छोटे खरगोश से भी कम। और खरगोश आज़ाद, अधिक “बड़ा” है।

कबीर का point: power बाहर से नहीं, freedom से आती है। और freedom अंतर से आती है।

corporate world में कोई CEO बँधा हुआ है expectations, board, stock price से। और एक छोटा सा spiritual seeker अपनी छोटी सी “खोपड़ी” में, मगर पूरी तरह आज़ाद। कौन “बड़ा”?

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सलोक 99 ॥ कबीर पंथु पनिमारीआ बहुत न रोहडा ॥ जै आसा परदेसी जिउ साह ह तिउ ओह बहडा ॥99॥

कबीर एक beautiful spotted-cattle imagery। “पंथु पनिमारीआ।” “पंथु” (path) पर “पनिमारी” (पानी वाले बैल, water buffalo) चल रहे हैं। “बहुत न रोहडा।” बहुत “रोहड़ा” (नफ़रत, complaint) नहीं।

यानी पानी ढोने वाले बैल, अपना काम करते जाते हैं, बिना complain।

“जै आसा परदेसी जिउ साह ह।” जैसे “परदेसी” (विदेशी, traveler) की आशा “साह” (खींची हुई)। “तिउ ओह बहडा।” वैसा ही वो “बहडा” (बहता रहता है)।

कबीर कह रहे हैं: एक परदेसी (travel करता हुआ) की आशा हमेशा “खींची” (pulled) रहती है, वो आगे की तरफ़ बढ़ता है। ऐसे ही ज़िंदगी की धारा।

और एक beautiful insight: काम करते रहो, बिना complain। पानी ढोने वाला बैल model है। ज़िंदगी एक काम है, और तू एक काम-करने-वाला।

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सलोक 100 ॥ कबीर आजि कालि ले तीसरा अंति ले पाडुसु पाजि ॥ जिन कै हीअरै राम बसै ते बैरागी राजि ॥100॥

सौवाँ सलोक। एक मील-पत्थर। “आजि कालि ले तीसरा।” आज, कल, और तीसरे दिन (कभी)। “अंति ले पाडुसु पाजि।” अंत में “पाडुस” (पड़ौसी?, या patel) “पाजि” (पास)।

अर्थ बहुत clear नहीं, मगर general theme: समय (आज, कल, परसों) धीरे-धीरे आता है। अंत में पड़ौसी जैसा (मौत) पास होती है।

“जिन कै हीअरै राम बसै।” जिनके हृदय में राम बसता है। “ते बैरागी राजि।” वो “बैरागी” (renunciant) राज (राजा) हैं।

यह royal-renunciant paradox है। जो “त्यागी” है, वही असली राजा है। क्योंकि उसे कुछ चाहिए नहीं, उसका सब कुछ है।

दिल्ली के बड़े-बड़े मँहगे apartment के मालिक, हर month EMI से डरते हैं। और एक साधू एक झोले के साथ, fully राजा। यह कबीर का सबसे consistent observation है।